श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०९१] * गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि * २६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शेषनागने उन गणेशजीकी मूर्तिका 'धरणीधर' यह | नाभिकमलमें भी स्थित हुए। हे व्यासजी! इस प्रकार मैंने नाम रखा। तदनन्तर वे शेषनाग भगवान् विष्णुके | गणेशजीकी अद्भुत महिमाका आपसे वर्णन किया ॥ ५६ ॥ शय्याभावको प्राप्त हुए अर्थात् उनकी शय्या बने और | गणेशजी प्रवालनगरमें 'धरणीधर' इस नामसे प्रसिद्ध उन्होंने अपने मस्तकपर पृथ्वीको उसी प्रकार धारण | हुए। [हे व्यासजी!] शेषनागने इन्हीं अभिलाषाओंकी किया, मानो पुष्पको धारण किया हो ॥ ५५ ॥ | पूर्तिके लिये विभु भगवान् गणेशजीकी आराधना की वे विघ्नराज गणेशजीके आभूषणके रूपमें उनके | थी ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शेषोपाख्यान' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥
इक्यानबेवाँ अध्याय गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि, ब्रह्मपुत्र कश्यपद्वारा गणेशजीकी आराधना और विविध वरोंकी प्राप्ति, कश्यपपत्नियोंसे सृष्टिका विस्तार, कश्यपपुत्रोंद्वारा गणेशजीकी स्तुति व्यासजी बोले- हे देव! भगवान् गणेशजीकी | हुए थे और उन्होंने सुन्दर बाजूबन्द पहन रखा था ॥ ८ ॥ दूसरी अन्य कथा भी मुझे बतलाइये। प्रभो! कथाओंको | सुवर्ण, मणि तथा रत्नोंसे समन्वित मौक्तिकमालाओंको सुनते हुए मेरा मन अत्यन्त उत्सुक हो रहा है ॥ १ ॥ | धारण करनेसे उनका कण्ठदेश अत्यन्त सुशोभित हो रहा ब्रह्माजी बोले- एक बारकी बात है कि प्रलय | था। वे अपने उदरमें सर्प लपेटे हुए थे। करोड़ों सूर्योंके होनेके अनन्तर भगवान् गजाननने मुझे आज्ञा देते हुए | दीप्तिमान् मण्डलके समान उनकी आभा थी ॥ ९ ॥ कहा- 'हे ब्रह्मन्! मेरी आज्ञासे आप विविध प्रकारकी | उनके प्रफुल्लित नेत्र सुशोभित हो रहे थे। सुन्दर- सृष्टि करें' ॥ २ ॥ | सूँड़से उनका मुख रमणीय दिखायी दे रहा था। उनके चरण- तब मैंने अपने मनसे सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न | युगल छोटी-छोटी घण्टियों तथा नूपुरोंकी रुन-झुन ध्वनिसे किया। उनके नाम मैं आपको बताता हूँ। कश्यप, गौतम, | झंकृत हो रहे थे। इस प्रकारके स्वरूपवाले भगवान् गजानन जमदग्नि, वसिष्ठ, भरद्वाज, अत्रि एवं विश्वामित्र-ये | कश्यपजीके सामने प्रकट हुए। कश्यपजी उनका दर्शनकर सात मानस पुत्र सभी विद्याओंके ज्ञाता थे ॥ ३-४॥ | हर्षसे विभोर हो उठे और नृत्य करने लगे ॥ १०-११॥ उन सभीने मुझसे कहा- 'हे ब्रह्मन्! हे सुरेश्वर! | कश्यपजीने उन्हें प्रणाम करके विविध प्रकारके हमें आज्ञा दीजिये।' मैंने कश्यपको उन सभीमें अधिक | मांगलिक उपचारोंसे उनकी पूजा की, तदनन्तर दोनों बुद्धिमान् जानकर उन्हें आज्ञा दी। मेरा सृष्टि रचनेका कार्य | हाथ जोड़कर अत्यन्त आनन्दित हुए कश्यपजीने भगवान् तुम करो-ऐसी आज्ञा मैंने उन्हें दी। वे 'ठीक है' ऐसा | गजाननसे इस प्रकार कहा - ॥ १२ ॥ कहकर तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये ॥ ५-६ ॥ | हे तात! मेरे पिता धन्य हैं, मेरी माता धन्य हैं, मेरा उन्होंने दिव्य हजार वर्षोंतक भगवान् गणेशजीके | तप धन्य है, मेरा ज्ञान धन्य है, मेरा यह शरीर धन्य है और एकाक्षर मन्त्रका जप किया। इससे द्विरदानन भगवान् | आज मेरे ये नेत्र धन्य हो गये, यह पृथ्वी धन्य है और ये गणेश प्रसन्न हो गये [और उनके समक्ष प्रकट हुए] ॥ ७ ॥ | लताएँ, वृक्ष तथा फल धन्य हैं। यह एकाक्षर मन्त्र धन्य है, उनकी चार भुजाएँ थीं, कमलके समान सुन्दर | जिसके प्रभावसे आज मुझे अखिलेश्वर, परात्पर, प्रसन्नात्मा, उनके नेत्र थे, वे बहुत बड़े मुकुटको धारण किये थे। | परमात्मा गजाननका दर्शन हुआ है ॥ १३-१४ ॥ वे अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, माला तथा हाथीदाँत लिये | जिसके यथार्थ स्वरूपका निर्धारण करनेमें चारों