श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वेद भी कुण्ठित हो जाते हैं, वेदान्तके विद्वान् मूक हो जाते हैं, जो मनके तर्कोंसे अगोचर हैं, उन्हीं देव गणेशका आज मैंने दर्शन किया है॥ १५॥ जिनसे ये विष्णु, शिव तथा अग्नि आदि प्रधान देवता प्रकट होते हैं, सातों पाताल तथा चौदहों भुवन आविर्भूत होते हैं और जिनमें लयको प्राप्त होते हैं, उन्हीं देव गणेशका आज मैंने दर्शन किया है। जो निर्गुण हैं, जिनका कोई स्वामी नहीं है, जो गुरुके उपदेशसे जाननेयोग्य हैं, जिनका कोई आकार नहीं है, जिन्हें कुछ लोग ब्रह्म कहते हैं, उन्हीं देव गणेशका आज मैंने दर्शन किया है॥ १६-१७१/२॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके वचनामृतरूपी रससे भगवान् गजानन अत्यन्त प्रसन्न हुए और विविध स्तुतियोंद्वारा स्तवन करनेवाले विनयसम्पन्न उन कश्यपसे बोले- ॥ १८१/२॥ गणेशजी बोले-हे मुने! आपकी श्रद्धा-भक्ति तथा किये गये स्तवन एवं मन्त्रानुष्ठानसे मैं आपपर प्रसन्न हूँ। आप अपने मनमें जो-जो भी अभिलाषा रखते हैं, वे सब मुझसे माँग लें॥ १९१/२॥ कश्यपजी बोले-हे प्रभो! विविध प्रकारकी सृष्टि करनेकी सामर्थ्यके साथ ही मुझे यह भी प्रदान करें कि आपके चरणकमलोंमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे और मुझे कभी भी आपका विस्मरण न हो। मैं जहाँ-कहीं भी आपका स्मरण करूँ, वहाँ-वहाँ आप मुझे दृष्टिगोचर हो जायँ। इसके साथ ही मुझे वैसा पुत्र प्रदान करें, जो कश्यपनन्दनके नामसे विख्यात हो ॥ २०-२११/२॥ गणेशजी बोले-हे महामुने ! आप मुझसे जो-जो भी चाहते हैं, वह सब मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा। आपको मेरी भक्ति तथा अविस्मरणीय स्मृति प्राप्त होगी और आप संकटकालमें मुझे अपने पास पायेंगे। मेरे कृपाप्रसादसे आप विचित्र सृष्टि करनेमें समर्थ होओगे ॥ २२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले-महर्षि कश्यपजीसे इस प्रकार कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये और वे कश्यपजी भी प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये ॥ २४॥ एक समयकी बात है, महर्षि कश्यप अकस्मात् अनंग कामदेवद्वारा पीड़ित हो गये। उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिली, तब वे अपने घरके भीतर चले गये ॥ २५ ॥ उन्हें अपने नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य कर्मोंको करनेका तथा ध्यानयोगका भी स्मरण नहीं रहा। उन्हें उस प्रकारसे कामविह्वल देखकर उनकी दिति, अदिति, दनु, कद्रू तथा विनता आदि चौदह पत्नियाँ उनके समक्ष आयीं। तब कश्यपमुनिने विभिन्न भवनोंमें उन स्त्रियोंके साथ रमण किया। यथोक्त समय उपस्थित होनेपर दिति नामक पत्नीने अनेक दैत्योंको जन्म दिया। अदितिने देवताओं तथा गन्धर्वोंको और दनुने दानवोंको जन्म दिया ॥ २६-२८॥ इसी प्रकार उनकी अन्य स्त्रियोंसे क्रमशः किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, गुह्यक, अनेक प्रकारके ग्राम्य तथा आरण्यक पशु उत्पन्न हुए। इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, वृक्ष, समुद्र, सरिताएँ, लता, विविध धान्य, अनेक धातुएँ, रत्न, मुक्ता, कृमि, पिपीलिका, सर्प तथा पक्षिगण आदि चराचर जगत् उन स्त्रियोंसे उत्पन्न हुआ ॥ २९-३०१/२॥ उस समय इस प्रकारकी विविध सन्तानोंको उत्पन्न हुआ देखकर महर्षि कश्यप अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। तदनन्तर उन धीमान् कश्यपजीने ऋण-धनशोधन, सिद्धमन्त्र और अरिचक्रका विचार करके गणेशजीके विविध मन्त्रोंका उपदेश अपने पुत्रोंको दिया ॥ ३१-३२ ॥ उन मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने किसीको गणेशजीका षोडशाक्षर मन्त्र, किसीको अष्टादशाक्षर मन्त्र, किसीको एकाक्षरमन्त्र, किसीको षडक्षर मन्त्र, किसीको पंचाक्षर मन्त्र, किसीको अष्टाक्षर मन्त्र, किसीको द्वादशाक्षर मन्त्र और किसीको उनका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ३३-३४॥ उन्होंने अपने पुत्रोंसे यह भी कहा कि जबतक अखिलाधार, सर्वसिद्धिप्रदायक भगवान् गणेशजीका दर्शन नहीं होता, तबतक तुम लोग इन मन्त्रोंका अनुष्ठान करते रहो। कश्यपजीने इस प्रकारकी आज्ञा पुत्रोंको प्रदान की और तब वे सभी तपस्या करनेके लिये विभिन्न स्थानोंको चले गये और अपने-अपनेको उपदिष्ट मन्त्रका जप करने लगे ॥ ३५-३६ ॥ वे सभी बैठते समय, भोजनके समय, निद्राके समय तथा जाग्रदवस्थामें-इस प्रकार सभी समय अनन्य