श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लक्षणात्मक गणेशपुराणकी अपनी विशिष्टता है। आदिदेव गणपतिके उपासकोंका तो यह प्राणप्रिय कण्ठहार है ही, समस्त आस्तिक-समुदायका अत्यन्त प्रिय और आदरणीय ग्रन्थ है। गणेश-साहित्यमें इसका स्थान प्रधान है। 'मुद्गलपुराण' से भी प्राचीन होनेके कारण स्वाभाविक ही इसकी मान्यता अधिक है। श्रुतियोंमें जिस सर्वात्मा, सर्वत्र, अनादि, अनन्त, अखण्ड-ज्ञानसम्पन्न पूर्णतम परमात्मा और उनके पंचदेवात्मक स्वरूपका वर्णन किया गया है, उसके अनुसार परब्रह्म परमेश्वर गणेशका विस्तृत विवेचन 'गणेशपुराण' में किया गया है। वहाँ आदिदेव गणेशको प्रणवरूपी बताया गया है और कहा गया है कि 'समस्त देवता और मुनि उन्हीं परमप्रभुका स्मरण करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र उन्हींकी पूजा करते हैं। वे सर्वकारण-कारण प्रभु ही समस्त जगत्के हेतु हैं। उन्हींकी आज्ञासे विधाता सृष्टि रचते हैं, विष्णु पालन एवं शिव संहार करते हैं। उन्हीं परमप्रभुके आदेशसे सूर्यदेव चलते हैं, वायु बहती है, पृथ्वीपर वृष्टि होती है और अग्नि प्रज्वलित होती है। अमित महिमामय प्रभु मंगलमय हैं, करुणामय हैं।' गणेशपुराण दो खण्डोंमें विभक्त है। पूर्वार्ध (उपासना- खण्ड)-में ९२ अध्याय और ४,०९३ श्लोक हैं। दूसरा उत्तरार्ध (क्रीडाखण्ड) १५५ अध्यायमें पूर्ण हुआ है। उसकी श्लोक-संख्या ६,९८६ है। इस प्रकार सम्पूर्ण गणेशपुराण २४७ अध्यायों और ११,०७९ श्लोकोंमें वर्णित है। पुराणकी दृष्टिसे इसका कलेवर भी लघु नहीं है। इसके प्रधान विषय प्रथमेश्वर गणेश ही हैं। अत्यन्त प्रांजल भाषामें गणेश-स्वरूप, गणेश- तत्त्व, गणेश-महिमा, गणेश-मन्त्र-माहात्म्य एवं गणेशकी सुमधुर लीला-कथाके माध्यमसे महिमामय गणेश- स्तवन 'गणेशपुराण' में इस प्रकार वर्णित हैं कि श्रोता अन्ततक भगवान् गणेशके ध्यानमें तन्मय रहता है। लीला-कथा उसके मर्मको स्पर्श करती चलती है। गणेशपुराणमें आद्यन्त सत्त्वकी प्रतिष्ठा एवं तमका विरोध पाया जाता है। आसुरी प्रवृत्तियोंके विनाश एवं दैवी-सम्पदाओंकी स्थापना एवं वृद्धिके लिये ही गजमुखकी अवतारणा होती है। एक बार ग्रन्थ आरम्भ कर लेनेपर पाठक और श्रोताके लिये उसे बीचमें छोड़ देना सहज सम्भाव्य नहीं होता। किंतु गणेशके गम्भीरतम वचनोंको समझनेके लिये विद्या, बुद्धि एवं गहन विचारके साथ श्रद्धा और भक्ति भी अपेक्षित है। शौनकमुनिने बारह वर्षोंका ज्ञानयज्ञ किया था। वहाँ अठारह पुराणोंकी मंगलमयी कथा हुई थी। उस कथासे अतृप्त ऋषियोंने सूतजीसे श्रीभगवान्की भुवनपावनी लीला-कथा और सुनानेकी प्रार्थना की। तब सूतजीने उन्हें गणेशपुराण सुनाकर तृप्त किया। यज्ञके नष्ट होनेपर दक्ष अत्यन्त दुखी थे। उस समय महर्षि मुद्गलने उन्हें गणेशपुराणकी लीला-कथा सुनायी और वहीं ब्रह्मासे सुने हुए महर्षि व्यास-कथित गणेशपुराणको महामुनि भृगुने देवनगरनरेश सोमकान्तको उनके लौकिक एवं पारलौकिक मंगलके लिये सुनानेकी कृपा की। उपासनाखण्डमें परात्पर परमेश्वर, सच्चिदानन्दघन