भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 656 में से

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पृष्ठ 254

२५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 द्वारा इस प्रकार कहे जाते समय इन्द्र आदि देवता भी वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ११-१२ ॥ उन सभी देवताओंने वहाँ हर्ष प्रकट किया, उन कार्तिकेयकी पूजा की तथा उनका स्तवन-वन्दन किया। दिव्य वाद्योंकी ध्वनि पृथ्वी, आकाश और रसातलमें गूँज उठी। तदनन्तर देवताओंने उन सेनानी कार्तिकेयको प्रणामकर उनसे कहा—'हे देव! तीनों लोकोंके लिये कंटक बने तारकासुरका विनाश करें' ॥ १३-१४॥ उन्होंने अभिषेककी विविध सामग्रियोंसे अनेक मुनियोंद्वारा उच्चरित किये गये वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रोंद्वारा उनका सेनापति पदपर अभिषेक किया ॥ १५ ॥ तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे सभी देवता अपने स्थानोंपर आ गये। उद्वेगरहित ऋषिगण भी पहलेकी भाँति तप करने लगे। कार्तिकेयके सेनापति होनेपर अब देवताओं तथा मुनियोंको कहीं भी भय नहीं रह गया था। वह बालक उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त करने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ता रहता है ॥ १६-१७ ॥ एक दिनकी बात है, बालस्वभाववश वह बालक कार्तिकेय चन्द्रमाको पकड़नेके लिये उड़ चला, तब ब्रह्माजीने उसे रोका और कहा—'ऐसा साहस मत करो'। उस बालकने अपनी बुद्धिके द्वारा देवगुरु बृहस्पतिको और अपने पराक्रमद्वारा देवराज इन्द्रको भी जीत लिया। एक बारकी बात है, जब पार्वतीके साथ भगवान् शंकर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, तो कार्तिकेयने उन्हें प्रणाम करके सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये उनसे पूछा— ॥ १८–१९ १/२ ॥ स्कन्द बोले—हे पिताजी! आप तीनों लोकोंके गुरुके द्वारा मैंने नाना प्रकारकी मंगलमयी महान् कथाओंको सुना है, तथापि मुझे पूर्ण सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हुई है, हे देव! आप मुझे कोई मंगलमय व्रत बतलाइये, जो सभी प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला हो, पुत्र, सम्पत्तिको बढ़ानेवाला हो, सभी प्रकारके पापोंका विनाशक, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षको देनेवाला हो और सभी शत्रुओंपर विजय दिलानेवाला हो ॥ २०–२२ ॥ ईश्वर बोले—हे स्कन्द! तुमने सभी लोगोंका उपकार करनेवाले व्रतके विषयमें बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं तुम्हें उस व्रतके विषयमें बता रहा हूँ, जो मानवोंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। वह व्रत सभी पापोंका हरण करनेवाला, धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला, सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला, पुत्र, सम्पत्तिको बढ़ानेवाला, अलक्ष्मीद्वारा उत्पन्न संकटको दूर करनेवाला और भगवान् गणेशजीको प्रसन्न करनेवाला है ॥ २३–२४ १/२ ॥ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको करता है, वह देवताओंके लिये भी पूज्य हो जाता है, अपनी स्वेच्छासे जहाँ-कहीं भी विचरण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है, इतना ही नहीं; वह सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें भी समर्थ हो जाता है। उसका दर्शन करनेवाले दूसरे लोगोंका महापाप भी विनष्ट हो जाता है ॥ २५-२६ ॥ हे स्कन्द! इस वरदचतुर्थीव्रतकी तुलना अन्य किसी व्रतसे नहीं की जा सकती। भगवान् शंकरद्वारा कही गयी ऐसी वाणी सुनकर सेनानी स्कन्दने पिता शंकरजीसे पुनः वरदचतुर्थीव्रतकी महिमाके विषयमें पूछा— ॥ २७ १/२ ॥ स्कन्द बोले—हे हर! इस वरदचतुर्थीव्रतके माहात्म्यको आप मुझे विस्तारसे बतलाइये। इस व्रतका