श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०८५ ] * भगवान् शिव-पार्वतीका क्रीडा-विहार * २४९ इसी प्रकार बहुत समय बीत जानेपर वे अस्थि और चर्ममात्र शरीरवाली हो गयी थीं। तदनन्तर भगवान् शंकरके पास जाकर गिरिजाने यह वचन कहा- ॥४॥ हे देव! आप मेरे विषयमें कुछ भी नहीं सोच रहे हैं कि मैं किस अवस्थाको प्राप्त हो गयी हूँ। अहो! बड़े आश्चर्यकी बात है कि दग्ध हुआ भी वह कामदेव मुझे अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है ॥ ५ ॥ मैंने उसे शान्त करनेके नानाविध उपाय किये, किंतु वह शान्त नहीं हुआ। हे मेरे स्वामिन् ! जिस उपायके द्वारा शान्ति प्राप्त हो, आप वह उपाय करें ॥ ६॥ अपनी प्रियाका हित करनेवाले भगवान् शंकरने इस प्रकारके वचनोंको सुनकर एकान्त स्थानमें उनका हाथ पकड़कर उन्हें शय्यापर बैठाया। कामदेवके द्वारा वशीभूत किये गये शंकरने उनके साथ यथेष्ट रमण किया। कामदेवने मृत्युको प्राप्त करके भी देवताओंके द्वारा कहे गये महान् कार्यको सम्पादित कर दिया ॥ ७-८॥ [ऐसा करके उसने] 'कामदेव अतुलनीय धनुर्धर है' इस प्रसिद्धिको पा लिया। क्रीडाविलासमें निमग्न उन उमा-महेश्वरके साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ९ ॥ अपने-अपने स्थानोंसे च्युत हुए देवता तथा मुनिगण कामदेवके ऐसे प्रयत्नको सुनकर पुनः कैलासपर्वतपर आये और वहाँ भगवान् शिवको क्रीडामें निमग्न जानकर वे चिन्ताके कारण व्याकुल चित्तवाले हो गये एवं मौन होकर वहाँ स्थित हो गये। तारकासुरसे भयभीत होकर वे पुनः गुफामें चले गये ॥ १०-११ ॥ इस तारकासुरका वध कब होगा, कब हम अपने स्थानोंमें जायँगे और कब भगवान् शंकर हमारे दुःखका विनाश करेंगे- इसी चिन्तासागरमें जब वे ब्रह्मा आदि देवता निमग्न थे, उसी समय देवगुरु बृहस्पतिजी उनसे बोले- 'हे अनघो! आप लोग मेरे वचनको सुनें ॥ १२-१३ ॥ आप लोग अग्निदेवको अन्य रूप धारण कराकर शिवके पास भेजें, वे शीघ्र ही शंकरको प्रबोधित करेंगे, इससे आपका कार्य बन जायगा। तब देवताओंने अग्निदेवको बुलाया और विविध प्रकारकी स्तुतियोंसे उनका स्तवन किया ॥ १४१/२ ॥ देवता बोले- हे ब्रह्मन् ! आपसे ही समस्त यज्ञक्रियाएँ और सभी संस्कार सम्पन्न होते हैं। आप ही जलके कारणभूत हैं, आप देवताओंके मुख हैं, आप गार्हपत्य आदि नामोंसे अग्निहोत्रके प्रणेता हैं। हे ईश! आप ही नित्यप्रति [बड़वानलरूपसे] समुद्रकी महान् जलराशिका पान किया करते हैं। आप ही मनुष्योंके जठरदेशमें जठराग्नि नामसे षड्रसोंका पाचन करते हैं॥ १५-१७॥ आप ही सभी जीवोंकी हड्डियोंके प्रत्येक जोड़ोंमें स्थित होकर उन्हें संचालित करते हैं, आपसे रहित होनेपर जीव 'प्रेत' इस संज्ञाको प्राप्त करता है और आपके द्वारा ही मृत शरीरका दाह किया जाता है ॥ १८ ॥ हे देवेश ! प्रत्येक प्राणियोंके प्राण धारण करनेमें आप ही हेतुभूत हैं। आप अग्निके बिना तथा जलके बिना कहीं भी अन्नको पकाया नहीं जा सकता ॥ १९ ॥ आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही रुद्र हैं और आप ही अनेक रूप धारण करनेवाले सूर्यदेवके रूपमें उत्पन्न होते हैं। हे जगदीश्वर ! आप ही क्रोधके मूलकारण हैं ॥ २० ॥ जहाँ-जहाँ भी तेज दिखलायी पड़ता है, वह सब आपका ही रूप है। अतः तीनों लोकोंका उपकार करनेवाले हे अग्निदेव ! आपसे आज हम देवता प्रार्थना करते हैं* ॥ २१ ॥ हे विभो ! उस तारकासुरने अपने आक्रमणद्वारा
- देवा ऊचुः त्वत्तो यज्ञक्रिया ब्रह्मन् संस्काः सर्व एव हि॥ अपां त्वमसि हेतुश्च देवानां मुखमेव च। अग्निहोत्रप्रणेता त्वं गार्हपत्यादिनामभिः ॥ त्वमेव पिबसीशाब्धिवारि नित्यं महत्तरम्। त्वमेव पचसे नृणां जठरे षड्रसानपि ॥ त्वमेव सर्वजन्तूनां सन्धी सन्धी विचेष्टसे । त्वया त्यक्तं प्रेतसंज्ञां लभते दह्यते त्वया ॥ हेतुस्त्वमसि देवेश जन्तूनां प्राणधारणे । त्वयाद्भिश्च विना चान्नं पक्तुं शक्यं न च क्वचित् ॥ त्वमेव ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्यश्चानेकरूपधृक् । त्वमेव जायसे मूलं क्रोधस्य जगदीश्वर ॥ यत्र यत्र भवेत्तेजस्तत्तद्रूपं तवैव च । अतस्त्वां प्रार्थयामोऽद्य त्रिलोक्या उपकारक ॥