श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उनकी भौंहें तन गयीं और वे बोले- 'मृत्युके समीप | शास्त्रोंका स्वाध्याय होता है और न यज्ञादिकी आहुतियाँ पहुँचे हुए किस दुष्टने अकस्मात् इस उपवनकी रचना | ही पड़ती हैं। सभी देवता अपने-अपने स्थानोंसे च्युत हो कर डाली है।' कामदेव भयसे संत्रस्त होकर छिप गया, | गये हैं। हे अनघ ! उन सभी देवताओंने आपको तपस्यामें किसीके लिये दृश्य नहीं हुआ। उसने उस समय इन्द्रादि | लीन देखकर आपको देहभावकी प्राप्ति करानेके लिये देवताओंका स्मरण किया, किंतु स्मरण किये जानेपर भी | शीघ्र ही कामदेवको बुलाकर आपके पास भेजा, किंतु वे देवता वहाँ नहीं आये ॥ ८-१० ॥ | वह आप श्रेष्ठ व्यक्तिके प्रति किये गये अपराधके कारण सभी देवता कार्यकी सफलताको देखनेके लिये अपने- | भस्म हो गया है ॥ १५-१७ ॥ अपने विमानोंमें आरूढ़ हो गये थे। उसी समय भगवान् | हे देव! इस समय आप हमारी रक्षा करें। हम सब शिवने कामदेवको देखा, जो अत्यन्त लघु एवं कृश | आपकी शरणमें आये हैं। आप शरणमें आये हुएकी रक्षा शरीरवाला हो गया था। तब उन्होंने कामदेवको भस्म करनेके | करनेवाले हैं-इस रूपमें आप तीनों लोकोंमें विख्यात लिये अपने तीसरे नेत्रको खोला। उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी, | हैं। हे महादेव ! हे करुणाकर ! हे शंकर ! आपकी शरण स्वर्ग तथा पाताल भी कम्पित हो उठा ॥ ११-१२॥ | ग्रहण करनेकी इच्छा रखनेवाले दीन देवताओंके अपराधको 'इस कामदेवको मत मारिये' - ऐसा जबतक देवता | आप क्षमा करें ॥ १८-१९॥ कह ही रहे थे कि उनके नेत्रसे उत्पन्न अग्निने उसी बीच | ब्रह्माजी बोले- हे मुने ! अपने चरणोंमें सिर रखी कामदेवको भस्म कर डाला। अब वह केवल भस्ममात्र | हुई उन भिल्लीरूपा पार्वतीके इस प्रकारके वचनोंको ही शेष रह गया था। तदनन्तर तीनों लोकोंके कल्याणकी | सुनकर भगवान् शंकरने अपनी नेत्राग्निको शान्त कर कामनासे भिल्लीरूप धारण की हुई देवी पार्वतीने दोनों | लिया और प्रसन्नमुख होकर वे कहने लगे-उठो-उठो, हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और बड़े ही | आज तुमने मेरे चरणोंमें गिरकर अपने वचनोंके द्वारा तथा आदरपूर्वक उनसे प्रार्थना की ॥ १३-१४॥ | अपने स्नेहके द्वारा देवताओंकी रक्षा की है ॥ २०-२१ ॥ हे शंकर ! तीनों लोकोंको जला देनेवाली इस | तदनन्तर उन भिल्लीरूपा पार्वतीका सहसा अग्निको आप शान्त करें। ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्तकर | आलिंगनकर भगवान् शंकरने उन्हें अपनी गोदमें ले लिया दैत्य तारक अत्यन्त बलशाली हो गया है। उसने तीनों | और वे उन्हें लेकर अपने वृषभमें आरूढ़ होकर लोकोंको आक्रान्त कर डाला है। अब न तो कहीं वेदादि | कैलासकी ओर चले गये ॥ २२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कामदहन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥
पचासीवाँ अध्याय भगवान् शिव-पार्वतीका क्रीडा-विहार, देवताओंकी प्रार्थनापर अग्निदेवका भिक्षुकरूपमें उनके समीप जाकर भिक्षाकी याचना करना, माता पार्वतीका भिक्षाके रूपमें उन्हें शिवतेज प्रदान करना, अग्निदेवद्वारा उस तेजको गंगामें प्रवाहित करना, छः कृत्तिकाओंद्वारा शिवतेजका धारण और षण्मुखका प्रादुर्भाव
ब्रह्माजी बोले- भगवान् शिवके आलिंगनके | मध्यमें गयीं, किंतु वहाँ भी उन्हें शान्ति नहीं मिली। प्रभावसे भिल्लीरूपा वे पार्वती कामाग्निसे उद्दीप्त हो | स्थलपर भी उन्हें निद्रा नहीं आती थी ॥ १-२ ॥ उठीं और जैसे मछली जलरहित स्थानमें छटपटाती है, | कपूर तथा चन्दन (-जैसे शीतल पदार्थ) भी उन्हें वैसे ही उन्हें भी कहीं भी सुखकी प्राप्ति नहीं हो रही | अधिक ताप प्रदान कर रहे थे। कोई भी शीतल पदार्थ थी। अपने शरीरमें शीतल उशीरका लेप करके वे जलके | उन्हें सन्तोष नहीं प्रदान कर पा रहा था ॥ ३ ॥