भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 656 में से

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पृष्ठ 263

उ०ख०-अ०८९ ] * गणेशजीद्वारा कामदेवको अनेक वरोंकी प्राप्ति * २६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ध्वनिसे निनादित था। स्वर्ण-कमलोंपर निवास करनेवाले | समुद्र-मन्थनमें सहयोग प्रदान किया था, तभी देवताओंने भ्रमर वहाँ गुंजन कर रहे थे। चम्पक, अशोक, बकुल | अमृत प्राप्त किया था और तभी उन्होंने अमरत्व प्राप्त तथा मालती-पुष्पोंसे सुगन्धित वायु उस पर्वतके शिखरपर | किया था, अतः मुझसे श्रेष्ठ और कोई दूसरा नहीं है। निवास करनेवाले जनोंके चित्तको अत्यन्त आह्लादित कर | उन शेषनागके मनके अभिमानको जानकर तीनों लोकोंका रही थी॥ २४-२६॥ | संहार करनेवाले तथा कल्याण करनेवाले और सब कुछ उस समय गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, किन्नर, देवता, | देख लेनेवाले भगवान् शिव मौन हो गये और फिर मुनिगण तथा नाग उन गिरिजापति भगवान् शंकरका | सहसा उठ खड़े हुए॥ ३५-३६॥ दर्शन करनेके लिये वहाँ आये। उनमेंसे कुछने साष्टांग | उन्होंने उस प्रकारके अभिमानमें चूर शेषनागको दण्डवत् प्रणामकर उनका अभिवादन किया। गन्धर्वोंने | भूमिपर पटक दिया, तब उनका एक-एक सिर दस-दस उच्च स्वरसे गान किया और अप्सराएँ नृत्य करने | भागोंमें विभक्त हो गया। इससे वे शेषनाग आधे प्रहरतक लगीं॥ २७-२८॥ | मूर्च्छित और चेतनाहीन-से हो गये। तभीसे वे शेषनाग उन्होंने दस भुजाधारी, व्याघ्राम्बर धारण किये हुए, | हजार फणोंसे सुशोभित हो गये॥ ३७-३८॥ नन्दी तथा भृंगी आदि गणोंसे परिव्याप्त, भालमें चन्द्रमाको | प्राणोंके बच जानेपर वे शेषनाग सोचने लगे कि धारण किये हुए, त्रिशूल लिये हुए, सारे शरीरमें भस्म | मैं तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवका आभूषण था लगाये हुए, शेषनागको सिरपर धारण किये हुए, | और सम्पूर्ण नागोंका भूषणस्वरूप था॥ ३९॥ कल्याण करनेवाले तथा वृषभपर आरूढ़ भगवान् शिवकी | लेकिन आज न जाने किस कर्मके फलस्वरूप इस पूजा की। अन्य देवोंने [भी] मानसिक उपचारोंद्वारा | अवस्थाको प्राप्त हो गया हूँ। जैसे पंखहीन पक्षी चलनेमें भगवान् शिवका पूजन किया॥ २९-३०॥ | असमर्थ होता है, वैसे ही आज मैं चलनेमें असमर्थ हो कोई-कोई अपनी दोनों आँखें बन्दकर उनका | गया हूँ। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। इस समय कौन मेरा ध्यान करने लगे। वसिष्ठ, वामदेव, जमदग्नि, द्वित, त्रित, | रक्षक हो सकता है, और ऐसा कौन है, जो मुझे अपनी अत्रि, कण्व, भरद्वाज तथा गौतम आदि मुनीश्वर विविध | पूर्वावस्थाको प्राप्त करनेका मंगलमय उपाय बता सकता स्तुतियोंके द्वारा उन पार्वतीपति भगवान् शंकरका स्तवन | है? अथवा कौन है, जो मेरे दुःखको दूर कर सकता है, करने लगे॥ ३१-३२॥ | इस प्रकार वे अत्यन्त चिन्तातुर हो उठे। उसी समय उन्होंने जब वे देवता तथा मुनिगण वहाँ भगवान् शंकरकी | मार्गमें जाते हुए मुनि नारदजीको देखा॥ ४०-४२॥ आराधना कर रहे थे, उस समय शेषनाग अत्यन्त गर्वित | जैसे कोई भिक्षुक स्वप्नमें धन-सम्पत्ति प्राप्तकर हो उठे कि तीनों लोकोंमें मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, दूसरा | कुछ प्रसन्न हो उठता है, वैसे ही वे नागराज शेष उन्हें और कोई श्रेष्ठ नहीं है। शिव [यदि] श्रेष्ठतर हैं तो | देखकर प्रसन्न हुए। नारदजीने अत्यन्त कष्टमें पड़े हुए मैं तो उनके भी सिरपर विराजमान हूँ, इस पृथ्वीको | उन नागराजको अपने समक्ष देखा॥ ४३॥ धारण करनेकी शक्ति मुझमें ही है और कहीं किसीमें | उन्हें चेष्टारहित, श्वासक्रियासे हीन तथा एक नहीं॥ ३३-३४॥ | मुनिकी भाँति ध्याननिष्ठ देखकर सब कुछ जाननेवाले मेरे कुलमें उत्पन्न वासुकि नागने जब रस्सी बनकर | होनेपर भी नारदजीने उन शेषसे पूछा- ॥ ४४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कामके पुनर्जन्मसम्बन्धी वृत्तान्तका वर्णन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥८९॥