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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 656 में से

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पृष्ठ 265

उ०ख०-अ०१० ] * देवर्षि नारदजीका शेषनागको गणेशोपासनाकी दीक्षा देना * २६३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भगवान् गणेशजीका जैसा ध्यान पहले किया था, उसी स्वरूपमें वे उन्हें दर्शन देनेके लिये प्रकट हुए ॥ १६ ॥ वे हजारों सूर्योंके समान थे और अपनी कान्तिसे दिशाओं तथा विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनके तेजसे शेषनाग भी चकाचौंध और अन्धे-जैसे हो गये। वे भयभीत, व्याकुल चित्तवाले तथा अत्यन्त विह्वल होकर काँप उठे। मुहूर्तभरमें जब वे स्वस्थचित्त हुए तो अपने मनमें यह सोचने लगे ॥ १७-१८ ॥ प्रलयाग्निके समान दीप्तिसे सम्पन्न यह कौन-सा तेज यहाँ उपस्थित हुआ है? यह कदाचित् सम्पूर्ण लोकोंको जला डालेगा अथवा मुझे ही भस्म कर डालेगा। कल्याणकारी कर्मोंको करनेपर बीचमें अमंगल कैसे आ सकता है? अथवा नारदजीने जिस प्रकार कहा है, मैं गणनायकके उसी स्वरूपका दर्शन कर रहा हूँ ॥ १९-२० ॥ इस प्रकार जब शेषनाग अत्यन्त चिन्तातुर हो उठे तो द्विरदानन भगवान् गणेश उनसे बोले-कुतर्क करनेमें दक्ष हे शेषनाग ! भय मत करो। मैं वरदाता गणेश उपस्थित हो गया हूँ। तुम रात-दिन जिसका ध्यान करते रहते हो, मैं वही हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा है, उसे माँगो। मैं ही इस जगत्‌का कर्ता, रक्षक और संहार करनेवाला अखिलेश्वर हूँ ॥ २१-२२ ॥ मेरे ही तेजसे चन्द्रमा, अग्नि, सूर्य और ग्रह-नक्षत्र प्रकाशित होते हैं। परब्रह्मस्वरूप होते हुए भी तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर प्रदान करनेके लिये तथा संसारका कल्याण करनेके लिये आविर्भूत हुआ हूँ। तुम जिन-जिन वरोंकी कामना करते हो, उन सबको मुझसे माँग लो ॥ २३-२४ ॥ शेष बोले-हे भगवन्! मैं आपके तेजसे धर्षित हो जानेके कारण न तो आपको देखनेका साहस कर पा रहा हूँ और न कुछ बोलनेका ही साहस कर पा रहा हूँ। हे अनघ! यदि आपका मेरे ऊपर पूर्ण अनुग्रह है तो आप (अपने इस तेजोमय स्वरूपको आवृत्तकर) सौम्यरूपमें हो जाइये ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोले-शेषनागद्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये गये करुणासागर वे सुरेश्वर गजानन करोड़ों चन्द्रमाओंकी आभासे सम्पन्न तथा सौम्य तेजवाले हो गये। तदनन्तर शेषनागने उन अखिलेश्वरको प्रणाम करके उनका स्तवन किया और उनसे वरोंकी याचना की ॥ २६ १/२ ॥ शेष बोले-जो आदि और अन्तसे रहित हैं, उन गणोंके नायक भगवान् गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ। जो सर्वत्र व्याप्त हैं, ईशानस्वरूप हैं, इस संसारके कारणके भी कारण हैं, जगत्‌के स्वामी हैं तथा सम्पूर्ण विश्वके द्वारा वन्दनीय हैं, उन गणेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २७-२८ ॥ जो गणोंके अध्यक्ष हैं, भगवान् विष्णुद्वारा स्तुत हैं, गुणोंके स्वामी हैं, गुणातीत हैं, उन गणाधिपति गणेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥ जो समस्त विद्याओंके स्वामी हैं, देवोंके भी देव हैं, देवताओंके अत्यन्त प्रिय हैं, सिद्धि तथा बुद्धिके प्रिय हैं, सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाले हैं, भुक्ति एवं मुक्तिको प्रदान करनेवाले हैं तथा सब प्रकारके विघ्नोंका नाश करनेवाले हैं, उन गणनायक भगवान् गणेशको मैं प्रणाम करता हूँ* ॥ ३० १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-हे महामुने! इस प्रकार देवताओंके स्वामी, वर प्रदान करनेवाले द्विरदानन भगवान् गणेशकी स्तुति करके शेषने उनसे जिन-जिन वरोंकी याचना की थी, उन्हें आप सुनें ॥ ३१ १/२ ॥ शेष बोले-आज मेरे द्वारा की गयी तपस्या धन्य हो गयी, मेरा ज्ञान धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरा शरीर, मेरे अनेक नेत्र तथा बहुतसे सिर भी धन्य हो गये। आपकी

  • शेष उवाच अनादिनिधनं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ सर्वव्यापिनमीशानं जगत्कारणकारणम्। सर्वस्वरूपं विश्वेशं विश्ववन्द्यं नमाम्यहम् ॥ गजाननं गणाध्यक्षं गरुडेशस्तुतं विभुम्। गुणाधीशं गुणातीतं गणाधीशं नमाम्यहम् ॥ विद्यानामधिपं देवं देवदेवं सुरप्रियम्। सिद्धिबुद्धिप्रियं सर्वसिद्धिदं भुक्तिमुक्तिदम् ॥ सर्वविघ्नहरं देवं नमामि गणनायकम्।