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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 656 में से

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पृष्ठ 259

उ०ख०-अ०८८ ] * कामदेवके दग्ध किये जानेपर कामपत्नी रतिद्वारा भगवान् शिवकी प्रार्थना * २५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

(बायाँ स्तम्भ) ब्रह्माजी बोले—रतिके द्वारा इस प्रकारसे स्तुत हुए भगवान् शिव उसपर प्रसन्न हो गये और बोले— ॥ ८१/२ ॥ शम्भु बोले—सुन्दर मुखमण्डलवाली हे कामदेवकी पत्नी ! हे महाभागे ! तुम वर माँगो। तुम्हारी इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर तुम्हारे मनमें विद्यमान जो-जो कामनाएँ हैं, मैं उन सभीको देता हूँ॥ ९१/२ ॥ भगवान् शिवके इस प्रकारके वचनको सुनकर रति अत्यन्त प्रसन्न हो गयी। उसने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर सौभाग्यकी अभिलाषा करनेवाली वह रति अत्यन्त व्याकुल होकर उन भगवान् शिवसे बोली— ॥ १०१/२ ॥ रति बोली—हे स्वामिन् ! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे श्रेष्ठ वचनको सुनें। हे त्रिलोचन ! यद्यपि पृथ्वी, आकाश तथा पातालमें भी स्त्रियोंमें कामिनियोंके गुण होते हैं, किंतु उन सबमें किसीमें भी मेरे लावण्यके तुल्य लावण्य लेशमात्र भी नहीं है ॥ ११-१२ ॥ मुझे देखकर इन्द्र आदि देवताओंने भी लज्जारहित होकर अपने तेजका परित्याग कर दिया था। उससे मुझे महान् लज्जा उत्पन्न हो गयी थी, उस लज्जाको आप दूर कर दें। हे शंकर ! मेरे पति कामदेवके न रहनेपर मेरा सौन्दर्य सर्वथा निष्प्रयोजन हो गया है। 'कामपत्नी रति विधवा हो गयी है' इस प्रकारकी

(दायाँ स्तम्भ) अपकीर्ति मुझे जला डाल रही है ॥ १३-१४॥ हे देवेश ! हे दयानिधे ! मुझे पतिका दानकर मेरी रक्षा कीजिये। इस प्रकारसे उस रतिके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर कामदेवकी पत्नी रतिको आनन्दित करते हुए स्निग्ध वाणीमें बोले ॥ १५१/२ ॥ शिव बोले—हे कल्याणि ! तुम चिन्ता मत करो और अब लज्जा भी मत करो। हे बाले ! तुम्हारे द्वारा स्मरणमात्र किये जानेपर वे कामदेव तुम्हें दर्शन देंगे। मनसे चिन्तित किये जानेपर भी वे तुम्हारे पास आ जायँगे। इसी कारण 'मनोभू' उनका यह नाम प्रसिद्ध होगा ॥ १६-१७ ॥ कामदेव तुम्हारे सभी मनोरथोंको पूर्ण करेंगे और तुम सर्वत्र मान्य हो जाओगी। जब वे भगवान् विष्णुके द्वारा देवी लक्ष्मीसे उत्पन्न होंगे, तब प्रद्युम्न नामसे तुम्हारे पतिके रूपमें लोगोंमें प्रसिद्ध होंगे। हे महाभागे ! इस समय तुम अपने घर लौट जाओ ॥ १८-१९ ॥ शिवकी आज्ञा मानकर वह रति अपने अत्यन्त सुन्दर भवनमें आ गयी। वहाँ आकर उसने अपने पतिका स्मरण किया, तो वे अनंग उसके समक्ष प्रकट हो गये। ईश्वरकी इच्छासे ही वे अनंग उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए, तब आश्चर्यचकित वह रति अपने पतिके साथ अत्यन्त आनन्दित हो गयी। तदनन्तर वे अनंग भगवान् शिवके पास गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे— ॥ २०-२११/२ ॥ अनंग बोले—हे देवेश्वर ! बिना अपराधके ही मुझे आपने अनंग (बिना देहवाला) क्यों बना दिया ? ॥ २२ ॥ हे विभो ! आपसे ही स्कन्दकी उत्पत्ति होगी—ऐसा जाननेवाले एवं तारकासुरद्वारा पीड़ित इन्द्रादि देवताओं तथा मुनियोंने ही आपकी तपस्याको भंग करनेके लिये मुझसे कहा था। इसीलिये मैंने सभीका उपकार करनेकी दृष्टिसे वैसा कर्म किया था ॥ २३-२४ ॥ तीनों लोकोंमें परोपकारके समान दूसरा कोई पुण्य नहीं है। हे सुरेश्वर ! मेरे लिये वह सब मेरे दुर्भाग्यके कारण विपरीत ही हुआ ॥ २५ ॥