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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

उ०ख०-अ०८७ ] * वरदचतुर्थीव्रतका विधान * २५३ प्रारम्भ किस दिनसे किया जाता है, इस व्रतकी विधि | प्रसन्न हैं, तो सभी मानवोंके कल्याणके लिये तथा इस क्या है, इसका फल क्या है और इस व्रतकी महिमाका | व्रतकी प्रसिद्धिके लिये यह सब मुझे पूर्ण रूपसे किसे प्रत्यक्ष हुआ है? हे शंकर! यदि आप मुझपर | बताइये॥ २८-३०॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'स्कन्दोपाख्यान' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८६॥

सतासीवाँ अध्याय वरदचतुर्थीव्रतका विधान, शिवजीके उपदेशसे स्कन्दद्वारा वरदचतुर्थीव्रतका प्रत्यक्ष अनुष्ठान, कार्तिकेयको लक्ष्यविनायक गणेशजीके दिव्य स्वरूपका दर्शन और अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, कार्तिकेयद्वारा लक्ष्यविनायक गणेशकी प्रतिमाकी स्थापना और तारकासुरका वध

शंकरजी बोले- [हे स्कन्द!] इस व्रतकी उत्तम विधिको मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे यह व्रत आरम्भ करना चाहिये॥ १॥ व्रतीको चाहिये कि व्रतके दिन प्रातःकाल तिल और आँवलेके चूर्णका उबटन लगाकर स्नान करे। क्रोधसे रहित होकर नित्य-नैमित्तिक सभी क्रियाओंको सम्पन्न करे। तदनन्तर किसी पवित्र स्थानमें एक मण्डपका निर्माण करे, जो केलेके स्तम्भसे सुसज्जित हो तथा जो ईख, चामर एवं पुष्पोंसे सुशोभित हो और दर्पणोंकी पंक्तिसे मण्डित हो॥ २-३॥ उस मण्डपके मध्य देशमें दो वस्त्रोंसे वेष्टित एक कलशकी स्थापना करे और वहीं चन्दनसे आठ दलवाले एक कमलकी रचना करे। तदनन्तर गुरुकी अनुमति लेकर पूजाकी सामग्रीका (जलसे) प्रोक्षण करे और सोलह उपचारोंके द्वारा गणनायक गणेशजीकी पूजा करे॥ ४-५॥ भगवान् गणेशकी प्रतिमा अपने-अपने सामर्थ्यके अनुसार सुवर्णकी अथवा रजतकी बनवाये। इक्कीस प्रकारके पक्वान्नोंको इक्कीस-इक्कीसकी संख्यामें बनाकर भगवान् गजाननके लिये नैवेद्य निवेदित करे और इक्कीस मुद्रा दक्षिणाके निमित्त प्रदान करे॥ ६-७॥ भगवान् गणेशके निमित्त दक्षिणारूपमें स्वर्णमुद्रा अथवा रजतमुद्रा अर्पित करे, इसमें कृपणता न करे। इक्कीसकी संख्यामें श्वेत अथवा हरित दूर्वा देवदेव गणेशजीको अर्पित करे, तदनन्तर मन्त्रपूर्वक पुष्पांजलि प्रदान करे, इक्कीसकी संख्यामें ही वेदज्ञ ब्राह्मणोंका पूजन करे॥ ८-९॥

ब्राह्मणोंको इक्कीस प्रकारके ही पक्वान्नोंका भोजन कराये और उतनी ही संख्यामें उन्हें दान दे। तदनन्तर उन्हें प्रणाम करे और उनसे क्षमा-याचना करे। अन्तमें (व्रतकी न्यूनांगतापूर्तिके लिये) उनसे अच्छिद्रवाचन कराये। गणेशजीकी पार्थिवपूजाकी विधिको पूर्वमें बतलाया गया है, उसी विधि-विधानसे यहाँ भी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर गणेशजीका ध्यान करते हुए बन्धु- बान्धवोंके साथ स्वयं भी गणेशजीकी उस कथाका श्रवण करे और फिर भोजन करे अथवा मौन रहकर उपवास करे॥ १०-१२॥ इस प्रकार श्रावणमासकी चतुर्थीसे भाद्रपदमासकी शुक्लपक्षकी चतुर्थीतक एक मासभर व्रत करे। भाद्रपद चतुर्थीको अपनी शक्तिके अनुसार बड़े ही श्रद्धापूर्वक महान् उत्सव मनाये॥ १३॥ उस दिन पूर्वोक्त विधानके अनुसार गणनायक गणेशजीका पूजन करे। रात्रिमें गीत-वाद्यों आदिकी ध्वनियोंसे जागरण करे। साथ ही पुराण तथा अन्य श्रेष्ठ कथाओंका श्रवण करना चाहिये और गणेशजीके सहस्र- नाममन्त्रोंसे उनकी स्तुति करे॥ १४-१५॥ प्रभातकालमें पवित्र जलमें स्नान करके द्विरदानन गणेशजीका पूजन करे तथा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक सौ इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये॥ १६॥ यथाशक्ति उन्हें गाय, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण तथा धन प्रदान करे। दीनों, अन्धों तथा अनाथोंको भी भोजन-धन आदि प्रदान करे॥ १७॥