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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 656 में से

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पृष्ठ 260

२५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

आजसे पहले तैंतीस करोड़ देवताओंमें मैं ही सबसे अधिक सुन्दर था और सभीके द्वारा सुन्दर पुरुषकी उपमा मुझसे ही दी जाती रही है। हे देवेश ! अपने शरीरसे रहित मैं प्रेतकी भाँति कैसे रहूँ? अतः हे महादेव ! कृपा करके आप मुझपर अनुग्रह करें ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर प्रणाम करनेवाले उन अनंगको भगवान् शिवने गणेशजीका एकाक्षर मन्त्र प्रदान किया और उसका अनुष्ठान करनेके लिये उन्हें आज्ञा प्रदान की। तदनन्तर अनंग एक रमणीय जनस्थानमें गये, वह स्थान सब प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला था। भगवान् शंकरजीकी आज्ञासे अनंगने वहाँ अनुष्ठान किया। उन्होंने गणेशजीके ध्यानपरायण होकर उनके एकाक्षर मन्त्रका जप करते हुए सौ वर्षपर्यन्त महान् तप किया ॥ २८-३० ॥ रतिके साथ [वहाँ] स्थित वे नित्य वायुका ही आहार करते थे। तदनन्तर देवदेवेश भगवान् गजानन उनपर प्रसन्न हो गये और उनके समक्ष प्रकट हो गये। उनकी दस भुजाएँ थीं, वे श्रेष्ठ मुकुटसे सुशोभित थे, देदीप्यमान रत्नोंकी आभासे रमणीय, कुण्डलों और बाजूबन्दोंसे वे मण्डित थे, करोड़ों सूर्योंके समान उनकी आभा थी, मोतियोंकी मालाओंसे वे सुशोभित हो रहे थे, उन्होंने दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण कर रखे थे, दिव्य गन्धोंका अनुलेपन किया हुआ था, उनकी सूँड़ तथा उनका मुखमण्डल सिन्दूरके समान अरुण वर्णका था। दस आयुधवाले उनके दस हाथ सुशोभित हो रहे थे, उनकी नाभि शेषनागसे अलंकृत थी, विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे सुशोभित हो रहे थे, उनके कन्धे सिंहके समान थे, वे महान् समृद्धिसे सम्पन्न तथा अपनी चीत्कार ध्वनिसे अखिल लोकोंको त्रास पहुँचानेवाले थे ॥ ३१-३४ १/२ ॥ भगवान् गणेशजीके प्रकट हो जानेपर इन्द्र आदि देवता, सभी मुनिगण, अप्सराओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा किन्नरोंके साथ वहाँ आये और दिव्य वाद्योंकी ध्वनि करते हुए उन सबने पृथक्-पृथक् होकर सोलह उपचारोंके द्वारा भगवान् गणेशजीकी पूजा की ॥ ३५-३६ १/२ ॥

तदनन्तर उठकर कामदेवने सर्वप्रथम सभी देवताओंको प्रणाम करके उनके चरणोंमें वन्दना की, इसी प्रकार मुनियोंको भी उन्होंने प्रणाम किया। तदनन्तर कृपालु भगवान् गणेशकी महिमाका वे गान करने लगे ॥ ३७-३८ ॥ काम बोले—हे भक्तवत्सल ! आप धन्य हैं। सभी देवताओंमें आप परब्रह्मस्वरूप हैं। आप निराकार होनेपर भी साकाररूपमें प्रकट हुए हैं ॥ ३९ ॥ आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया है। मेरी तपस्या भी आज धन्यतर हो गयी है, जो कि सभी दुःखोंका मोचन करनेवाले आपके युगल-चरणोंका आज मुझे दर्शन हुआ है ॥ ४० ॥ आपका दर्शन सभी सिद्धियोंका कारण और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाला है। आज मेरे दोनों नेत्र धन्य हो गये हैं, जिन्होंने परम पुरुष परमात्माका दर्शन किया है ॥ ४१ ॥ जिनके यथार्थ स्वरूपको न वेदान्तदर्शनके विद्वान् जानते हैं, न सांख्यदर्शनके मनीषी और न योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि आदि ही जानते हैं। वे 'नेति-नेति' कहकर मौन हो जाते हैं। जिनके स्वरूप-निर्धारणमें वेद भी कुण्ठित हो जाता है। जिन अखिलेश्वरके एक-एक रोम-कूपमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं, उन प्रभु गणेशजीका मैंने जिस मन्त्रके प्रभावसे दर्शन किया है, वह मन्त्र भी अत्यन्त धन्य है ॥ ४२-४३ ॥ गणेशजी बोले—हे रतिपते ! तुमने ठीक ही कहा है, ब्रह्मा आदि देवता भी मुझे नहीं जानते हैं। जब मैं साकार रूप धारण करता हूँ, तब वे मुझे जान पाते हैं ॥ ४४ ॥ हे काम ! मैं तुम्हारी तपस्या और मन्त्रानुष्ठानसे प्रसन्न हुआ हूँ, इसी कारण इस समय तुमने मेरे अनुग्रहसे ही मेरा दर्शन किया है। हे काम ! मुझसे तुम सम्पूर्ण मनोरथोंको माँग लो, मैं तुम्हें इच्छित वर प्रदान करता हूँ ॥ ४५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—भगवान् गणेशका ऐसा वचन सुनकर मनोभव कामदेव उनसे पुनः बोले और भगवान् शिवद्वारा किये सम्पूर्ण वृत्तान्तको उन्हें क्रमशः बतलाया। कामदेवने प्रसन्न होकर वर प्रदान करनेवाले उन भगवान् गणेशजीको अपनी अनंगताकी प्राप्ति, रतिके विलाप, मन्त्रकी प्राप्ति,