श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०८७] * वरदचतुर्थीव्रतका विधान * २५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
देनेके लिये प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो इच्छा हो, उसे बताओ, मैं गजानन गणेश तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ और तुम्हें यथेष्ट वर देता हूँ॥ ३९॥ स्कन्द बोले- हे जगदीश्वर ! आपके जिस यथार्थ स्वरूपको न देवता जानते हैं, न शास्त्रकार मुनिगण, न ब्रह्मा आदि देवता और न ही शेषनाग आदि प्रमुख नाग; हे द्विरदानन ! उसी स्वरूपका आज मुझे सम्यक् रूपसे दर्शन प्राप्त हुआ है॥ ४० ॥ आपके दर्शन हो जानेसे ही आज मैं पूर्ण मनोरथवाला हो गया हूँ। हे देव ! फिर भी आपके कथनके अनुसार आपसे यह याचना करता हूँ कि कभी भी मेरी पराजय न हो और मेरे द्वारा आपका ध्यान किये जानेपर आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें॥ ४१ ॥ [हे प्रभो !] आपके चरणारविन्दोंका कभी भी मुझे विस्मरण न हो और सभी देवताओंमें मुझे श्रेष्ठता प्राप्त हो। अलक्ष्य अर्थात् अदर्शनीय होनेपर भी मुझे आज आपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है, इसलिये आप लक्ष्य विनायक नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त करें और अपने भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेके लिये आप कल्पवृक्षके समान बनें ॥ ४२-४३॥ लक्ष्यविनायक बोले- हे स्कन्द ! वह सब कुछ पूर्ण होगा, जो आज तुमने मुझसे प्रार्थना की है। कभी भी तुम्हें मेरा विस्मरण नहीं होगा। जब-जब तुम मेरा ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरा सान्निध्य प्राप्त करोगे। तुम्हारे शत्रुओंकी पराजय होगी और तुम देवताओंमें श्रेष्ठ पद प्राप्त करोगे ॥ ४४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार स्कन्दजीकी नम्रता और उनकी तपस्याके प्रभावसे प्रसन्न होकर देव गणेशजीने उन्हें माँगे गये सभी वरोंको और अपना निजी वाहन 'मयूर' भी प्रदान किया। तभीसे स्कन्दका 'मयूरध्वज' यह नाम भी प्रसिद्ध हो गया ॥ ४५-४६ ॥ गजानन बोले- तुम्हारे हाथों तारक आदि महान् असुर मृत्युको प्राप्त करेंगे। हे अनघ ! मैं तुम्हारे कथनानुसार भक्तवत्सलके रूपमें लक्ष्यविनायक इस नामसे चिरकालतक इस क्षेत्रमें निवास करूँगा ॥ ४७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर विकट नामवाले वे गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर स्कन्दने ब्राह्मणोंके साथ वहाँ गणेशजीकी महान् मूर्तिको स्थापित किया और उस समय उन्होंने उस मूर्तिका 'लक्ष्यविनायक' यह मंगलमय नाम रखा। उन्होंने एक लाख मोदकों, उतने ही पुष्पों एवं उतने ही दूर्वांकुरों तथा उन-उन प्रकारकी विविध वस्तुओंसे उस मूर्तिकी पूजा की और उतनी ही संख्यामें अर्थात् एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन कराया। तदुपरान्त उन लक्ष्यविनायकका स्तवन करके और उन्हें प्रणाम करके स्कन्द मयूरपर आरूढ़ होकर लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरके समीप गये और उनको वह सारा वृत्तान्त बतलाया तथा गणेशजीद्वारा किया गया अपना 'मयूरध्वज' नाम भी उनको बतलाया ॥ ४८-५२ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवकी अनुमति पाकर और उनका आशीर्वाद ग्रहणकर एवं भगवान् गजाननका स्मरणकर स्कन्द तारकासुरके विनाशके लिये चल पड़े। देवताओं तथा ऋषियोंने उन्हें देवसेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया। तदनन्तर महान् पराक्रमशाली सेनानी कार्तिकेयने तारकासुरको देखकर उसके साथ युद्ध किया ॥ ५३-५४ ॥ एक लाख वर्षतक युद्ध करनेके अनन्तर उन्होंने अपनी शक्तिके प्रहारसे उसे मार डाला। शेषनागमें भी उस युद्धका वर्णन करनेकी सामर्थ्य नहीं है ॥ ५५ ॥