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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

अङ्क ] * पञ्चश्लोकिगणेशपुराणम् * २५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पञ्चश्लोकिगणेशपुराणम् श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितं व्यासाय धात्रा पुरा | पूर्वकालमें ब्रह्माजीने व्यासजीको श्रीविघ्नेश (गणेश)- तत्खण्डं प्रथमं महागProperty... तत्खण्डं प्रथमं महागणपतेश्चोपासनाख्यं यथा। | पुराणका सारतत्त्व बताया था। महागणपतिके उस पुराणका संहर्तुं त्रिपुरं शिवेन गणपस्यादौ कृतं पूजनं | उपासना-संज्ञक प्रथम खण्ड है। भगवान् शिवने पहले त्रिपुरका कर्तुं सृष्टिमिमां स्तुतः स विधिना व्यासेन बुद्ध्याप्तये ॥ १ ॥ | संहार करनेके लिये गणपतिका पूजन किया। फिर ब्रह्माजीने इस सृष्टिकी रचना करनेके लिये उनकी विधिवत् स्तुति की। तत्पश्चात् व्यासजीने बुद्धिकी प्राप्तिके लिये उनका स्तवन किया ॥ १ ॥ संकष्टीदेवीकी, गणेशकी, उनके मन्त्रकी, सङ्कष्ट्याश्च विनायकस्य च मनोः स्थानस्य तीर्थस्य वै | स्थानकी, तीर्थकी और दूर्वाकी महिमा यह भक्तिचरित है। दूर्वाणां महिमेति भक्तिचरितं तत्पार्थिवस्यार्चनम्। | उनके पार्थिव-विग्रहका पूजन भी भक्तिचर्या ही है। उन तेभ्यो यैर्यदभीप्सितं गणपतिस्तत्तत्प्रतुष्टो ददौ | भक्तिचर्या करनेवाले पुरुषोंमेंसे जिन-जिनने जिस-जिस ताः सर्वा न समर्थ एव कथितुं ब्रह्मा कुतो मानवः ॥ २ ॥ | वस्तुको पानेकी इच्छा की, सन्तुष्ट हुए गणपतिने वह-वह वस्तु उन्हें दी। उन सबका वर्णन करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है! ॥ २ ॥ अब क्रीडाकाण्डमथो वदे कृतयुगे श्वेतच्छविः काश्यपः | क्रीडाकाण्डका वर्णन करता हूँ। सत्ययुगमें दस भुजाओंसे सिंहाङ्कः स विनायको दशभुजो भूत्वाथ काशीं ययौ। | युक्त श्वेत कान्तिमान् कश्यपपुत्र सिंहध्वज महोत्कट विनायक हत्वा तत्र नरान्तकं तदनुजं देवान्तकं दानवं | काशीमें गये। वहाँ नरान्तक और उसके छोटे भाई देवान्तक त्रेतायां शिवनन्दनो रसभुजो जातो मयूरध्वजः ॥ ३ ॥ | नामक दानवको मारकर त्रेतामें वे षड्बाहु शिवनन्दन मयूरध्वजके रूपमें प्रकट हुए ॥ ३ ॥ उन्होंने कमलासुरको तथा महादैत्यपति सिन्धुको उसके गणोंसहित मार डाला। हत्वा तं कमलासुरं च सगणं सिन्धुं महादैत्यपं | तत्पश्चात् ब्रह्माजीने सिद्धि और बुद्धि नामक दो कन्याएँ पश्चात् सिद्धिमती सुते कमलजस्तस्मै च ज्ञानं ददौ। | उन्हें दीं और ज्ञान भी प्रदान किया। द्वापरयुगमें गौरीपुत्र द्वापारे तु गजाननो युगभुजो गौरीसुतः सिन्दुरं | गजानन दो भुजाओंसे युक्त हुए। उन्होंने अपने हाथसे सम्मर्द्य स्वकरेण तं निजमुखे चाखुध्वजो लिप्तवान् ॥ ४ ॥ | सिन्दूरासुरका मर्दन करके उसे अपने मुखपर पोत लिया। उनकी ध्वजामें मूषकका चिह्न था ॥ ४ ॥ उन्होंने सन्तुष्ट राजा वरेण्यको गणेश-गीताका उपदेश किया। फिर गीताया उपदेश एव हि कृतो राज्ञे वरेण्याय वै | [कलियुगमें] वे धूम्रकेतु नामसे प्रसिद्ध धर्मयुक्त तुष्टायाथ च धूम्रकेतुरभिधो विप्रः स धर्मर्धिकः। | धनवाले ब्राह्मण होंगे। उस समय उनके ध्वजका चिह्न अश्वाङ्को द्विभुजो सितो गणपतिम्लेंच्छान्तकः स्वर्णदः | अश्व होगा। उनके दो भुजाएँ होंगी। वे गौरवर्णके गणपति क्रीडाकाण्डमिदं गणस्य हरिणा प्रोक्तं विधात्रे पुरा ॥ ५ ॥ | म्लेच्छोंका अन्त करनेवाले और सुवर्णके दाता होंगे। गणपतिके इस क्रीडाकाण्डका वर्णन पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे किया था ॥ ५ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे इन पाँच एतच्छ्लोकसुपञ्चकं प्रतिदिनं भक्त्या पठेद्यः पुमान् | श्लोकोंका पाठ करेगा, वह समस्त उत्तम भोगोंका उपभोग निर्वाणं परमं व्रजेत् स सकलान् भुक्त्वा सुभोगानपि। | करके अन्तमें परम निर्वाण (मोक्ष)-को प्राप्त होगा। ॥ इति श्रीपञ्चश्लोकिगणेशपुराणं सम्पूर्णम् ॥ ॥ इस प्रकार श्रीपंचश्लोकी गणेशपुराण सम्पूर्ण हुआ ॥

२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सर्वकामप्रद श्रीगणेशाष्टकम् [श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें महर्षि कश्यपकी प्रेरणासे भक्तोंने सामूहिकरूपसे इस श्रीगणेशाष्टक स्तोत्रको भगवान् गजाननके प्रति कहा है। जिससे प्रसन्न होकर भगवान् गणेशने स्वयं प्रकट होकर आश्वासन देते हुए कहा कि इस स्तोत्रका पाठ करनेसे समस्त कामनाओंकी सिद्धि हो जायगी। कारागारमें बँधे हुए तथा राजाके द्वारा वध-दण्ड पानेवाले कैदी भी इस स्तोत्रका पाठ करनेसे बन्धन-मुक्त हो जायँगे; इस स्तोत्रका पाठ करनेसे विद्यार्थीको विद्या, पुत्रार्थीको पुत्र, कामार्थीको समस्त मनोवांछित कामनाओं तथा गणेश-भक्तिकी प्राप्ति हो जायगी।] सर्वे ऊचुः यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा यतो निर्गुणादप्रमेया गुणास्ते। यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ १॥ यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेतत्तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता। तथेन्द्रादयो देवसङ्घा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ २॥ यतो वह्निभानूद्भवो भूर्जलं च यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः। यतः स्थावरा जङ्गमा वृक्षसङ्घाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ ३॥ यतो दानवाः किन्नरा यक्षसङ्घा यतश्चारणा वारणाः श्वापदाश्च। यतः पक्षिकीटा यतो वीरुधश्च सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ ४॥ यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः सम्पदो भक्तसंतोषिकाः स्युः। यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ ५॥ सब भक्तोंने कहा—जिन अनन्त शक्तिवाले परमेश्वरसे अनन्त जीव प्रकट हुए हैं; जिन निर्गुण परमात्मासे अप्रमेय (असंख्य) गुणोंकी उत्पत्ति हुई है; सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीन भेदोंवाला यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे प्रकट एवं भासित हो रहा है, उन गणेशका हम नमन एवं भजन करते हैं॥ १॥ जिनसे इस समस्त जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है; जिनसे कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी विश्वरक्षक विष्णु, इन्द्र आदि देव-समुदाय और मनुष्य प्रकट हुए हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ २॥ जिनसे अग्नि और सूर्यका प्राकट्य हुआ; पृथ्वी, जल, समुद्र, चन्द्रमा, आकाश और वायुका प्रादुर्भाव हुआ तथा जिनसे स्थावर-जंगम और वृक्षसमूह उत्पन्न हुए हैं, उन गणेशका हम नमन एवं भजन करते हैं ॥ ३ ॥ जिनसे दानव, किंनर और यक्षसमूह प्रकट हुए; जिनसे हाथी और हिंसक जीव उत्पन्न हुए तथा जिनसे पक्षियों, कीटों और लता-बेलोंका प्रादुर्भाव हुआ, उन गणेशका हम सदा ही नमन और भजन करते हैं॥ ४॥ जिनसे मुमुक्षुको बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञानका नाश होता है; जिनसे भक्तोंको सन्तोष देनेवाली सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा जिनसे विघ्नोंका नाश और समस्त कार्योंकी सिद्धि होती है, उन गणेशका हम सदा नमन एवं भजन करते हैं॥ ५॥

अङ्क ] * सर्वकामप्रद श्रीगणेशाष्टक * २७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 यतः पुत्रसम्पद् यतो वाञ्छितार्थो यतोऽभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः। यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ६ ॥ यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः। यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ७॥ यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति। परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥८॥ श्रीगणेश उवाच पुनरूचे गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः। त्रिसन्ध्यं त्रिदिनं तस्य सर्वं कार्यं भविष्यति ॥ ९ ॥ यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम्। अष्टवारं चतुर्थ्यां तु सोऽष्टसिद्धीरवाप्नुयात् ॥ १०॥ यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिने दिने। स मोचयेद् बन्धगतं राजवध्यं न संशयः ॥ ११ ॥ विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात्। वाञ्छिताँल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः ॥ १२ ॥ यो जपेत् परया भक्त्या गजाननपरो नरः। एवमुक्त्वा ततो देवश्चान्तर्धानं गतः प्रभुः ॥ १३॥ ॥ इति श्रीगणेशपुराणे उपासनाखण्डे श्रीगणेशाष्टकं सम्पूर्णम् ॥ जिनसे पुत्र-सम्पत्ति सुलभ होती है; जिनसे मनोवांछित अर्थ सिद्ध होता है; जिनसे अभक्तोंको अनेक प्रकारके विघ्न प्राप्त होते हैं तथा जिनसे शोक, मोह और काम प्राप्त होते हैं, उन गणेशका हम सदा नमन एवं भजन करते हैं॥६॥ जिनसे अनन्त शक्तिसम्पन्न सुप्रसिद्ध शेषनाग प्रकट हुए; जो इस पृथ्वीको धारण करने एवं अनेक रूप ग्रहण करनेमें समर्थ हैं; जिनसे अनेक प्रकारके अनेक स्वर्गलोक प्रकट हुए हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥७॥ जिनके विषयमें वेदवाणी कुण्ठित है; जहाँ मनकी भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति सदा सावधान रहकर 'नेति-नेति'- इन शब्दोंद्वारा जिनका वर्णन करती है; जो सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥८॥ श्रीगणेशजी बोले-जो मनुष्य तीन दिनोंतक तीनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके सारे कार्य सिद्ध हो जायँगे ॥ ९ ॥ जो आठ दिनोंतक इन आठ श्लोकोंका एक बार पाठ करेगा और चतुर्थी तिथिको आठ बार इस स्तोत्रको पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियोंको प्राप्त कर लेगा ॥ १० ॥ जो एक मासतक प्रतिदिन दस-दस बार इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह कारागारमें बँधे हुए तथा राजाके द्वारा वध-दण्ड पानेवाले कैदीको भी छुड़ा लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ११ ॥ इस स्तोत्रका इक्कीस बार पाठ करनेसे विद्यार्थी विद्याको, पुत्रार्थी पुत्रको तथा कामार्थी समस्त मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥ जो मनुष्य पराभक्तिसे इस स्तोत्रका जप करता है, वह गजाननका परम भक्त हो जाता है-ऐसा कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणमें श्रीगणेशाष्टक सम्पूर्ण हुआ ॥

२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- श्रीगणेशपञ्चरत्नस्तोत्रम् मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरञ्जकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥ १ ॥ नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम्। सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्॥ २ ॥ समस्तलोकशङ्करं निरस्तदैत्यकुञ्जरं दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम्। कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम्॥ ३॥ अकिञ्चनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम्। प्रपञ्चनाशभीषणं धनञ्जयादिभूषणं कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम्॥ ४॥ नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजम् अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम्। हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम्॥ ५॥ महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं प्रगायति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम्। अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात्॥ ६॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीगणेशपञ्चरत्नस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ जिन्होंने बड़े आनन्दसे अपने हाथमें मोदक ले रखे हैं; जो सदा ही मुमुक्षुजनोंकी मोक्षाभिलाषाको सिद्ध करनेवाले हैं; चन्द्रमा जिनके भालदेशके भूषण हैं; जो भक्तिभावमें निमग्न लोगोंके मनको आनन्दित करते हैं; जिनका कोई नायक या स्वामी नहीं है; जो एकमात्र स्वयं ही सबके नायक हैं; जिन्होंने गजासुरका संहार किया है तथा जो नतमस्तक पुरुषोंके अशुभका तत्काल नाश करनेवाले हैं, उन भगवान् विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १ ॥ जो प्रणत न होनेवाले—उद्दण्ड मनुष्योंके लिये अत्यन्त भयंकर हैं; नवोदित सूर्यके समान अरुण प्रभासे उद्भासित हैं; दैत्य और देवता—सभी जिनके चरणोंमें शीश झुकाते हैं; जो प्रणत भक्तोंका भीषण आपत्तियोंसे उद्धार करनेवाले हैं, उन सुरेश्वर, निधियोंके अधिपति, गजेन्द्रशासक, महेश्वर, परात्पर गणेश्वरका मैं निरन्तर आश्रय ग्रहण करता हूँ॥ २ ॥ जो समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले हैं; जिन्होंने गजाकार दैत्यका विनाश किया है; जो लम्बोदर, श्रेष्ठ, अविनाशी एवं गजराजवदन हैं; कृपा, क्षमा और आनन्दकी निधि हैं; जो यश प्रदान करनेवाले तथा नमनशीलोंको मनसे सहयोग देनेवाले हैं, उन प्रकाशमान देवता गणेशको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३ ॥ जो अकिंचन-जनोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा चिरंतन उक्ति (वेदवाणी)के भाजन (वर्ण्य-विषय) हैं; जिन्हें त्रिपुरारि शिवके ज्येष्ठ पुत्र होनेका गौरव प्राप्त है; जो देव-शत्रुओंके गर्वको चूर्ण कर देनेवाले हैं; दृश्य- प्रपंचका संहार करते समय जिनका रूप भीषण हो जाता है; धनंजय आदि नाग जिनके भूषण हैं तथा जो गण्डस्थलसे दानकी धारा बहानेवाले गजेन्द्ररूप हैं, उन पुरातन गजराज गणेशका मैं भजन करता हूँ॥ ४॥ जिनकी दन्तकान्ति नितान्त कमनीय है; जो अन्तकके अन्तक (मृत्युंजय) शिवके पुत्र हैं; जिनका रूप अचिन्त्य एवं अनन्त है; जो समस्त विघ्नोंका उच्छेद करनेवाले हैं तथा योगियोंके हृदयके भीतर जिनका निरन्तर निवास है, उन एकदन्त गणेशका मैं सदा चिन्तन करता हूँ॥ ५॥ जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल मन-ही-मन गणेशका स्मरण करते हुए इस 'महागणेश-पंचरत्न' का आदरपूर्वक उच्चस्वरसे गान करता है, वह शीघ्र ही आरोग्य, निर्दोषता, उत्तम ग्रन्थों एवं सत्पुरुषोंका संग, उत्तम पुत्र, दीर्घ आयु एवं अष्ट सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है॥ ६॥ ॥ इस प्रकार श्रीशंकराचार्यरचित श्रीगणेशपंचरत्नस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

अङ्क ] * गणेशगीतोक्त परब्रह्म श्रीगणेश-तत्त्व * २९ गणेशगीतोक्त परब्रह्म श्रीगणेश-तत्त्व शिवे विष्णौ च शक्तौ च सूर्ये मयि नराधिप। याभेदबुद्धिर्योगः स सम्यग्योगो मतो मम॥ अहमेव जगद्यस्मात्सृजामि पालयामि च। कृत्वा नानाविधं वेषं संहरामि स्वलीलया॥ अहमेव महाविष्णुरहमेव सदाशिवः। अहमेव महाशक्तिरहमेवार्यमा प्रिय॥ अहमेको नृणां नाथो जातः पञ्चविधः पुरा। अज्ञानान्मां न जानन्ति जगत्कारणकारणम्॥ मत्तोऽग्निरापो धरणी मत्त आकाशमारुतौ। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपाला दिशो दश॥ वसवो मुनयो गावो मनवः पशवोऽपि च। सरितः सागरा यक्षा वृक्षाः पक्षिगणा अपि॥ तथैकविंशतिः स्वर्गा नागाः सप्त वनानि च। मनुष्याः पर्वताः साध्याः सिद्धा रक्षोगणास्तथा॥ अहं साक्षी जगच्चक्षुरलिप्तः सर्वकर्मभिः। अविकारोऽप्रमेयोऽहमव्यक्तो विश्वगोऽव्ययः॥ अहमेव परं ब्रह्माव्यानन्दात्मकं नृप। मोहयत्यखिलान् माया श्रेष्ठान् मम नरानमून॥


मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः। मय्येव च लयं यान्ति प्रलयेषु युगे युगे॥ अहमेव परो ब्रह्मा महारुद्रोऽहमेव च। अहमेव जगत्सर्वं स्थावरं जङ्गमं च यत्॥ अजोऽव्ययोऽहं भूतात्मानादीरीश्वर एव च। आस्थाय त्रिगुणां मायां भवामि बहुयोनिषु॥ अधर्मोपचयो धर्मोपचयो हि यदा भवेत्। साधून् संरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं सम्भवाम्यहम्॥ उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च। हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा॥ (गणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १३८। २१-२९, १४०। ७-११) [राजा वरेण्यके पूछनेपर भगवान् श्रीगणेशजी कहते हैं- ] हे राजन्! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो अभेदबुद्धिरूप योग है, उसीको मैं यथार्थ योग मानता हूँ॥ मैं ही अपनी लीलासे अनेक वेष धारण करता हुआ इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ॥ हे प्रिय! मैं ही महाविष्णु, मैं ही सदाशिव, मैं ही महाशक्ति और मैं ही सूर्य हूँ॥ एकमात्र मैं ही मनुष्योंका स्वामी हूँ, [विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य तथा गणेश- ] इन पाँच प्रकारसे मैं पूर्वकालमें उत्पन्न हुआ हूँ, मैं जगत्के कारणका भी कारण हूँ, मुझको अज्ञानीलोग नहीं जानते॥ अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल और दसों दिशाएँ, आठ वसु, मुनि, गौ, मनु, पशु, नदी, समुद्र, यक्ष, वृक्ष, पक्षियोंके समूह, इक्कीस स्वर्ग, नाग, सात वन, मनुष्य, पर्वत, साध्य, सिद्ध, राक्षस इत्यादि सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं॥ मैं ही सबका साक्षी, सम्पूर्ण जगत्का नेत्र, सभी कर्मोंसे अलिप्त, निर्विकार, अप्रमेय, अव्यक्त, सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त और अविनाशी हूँ॥ हे राजन्! मैं ही अव्यय आनन्दस्वरूप परब्रह्म हूँ, मेरी माया सम्पूर्ण जगत्को तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको भी मोहित करती है॥


हे महाबाहो! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युगमें प्रलयके समय मुझमें ही लय हो जाते हैं॥ मैं ही श्रेष्ठ ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ॥ मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवोंका आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक मायामें स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ॥ जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंको मारनेके लिये मैं अवतार लेता हूँ॥ मैं अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका संस्थापन करता हूँ और अनेक प्रकारकी लीलाकर आनन्दसे दुष्टों तथा दैत्योंका वध करता हूँ॥

३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा

शुभं वाप्यशुभं कर्म न मुञ्चति नरं क्वचित्॥ यस्र्यां यस्यामवस्थायां कृतं भवति कर्म यत्। तस्यां तस्यामवस्थायां भुज्यते प्राणिभिर्ध्रुवम्॥ मनुष्यके द्वारा किया गया शुभ या अशुभ कर्म उसका कभी पीछा नहीं छोड़ता; जिस-जिस अवस्थामें जैसा-जैसा कर्म किया गया होता है, उस-उस अवस्थामें प्राणीको उसका फल भोगना पड़ता है, यह ध्रुव सत्य है। [उपासनाखण्ड २।२-३] दुःखस्य भोक्ता न परोऽस्ति नैव सुखस्य वा पूर्वकृतस्य जन्तोः। यथा यथा कर्मफलं प्रसक्तं तदेव भोग्यं स्वयमेव तादृक्॥ पूर्वकालमें किये गये [पाप या पुण्य] कर्मका फल दुःख या सुखके रूपमें प्राणीको स्वयं ही भोगना पड़ता है, दूसरा कोई उसे नहीं भोग सकता। जिस-जिस प्रकारसे कर्मफलको भोगना निश्चित होता है, उसे वैसे ही और स्वयंको ही भोगना पड़ता है। [उपासनाखण्ड २।२२] पितुर्वाक्ये रतो नित्यं श्रद्धया श्राद्धकृत्तथा। पिण्डदो यो गयायां तु स पुत्रः पुत्र उच्यते॥ पिताके वचनोंका पालन करनेमें नित्य रत रहनेवाला, [मरणोपरान्त] श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेवाला और गयामें पिण्डदान करनेवाला पुत्र ही पुत्र कहा जाता है। [उपासनाखण्ड २।२८] परोपकारं कुर्याच्च द्रव्यप्राणवचोऽमृतैः। परापकारं नो कुर्यादात्मस्तवनमेव च॥ धन, प्राण तथा अमृतरूपी (सहानुभूतिपूर्ण) वचनोंसे दूसरोंका उपकार करे, कभी किसीका अपकार न करे और न ही आत्मप्रशंसा करे। (उपासनाखण्ड ३।२५) विश्वासो यस्य नैव स्यात्तत्र नो विश्वसेत् क्वचित्॥ विश्वस्तेऽत्यन्तविश्वासो न कर्तव्यो बुभूषता। कृतवैरेऽथ विश्वस्ते कदापि न च विश्वसेत्॥ जो विश्वसनीय न हो, उसपर कभी भी विश्वास न करे। समृद्धिकी इच्छावाला राजा विश्वस्त व्यक्तिपर भी अत्यन्त विश्वास न करे। जिससे एक बार वैर हो गया हो, वह यदि पुनः विश्वस्त बन गया हो तथापि उसपर तो कभी भी विश्वास न करे। [उपासनाखण्ड ३।३०-३१] अधमो यदि निन्देत स्तुवीत यदि वा क्वचित्। न क्रुध्येन्न च तुष्येच्च किं तया किं तयापि च॥ यदि अधम व्यक्ति कभी निन्दा करे अथवा प्रशंसा करे तो न तो उसपर क्रोधित हो, न ही प्रसन्न; क्योंकि उसकी निन्दा या स्तुतिका क्या अर्थ!। [उपासनाखण्ड ३।३५] ऋणतो ब्राह्मणं चैव पङ्कतो गां समुद्धरेत्। अनृतं न वदेत् क्वापि सत्यं क्वापि न हापयेत्॥ ब्राह्मणका ऋणसे और गायका कीचड़से सम्यक् रूपसे उद्धार करे। कभी असत्य न बोले और कभी सत्यको न छोड़े। [उपासनाखण्ड ३।४०] क्षुब्धं प्रसन्नं हृदयं समीक्ष्या- पकारिणं चोपकरं हि वक्ति॥ क्षुब्ध या प्रसन्न हृदय स्वयं ही समीक्षा करके बता देता है कि कौन अपकारी है और कौन उपकारी। [उपासनाखण्ड ५।२६] विचार्य सम्यक् कर्तव्यं कर्म साध्वितरच्च यत्॥ कर्मोंकी गति बड़ी ही सूक्ष्म होती है, अतः सत्कर्म या दुष्कर्मको भलीभाँति विचारकर करना चाहिये। [उपासनाखण्ड १०।१७] बुद्ध्या युक्त्यार्जवेनापि गुरूणि च लघूनि च॥ कार्याणि साधयेद्धीमान् गर्वान्न च मत्सरात्। कार्य चाहे बड़े हों या छोटे; बुद्धिमान् मनुष्यको उन्हें बुद्धिद्वारा, युक्तिपूर्वक और विनम्रतासे सम्पन्न करना चाहिये न कि गर्व और मत्सर (ईर्ष्या)-पूर्वक। [उपासनाखण्ड १०।१८-१९] नालोकयेन्मुखं तेषां विमुखा ये गजानने। तेषां दर्शनमात्रेण विघ्नानि स्युः पदे पदे॥

अङ्क] * श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा * ३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

जो लोग गणेशजीकी भक्तिसे विमुख हैं, उनका तो मुख भी नहीं देखना चाहिये। उनके दर्शनमात्रसे पग-पगपर विघ्न उपस्थित होते हैं। [उपासनाखण्ड १९। ८] साधूनां सङ्गतिः सद्यो ददाति फलमुत्तमम्। साधुजनोंकी संगति शीघ्र ही उत्तम फल देती है। [उपासनाखण्ड १९। ३५] पूर्वजन्मकृतात् पापाज्जायते दुःखभाङ्नरः॥ दुःखवान् सुखमाप्नोति सुखवानपि तत्पुनः। पूर्वजन्ममें किये हुए पापके कारण ही मनुष्य दुःखका भागी होता है। जिसे दुःख प्राप्त है, उसे भी सुखकी प्राप्ति होती है; वैसे ही जिसे सुख प्राप्त है, उसे भी दुःखकी प्राप्ति होती है। [उपासनाखण्ड १९। ४८-४९] मातापित्रोर्वचः कार्यं सत्पुत्रेण यशस्विना। पूजनं च तयोः कार्यं पोषणं पालनं तथा॥ माता-पिताके वचनका पालन करना, उनका पूजन करना और उन दोनोंका पालन-पोषण करना यशस्वी सत्पुत्रके लिये कर्तव्य है। [उपासनाखण्ड २३। २२] यो यथा कुरुते कर्म स तथा फलमश्नुते॥ जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल भोगता है। [उपासनाखण्ड २३। २६] परपुंसि मनो यस्याः सा वै निरयभागभवेत्॥ जिसका मन परपुरुषमें लग जाता है, वह [नारी] निश्चय ही नरकका भोग करनेवाली होती है। [उपासनाखण्ड २८। १५] लोकेषु वर्षते मेघः शेषेण ध्रियते धरा॥ उपकाराय सूर्योऽपि भ्रमतेऽहर्निशं द्विज। हे द्विज! बादल सम्पूर्ण लोकोंमें वर्षा करते हैं, शेषजी पृथ्वीको धारण करते हैं, सूर्य भी [लोगोंका] उपकार करनेके लिये ही दिन-रात भ्रमण करते रहते हैं। [उपासनाखण्ड २९। २२-२३] अनुतापविहीनस्य निष्कृतिर्नैव विद्यते। जिसे अपने दुष्कृतका पछतावा न हो, उसके


[दायाँ स्तम्भ]

उद्धारका तो कोई उपाय ही नहीं होता। [उपासनाखण्ड ३२। २९] पितृहा मातृहा स्त्रीहा मद्यपी गुरुतल्पगः। तस्य संस्पर्शनादेव सचैलं स्नानमाचरेत्॥ जो पिता-माता, स्त्रीका वध करनेवाला है, सुरापान करनेवाला है तथा गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाला है, उसका स्पर्शमात्र हो जानेपर वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये। [उपासनाखण्ड ७६। ६०] दोषे जाते स्वयं सन्तः ख्यापयन्ति जनेषु तम्। आच्छादने दोषवृद्धिः ख्यापने तु लयो भवेत्। सन्तजन [अपनेमें] कोई दोष उत्पन्न हो जानेपर स्वयं ही जनसमुदायमें उसका ख्यापन कर देते हैं। छिपानेसे दोषकी वृद्धि होती है और प्रकट कर देनेसे उसका नाश हो जाता है। [उपासनाखण्ड ३३। ३-४] पुण्यक्षयो भवेत्तस्य परदोषं य ईरयेत्॥ जो दूसरेके दोषोंका बखान करता है, उसके पुण्यका क्षय हो जाता है। [उपासनाखण्ड ७६। ५६] परेषां दोषकथने दोषो यद्यपि वर्तते॥ प्रश्ने कृते तु वक्तव्यं याथातथ्यान्न मत्सरात्। यद्यपि दूसरेके दोषोंका कथन करनेमें दोष होता है, तथापि पूछे जानेपर यथार्थरूपसे उसका वर्णन करना चाहिये, ईर्ष्या-द्वेषवश नहीं। [क्रीडाखण्ड २६। ३-४] परस्यानिष्टमिच्छेद्यः स स्वयं निधनं व्रजेत्। जो दूसरेके अनिष्टकी कामना करता है, वह स्वयं मृत्युको प्राप्त होता है। [क्रीडाखण्ड २९। ५९] यस्य स्वभावो यादृक् स्यात्स तथा वर्तते नरः। न जहाति घृष्यमाणश्चन्दनः स्वसुगन्धिताम्॥ कस्तूरीकर्दमयुतः पलाण्डुर्वा निजं गुणम्। जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा ही व्यवहार करता है। जैसे घिसे जानेपर भी चन्दन अपने सुगन्धरूपी स्वभावको नहीं छोड़ता और कस्तूरीपंकसे सना होनेपर भी प्याज अपने स्वाभाविक गुण दुर्गन्धका त्याग नहीं करता। [क्रीडाखण्ड २२। १२-१३]

३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] महान् क्षुद्रस्य वाक्यं चेत् कुरुते सोऽपि साधुताम्। प्राप्नोति सर्वलोकेषु कीर्तिं स्फीतां समुत्कटाम्॥ यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्तिके अनुरोध वचनको स्वीकार करता है तो वह भी साधुताको प्राप्त करता है और सभी लोकोंमें अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यशको प्राप्त करता है। [उपासनाखण्ड ७८।२०] ईश्वरे सानुकूले कः पीडितुं क्षमते जनम्। यदि ईश्वर अनुकूल हो तो व्यक्तिको मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? [क्रीडाखण्ड ८४।६३] यमीश्वरोऽवति सदा तं हन्तुं यः समीहते। स एव विलयं याति पतङ्ग इव दीपकः॥ भगवान् जिसकी सदा रक्षा करते हैं, उसे जो मारनेकी इच्छा करता है, निश्चय ही वह उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपकके पास जानेवाला पतिंगा नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड ८६।२९] सन्तः प्राणात्यये प्राप्ते न भाषन्तेऽनृतं क्वचित्। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन नहीं बोलते। [क्रीडाखण्ड ९२।३२] सभायामागतः साधुरसाधुर्दुर्बलो बली। प्रष्टव्यो माननीयश्च नीतिरेषा सनातनी॥ सभामें जो कोई भी आये, चाहे वह साधु हो या असाधु, दुर्बल हो अथवा बलवान्; वह सम्माननीय होता है, उससे कुशल-क्षेम पूछना चाहिये—यही सनातन नीति है। [क्रीडाखण्ड १११।८-९] प्रसङ्गं नैव जानासि यतो वाचस्पतेरपि। अज्ञानात् प्रकृतार्थस्य वचो याति वृथार्थताम्॥ तुम प्रसंगानुकूल बात करना नहीं जानते हो, अज्ञानवश समयके अनुकूल बात न करनेवालेका वचन सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, चाहे वह बृहस्पति ही क्यों न हो। [क्रीडाखण्ड १११।२४] नायकेन न हन्तव्यो दूतस्तेनापि नायकः। स्वामीको दूतका वध नहीं करना चाहिये और [ठीक इसी प्रकार] दूतको भी स्वामीका वध नहीं

[दायाँ स्तम्भ] करना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १११।३३] अशुभात्कर्मणो दुःखं सुखं स्याच्छुभकर्मणः। अतः सन्तः प्रकुर्वन्ति शुभं कर्म सदादरात्॥ हितं च सर्वजन्तूनां कायेन मनसा गिरा। अशुभ कर्मसे दुःख और शुभकर्मसे सुखकी प्राप्ति होती है, अतः सदाचारी पुरुष सदा ही बड़े आदरपूर्वक शुभ कर्म ही करते हैं और शरीरसे, मनसे तथा वाणीसे सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं। [क्रीडाखण्ड ११७।१७-१८] निरुपाधितया दुःखं यः परस्य निवारयेत्। तद्दुःखदुःखी च पुमान् पुरुषार्थी स भण्यते॥ जो मनुष्य निश्छल भावसे दूसरेके दुःखका निवारण करता है, और उसके दुःखके कारण स्वयं भी दुःखका अनुभव करता है, वह व्यक्ति ही पुरुषार्थी कहा जाता है। [क्रीडाखण्ड ११७।२१] क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च। न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत्॥ यह निश्चित है कि ऋणका बन्धन छूट जानेपर, स्त्री, पुत्र, पशु—कुछ भी इस संसारमें स्थिर नहीं रहता, अतः शोक करना व्यर्थ है। [क्रीडाखण्ड १२०।२६] यथा काष्ठं काष्ठगतं पूरे स्याच्च वियुज्यते। तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेऽवशः॥ जिस प्रकार जलप्रवाहमें बहते हुए दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं तो कभी अलग हो जाते हैं, वैसे ही [प्रारब्धके कारण] विवश हुआ प्राणी [दूसरे प्राणीके साथ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता है। [क्रीडाखण्ड १२०।२७] न लघुर्लघुतामेति पराक्रमयुतोऽपि चेत्। अणुमात्रो दहेद्वह्निः सकलं नगरं महत्॥ यदि पराक्रमी व्यक्ति लघु [आकारवाला] हो, तो भी उसे लघु मानना अनुचित है, वह लघु प्रभाववाला नहीं होता, जैसे अग्निकी चिनगारी अणुवत् हो करके भी विशाल नगरको सम्पूर्णतः जला सकती है। [क्रीडाखण्ड १३७।८]

अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा * ३३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद् दृढात्। अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् ॥ वासना; जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सबसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२१] क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः। यस्य स्यात्स हि मर्त्येऽस्मिँल्लोके मुक्तोऽखिलार्थकृत् ॥ क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२४] कर्माङ्कुरवियोगेन यः कर्माण्यपि चेह वा। तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ जो कर्मोंके अंकुरसे रहित अर्थात् संकल्प और कामनारहित कर्म करते हैं, तत्त्वके जाननेसे उस बुद्धिमान्‌की सारी क्रियाएँ दग्ध हो जाती हैं, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।२५] निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः। केवलं वैग्रहं कर्माचरन्नायाति पातकम् ॥ जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे व्यक्ति यदि शरीरनिमित्तक (जीवननिर्वाहार्थ) कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता। [क्रीडाखण्ड १४०।२७] अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यासद्ध्योः समश्च यः। यथाप्राप्तीह सन्तुष्टः कुर्वन् कर्म न बद्ध्यते ॥ जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते। [क्रीडाखण्ड १४०।२८] सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः। अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।३९] भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्। लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४७] भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः। तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः ॥ जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्ध चित्तवाला है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४८] जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा। तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ॥ जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है। [क्रीडाखण्ड १४१।२५] यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः सम्प्रकल्पयेत्। घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् ॥ [हे राजन्!] जो निग्रह करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४२।२०] यं यं देवं स्मरन् भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम्। तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप ॥ भक्तिपूर्वक जिस-जिस देवताको स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवरका त्याग करता है, हे राजन्! उनकी भक्ति करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है। [क्रीडाखण्ड १४३।१७] अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप। योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥ हे राजन्! जो अनन्यशरण होकर भक्तिसे मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योगक्षेम (मंगल)-का विधान करता हूँ। [क्रीडाखण्ड १४३।२०] कामो लोभस्तथा क्रोधो दम्भश्चत्वार इत्यमी। महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ॥ काम, लोभ, क्रोध, दम्भ-ये नरकके चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १४७।२३]

३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भगवान् श्रीगणेशजीकी आरती आरति गजवदन विनायक की। सुर-मुनि-पूजित गणनायक की ॥ टेक ॥ एकदंत शशिभाल गजानन, विघ्नविनाशक शुभगुण-कानन, शिवसुत वन्द्यमान-चतुरानन, दुःख-विनाशक सुखदायक की ॥ सुर० ॥ ऋद्धि-सिद्धि-स्वामी समर्थ अति, विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति, अघ-वन-दहन, अमल अविगत-गति, विद्या-विनय-विभव-दायक की ॥ सुर० ॥ पिङ्गल नयन, विशाल शुण्डधर, धूम्रवर्ण शुचि वज्राङ्कुश-कर, लम्बोदर बाधा-विपत्ति-हर, सुर-वन्दित सब बिधि लायक की ॥ सुर० ॥

सम्पादकीय लेख— श्रीगणेशपुराण—एक परिचय

अत्यन्त प्राचीन कालकी बात है, सौराष्ट्रदेशके प्रसिद्ध देवनगरमें शास्त्र-मर्मज्ञ सोमकान्त नामक धर्मपरायण एक नरेश थे। वे अतिशय सुन्दर, विद्वान्, धनवान्, तेजस्वी एवं पराक्रमी थे। उनकी बुद्धिमती, अनिन्द्य सुन्दरी, धर्मपरायणा सती पत्नीका नाम सुधर्मा था। सुधर्माके गर्भसे हेमकण्ठ नामक अत्यन्त सुन्दर, शूर, पराक्रमी एवं विद्या-विनय-सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हुआ। हेमकण्ठ अपने माता-पिताके सर्वथा अनुकूल था और वह सोमकान्तके शासन-कार्यमें दक्षतापूर्वक सहयोग प्रदान करता रहता था। रूपवान्, विद्याधीश, क्षेमंकर, ज्ञानगम्य और सुबल नामक पाँच स्वामिभक्त अमात्य भी राजा सोमकान्तकी प्रत्येक रीतिसे सेवा किया करते। सोमकान्तके राज्यमें प्रजा समृद्ध एवं सुखी थी। वह सर्वथा निरापद जीवन व्यतीत करती थी। साधु और ब्राह्मण निश्चिन्त होकर श्रीभगवान्की आराधना किया करते थे। सहसा सोम-तुल्य राजा सोमकान्तको गलितकुष्ठ हो गया। उनके शरीरमें सर्वत्र घाव हो गये। उनसे रक्त और पीब बहने लगा। नरेशने प्रख्यात चिकित्सकोंसे अनेक उपचार करवाये, किंतु उनसे उनको कोई लाभ नहीं हुआ। यशस्वी नरपति अत्यन्त निर्बल तो हो ही गये थे, उनके व्रणोंमें कीड़े पड़ गये और उनसे दुर्गन्ध निकलने लगी। अत्यन्त दुखी होकर देवनगर-नरेशने अपना शेष जीवन अरण्यमें जाकर तपश्चरणमें व्यतीत करनेका निश्चय किया। उन्होंने विधिपूर्वक अपने सुयोग्य पुत्र हेमकण्ठको आचार, धर्म और नीतिकी शिक्षा दी। तदनन्तर उसे राज्य-पदपर अभिषिक्त कर दिया। नरेशने अपने परम बुद्धिमान् एवं राजभक्त क्षेमंकर, रूपवान् और विद्याधीश नामक अमात्यत्रयको युवराजके सहयोगसे सुचारूरूपसे राज्य-संचालनका आदेश प्रदान किया। तदनन्तर राजा सोमकान्तने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उन्हें विविध प्रकारके व्यंजनोंसे तृप्तकर बहुमूल्य दक्षिणाएँ प्रदान कीं। राजा वनके लिये प्रस्थित हुए तो प्रजावत्सल नरेशके वियोगकी कल्पनासे समस्त प्रजा व्याकुल हो गयी। हेमकण्ठके दुःखकी सीमा नहीं थी। वह प्रजाके साथ रोता हुआ पिताके साथ पीछे-पीछे चल रहा था, किंतु नरेशने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा तथा सुबल और ज्ञानगम्य— दो अमात्योंके अतिरिक्त अन्य सबको समझाकर लौट जानेका आदेश दिया। हेमकण्ठको विवशतः अपनी प्रजाके साथ लौटना पड़ा। चिन्तित, दुखी, पीड़ित, निराश और उदास नरेश अपनी पत्नी सुधर्मा और दोनों अमात्योंके साथ वनके कष्ट सहते चले जा रहे थे। सती सुधर्मा अपने पतिकी निरन्तर सेवा किया करती और दोनों मन्त्री उनके लिये फल-फूल ढूँढ़कर ले आते। इस प्रकार यात्रा करते हुए वे सघन वनमें एक सरोवरके तटपर पहुँचे। सोमकान्त व्रणोंकी पीड़ा और यात्राके कष्टसे लेट गये थे। सुधर्मा उनके चरण दबा रही थी। दोनों मन्त्री फल-मूलके लिये कुछ दूर निकल गये थे। उसी समय

३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- जल भरनेके लिये कलश लिये एक तेजस्वी मुनिकुमार सरोवरके तटपर पहुँचे। सती सुधर्माने उन मुनिपुत्रसे पूछा—'आप किसके पुत्र हैं और यहाँ कैसे पधारे हैं?' अत्यन्त मधुर वाणीमें ऋषिकुमारने उत्तर दिया— 'मैं महात्मा भृगुकी सती पत्नी पुलोमाका पुत्र हूँ। च्यवन मेरा नाम है। आपलोग कौन हैं और इस निबिड़ वनमें कैसे आये हैं?' अत्यन्त दुखी सुधर्माने मुनिकुमारसे अपना विस्तृत परिचय देते हुए कहा—'महात्मन्! परम प्रतापी, समस्त ऐश्वर्योंका उपभोग करनेवाले मेरे स्वामी पता नहीं, किस कर्मका फल भोग रहे हैं? ऋषि स्वाभाविक दयालु होते हैं। आप दयापूर्वक हमारे कल्याणका कोई उपाय कीजिये।' अत्यन्त दुःखके कारण रानीके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। मुनिपुत्र च्यवनने चुपचाप सरोवरके जलसे कलश भरा और शीघ्रतासे अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ महर्षि भृगुने उनसे विलम्बका कारण पूछा तो उन्होंने राजा सोमकान्तकी दुर्दशा और उनकी पत्नीकी अद्भुत सेवाका अत्यन्त करुण वर्णन सुनाया। कृपामय महात्मा भृगुने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! तुम उन लोगोंको यहीं ले आओ।' च्यवन पुनः सरोवर-तटपर पहुँचे। तबतक राजाके दोनों अमात्य भी वहाँ आ गये थे। च्यवनने महारानीसे कहा—'माता! मेरे तपस्वी पिताने आपलोगोंको आश्रममें बुलाया है।' सुधर्मा अत्यन्त प्रसन्न हुई। वह अपने पति एवं सेवकोंसहित मुनिपुत्रके पीछे-पीछे महर्षिके आश्रम- पर पहुँची। महर्षि भृगुका आश्रम अत्यन्त पवित्र एवं सुखद था। उसमें सर्वत्र विविध प्रकारके सुगन्धित पुष्प खिले थे। आश्रममें वृक्षोंपर विविध प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे थे। विडाल, नेवला, बाज, मयूर, सर्प, गज, गाय, सिंह और व्याघ्र आदि सभी प्राणी अपना वैरभाव त्यागकर एक साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। वेद-पाठ हो रहा था और यज्ञ-धूमसे समस्त आश्रम पावनताका विग्रह बना हुआ था। सोमकान्त, उनकी पत्नी सुधर्मा और दोनों मन्त्रियोंने व्याघ्रचर्मपर आसीन परम तेजस्वी तपस्वी महर्षि भृगुको देखा तो दण्डकी भाँति उनके चरणोंपर गिर पड़े। नरेशने हाथ जोड़कर निवेदन किया—'प्रभो! आपके दर्शनसे मेरे पुण्य उदित हो गये। मैंने जीवनभर धर्मका पालन किया है, किंतु पता नहीं, मेरे किस महान् पातकसे मेरी ऐसी दुर्दशा हो रही है कि मेरा जीवन दुर्बह हो गया है। मेरे सभी प्रयत्न विफल हो गये हैं। अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आपके आश्रममें हिंस्र पशुओंने भी अपना सहज वैर त्याग दिया है। दयामय! आप मुझपर दया करें।' नरेशके करुण वचन सुन महर्षि भृगु कुछ क्षणोंके लिये ध्यानस्थ हुए और फिर उन्होंने उनसे कहा— 'राजन्! तुम चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें रोगसे छूटनेका उपाय बताऊँगा। अभी तुमलोग यात्रासे थके हुए हो; स्नान, भोजन और विश्राम करो।' वहाँ सबने तेल लगाकर स्नान किया और फिर वे भोजन करने बैठे। अनेक प्रकारके सुस्वादु षड्रस व्यंजन थे। राजा, रानी और अमात्य उक्त पवित्रतम आहारसे पूर्ण तृप्त हुए और फिर परम त्यागी महर्षि भृगुके आश्रममें राज्योचित व्यवस्थासे चकित-विस्मित नरेश अपनी पत्नी एवं सेवकोंसहित सुकोमल शय्यापर विश्राम करने लगे। रात्रि व्यतीत हुई। अरुणोदय हुआ। महर्षि भृगु स्नान, संध्या, जप और होम आदिसे निवृत्त हुए ही थे कि दैनिक कृत्य कर राजा सोमकान्तने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा एवं अमात्योंसहित महामुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख बैठ गये। 'राजन्! पूर्वके जिन कुकर्मोंसे तुम्हें गलितकुष्ठकी यह दारुण यातना सहनी पड़ रही है, उसे बता रहा हूँ; तुम ध्यानपूर्वक सुनो!' करुणहृदय महात्मा भृगु राजा सोमकान्तको उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाते हुए कहने

अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

लगे—'विन्ध्यगिरिके निकट कोल्हार नामक सुन्दर नगरमें चिद्रूप नामक एक धन-वैभवसम्पन्न वैश्य था। पतिके अनुकूल जीवन व्यतीत करनेवाली उसकी सुन्दरी पत्नीका नाम सुभगा था। तुम उसी सुभगाके पुत्र थे। तुम्हारा नाम था कामद।' एकमात्र पुत्र होनेके कारण माता-पिताने तुम्हारा अतिशय प्रीतिपूर्वक पालन किया। युवक होनेपर कुटुम्बिनी नामक सुन्दरी और सद्धर्मपरायणा युवतीसे तुम्हारा विवाह हुआ। कुटुम्बिनीके गर्भसे तुम्हारे सात कन्याएँ और पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ समय बाद तुम्हारे पिता चिद्रूपका शरीरान्त हो गया। तुम्हारी पतिपरायणा माता सुभगा अपने पतिके साथ सती हो गयी। तुम धनसम्पन्न और पूर्ण स्वतन्त्र थे। दुराचरणमें तुमने अपना सर्वस्व नष्ट कर दिया। यहाँतक कि घर भी बिक गया। तुम्हारी सरला पत्नी समझाती, पर तुम उसकी उपेक्षा कर देते। विवशतः वह अपनी संततियोंके साथ अपने पिताके घर जाकर जीवन- निर्वाह करने लगी। तुम दुराचरण-सम्पन्न सर्वथा निरंकुश थे। बलपूर्वक दूसरेका धन छीनकर मद्य, मांस और परस्त्रीका सेवन करते। तुम्हारी दुष्टता पराकाष्ठापर पहुँच गयी, तब राजाज्ञासे तुम नगरसे निर्वासित कर दिये गये। तुम वनमें पहुँचे। वहाँ तुम दस्यु-जीवन व्यतीत करने लगे। तुमसे भयभीत होकर मनुष्य ही नहीं, पशु भी प्राण बचाकर भागते थे। तुम पर्वतकी गुफामें रहते थे। तुम्हारे श्वशुरने तुमसे भयभीत होकर तुम्हारी पत्नी और बच्चोंको तुम्हारे पास पहुँचा दिया। तुम्हारी पत्नीके पास वस्त्राभरण थे और तुम्हारे पुत्र भी तेजस्वी थे; किंतु तुम रात्रिमें यात्रियोंको लूटकर उनके धन और स्त्रीका उपभोग करते। तुम सर्वथा निर्दय और हृदयहीन हो गये थे। एक बार एक ब्राह्मण अपनी युवती पत्नीके साथ उधरसे जा रहे थे। तुमने उन्हें पकड़ लिया। ब्राह्मणने करुण प्रार्थना की, धर्मोपदेश दिया, पर तुमपर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तुमने उन दीन ब्राह्मणदेवताका मस्तक उतार लिया। इस प्रकार तुम प्रतिदिन स्त्री, वृद्ध और बालकोंकी निर्दयतापूर्वक हत्या करते ही रहे। तुम सर्वथा विवेक- भ्रष्ट हो गये थे। तुम्हारा यौवन तो हत्या, लूट, परधन एवं पर- दारापहरणमें बीता; पर देखते-ही-देखते वृद्धावस्था आ गयी। तुम निर्बल हो गये। तुम्हारा शरीर काँपने लगा और तुमको अनेक प्रकारके कष्ट होने लगे। इस स्थितिमें तुम्हारा स्वजन या हितैषी कोई नहीं रहा। पुत्र और नौकर आदि सभी तुम्हारा तिरस्कार करते रहते। तुम निरन्तर दुखी रहने लगे। तुमने सोचा, 'अपना शेष धन दान कर दूँ।' तुम्हारी प्रार्थनासे एक ब्राह्मण वनमें गये। उनकी प्रार्थनापर ऋषिगण तुम्हारे पास आये, पर जब तुमने अपना धन उन्हें स्वीकार करनेके लिये आग्रह किया, तो वे तुरंत उलटे पैर वापस चले गये। सबने एक ही बात कही—'तेरे-जैसे अधम, हत्यारे, मद्यप, परस्त्रीगामी एवं क्रूरतम पापात्माका दिया धन लेनेका साहस कौन करेगा?' तुम रोगाक्रान्त थे। मुनियों और ब्राह्मणोंके वचन सुन मन-ही-मन पश्चात्ताप करने लगे। तुम्हारा हृदय हाहाकार कर रहा था, पर कोई वश नहीं था। तुम्हारे पास चाँदी, सोना और रत्नादि अधिक थे। तुमने ब्राह्मणोंके परामर्शसे एक पुरातन गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करवाया। मन्दिरके भव्य और आकर्षक बनवानेमें तुम्हारा सारा धन समाप्त हो गया। कुछ तुम्हारी स्त्री और कुछ तुम्हारे पुत्रों और मित्रोंने ले लिया। कुछ ही समय बाद तुम्हारा देहावसान हो गया। यमदूतोंने तुम्हें बड़ी यातना दी। यमके पूछनेपर तुमने पहले पुण्यकर्मोंका फल प्राप्त करना स्वीकार किया। फलतः अत्यधिक कान्तिपूर्ण गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करानेके कारण तुम सुन्दर राजा सोमकान्त हुए और तुम्हें अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी प्राप्त हो गयी।''

३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] सर्वथा निःस्पृह, परम वीतराग, दयामूर्ति महर्षि भृगु राजा सोमकान्तको उसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुना रहे थे, किंतु ऋषि-वचनोंपर उसे विश्वास नहीं हुआ। राजाके मनमें सन्देह उत्पन्न होते ही उनके शरीरसे विविध रंगके पक्षी निकल पड़े और उनके अंग-प्रत्यंग नोच-नोचकर खाने लगे। दुःखसे छटपटाते हुए राजाने महामुनि भृगुसे करुण प्रार्थना की—'मुनिनाथ! आपके इस वनमें पशु भी अपना सहज वैर त्याग देते हैं, फिर आपकी शरणमें आये मुझ कुष्ठीको ये पक्षी कष्ट क्यों दे रहे हैं? आप कृपापूर्वक मेरी रक्षा करें।' 'तुमने मेरे वचनपर सन्देह किया, इस कारण मैंने तुम्हें इतना अनुभव करा दिया। अब ये पक्षी शीघ्र चले जायँगे।' महर्षिने क्षणभर ध्यानस्थ होनेके अनन्तर कहा—'तुम्हारे पातक महान् हैं, तथापि मैं उन्हें दूर करनेका उपाय बताऊँगा।' 'हुं' महामुनि भृगुके उच्चारण करते ही समस्त पक्षी अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर महात्मा भृगुने राजा सोमकान्तको गणेशका 'अष्टोत्तरशतनाम' सुनाया और उससे अभिमन्त्रित जल राजाके शरीरपर छिड़क दिया। उक्त जलका छींटा पड़ते ही राजाकी नासिकासे एक छोटा काले मुखवाला बालक धरतीपर गिर पड़ा। थोड़ी ही देरमें वह अत्यन्त विशाल और भयानक हो गया। उसके मुखसे अग्निकी ज्वालाएँ निकल रही थीं। वहाँ सर्वत्र रक्त और पीब फैल गया। भयाक्रान्त आश्रम- वासियोंको भागते देखकर महर्षि भृगुने उस पुरुषसे उसका परिचय पूछा। उक्त भयानक पुरुषने उत्तर दिया—'मैं प्रत्येक प्राणीके शरीरमें रहनेवाला पापपुरुष हूँ। आपके अभिमन्त्रित जलका छींटा पड़नेसे इस राजाके शरीरसे निकला हूँ। आप मुझे निवास एवं भक्ष्य प्रदान कीजिये; अन्यथा मैं आपके सम्मुख ही सबके साथ इस राजा सोमकान्तको भी खा जाऊँगा।'

[दायाँ स्तम्भ] महामुनि भृगुने वहाँसे हटकर एक शुष्क आम्रवृक्षके कोटरकी ओर संकेत करते हुए उक्त पापपुरुषसे कहा— 'नीच! तू सूखे पत्तोंको खाकर इस कोटरमें रह; अन्यथा मैं तुझे भस्म कर दूँगा।' महामुनि भृगुकी वाणी सुनकर पापपुरुषने उस वृक्षका स्पर्श किया ही था कि पक्षियोंसहित वृक्ष तुरंत जलकर भस्म हो गया। मुनिसे भयभीत पापपुरुष भी उस भस्ममें छिप गया। इसके अनन्तर महर्षि भृगुने राजा सोमकान्तके समीप जाकर कहा—'जब तुम 'गणेशपुराण' सुनना प्रारम्भ करोगे, तब इस भस्मसे पुनः नया आम्रवृक्ष उगेगा। जिस प्रकार यह वृक्ष धीरे-धीरे बढ़ता जायगा, उसी प्रकार तुम्हारे पाप भी नष्ट होते जायँगे।' चकित होकर नरेशने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—'मुनिवर! ऐसा पुराण तो मैंने न कहीं देखा और न सुना ही है। वह कहाँ प्राप्त होगा और उसके वक्ता कहाँ हैं?' दयालु मुनि भृगुने कहा—'पहले उसे वेदगर्भ ब्रह्माने महर्षि व्यासको सुनाया था और उनकी कृपासे वह पापनाशक 'गणेशपुराण' मुझे प्राप्त हुआ। तुम तीर्थमें जाकर पहले 'गणेशपुराण'-श्रवणका संकल्प कर लो।' महर्षि भृगुकी आज्ञासे राजा सोमकान्तने प्रख्यात भृगुतीर्थमें स्नान किया और फिर पवित्र मनसे हाथमें जल लेकर संकल्प किया—'मैं श्रद्धा और विधिपूर्वक गणेशपुराण-श्रवण करूँगा।' राजाके आश्चर्यकी सीमा नहीं थी। संकल्पका जल धरतीपर छोड़ते ही वे पूर्णतया रोगमुक्त होकर पूर्ववत् सुन्दर और तेजस्वी हो गये। गलितकुष्ठकी पीड़ाकी बात तो दूर—शरीरपर उसका कोई चिह्न भी कहीं शेष नहीं रहा। हर्षमग्न नरेश महामुनिके समीप पहुँचे तो उनके चरणोंपर गिर पड़े। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक कहा—'मुनिनाथ! अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि

अङ्क] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणेशपुराण-श्रवणके संकल्पका जल छोड़ते ही मेरी सारी व्याधियाँ दूर हो गयीं।' महामुनिने राजाका हाथ पकड़कर उठाया और उन्हें बैठनेके लिये एक आसन दिया। राजाने हाथ जोड़कर कहा- 'दयामय ! आपकी दयासे मेरा सारा कष्ट दूर हो गया। अब आप कृपापूर्वक मुझे 'गणेशपुराण' की कथा सुनाइये।' मुनिवर भृगुने कहा- 'राजन् ! मैं यह पुराण तुम्हें सुनाता हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो।' महर्षिने पापनाशक परम पावन गणेशपुराणकी कथा प्रारम्भ करनेके पूर्व उसकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये सर्वप्रथम गणेश-वन्दना की- नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्मविद्याप्रदायिने । यस्यागस्त्यायते नाम विघ्नसागरशोषणे ॥ 'जिनका नाम विघ्नोंका समुद्र सोख लेनेके लिये अगस्त्यका काम करता है, उन ब्रह्म-विद्या-प्रदाता गणेशको नमस्कार है।' (गणेशपुराण १।१।१) इस प्रकार गणेशपुराण गणेश-वन्दनसे प्रारम्भ हुआ। पुराण-शब्दका साधारण अर्थ है- पुराना। जिस ग्रन्थमें पुरातन कथाओंका संकलन है, वह 'पुराण' है। किंतु 'पुराण' शब्दकी व्याख्या अत्यन्त विस्तृत है। श्रीमद्भागवत (१२।७।९-१०)-के मतानुसार पुराणके दस लक्षण हैं- सर्गोऽस्याथ विसर्गश्च वृत्ती रक्षान्तराणि च। वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः ॥ दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः। "पुराणोंके पारदर्शी विद्वान् बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं- 'विश्वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (ऊति) और अपाश्रय।' किंतु श्रीलोमहर्षण सूतने पुराणके निम्नलिखित पाँच लक्षणोंका ही उल्लेख किया है- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ 'मन्वन्तरविज्ञान, सृष्टिविज्ञान, प्रतिसृष्टिविज्ञान, वंशविज्ञान और वंशानुचरितविज्ञान।' ये पाँचों लक्षण भी पाँच-पाँच प्रकारके बताये गये हैं; किंतु विस्तार-भयसे यहाँ उनका उल्लेख नहीं किया जा रहा है। 'पुराण' अनादि हैं। प्रारम्भमें एक ही पुराण था, पर था अत्यन्त विस्तृत। उसकी श्लोक-संख्या शतकोटि थी। उसे लोकपितामहने ऋषियोंको सुनाया था। फिर वेदार्थ-दर्शनकी शक्तिके साथ अनादिकालीन पुराणको लुप्त होते देखकर भगवान् कृष्णद्वैपायनने पुराणोंका प्रणयन किया। उन्होंने पुराणोंकी श्लोक-संख्या चार लाख कर दी और उन पुराणोंमें निष्ठाके अनुरूप आराध्यकी प्रतिष्ठाकर कृपामूर्ति महर्षि व्यासने चारों वर्णोंके लिये वेदार्थ सहज सुलभ कर दिया। अष्टादश पुराण प्रसिद्ध हैं, किंतु कुछ विद्वान् उनके महापुराण, उपपुराण, अतिपुराण और पुराण भेद करते हैं और इन प्रत्येककी भी अष्टादश संख्या बतलाते हैं।* इस प्रकार गणेशपुराण अतिपुराण है, किंतु इस पंच- *(१) महापुराण-ब्राह्म, पद्म, शिव, विष्णु, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड और ब्रह्माण्ड। (२) उपपुराण-भागवत, माहेश्वर, ब्रह्माण्ड, आदित्य, पराशर, सौर, नन्दिकेश्वर, साम्ब, कालिका, वारुण, औशनस्, मानव, कापिल, दुर्वासस्, शिवधर्म, बृहन्नारदीय, नारसिंह और सनत्कुमार। (३) अतिपुराण-कार्तव, ऋजु, आदि, मुद्गल, पशुपति, गणेश, सौर, परानन्द, बृहद्धर्म, महाभागवत, देवी, कल्कि, भार्गव, वसिष्ठ, कौर्म, गर्ग, चण्डी और लक्ष्मी। (४) पुराण-बृहद्विष्णु, शिव उत्तरखण्ड, लघु बृहन्नारदीय, मार्कण्डेय, वह्नि, भविष्योत्तर, वराह, स्कन्द, वामन, बृहद्वामन, बृहन्मत्स्य, स्वल्पमत्स्य, लघुवैवर्त और पाँच प्रकारके भविष्य। जनसामान्यमें महापुराणोंके अतिरिक्त अन्य सभी पुराणोंकी प्रसिद्धि प्रायः उपपुराणोंके रूपमें ही है।

४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लक्षणात्मक गणेशपुराणकी अपनी विशिष्टता है। आदिदेव गणपतिके उपासकोंका तो यह प्राणप्रिय कण्ठहार है ही, समस्त आस्तिक-समुदायका अत्यन्त प्रिय और आदरणीय ग्रन्थ है। गणेश-साहित्यमें इसका स्थान प्रधान है। 'मुद्गलपुराण' से भी प्राचीन होनेके कारण स्वाभाविक ही इसकी मान्यता अधिक है। श्रुतियोंमें जिस सर्वात्मा, सर्वत्र, अनादि, अनन्त, अखण्ड-ज्ञानसम्पन्न पूर्णतम परमात्मा और उनके पंचदेवात्मक स्वरूपका वर्णन किया गया है, उसके अनुसार परब्रह्म परमेश्वर गणेशका विस्तृत विवेचन 'गणेशपुराण' में किया गया है। वहाँ आदिदेव गणेशको प्रणवरूपी बताया गया है और कहा गया है कि 'समस्त देवता और मुनि उन्हीं परमप्रभुका स्मरण करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र उन्हींकी पूजा करते हैं। वे सर्वकारण-कारण प्रभु ही समस्त जगत्‌के हेतु हैं। उन्हींकी आज्ञासे विधाता सृष्टि रचते हैं, विष्णु पालन एवं शिव संहार करते हैं। उन्हीं परमप्रभुके आदेशसे सूर्यदेव चलते हैं, वायु बहती है, पृथ्वीपर वृष्टि होती है और अग्नि प्रज्वलित होती है। अमित महिमामय प्रभु मंगलमय हैं, करुणामय हैं।' गणेशपुराण दो खण्डोंमें विभक्त है। पूर्वार्ध (उपासना- खण्ड)-में ९२ अध्याय और ४,०९३ श्लोक हैं। दूसरा उत्तरार्ध (क्रीडाखण्ड) १५५ अध्यायमें पूर्ण हुआ है। उसकी श्लोक-संख्या ६,९८६ है। इस प्रकार सम्पूर्ण गणेशपुराण २४७ अध्यायों और ११,०७९ श्लोकोंमें वर्णित है। पुराणकी दृष्टिसे इसका कलेवर भी लघु नहीं है। इसके प्रधान विषय प्रथमेश्वर गणेश ही हैं। अत्यन्त प्रांजल भाषामें गणेश-स्वरूप, गणेश- तत्त्व, गणेश-महिमा, गणेश-मन्त्र-माहात्म्य एवं गणेशकी सुमधुर लीला-कथाके माध्यमसे महिमामय गणेश- स्तवन 'गणेशपुराण' में इस प्रकार वर्णित हैं कि श्रोता अन्ततक भगवान् गणेशके ध्यानमें तन्मय रहता है। लीला-कथा उसके मर्मको स्पर्श करती चलती है। गणेशपुराणमें आद्यन्त सत्त्वकी प्रतिष्ठा एवं तमका विरोध पाया जाता है। आसुरी प्रवृत्तियोंके विनाश एवं दैवी-सम्पदाओंकी स्थापना एवं वृद्धिके लिये ही गजमुखकी अवतारणा होती है। एक बार ग्रन्थ आरम्भ कर लेनेपर पाठक और श्रोताके लिये उसे बीचमें छोड़ देना सहज सम्भाव्य नहीं होता। किंतु गणेशके गम्भीरतम वचनोंको समझनेके लिये विद्या, बुद्धि एवं गहन विचारके साथ श्रद्धा और भक्ति भी अपेक्षित है। शौनकमुनिने बारह वर्षोंका ज्ञानयज्ञ किया था। वहाँ अठारह पुराणोंकी मंगलमयी कथा हुई थी। उस कथासे अतृप्त ऋषियोंने सूतजीसे श्रीभगवान्‌की भुवनपावनी लीला-कथा और सुनानेकी प्रार्थना की। तब सूतजीने उन्हें गणेशपुराण सुनाकर तृप्त किया। यज्ञके नष्ट होनेपर दक्ष अत्यन्त दुखी थे। उस समय महर्षि मुद्गलने उन्हें गणेशपुराणकी लीला-कथा सुनायी और वहीं ब्रह्मासे सुने हुए महर्षि व्यास-कथित गणेशपुराणको महामुनि भृगुने देवनगरनरेश सोमकान्तको उनके लौकिक एवं पारलौकिक मंगलके लिये सुनानेकी कृपा की। उपासनाखण्डमें परात्पर परमेश्वर, सच्चिदानन्दघन

अङ्क] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणेशका विस्तृत वर्णन है। गणेश जगत्कर्ता, जगत्स्वरूप, | गणेश प्रत्येक युगमें त्रैलोक्यविजयी अजेय असुरके जगत्पालक, जगदाधार, सर्वसमर्थ, सर्वान्तर्यामी, सर्वत्र | वधके लिये अवतरित होते हैं। अनीति, अधर्म एवं एवं सर्वान्तरात्मा हैं। ब्रह्मादि देव उनकी इच्छाका | अनाचरणसम्पन्न असुरोंका विनाश होता है और धर्ममूर्ति अनुसरण करते हैं। वे भक्तोंके विघ्नोंका विनाश करनेवाले | परमात्मा गजानन धर्मकी स्थापना करते हैं। धरणीका मंगलमूर्ति, मंगलालय, विघ्नकर्ता, विघ्नहर्ता एवं विघ्नराज | भार उतरता है और दुखी देवता, ऋषि तथा ब्राह्मणादि हैं। वे परब्रह्मस्वरूप सर्वानन्द-प्रदाता सर्वानन्दमय हैं। | प्रसन्न होकर अपने धर्मका पालन करने लगते हैं। पितामहने सृष्टिरचना प्रारम्भ की, उस समय | सत्ययुगमें परमप्रभु गणेशका प्रथम अवतार गणेशने उन्हें सहायता प्रदान की। इस वर्णनके अनन्तर | महोत्कट विनायकके रूपमें हुआ था। परमतेजस्वी महर्षि भृगुने गृत्समद, रुक्मांगद एवं त्रिपुरासुरका वृत्तान्त | परमप्रभु विनायकके दस भुजाएँ थीं और सिंह उनका सुनाया। फिर उन्होंने महिमामय 'गणेशसहस्रनाम' का | वाहन था। वे महात्मा कश्यपकी परम सती सहधर्मिणी गान किया। इसी 'गणेशसहस्रनाम' के द्वारा भगवान् | अदितिके यहाँ प्रकट हुए थे। उस अवतारमें उन्होंने देवान्तक शंकर त्रिपुर-वध करनेमें सफल हुए। | और नरान्तक-जैसे दुर्दान्त असुरोंका वध किया था। इसके बाद गणेशपार्थिव-पूजा, गणेशव्रत, संकष्ट- | त्रेतामें इन त्रैलोक्यत्राता प्रभुने शिवप्रिया पार्वतीके चतुर्थीव्रत, अंगारकचतुर्थीव्रत एवं उसका माहात्म्य सुनाकर | यहाँ अवतार लिया। उनकी अंगकान्ति चन्द्र-तुल्य महामुनिने सोमकान्तको गणेशद्वारा चन्द्रमाको शाप- | थी। उनके छः हाथ थे और उनका वाहन मयूर प्रदान एवं उनपर अनुग्रहकी कथा सुनायी। तदनन्तर | था। उन्होंने माता-पिता, ऋषियों, ऋषिपत्नियों एवं उन्होंने दूर्वा-माहात्म्यका वर्णन किया। | मुनि-पुत्रोंको अलौकिक सुख प्रदान किया। तदनन्तर फिर उपासनाखण्डमें पुत्रप्राप्त्यर्थ संकष्टचतुर्थीव्रतके | अनेक असुरोंके साथ वरप्राप्त महादैत्य सिन्धुका वधकर सोद्यापन वर्णनके अनन्तर तारकासुर-वध, काम-दहन, | त्रैलोक्यमें धर्मकी स्थापना की। देवता, मुनि, ब्राह्मणों परशुरामका तप एवं उन्हें गणेश-दर्शनकी प्राप्ति आदि | एवं सद्धर्मपरायण पुरुषोंका दुःख दूर हुआ; उन्हें कथाओंमें सर्वत्र करुणामूर्ति प्रभु गणेशकी करुणा, | सुख-शान्ति प्राप्त हुई। उनकी भक्तवत्सलता एवं महिमाके दर्शन होते हैं। | द्वापरमें सिन्दूरासुरके क्रूरतम शासनमें त्रैलोक्य इसके बाद स्कन्दोत्पत्ति, मदनकी पुनरुत्पत्ति, देवर्षि | विकल-विह्वल हो गया था। देवता और ऋषि आदि नारदकी प्रेरणासे शेषके द्वारा गजाननकी आराधना | तपस्वी गिरि-गुफाओं और अरण्योंमें छिप गये थे। उस एवं स्तुतिका विशद वर्णन करते हुए गजवक्त्रका | समय परमप्रभु विनायक गौरीके यहाँ प्रकट हुए। अपने माहात्म्य गान किया गया है। गजवक्त्रके मंगलमय नाम | दिये वचनके अनुसार उन्होंने भगवान् शिवसे कहा कि और रूपका निरूपण करनेके साथ उपासनाखण्ड पूरा | 'आप मुझे राजा वरेण्यकी सद्यःप्रसूता सहधर्मिणी पुष्पिकाके हुआ है। | समीप पहुँचा दें।' आशुतोष शिवकी आज्ञासे नन्दी उन्हें इसके अनन्तर गणेशपुराणके उत्तरार्ध (क्रीडाखण्ड)- | वरेण्य-पत्नी पुष्पिकाके प्रसूति-गृहमें रख आये। में देवाधिदेव गजमुखके अवतरित होकर पृथ्वीका भार | वे परमप्रभु अरुणवर्णके थे। उनके चार भुजाएँ थीं उतारनेकी पुण्यमयी कथाका वर्णन किया गया है। उन | और उनका वाहन मूषक था। उनका नाम 'गजानन' कथाओंमें गणेशकी बाल-लीलाओं, असुर-संहार एवं | प्रसिद्ध हुआ। भक्तोंकी कामना-पूर्तिका मर्मस्पर्शी चित्रण है। गणेशपुराणके | महर्षि पराशर एवं उनकी सती धर्मपत्नी वत्सलाने क्रीडाखण्डके अनुसार सर्वसमर्थ भक्तवत्सल करुणामय | अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उन परमप्रभु गजाननका पालन

४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

किया। उन दयामयने महादैत्य सिन्दूरको मुक्ति प्रदानकर त्रैलोक्यकी भयानक विपत्तिका निवारण किया। तदनन्तर करुणामय गजाननने अपने पिता राजा वरेण्यके अशेष कल्याणके लिये उन्हें अमृतमय उपदेश दिया। वह 'गणेशगीता' के नामसे प्रसिद्ध है। इस गीतामें भगवान् गजाननने सर्वप्रथम सांख्यसारतत्त्वका प्रतिपादन किया है। तदनन्तर कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं कर्मसंन्यास-योगका निरूपण कर योगाभ्यासकी प्रशंसा करते हुए बुद्धि-योग और उपासना-योगका सुविस्तृत वर्णन किया है। फिर करुणामय प्रभु गजाननने विश्वरूपदर्शन एवं क्षेत्रज्ञानज्ञेय-विवेकका अत्यन्त प्रभावोत्पादक निरूपण करते हुए योगोपदेशपूर्ण एवं विविध कल्याणकर वचनोंसे अपना सदुपदेश पूर्ण किया। गोपालनन्दन योगेश्वर श्रीकृष्ण-कथित श्रीमद्भगवद्गीताकी भाँति यह गणेशगीता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं परमोपयोगी है। श्रीमद्भगवद्गीताके प्रायः समस्त विषय इस गणेशगीतामें आ गये हैं। इसके अनन्तर गणेशपुराणमें कलिमें होनेवाले अधर्म एवं अनाचारका वर्णन करते हुए इस युगके अन्तमें सर्वभूतहितैषी गणेशके अवतारका वर्णन है। कलिमें जब पापका साम्राज्य व्याप्त हो जायगा, तब वे प्रभु गणेश श्याम कलेवरमें अवतरित होंगे। उनका नाम 'धूम्रकेतु' होगा। उनके दो भुजाएँ होंगी। अश्वा- रूढ़ धूम्रकेतु पापोंका सर्वनाश कर धर्मकी प्रतिष्ठा कर देंगे और फिर सत्ययुगके मंगलमय चरणोंसे धरती प्रमुदित होगी। राजा सोमकान्तने यह पुण्यमयी गणेश-लीला- कथा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक वर्षतक सुनी। उस कथा-श्रवणके अद्भुत प्रभावसे वे रोगसे सर्वथा मुक्त एवं परम पवित्र हो गये। उनके लिये पवित्रतम गणेश- लोकसे विमान अवतीर्ण हुआ। गणेश-दूतोंने राजासे उस विमानमें बैठनेकी प्रार्थना की, तब अत्यन्त उपकृत भाग्यवान् राजा सोमकान्तने महर्षि भृगुके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी अनुमति प्राप्तकर अपनी सहधर्मिणी और अमात्य-द्वयसहित विमानमें बैठ गणेश-लोकके लिये प्रस्थित हुए। विमानमें आरूढ़ होनेपर राजाके पूछनेपर गणेश-दूतोंने काशी विश्वेश्वरके आवरणगत रहनेवाले छप्पन गणेशका नाम और उनके स्मरणका माहात्म्य सुनाया। पुराणके अन्तिम अध्यायमें उसके श्रवणका माहात्म्य गान किया गया है। गणेशपुराणके पाठ, श्रवण और उसकी पूजाकी तो अमित महिमा बतायी ही गयी है, ग्रन्थरत्नके लिखने और उसे घरमें रखनेका भी फल बतलाते हुए कहा गया है— यस्य गेहे गणेशस्य पुराणं लिखितं भवेत्। न तत्र राक्षसा भूताः प्रेताश्च पूतनादयः ॥ ग्रहा बालग्रहा नैव पीडां कुर्वन्ति कर्हिचित्। तद्गृहं हि गणेशेन रक्ष्यते सर्वदा स्वयम् ॥ इदं पुराणं शृणुयात् पूजयेद् वा समाहितः। तस्य दर्शनतः पूता भवन्ति पतिता नराः ॥ (श्रीगणेशपुराण २।१५५।९-११) इस प्रकार इन ललित कथाओंके माध्यमसे इस पुराणके द्वारा पाठकों एवं श्रोताओंको आसुरी प्रवृत्तियोंसे सतत सजग रहनेकी प्रेरणा तो प्राप्त होती ही है, दैवी सम्पदाओं एवं उनके मूलस्रोत परब्रह्म परमेश्वर गजवक्त्रके चरणकमलोंमें श्रद्धा और भक्ति भी उदित होती है। उस श्रद्धा-भक्तिसे दयामय गणेश सहज ही द्रवित होकर भक्तका लोक एवं परलोक—दोनों सफल कर देते हैं।* अनन्त जन्मोंकी ज्वाला सदाके लिये शान्तकर अक्षय सुख-शान्ति प्रदान कर देते हैं। निश्चय ही यह गणेश-पुराण गणेशोपासकोंके लिये सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ-रत्न है।


  • पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्। (श्रीगणेशपुराण २। १५५। २९)

उपासना-खण्ड

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमन्महर्षिकृष्णद्वैपायनव्यासविरचित श्रीगणेशपुराण [ पूर्वार्ध ] उपासना-खण्ड पहला अध्याय ऋषियों और सूतजीके संवादके प्रसंगमें गणेशजीकी महिमा और राजा सोमकान्तके चरित्रका वर्णन

नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्मविद्याप्रदायिने। यस्यागस्त्यायते नाम विघ्नसागरशोषणे ॥ ब्रह्मविद्याके प्रदाता उन गणेशजीको नमस्कार है, जिनका नाम अगस्त्यमुनि*की भाँति विघ्नरूपी समुद्रको सुखानेवाला है ॥ १ ॥ ऋषियोंने कहा—हे महाबुद्धिमान् वेदशास्त्रविशारद सूतजी ! आप समस्त विद्याओंके निधिरूप (खजाने) हैं, आपसे बढ़कर श्रेष्ठ वक्ता नहीं मिल सकता। हमारे जन्म-जन्मान्तरीय महान् पुण्योंका उदय हुआ है, जो कि आप-जैसे सर्वज्ञ सत्पुरुषका दर्शन हो रहा है। इस संसारमें हम सब सर्वाधिक धन्य हैं, हमारा जीवन सफल जीवन है। हमारे पूर्वज, हमारा वेद-शास्त्रोंका अध्ययन, हमारी तपस्याका श्रम—ये सब धन्य हो गये। [वक्ताओंमें] श्रेष्ठ [हे सूतजी] ! आपने हमें अठारह पुराणोंको विस्तारपूर्वक सुनाया है, हमारी अन्य पुराणोंको भी सुननेकी इच्छा है, अतः उन्हें भी सुनायें ॥ २-५ ॥ हम सब शौनकजीद्वारा आयोजित द्वादशवर्षीय महासत्रमें नियुक्त हैं, आपद्वारा कराये जानेवाले कथामृतपानके अतिरिक्त हमारे श्रमका निवारण किसी प्रकार नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

सूतजी बोले—पुण्य कर्ममें निरत हे महाभाग्यशाली [ऋषियो] ! आप लोगोंके द्वारा अत्यन्त उत्तम प्रश्न किया गया है; क्योंकि राग-द्वेषरहित, सम चित्तवाले साधुजनोंकी बुद्धि संसारके उपकारमें लगी रहती है ॥ ७ ॥ हे द्विजगण ! मुझे भी कथाओंके कहनेमें ही सन्तोष प्राप्त होता है, अतः मैं आप सब साधु चरितवाले सत्पुरुषोंको विशेष रूपसे कथा सुनाऊँगा ॥ ८ ॥ [अष्टादश महापुराणों, जिनकी कथा मैं सुना चुका

  • महाभारत-वनपर्व, अध्याय १०५ में वर्णित है कि अगस्त्यमुनिने समुद्रके सम्पूर्ण जलका पानकर उसे सुखा दिया था।

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४४          * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *          [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

हूँ, के अतिरिक्त] गणेश, नारदीय, नृसिंह आदि वैसे ही अन्य अठारह उपपुराण भी हैं, उनमें जो गणेशजीसे सम्बन्धित गणेशपुराण है, उसका प्रवचन मैं सर्वप्रथम करूँगा, जिसका कि विशेष रूपसे मर्त्यलोकमें श्रवण दुर्लभ है ॥ ९-१० ॥ जिस गणेशपुराणके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, जिसके प्रभावको कहनेमें [सहस्र मुखवाले] शेषजी और चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, तो भी आप सबकी आज्ञासे मैं इसको संक्षेपमें कहूँगा। बहुत- से जन्मोंके पुण्योंके एकत्र होनेसे ही इसका श्रवण होता है, पाखण्डियों, नास्तिकों और पापकर्मियोंको इसका श्रवण सम्भव नहीं होता ॥ ११-१२१/२ ॥ श्रीगणेशजी तत्त्वतः नित्य, निर्गुण और अनादि हैं; इसलिये उनके स्वरूपका कथन किसीके लिये सम्भव नहीं है; फिर भी उनकी उपासनामें निरत भक्तोंद्वारा उन्हें सगुणरूपमें निरूपित किया जाता है ॥ १३-१४॥ ॐकाररूपी जो भगवान् [गणेश] वेदोंमें सर्वप्रथम प्रतिष्ठित हैं, मुनिगण तथा इन्द्रादि देवगण जिनका हृदयमें सदा स्मरण करते रहते हैं, ब्रह्मा, ईशान (शिव), इन्द्र और विष्णु जिनका सतत पूजन करते हैं, जो समस्त जगतोंके हेतु और सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण हैं, जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजी [विश्वका] सृजन करते हैं, जिनकी आज्ञासे विष्णु पालन करते हैं, जिनकी आज्ञासे भगवान् शंकर संहार करते हैं, जिनकी आज्ञासे सूर्य संचरण (भ्रमण) करते हैं, जिनकी आज्ञासे पवनदेव प्रवहमान होते हैं, जिनकी आज्ञासे जल सभी दिशाओंमें प्रवाहित होता है, जिनकी आज्ञासे ग्रह-नक्षत्र (उल्कापिण्ड) पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, जिनकी आज्ञासे तीनों लोकोंमें अग्नि प्रज्वलित होती है, उन भगवान् गणेशका जो गुप्त चरित है, जिसे किसीके समक्ष प्रकट नहीं किया गया है, उसे मैं आप सबसे कहता हूँ। हे द्विजगण! आप लोग आदरपूर्वक उसे सुनें ॥ १५-१९ ॥ इसे पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अमिततेजस्वी व्यासजीसे कहा था, उन्होंने इसे भृगुजीसे और भृगुजीने इसे [राजा] सोमकान्तसे कहा- ॥ २० ॥


[दायाँ स्तम्भ]

जिन्होंने करोड़ों व्रतों, यज्ञों, तपस्याओं, दानों और तीर्थसेवनद्वारा पुण्य अर्जित किया है, हे श्रेष्ठ द्विजगणो! उन्हींकी बुद्धि इस गणेशसंज्ञक पुराणके श्रवणमें प्रवृत्त होती है। जिनका मन स्त्री, पुत्र, भूमि आदि सांसारिक मायाजालमें आसक्त नहीं होता, हे श्रेष्ठ मुनिगण! भगवान् मयूरेश (गणेशजी)-की कथाका वे ही सादर श्रवण करते हैं। अब आप लोग सोमकान्तके आख्यानके माध्यमसे इसकी (गणेशपुराणकी) महिमाका श्रवण करें ॥ २१-२३ ॥ सौराष्ट्र देशमें स्थित देवनगरमें सोमकान्त नामका एक राजा हुआ, जो वेद और शास्त्रके तत्त्वको जानने- वाला तथा धर्मशास्त्रके प्रयोजनभूत विहित कर्मानुष्ठानमें रत रहनेवाला था ॥ २४ ॥ जब वह प्रस्थान करता तो दस सहस्र गजारोही, उसके दुगुने अर्थात् बीस सहस्र अश्वारोही और छः हजार रथारोही उसका अनुगमन करते थे। साथ ही असंख्य पैदल सैनिक, आग्नेयास्त्रधारी तथा दो तरकस धारण करनेवाले धनुर्धारी भी उसके साथ होते थे ॥ २५-२६ ॥ उसने बुद्धिसे बृहस्पतिको, धन-सम्पत्तिसे कुबेरको, क्षमासे पृथ्वीको और गाम्भीर्यसे महासागरको जीत लिया था। उस राजाने अपनी प्रकाशमयी आभासे सूर्य और कान्तिसे चन्द्रमाको, प्रतापसे अग्निको और सौन्दर्यसे कामदेवको जीत लिया था ॥ २७-२८ ॥ उसके पाँच मन्त्री थे, जो प्रबल शक्तिशाली, दृढ़ पराक्रमी, नीतिशास्त्रके तत्त्वार्थको जाननेवाले और शत्रु- राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले थे ॥ २९ ॥ उनमेंसे प्रथमका नाम रूपवान्, दूसरेका विद्याधीश, तीसरेका क्षेमंकर, चौथा ज्ञानगम्य और पाँचवाँ सुबल नामवाला था ॥ ३० ॥ ये सभी नित्य राज्यकार्य करनेवाले और राजाके अत्यन्त प्रिय थे। इन्होंने अनेक देशोंपर आक्रमण करके अपने पराक्रमसे उन्हें विजित किया था ॥ ३१ ॥ ये सभी अत्यन्त सुन्दर थे तथा अनेक प्रकारके आभूषणों और वस्त्रोंसे अलंकृत रहते थे। उस राजाकी सुधर्मा नामक गुणशालिनी पत्नी थी, जिसके रूपको


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