श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंअङ्क] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणेशका विस्तृत वर्णन है। गणेश जगत्कर्ता, जगत्स्वरूप, | गणेश प्रत्येक युगमें त्रैलोक्यविजयी अजेय असुरके जगत्पालक, जगदाधार, सर्वसमर्थ, सर्वान्तर्यामी, सर्वत्र | वधके लिये अवतरित होते हैं। अनीति, अधर्म एवं एवं सर्वान्तरात्मा हैं। ब्रह्मादि देव उनकी इच्छाका | अनाचरणसम्पन्न असुरोंका विनाश होता है और धर्ममूर्ति अनुसरण करते हैं। वे भक्तोंके विघ्नोंका विनाश करनेवाले | परमात्मा गजानन धर्मकी स्थापना करते हैं। धरणीका मंगलमूर्ति, मंगलालय, विघ्नकर्ता, विघ्नहर्ता एवं विघ्नराज | भार उतरता है और दुखी देवता, ऋषि तथा ब्राह्मणादि हैं। वे परब्रह्मस्वरूप सर्वानन्द-प्रदाता सर्वानन्दमय हैं। | प्रसन्न होकर अपने धर्मका पालन करने लगते हैं। पितामहने सृष्टिरचना प्रारम्भ की, उस समय | सत्ययुगमें परमप्रभु गणेशका प्रथम अवतार गणेशने उन्हें सहायता प्रदान की। इस वर्णनके अनन्तर | महोत्कट विनायकके रूपमें हुआ था। परमतेजस्वी महर्षि भृगुने गृत्समद, रुक्मांगद एवं त्रिपुरासुरका वृत्तान्त | परमप्रभु विनायकके दस भुजाएँ थीं और सिंह उनका सुनाया। फिर उन्होंने महिमामय 'गणेशसहस्रनाम' का | वाहन था। वे महात्मा कश्यपकी परम सती सहधर्मिणी गान किया। इसी 'गणेशसहस्रनाम' के द्वारा भगवान् | अदितिके यहाँ प्रकट हुए थे। उस अवतारमें उन्होंने देवान्तक शंकर त्रिपुर-वध करनेमें सफल हुए। | और नरान्तक-जैसे दुर्दान्त असुरोंका वध किया था। इसके बाद गणेशपार्थिव-पूजा, गणेशव्रत, संकष्ट- | त्रेतामें इन त्रैलोक्यत्राता प्रभुने शिवप्रिया पार्वतीके चतुर्थीव्रत, अंगारकचतुर्थीव्रत एवं उसका माहात्म्य सुनाकर | यहाँ अवतार लिया। उनकी अंगकान्ति चन्द्र-तुल्य महामुनिने सोमकान्तको गणेशद्वारा चन्द्रमाको शाप- | थी। उनके छः हाथ थे और उनका वाहन मयूर प्रदान एवं उनपर अनुग्रहकी कथा सुनायी। तदनन्तर | था। उन्होंने माता-पिता, ऋषियों, ऋषिपत्नियों एवं उन्होंने दूर्वा-माहात्म्यका वर्णन किया। | मुनि-पुत्रोंको अलौकिक सुख प्रदान किया। तदनन्तर फिर उपासनाखण्डमें पुत्रप्राप्त्यर्थ संकष्टचतुर्थीव्रतके | अनेक असुरोंके साथ वरप्राप्त महादैत्य सिन्धुका वधकर सोद्यापन वर्णनके अनन्तर तारकासुर-वध, काम-दहन, | त्रैलोक्यमें धर्मकी स्थापना की। देवता, मुनि, ब्राह्मणों परशुरामका तप एवं उन्हें गणेश-दर्शनकी प्राप्ति आदि | एवं सद्धर्मपरायण पुरुषोंका दुःख दूर हुआ; उन्हें कथाओंमें सर्वत्र करुणामूर्ति प्रभु गणेशकी करुणा, | सुख-शान्ति प्राप्त हुई। उनकी भक्तवत्सलता एवं महिमाके दर्शन होते हैं। | द्वापरमें सिन्दूरासुरके क्रूरतम शासनमें त्रैलोक्य इसके बाद स्कन्दोत्पत्ति, मदनकी पुनरुत्पत्ति, देवर्षि | विकल-विह्वल हो गया था। देवता और ऋषि आदि नारदकी प्रेरणासे शेषके द्वारा गजाननकी आराधना | तपस्वी गिरि-गुफाओं और अरण्योंमें छिप गये थे। उस एवं स्तुतिका विशद वर्णन करते हुए गजवक्त्रका | समय परमप्रभु विनायक गौरीके यहाँ प्रकट हुए। अपने माहात्म्य गान किया गया है। गजवक्त्रके मंगलमय नाम | दिये वचनके अनुसार उन्होंने भगवान् शिवसे कहा कि और रूपका निरूपण करनेके साथ उपासनाखण्ड पूरा | 'आप मुझे राजा वरेण्यकी सद्यःप्रसूता सहधर्मिणी पुष्पिकाके हुआ है। | समीप पहुँचा दें।' आशुतोष शिवकी आज्ञासे नन्दी उन्हें इसके अनन्तर गणेशपुराणके उत्तरार्ध (क्रीडाखण्ड)- | वरेण्य-पत्नी पुष्पिकाके प्रसूति-गृहमें रख आये। में देवाधिदेव गजमुखके अवतरित होकर पृथ्वीका भार | वे परमप्रभु अरुणवर्णके थे। उनके चार भुजाएँ थीं उतारनेकी पुण्यमयी कथाका वर्णन किया गया है। उन | और उनका वाहन मूषक था। उनका नाम 'गजानन' कथाओंमें गणेशकी बाल-लीलाओं, असुर-संहार एवं | प्रसिद्ध हुआ। भक्तोंकी कामना-पूर्तिका मर्मस्पर्शी चित्रण है। गणेशपुराणके | महर्षि पराशर एवं उनकी सती धर्मपत्नी वत्सलाने क्रीडाखण्डके अनुसार सर्वसमर्थ भक्तवत्सल करुणामय | अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उन परमप्रभु गजाननका पालन