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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 656 में से

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पृष्ठ 258

२५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तारकासुरके मारे जानेपर सभी देवता, मुनिगण, लोकपाल, नाग तथा सभी मनुष्य प्रसन्न हो गये। आनन्दित होकर उन्होंने स्कन्दके ऊपर फूलोंकी वर्षा की। तदनन्तर सभी देवता तथा सभी लोग अपने-अपने निवास-स्थानोंको चले गये और वे पहलेके समान ही यज्ञ-यागादि, श्राद्धादि पितृकर्म तथा अतिथिपूजन आदि करने लगे ॥ ५६-५७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] मैंने गणेशजीकी इस प्रकारकी अद्भुत महिमाको आपसे कहा। उनके व्रतकी महिमाको भी यथार्थ रूपमें आपको बतलाया, गणेशजीके इस वरदचतुर्थीव्रतके प्रभावसे ही स्कन्दने तैंतीस करोड़ देवताओंसे भी अवध्य उस महान् असुर तारकको युद्धमें मार गिराया। इसी कारण वे स्कन्द इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी पूज्य बन गये ॥ ५८-६० ॥ व्यासजी बोले- हे प्रजापते! उन कार्तिकेयने महान् समाधिमें स्थित होकर किस स्थानपर अनुष्ठान किया था, उसे आप मुझे बतायें ॥ ६१ ॥ ब्रह्माजी बोले- जहाँपर घृष्णेश्वर नामक भगवान् शंकर विराजमान हैं, उसी स्थानपर स्कन्दने अनुष्ठान किया था। स्कन्दद्वारा वहाँपर स्थापित गणेश लक्ष्यविनायक नामसे प्रसिद्ध हो गये ॥ ६२ ॥ उसी नगरमें बादमें अत्यन्त विख्यात एल नामक राजा हुए। हे मुने! उन्हींके नामसे बादमें वह नगर भी एलनगर* के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तारकवधका वर्णन' नामक सतासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥ अठासीवाँ अध्याय कामदेवके दग्ध किये जानेपर कामपत्नी रतिद्वारा भगवान् शिवकी प्रार्थना, प्रसन्न होकर शिवद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति तथा कामदेवके सदेह होनेका वरदान दिया जाना, कामदेवद्वारा गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका अनुष्ठान तथा गणेशजीकी आराधना मुनि बोले- हे ब्रह्मन्! मैंने गणेशजीके व्रतसे सम्बद्ध आख्यानको सुना, यदि उन भगवान् शंकरने अपनी क्रोधाग्निसे कामदेवको भस्म कर डाला, तो फिर वह कामदेव आज भी सभी लोगोंमें व्याप्त कैसे दिखायी देता है? हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! यह सब मुझे विस्तारसे बतलाइये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- जब भगवान् शंकरने रुष्ट होकर अपना तीसरा नेत्र खोला था, तब अपने पति कामदेवका अपराध जानकर कामपत्नी रति मृत कामदेवके निमित्त विलाप करती हुई भगवान् शंकरके पास पहुँची और उन्हें साष्टांग प्रणामकर अपनी बुद्धिके अनुसार उनकी स्तुति करने लगी ॥ ३-४ ॥ रति बोली- मैं देवी पार्वतीके स्वामी तथा मस्तकमें तीसरा नेत्र धारण करनेवाले उन भगवान् वृषध्वजको प्रणाम करती हूँ, जो सत्त्वगुणका आश्रय लेकर समस्त जगत्‌का पालन करते हैं और रजोगुणसे सम्पन्न होकर समस्त लोकोंकी सृष्टि करते हैं ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी वे महेश्वर तमोगुणसे आविष्ट शरीर धारणकर अपनी इच्छासे जगत्‌का संहार करते हैं। जो हाथमें कपाल धारण करते हैं और भिक्षा ग्रहणकर भी लोगोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करते हैं। जो भगवान् शिव स्वेच्छासे सब कुछ करने, कुछ भी न करने तथा कुछका कुछ करनेका सामर्थ्य रखनेवाले हैं और महान् पराक्रमसे सम्पन्न हैं; दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले ऐसे वे महेश्वर शिव पतिसे हीन मुझ अबलाको शरण प्रदान करें ॥ ६-७ ॥ वे भगवान् शिव शीघ्र ही मेरे मृत पतिको जीवनदान दे करके शरणमें आयी हुई मुझको सौभाग्यशाली बनायें, यदि ऐसा नहीं होता है, तो हे ईश! मैं अपने प्राणोंका त्याग करके आपकी कीर्तिको अपकीर्तिमें बदल दूँगी ॥ ८ ॥ *एलनगरका प्राचीन नाम 'एलारपुरक्षेत्र' है। यह वर्तमानमें महाराष्ट्र-प्रान्तके औरंगाबाद जिलेमें स्थित है। इसका नाम बेरोल या बेरूल है। घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) ज्योतिर्लिंग यहीं है। उसी मन्दिरमें गणेशजीकी भी मूर्ति है।