श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
किया। उन दयामयने महादैत्य सिन्दूरको मुक्ति प्रदानकर त्रैलोक्यकी भयानक विपत्तिका निवारण किया। तदनन्तर करुणामय गजाननने अपने पिता राजा वरेण्यके अशेष कल्याणके लिये उन्हें अमृतमय उपदेश दिया। वह 'गणेशगीता' के नामसे प्रसिद्ध है। इस गीतामें भगवान् गजाननने सर्वप्रथम सांख्यसारतत्त्वका प्रतिपादन किया है। तदनन्तर कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं कर्मसंन्यास-योगका निरूपण कर योगाभ्यासकी प्रशंसा करते हुए बुद्धि-योग और उपासना-योगका सुविस्तृत वर्णन किया है। फिर करुणामय प्रभु गजाननने विश्वरूपदर्शन एवं क्षेत्रज्ञानज्ञेय-विवेकका अत्यन्त प्रभावोत्पादक निरूपण करते हुए योगोपदेशपूर्ण एवं विविध कल्याणकर वचनोंसे अपना सदुपदेश पूर्ण किया। गोपालनन्दन योगेश्वर श्रीकृष्ण-कथित श्रीमद्भगवद्गीताकी भाँति यह गणेशगीता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं परमोपयोगी है। श्रीमद्भगवद्गीताके प्रायः समस्त विषय इस गणेशगीतामें आ गये हैं। इसके अनन्तर गणेशपुराणमें कलिमें होनेवाले अधर्म एवं अनाचारका वर्णन करते हुए इस युगके अन्तमें सर्वभूतहितैषी गणेशके अवतारका वर्णन है। कलिमें जब पापका साम्राज्य व्याप्त हो जायगा, तब वे प्रभु गणेश श्याम कलेवरमें अवतरित होंगे। उनका नाम 'धूम्रकेतु' होगा। उनके दो भुजाएँ होंगी। अश्वा- रूढ़ धूम्रकेतु पापोंका सर्वनाश कर धर्मकी प्रतिष्ठा कर देंगे और फिर सत्ययुगके मंगलमय चरणोंसे धरती प्रमुदित होगी। राजा सोमकान्तने यह पुण्यमयी गणेश-लीला- कथा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक वर्षतक सुनी। उस कथा-श्रवणके अद्भुत प्रभावसे वे रोगसे सर्वथा मुक्त एवं परम पवित्र हो गये। उनके लिये पवित्रतम गणेश- लोकसे विमान अवतीर्ण हुआ। गणेश-दूतोंने राजासे उस विमानमें बैठनेकी प्रार्थना की, तब अत्यन्त उपकृत भाग्यवान् राजा सोमकान्तने महर्षि भृगुके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी अनुमति प्राप्तकर अपनी सहधर्मिणी और अमात्य-द्वयसहित विमानमें बैठ गणेश-लोकके लिये प्रस्थित हुए। विमानमें आरूढ़ होनेपर राजाके पूछनेपर गणेश-दूतोंने काशी विश्वेश्वरके आवरणगत रहनेवाले छप्पन गणेशका नाम और उनके स्मरणका माहात्म्य सुनाया। पुराणके अन्तिम अध्यायमें उसके श्रवणका माहात्म्य गान किया गया है। गणेशपुराणके पाठ, श्रवण और उसकी पूजाकी तो अमित महिमा बतायी ही गयी है, ग्रन्थरत्नके लिखने और उसे घरमें रखनेका भी फल बतलाते हुए कहा गया है— यस्य गेहे गणेशस्य पुराणं लिखितं भवेत्। न तत्र राक्षसा भूताः प्रेताश्च पूतनादयः ॥ ग्रहा बालग्रहा नैव पीडां कुर्वन्ति कर्हिचित्। तद्गृहं हि गणेशेन रक्ष्यते सर्वदा स्वयम् ॥ इदं पुराणं शृणुयात् पूजयेद् वा समाहितः। तस्य दर्शनतः पूता भवन्ति पतिता नराः ॥ (श्रीगणेशपुराण २।१५५।९-११) इस प्रकार इन ललित कथाओंके माध्यमसे इस पुराणके द्वारा पाठकों एवं श्रोताओंको आसुरी प्रवृत्तियोंसे सतत सजग रहनेकी प्रेरणा तो प्राप्त होती ही है, दैवी सम्पदाओं एवं उनके मूलस्रोत परब्रह्म परमेश्वर गजवक्त्रके चरणकमलोंमें श्रद्धा और भक्ति भी उदित होती है। उस श्रद्धा-भक्तिसे दयामय गणेश सहज ही द्रवित होकर भक्तका लोक एवं परलोक—दोनों सफल कर देते हैं।* अनन्त जन्मोंकी ज्वाला सदाके लिये शान्तकर अक्षय सुख-शान्ति प्रदान कर देते हैं। निश्चय ही यह गणेश-पुराण गणेशोपासकोंके लिये सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ-रत्न है।
- पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्। (श्रीगणेशपुराण २। १५५। २९)