श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंअङ्क] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणेशपुराण-श्रवणके संकल्पका जल छोड़ते ही मेरी सारी व्याधियाँ दूर हो गयीं।' महामुनिने राजाका हाथ पकड़कर उठाया और उन्हें बैठनेके लिये एक आसन दिया। राजाने हाथ जोड़कर कहा- 'दयामय ! आपकी दयासे मेरा सारा कष्ट दूर हो गया। अब आप कृपापूर्वक मुझे 'गणेशपुराण' की कथा सुनाइये।' मुनिवर भृगुने कहा- 'राजन् ! मैं यह पुराण तुम्हें सुनाता हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो।' महर्षिने पापनाशक परम पावन गणेशपुराणकी कथा प्रारम्भ करनेके पूर्व उसकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये सर्वप्रथम गणेश-वन्दना की- नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्मविद्याप्रदायिने । यस्यागस्त्यायते नाम विघ्नसागरशोषणे ॥ 'जिनका नाम विघ्नोंका समुद्र सोख लेनेके लिये अगस्त्यका काम करता है, उन ब्रह्म-विद्या-प्रदाता गणेशको नमस्कार है।' (गणेशपुराण १।१।१) इस प्रकार गणेशपुराण गणेश-वन्दनसे प्रारम्भ हुआ। पुराण-शब्दका साधारण अर्थ है- पुराना। जिस ग्रन्थमें पुरातन कथाओंका संकलन है, वह 'पुराण' है। किंतु 'पुराण' शब्दकी व्याख्या अत्यन्त विस्तृत है। श्रीमद्भागवत (१२।७।९-१०)-के मतानुसार पुराणके दस लक्षण हैं- सर्गोऽस्याथ विसर्गश्च वृत्ती रक्षान्तराणि च। वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः ॥ दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः। "पुराणोंके पारदर्शी विद्वान् बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं- 'विश्वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (ऊति) और अपाश्रय।' किंतु श्रीलोमहर्षण सूतने पुराणके निम्नलिखित पाँच लक्षणोंका ही उल्लेख किया है- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ 'मन्वन्तरविज्ञान, सृष्टिविज्ञान, प्रतिसृष्टिविज्ञान, वंशविज्ञान और वंशानुचरितविज्ञान।' ये पाँचों लक्षण भी पाँच-पाँच प्रकारके बताये गये हैं; किंतु विस्तार-भयसे यहाँ उनका उल्लेख नहीं किया जा रहा है। 'पुराण' अनादि हैं। प्रारम्भमें एक ही पुराण था, पर था अत्यन्त विस्तृत। उसकी श्लोक-संख्या शतकोटि थी। उसे लोकपितामहने ऋषियोंको सुनाया था। फिर वेदार्थ-दर्शनकी शक्तिके साथ अनादिकालीन पुराणको लुप्त होते देखकर भगवान् कृष्णद्वैपायनने पुराणोंका प्रणयन किया। उन्होंने पुराणोंकी श्लोक-संख्या चार लाख कर दी और उन पुराणोंमें निष्ठाके अनुरूप आराध्यकी प्रतिष्ठाकर कृपामूर्ति महर्षि व्यासने चारों वर्णोंके लिये वेदार्थ सहज सुलभ कर दिया। अष्टादश पुराण प्रसिद्ध हैं, किंतु कुछ विद्वान् उनके महापुराण, उपपुराण, अतिपुराण और पुराण भेद करते हैं और इन प्रत्येककी भी अष्टादश संख्या बतलाते हैं।* इस प्रकार गणेशपुराण अतिपुराण है, किंतु इस पंच- *(१) महापुराण-ब्राह्म, पद्म, शिव, विष्णु, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड और ब्रह्माण्ड। (२) उपपुराण-भागवत, माहेश्वर, ब्रह्माण्ड, आदित्य, पराशर, सौर, नन्दिकेश्वर, साम्ब, कालिका, वारुण, औशनस्, मानव, कापिल, दुर्वासस्, शिवधर्म, बृहन्नारदीय, नारसिंह और सनत्कुमार। (३) अतिपुराण-कार्तव, ऋजु, आदि, मुद्गल, पशुपति, गणेश, सौर, परानन्द, बृहद्धर्म, महाभागवत, देवी, कल्कि, भार्गव, वसिष्ठ, कौर्म, गर्ग, चण्डी और लक्ष्मी। (४) पुराण-बृहद्विष्णु, शिव उत्तरखण्ड, लघु बृहन्नारदीय, मार्कण्डेय, वह्नि, भविष्योत्तर, वराह, स्कन्द, वामन, बृहद्वामन, बृहन्मत्स्य, स्वल्पमत्स्य, लघुवैवर्त और पाँच प्रकारके भविष्य। जनसामान्यमें महापुराणोंके अतिरिक्त अन्य सभी पुराणोंकी प्रसिद्धि प्रायः उपपुराणोंके रूपमें ही है।