श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया है। आप उस | लिये वहाँपर आयीं ॥ ३११/२ ॥ आकाशवाणीको जानते ही हैं और कामदेवकी जो दुर्गति | तदनन्तर अग्निने यह समझकर गंगाजीके शीतल हुई है, वह भी आपको ज्ञात है ॥ २२ ॥ | जलमें उस तेजको डाल दिया कि ये गंगाजी यदि चिरकालसे क्रीडामें निमग्न भगवान् शंकर और | भगवान् शिवकी प्रिया होकर जलरूपमें स्थित हैं, तो ये पार्वतीको आप उद्बुद्ध करें। आप अपना दूसरा रूप | निश्चित ही इस वीर्यरूप तेजको धारण करनेमें समर्थ धारणकर वहाँ जाकर भिक्षाकी याचना करें। ऐसा | होंगी ॥ ३२१/२ ॥ करनेसे सम्पूर्ण जगत्का तथा हमारा भी कल्याण | तदनन्तर स्नानके लिये आयी हुई उन छः स्त्रियोंने होगा ॥ २३१/२ ॥ | उस शिववीर्यके छः भागकर पृथक्-पृथक् उसे ग्रहण ब्रह्माजी बोले-देवताओंका ऐसा वचन सुनकर | कर लिया। वे अग्निदेव उसी क्षण अन्तर्धान हो गये और वे अग्निदेव काषाय वस्त्र धारण करके ब्राह्मणका रूप | दूर पहुँच जानेपर उनके शरीरका शूल भी दूर हो बनाकर उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् शंकर एवं | गया ॥ ३३-३४ ॥ पार्वती क्रीडामें निमग्न थे। उन्होंने बाहर ही स्थित होकर | स्नानके अनन्तर वे स्त्रियाँ वस्त्र धारणकर अपने- 'भिक्षा दीजिये'-इस प्रकारसे तीन बार बड़े ही ऊँचे | अपने घर चली गयीं। उनके पतियोंने देखा कि उनकी स्वरमें कहा। उन दोनोंने वह ध्वनि सुन ली। तदनन्तर | पत्नियोंका मुखमण्डल अत्यन्त प्रकाशमान हो रहा है। उन अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर वे दोनों आपसमें कहने | मुनीश्वरोंने ज्ञानदृष्टिसे यह जान लिया कि ये गर्भावस्थाको लगे कि वस्त्र धारण कर लो। यह कौन है, जो यहाँ | प्राप्त हो गयी हैं। उन्होंने उन्हें गृहसे बाहर कर दिया और आ गया है, भिक्षामें इसे कौन-सी वस्तु दी जाय-इस | अपना मुख न दिखलानेको कहा ॥ ३५-३६ ॥ प्रकार वे विचार करने लगे ॥ २४-२७॥ | तब वे पुनः एकत्र होकर सरकण्डोंसे सुशोभित भगवान् शंकरके तेजको धारण करनेमें असमर्थ | गंगाजीके तटपर पहुँचीं और उन्होंने अपने-अपने गर्भको देवी उमाने उस तेजको अपनी अंजलिमें धारण किया | उन सरकण्डोंमें त्याग दिया। तदनन्तर स्नान करके पवित्र और भवितव्यताको भलीभाँति समझते हुए उन्होंने वह | होकर वे अपने घरोंको गयीं ॥ ३७ ॥ तेज उन भिक्षुक अग्निदेवको समर्पित कर दिया ॥ २८ ॥ | अपने-अपने गर्भका परित्यागकर जब वे छहों अग्निदेवने विचार किया कि इस तेजको यदि मैं | स्त्रियाँ वापस चली गयीं, तो छः मुखों तथा बारह भूमिपर गिरा देता हूँ, तो यह चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण | हाथोंवाला एक बालक वहाँ प्रादुर्भूत हो गया ॥ ३८ ॥ त्रिलोकीको दग्ध कर डालेगा, अतः उन्होंने भगवान् | उसके हुंकारमात्रसे ग्रह-नक्षत्र एवं तारे आकाशसे शंकरके उस तेजको उन दोनोंके शापसे भयभीत होकर | पृथ्वीपर गिरने लगे। सम्पूर्ण धरती, शेषनाग तथा स्वयं पी लिया। इसके फलस्वरूप वे अग्निदेव गर्भवान् | पाताललोक काँप उठा। वृक्ष उखड़ने लगे, सूर्य बादलोंसे हो गये, उन्हें अत्यन्त लज्जा तथा संताप हो उठा। वे | आच्छादित हो गये। इसी समय दिव्य दृष्टिवाले देवर्षि अग्नि जहाँ-जहाँ भी जाते, कहीं भी उन्हें शान्ति प्राप्त | नारद वहाँ आ उपस्थित हुए ॥ ३९-४० ॥ नहीं हुई ॥ २९-३० ॥ | नारदजी भगवान् शंकरका दर्शन करने जा रहे थे, तुला राशिमें भगवान् सूर्यके संक्रमण करनेपर एक | मार्गमें उन्होंने उस बालकको देखा। वह बालक अत्यन्त दिन उषाकालमें ही उठकर वे अग्निदेव गंगामें स्नान | दीप्तिमान्, महान् बलशाली तथा अपने तेजके कारण करनेके लिये गये। स्नानसे पूर्व वे जबतक शौच आदि | दुर्दर्शनीय था ॥ ४१ ॥ क्रियाओंसे निवृत्त हुए, उसी बीच छः स्त्रियाँ भी | ध्यान लगाकर उस बालकके विषयमें सब कुछ श्रद्धाभक्तिके साथ कार्तिकमासमें गंगाजीमें स्नान करनेके | जानकर वे नारद मौन होकर कैलासपर्वतपर चले आये