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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 656 में से

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पृष्ठ 262

२६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उन्होंने अकेले ही बहुतोंपर विजय प्राप्त कर ली। वे कामदेव ही 'प्रद्युम्न' इस नामसे विख्यात हुए। तदनन्तर वे रति (मायावती)-को लेकर [द्वारका] पुरीको चले गये ॥ १२-१३॥ गणेशजीकी कृपासे वे सभी देवोंके लिये मान्य, तीनों लोकोंमें विजय प्राप्त करनेवाले तथा आनन्दित होकर परम प्रसन्न हो गये। रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ उन्हें दूसरे कृष्णके समान ही देखकर लज्जित हो उठीं और उठकर इधर-उधर चली गयीं ॥ १४-१५ ॥ तदनन्तर नारदजीके कथनानुसार उन्हें अपना पुत्र जानकर वे सब अत्यन्त आनन्दित हो गयीं और उनके समीप जाकर उन्होंने उनका आलिंगन किया। प्रद्युम्नके साथ आयी मायावतीरूपा रतिने भी उन सभीको प्रणाम किया। उनके वहाँ आनेपर उस द्वारकापुरीके सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे महामुने व्यासजी! इस प्रकार मैंने आपको जनस्थानमें स्थित गणेशजीकी महिमाका निरूपण किया। उस स्थानपर ही राम [के भ्राता लक्ष्मण]-ने शूर्पणखाका नासिका-छेदन किया था, इसी कारण वह जनस्थान 'नासिक' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १७-१८॥ वहाँके पत्थरके टुकड़े आज भी मोदक-जैसे दिखायी देते हैं। इस प्रकार कामदेवने षडक्षर मन्त्रके द्वारा गजाननदेवकी वैसे ही आराधना की, जिस प्रकार कि शेषनागने उनकी आराधना की थी। [गणेशोपासनाके] फलस्वरूप रति तथा कामदेव (मायावती और प्रद्युम्न) दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १९-२० ॥ व्यासजी बोले- ब्रह्मन्! शेषनागने भगवान् गजाननकी आराधना किस प्रकार की थी, किसलिये की थी और प्रसन्न हुए गणेशजीसे उन्होंने किस वस्तुको प्राप्त किया था? हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझे विस्तारसे बतलाइये; क्योंकि भगवान्की कथाके विषयमें प्रश्न करनेवाले, कथा सुननेवाले तथा कथाको बतलानेवाले- तीनोंके पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ २१-२२॥ ब्रह्माजी बोले-हे ब्रह्मन्! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं उस कथारूपी अमृतको बताता हूँ। सत्यवतीके पुत्र हे व्यासजी ! आप सावधान होकर वह सब सुनें ॥ २३ ॥ हे मुने! किसी समयकी बात है, पार्वतीजीके साथ भगवान् शिव सुन्दर शिखरवाले श्रेष्ठ हिमालयपर्वतकी चोटीपर सुखपूर्वक विराजमान थे। वह पर्वत विविध प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे परिव्याप्त तथा झरनोंकी