भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 656 में से

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अङ्क ] * पञ्चश्लोकिगणेशपुराणम् * २५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पञ्चश्लोकिगणेशपुराणम् श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितं व्यासाय धात्रा पुरा | पूर्वकालमें ब्रह्माजीने व्यासजीको श्रीविघ्नेश (गणेश)- तत्खण्डं प्रथमं महागProperty... तत्खण्डं प्रथमं महागणपतेश्चोपासनाख्यं यथा। | पुराणका सारतत्त्व बताया था। महागणपतिके उस पुराणका संहर्तुं त्रिपुरं शिवेन गणपस्यादौ कृतं पूजनं | उपासना-संज्ञक प्रथम खण्ड है। भगवान् शिवने पहले त्रिपुरका कर्तुं सृष्टिमिमां स्तुतः स विधिना व्यासेन बुद्ध्याप्तये ॥ १ ॥ | संहार करनेके लिये गणपतिका पूजन किया। फिर ब्रह्माजीने इस सृष्टिकी रचना करनेके लिये उनकी विधिवत् स्तुति की। तत्पश्चात् व्यासजीने बुद्धिकी प्राप्तिके लिये उनका स्तवन किया ॥ १ ॥ संकष्टीदेवीकी, गणेशकी, उनके मन्त्रकी, सङ्कष्ट्याश्च विनायकस्य च मनोः स्थानस्य तीर्थस्य वै | स्थानकी, तीर्थकी और दूर्वाकी महिमा यह भक्तिचरित है। दूर्वाणां महिमेति भक्तिचरितं तत्पार्थिवस्यार्चनम्। | उनके पार्थिव-विग्रहका पूजन भी भक्तिचर्या ही है। उन तेभ्यो यैर्यदभीप्सितं गणपतिस्तत्तत्प्रतुष्टो ददौ | भक्तिचर्या करनेवाले पुरुषोंमेंसे जिन-जिनने जिस-जिस ताः सर्वा न समर्थ एव कथितुं ब्रह्मा कुतो मानवः ॥ २ ॥ | वस्तुको पानेकी इच्छा की, सन्तुष्ट हुए गणपतिने वह-वह वस्तु उन्हें दी। उन सबका वर्णन करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है! ॥ २ ॥ अब क्रीडाकाण्डमथो वदे कृतयुगे श्वेतच्छविः काश्यपः | क्रीडाकाण्डका वर्णन करता हूँ। सत्ययुगमें दस भुजाओंसे सिंहाङ्कः स विनायको दशभुजो भूत्वाथ काशीं ययौ। | युक्त श्वेत कान्तिमान् कश्यपपुत्र सिंहध्वज महोत्कट विनायक हत्वा तत्र नरान्तकं तदनुजं देवान्तकं दानवं | काशीमें गये। वहाँ नरान्तक और उसके छोटे भाई देवान्तक त्रेतायां शिवनन्दनो रसभुजो जातो मयूरध्वजः ॥ ३ ॥ | नामक दानवको मारकर त्रेतामें वे षड्बाहु शिवनन्दन मयूरध्वजके रूपमें प्रकट हुए ॥ ३ ॥ उन्होंने कमलासुरको तथा महादैत्यपति सिन्धुको उसके गणोंसहित मार डाला। हत्वा तं कमलासुरं च सगणं सिन्धुं महादैत्यपं | तत्पश्चात् ब्रह्माजीने सिद्धि और बुद्धि नामक दो कन्याएँ पश्चात् सिद्धिमती सुते कमलजस्तस्मै च ज्ञानं ददौ। | उन्हें दीं और ज्ञान भी प्रदान किया। द्वापरयुगमें गौरीपुत्र द्वापारे तु गजाननो युगभुजो गौरीसुतः सिन्दुरं | गजानन दो भुजाओंसे युक्त हुए। उन्होंने अपने हाथसे सम्मर्द्य स्वकरेण तं निजमुखे चाखुध्वजो लिप्तवान् ॥ ४ ॥ | सिन्दूरासुरका मर्दन करके उसे अपने मुखपर पोत लिया। उनकी ध्वजामें मूषकका चिह्न था ॥ ४ ॥ उन्होंने सन्तुष्ट राजा वरेण्यको गणेश-गीताका उपदेश किया। फिर गीताया उपदेश एव हि कृतो राज्ञे वरेण्याय वै | [कलियुगमें] वे धूम्रकेतु नामसे प्रसिद्ध धर्मयुक्त तुष्टायाथ च धूम्रकेतुरभिधो विप्रः स धर्मर्धिकः। | धनवाले ब्राह्मण होंगे। उस समय उनके ध्वजका चिह्न अश्वाङ्को द्विभुजो सितो गणपतिम्लेंच्छान्तकः स्वर्णदः | अश्व होगा। उनके दो भुजाएँ होंगी। वे गौरवर्णके गणपति क्रीडाकाण्डमिदं गणस्य हरिणा प्रोक्तं विधात्रे पुरा ॥ ५ ॥ | म्लेच्छोंका अन्त करनेवाले और सुवर्णके दाता होंगे। गणपतिके इस क्रीडाकाण्डका वर्णन पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे किया था ॥ ५ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे इन पाँच एतच्छ्लोकसुपञ्चकं प्रतिदिनं भक्त्या पठेद्यः पुमान् | श्लोकोंका पाठ करेगा, वह समस्त उत्तम भोगोंका उपभोग निर्वाणं परमं व्रजेत् स सकलान् भुक्त्वा सुभोगानपि। | करके अन्तमें परम निर्वाण (मोक्ष)-को प्राप्त होगा। ॥ इति श्रीपञ्चश्लोकिगणेशपुराणं सम्पूर्णम् ॥ ॥ इस प्रकार श्रीपंचश्लोकी गणेशपुराण सम्पूर्ण हुआ ॥