श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 264, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नब्बेवाँ अध्याय देवर्षि नारदजीका शेषनागको गणेशोपासनाकी दीक्षा देना, शेषनागद्वारा षडक्षर मन्त्रका अनुष्ठान, प्रसन्न होकर गणेशजीका उन्हें दिव्यस्वरूपमें दर्शन देना, शेषनागद्वारा गणेश-स्तवन और अनेक वरोंकी प्राप्ति, गणेशजीकी कृपासे शेषनागका सहस्र सिरवाला होना, शेषनागका धरणीधर नामसे गणेश-प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना नारदजी बोले-[हे नागराज!] तुम इस प्रकारसे तेजरहित और अत्यन्त दुखी क्यों हुए हो? तुम्हारे सिर कैसे फूटे हैं और तुमने किस मुनिका अत्यन्त अप्रिय किया है? क्या तुमसे भगवान् शिव नाराज हैं? अथवा तुमने गर्व क्यों किया था? हे शेष! इन सबका कारण मुझे बताओ, तभी मैं उसको दूर करनेका उपाय बतलाऊँगा ॥ १-२॥ तुम्हारे बिना कौन ऐसा है, जो चराचर जीवोंसे समन्वित इस पृथ्वीको धारण कर सकता है। इतनेपर भी जब वे शेषनाग कुछ नहीं बोले, तो मुनि नारदजीने स्वयं ही उन नागराजको अपना पद पुनः प्राप्त करनेका शुभ उपाय बताया ॥ ३१/२॥ नारदजी बोला- सम्पूर्ण कलाओंके निधान हे शेषनाग ! मेरे कथनको ध्यानपूर्वक सुनो। मैं वह उपाय बतला रहा हूँ, जिससे ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता भी तुम्हारे सेवकके समान हो जायँगे और तुम इस सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने ऊपर उसी प्रकार धारण कर सकोगे, जैसे कि एक बालक पुष्पकी मालाको धारण कर लेता है ॥ ४-५ ॥ शेषनाग बोले-मेरा कोई जन्मान्तरीय पुण्य था, जिसके प्रभावसे अकस्मात् मुझे आपका दर्शन हुआ। आगे भी ठीक ही होगा, इसमें कोई संशय नहीं ॥ ६ ॥ अन्यथा जो पुण्यकर्म नहीं करते हैं, उन्हें आपका दर्शन कैसे हो सकता है? इस समय मेरा शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया है, अतः मैं पृथ्वीको धारण करनेमें असमर्थ हूँ। हे मुने! आप वह उपाय बताइये, जिससे कि मैं पूर्वके समान हो जाऊँ ॥ ७१/२ ॥ नारदजी बोले-हे नागराज! मैं तुमको उन भगवान् गणेशजीके महामन्त्रको बताता हूँ, जिनके कृपाप्रसादसे इन्द्र आदि देवताओैंने अपने-अपने पद प्राप्त किये थे और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जिनकी आज्ञासे सृष्टि, स्थिति तथा संहारका कार्य करते हैं ॥ ८-९ ॥ उन सर्वेश्वर भगवान् गणेशजीके प्रसन्न होनेपर तुम अपनी पूर्वावस्थाको प्राप्त कर लोगे। तुम्हारी दीन दशा देखकर मेरा मन अत्यन्त दयार्द्र हो उठा है ॥ १० ॥ इसी कारण मैं तुम्हें गणेशजीका षडक्षर मन्त्र प्रदान करता हूँ। इसका अनुष्ठानमात्र करनेसे भगवान् गजानन तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हो जायँगे और तुम उन सभी कामनाओंको प्राप्त कर लोगे, जिन-जिनकी तुम उनसे याचना करोगे ॥ १११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-शेषनागको उपदेश देकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये और शेषनागने भी तपस्या करनेके लिये अत्यन्त शुभ निश्चय करके अपनी सभी इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे लौटाकर उन गणेशजीका ध्यान करते हुए एक हजार वर्षोंतक उस श्रेष्ठ (षडक्षर) मन्त्रका जप किया। मन्त्रानुष्ठान पूरा होनेपर उन्होंने देवाधिदेव भगवान् गजाननका अपने समक्ष दर्शन किया ॥ १२-१४ ॥ वे सिंहपर आरूढ़ थे, उनके तीन नेत्र थे, दस भुजाएँ थीं, वे नागको धारण किये थे तथा कुण्डल एवं बाजूबन्द पहने हुए थे। उन्होंने वक्षःस्थलपर मोतियोंकी माला धारण की थी, उनका मुकुट अत्यन्त सुन्दर था, वे रत्नमुद्रा तथा अक्षसूत्र लिये हुए थे। वे अनेकों देवों तथा ऋषिवृन्दोंद्वारा निरन्तर सेवित हो रहे थे, उनकी सूँड़ टेढ़ी थी और मुख हाथीका था। वे भक्तजनोंकी अभिलाषाको परिपूर्ण करनेके लिये विग्रह धारण किये थे, वे देवताओं तथा मनुष्योंको वर देनेवाले थे और आराधना करनेवालेको उसका मनोभिलषित पदार्थ प्रदान करनेवाले थे ॥ १५ ॥ शेषनागने सिद्धि-बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित