श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
यदि इतना सामर्थ्य न हो तो इक्कीस ब्राह्मणों अथवा फिर एक ही ब्राह्मणको भोजन कराये। यदि गणेशजीकी स्वर्ण आदि धातुकी मूर्ति बनवायी हो, तो उसे ब्राह्मणको प्रदान कर देना चाहिये। यदि गणेशजीकी प्रतिमा मिट्टीकी बनायी गयी हो; तो उसे पालकीमें रखकर दिव्य वाद्योंकी ध्वनिके साथ बड़े ही उत्साहपूर्वक जलके मध्यमें विसर्जित कर देना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ उस प्रतिमाको ध्वज, पताका आदिसे आच्छादित करके, वेदोंके घोष तथा गीतोंकी ध्वनियों और बालकोंके दण्डयुद्धरूप क्रीड़ा-कौतुकके साथ विसर्जित करके वापस घर आना चाहिये ॥ २० ॥ हे षडानन ! जो इस प्रकारसे एक बार भी गणेशजीका व्रत करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्तकर अन्तमें गणेशजीके लोकको प्राप्त करता है ॥ २१ ॥ ब्रह्माजीने सृष्टि-रचनाकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये भगवान् गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका जप करते हुए यह व्रत किया था। तब गणेशजीने उनके सामने प्रकट होकर उन्हें विविध प्रकारकी शक्ति प्रदान की थी ॥ २२ ॥ भगवान् विष्णुने भी सृष्टिका पालन-पोषण करनेके लिये इस व्रतको किया था और परम अद्भुत षडक्षर महामन्त्रका जप किया था ॥ २३ ॥ हे षडानन ! इस व्रतके प्रभावसे उन्होंने स्वेच्छापूर्वक अवतार धारण करनेकी क्षमता प्राप्त की थी। हे पुत्र ! मैंने भी गणेशजीके अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए इस व्रतको किया था ॥ २४ ॥ इससे मैं विविध प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हो गया और उसी शक्ति-सामर्थ्यसे मैं तीनों लोकोंका संहार करता हूँ। वृत्रासुरका विनाश करनेके लिये देवराज इन्द्रने तथा दैत्य शम्बरासुरका वध करनेके लिये कामदेवावतार प्रद्युम्नने इस व्रतको किया था। इसी कारण वे दोनों उन दोनोंका वध करनेमें समर्थ हुए। यक्षों, गन्धर्वों, मुनियों, किन्नरों, नागों, राक्षसों, सिद्धों, चारणों तथा मानवोंने अपने-अपने इष्टकी सिद्धिके लिये इस व्रतको किया था। अतः हे स्कन्द ! तुम भी इस चतुर्थी व्रतको करो ॥ २५-२७ ॥ इससे तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे और तीनों लोकोंमें तुम्हारी प्रसिद्धि हो जायगी। मैं वरदाता गणेशजीका षडक्षर मन्त्र तुम्हें प्रदान करता हूँ ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे द्विजोत्तम ! तदनन्तर शुभ मुहूर्तमें भगवान् शिवने उन्हें षडक्षरी दीक्षा प्रदान की और वे स्कन्द उसी समय तपस्याके लिये निकल पड़े। वे एक ऐसे अत्यन्त निर्मल स्थानमें गये, जो वृक्षों तथा लताओंसे व्याप्त था, बहुतसे मूलवाले तथा फलवाले वृक्षोंसे समन्वित था और अनेक सरोवरों तथा वापियोंसे सुशोभित था ॥ २९-३० ॥ स्कन्दजीने एक पैरपर खड़े होकर अत्यन्त दारुण तप किया और भगवान् शंकरने पूर्वमें जो व्रत बताया था, उसका विधिवत् पालन किया। तब षडक्षर मन्त्रके अनुष्ठान तथा इस वरदचतुर्थी व्रतके प्रभावसे परमात्मा गजानन उनपर अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर गणेशजीने सेनानी कार्तिकेयको अपने उस अत्यन्त श्रेष्ठ स्वरूपका दर्शन दिया, जो योगियोंके द्वारा ध्यान करनेयोग्य था, महान् तेजस्वी था, चार हाथोंसे सुशोभित था, महान् मुकुटसे अलंकृत हो रहा था, कुण्डलों तथा बाजूबन्दोंसे मण्डित था। भगवान् गणेशके एक दाँत था, माथेपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था, उनकी लम्बी सूँड सुशोभित हो रही थी। वे अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, माला तथा दाँतको धारणकर सुशोभित हो रहे थे। मोती तथा मणियोंको धारण किये हुए थे। उदरदेशमें नागराजको धारण किये थे। उन्होंने दिव्य वस्त्रोंका परिधान धारण किया हुआ था, दिव्य सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेप लगाया हुआ था, वे भगवान् गणेश अनेकों सूर्योंके सदृश आभासे देदीप्यमान हो रहे थे और तेजकी ज्वालासे आभासित थे ॥ ३३-३६ ॥ ऐसे स्वरूपका दर्शनकर वे षण्मुख कार्तिकेय आश्चर्यचकित और विस्फारित नेत्रोंवाले हो गये। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा और 'यह क्या है'- इस प्रकारसे वे सोचने लगे। मैंने जिनका ध्यान किया था, क्या ये वे ही हैं या और कोई। मैं इन्हें नहीं जान पा रहा हूँ, ये कौन हैं। तब उन्होंने धीरेसे पूछा- 'आप कौन हैं और आपका नाम क्या है ?' ॥ ३७-३८ ॥ गजानन बोले- हे षडानन ! जिनका तुम एकाग्र मनसे रात-दिन ध्यान किया करते थे, वही मैं तुम्हें वर