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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

अङ्क] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणेशका विस्तृत वर्णन है। गणेश जगत्कर्ता, जगत्स्वरूप, | गणेश प्रत्येक युगमें त्रैलोक्यविजयी अजेय असुरके जगत्पालक, जगदाधार, सर्वसमर्थ, सर्वान्तर्यामी, सर्वत्र | वधके लिये अवतरित होते हैं। अनीति, अधर्म एवं एवं सर्वान्तरात्मा हैं। ब्रह्मादि देव उनकी इच्छाका | अनाचरणसम्पन्न असुरोंका विनाश होता है और धर्ममूर्ति अनुसरण करते हैं। वे भक्तोंके विघ्नोंका विनाश करनेवाले | परमात्मा गजानन धर्मकी स्थापना करते हैं। धरणीका मंगलमूर्ति, मंगलालय, विघ्नकर्ता, विघ्नहर्ता एवं विघ्नराज | भार उतरता है और दुखी देवता, ऋषि तथा ब्राह्मणादि हैं। वे परब्रह्मस्वरूप सर्वानन्द-प्रदाता सर्वानन्दमय हैं। | प्रसन्न होकर अपने धर्मका पालन करने लगते हैं। पितामहने सृष्टिरचना प्रारम्भ की, उस समय | सत्ययुगमें परमप्रभु गणेशका प्रथम अवतार गणेशने उन्हें सहायता प्रदान की। इस वर्णनके अनन्तर | महोत्कट विनायकके रूपमें हुआ था। परमतेजस्वी महर्षि भृगुने गृत्समद, रुक्मांगद एवं त्रिपुरासुरका वृत्तान्त | परमप्रभु विनायकके दस भुजाएँ थीं और सिंह उनका सुनाया। फिर उन्होंने महिमामय 'गणेशसहस्रनाम' का | वाहन था। वे महात्मा कश्यपकी परम सती सहधर्मिणी गान किया। इसी 'गणेशसहस्रनाम' के द्वारा भगवान् | अदितिके यहाँ प्रकट हुए थे। उस अवतारमें उन्होंने देवान्तक शंकर त्रिपुर-वध करनेमें सफल हुए। | और नरान्तक-जैसे दुर्दान्त असुरोंका वध किया था। इसके बाद गणेशपार्थिव-पूजा, गणेशव्रत, संकष्ट- | त्रेतामें इन त्रैलोक्यत्राता प्रभुने शिवप्रिया पार्वतीके चतुर्थीव्रत, अंगारकचतुर्थीव्रत एवं उसका माहात्म्य सुनाकर | यहाँ अवतार लिया। उनकी अंगकान्ति चन्द्र-तुल्य महामुनिने सोमकान्तको गणेशद्वारा चन्द्रमाको शाप- | थी। उनके छः हाथ थे और उनका वाहन मयूर प्रदान एवं उनपर अनुग्रहकी कथा सुनायी। तदनन्तर | था। उन्होंने माता-पिता, ऋषियों, ऋषिपत्नियों एवं उन्होंने दूर्वा-माहात्म्यका वर्णन किया। | मुनि-पुत्रोंको अलौकिक सुख प्रदान किया। तदनन्तर फिर उपासनाखण्डमें पुत्रप्राप्त्यर्थ संकष्टचतुर्थीव्रतके | अनेक असुरोंके साथ वरप्राप्त महादैत्य सिन्धुका वधकर सोद्यापन वर्णनके अनन्तर तारकासुर-वध, काम-दहन, | त्रैलोक्यमें धर्मकी स्थापना की। देवता, मुनि, ब्राह्मणों परशुरामका तप एवं उन्हें गणेश-दर्शनकी प्राप्ति आदि | एवं सद्धर्मपरायण पुरुषोंका दुःख दूर हुआ; उन्हें कथाओंमें सर्वत्र करुणामूर्ति प्रभु गणेशकी करुणा, | सुख-शान्ति प्राप्त हुई। उनकी भक्तवत्सलता एवं महिमाके दर्शन होते हैं। | द्वापरमें सिन्दूरासुरके क्रूरतम शासनमें त्रैलोक्य इसके बाद स्कन्दोत्पत्ति, मदनकी पुनरुत्पत्ति, देवर्षि | विकल-विह्वल हो गया था। देवता और ऋषि आदि नारदकी प्रेरणासे शेषके द्वारा गजाननकी आराधना | तपस्वी गिरि-गुफाओं और अरण्योंमें छिप गये थे। उस एवं स्तुतिका विशद वर्णन करते हुए गजवक्त्रका | समय परमप्रभु विनायक गौरीके यहाँ प्रकट हुए। अपने माहात्म्य गान किया गया है। गजवक्त्रके मंगलमय नाम | दिये वचनके अनुसार उन्होंने भगवान् शिवसे कहा कि और रूपका निरूपण करनेके साथ उपासनाखण्ड पूरा | 'आप मुझे राजा वरेण्यकी सद्यःप्रसूता सहधर्मिणी पुष्पिकाके हुआ है। | समीप पहुँचा दें।' आशुतोष शिवकी आज्ञासे नन्दी उन्हें इसके अनन्तर गणेशपुराणके उत्तरार्ध (क्रीडाखण्ड)- | वरेण्य-पत्नी पुष्पिकाके प्रसूति-गृहमें रख आये। में देवाधिदेव गजमुखके अवतरित होकर पृथ्वीका भार | वे परमप्रभु अरुणवर्णके थे। उनके चार भुजाएँ थीं उतारनेकी पुण्यमयी कथाका वर्णन किया गया है। उन | और उनका वाहन मूषक था। उनका नाम 'गजानन' कथाओंमें गणेशकी बाल-लीलाओं, असुर-संहार एवं | प्रसिद्ध हुआ। भक्तोंकी कामना-पूर्तिका मर्मस्पर्शी चित्रण है। गणेशपुराणके | महर्षि पराशर एवं उनकी सती धर्मपत्नी वत्सलाने क्रीडाखण्डके अनुसार सर्वसमर्थ भक्तवत्सल करुणामय | अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उन परमप्रभु गजाननका पालन

४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

किया। उन दयामयने महादैत्य सिन्दूरको मुक्ति प्रदानकर त्रैलोक्यकी भयानक विपत्तिका निवारण किया। तदनन्तर करुणामय गजाननने अपने पिता राजा वरेण्यके अशेष कल्याणके लिये उन्हें अमृतमय उपदेश दिया। वह 'गणेशगीता' के नामसे प्रसिद्ध है। इस गीतामें भगवान् गजाननने सर्वप्रथम सांख्यसारतत्त्वका प्रतिपादन किया है। तदनन्तर कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं कर्मसंन्यास-योगका निरूपण कर योगाभ्यासकी प्रशंसा करते हुए बुद्धि-योग और उपासना-योगका सुविस्तृत वर्णन किया है। फिर करुणामय प्रभु गजाननने विश्वरूपदर्शन एवं क्षेत्रज्ञानज्ञेय-विवेकका अत्यन्त प्रभावोत्पादक निरूपण करते हुए योगोपदेशपूर्ण एवं विविध कल्याणकर वचनोंसे अपना सदुपदेश पूर्ण किया। गोपालनन्दन योगेश्वर श्रीकृष्ण-कथित श्रीमद्भगवद्गीताकी भाँति यह गणेशगीता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं परमोपयोगी है। श्रीमद्भगवद्गीताके प्रायः समस्त विषय इस गणेशगीतामें आ गये हैं। इसके अनन्तर गणेशपुराणमें कलिमें होनेवाले अधर्म एवं अनाचारका वर्णन करते हुए इस युगके अन्तमें सर्वभूतहितैषी गणेशके अवतारका वर्णन है। कलिमें जब पापका साम्राज्य व्याप्त हो जायगा, तब वे प्रभु गणेश श्याम कलेवरमें अवतरित होंगे। उनका नाम 'धूम्रकेतु' होगा। उनके दो भुजाएँ होंगी। अश्वा- रूढ़ धूम्रकेतु पापोंका सर्वनाश कर धर्मकी प्रतिष्ठा कर देंगे और फिर सत्ययुगके मंगलमय चरणोंसे धरती प्रमुदित होगी। राजा सोमकान्तने यह पुण्यमयी गणेश-लीला- कथा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक वर्षतक सुनी। उस कथा-श्रवणके अद्भुत प्रभावसे वे रोगसे सर्वथा मुक्त एवं परम पवित्र हो गये। उनके लिये पवित्रतम गणेश- लोकसे विमान अवतीर्ण हुआ। गणेश-दूतोंने राजासे उस विमानमें बैठनेकी प्रार्थना की, तब अत्यन्त उपकृत भाग्यवान् राजा सोमकान्तने महर्षि भृगुके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी अनुमति प्राप्तकर अपनी सहधर्मिणी और अमात्य-द्वयसहित विमानमें बैठ गणेश-लोकके लिये प्रस्थित हुए। विमानमें आरूढ़ होनेपर राजाके पूछनेपर गणेश-दूतोंने काशी विश्वेश्वरके आवरणगत रहनेवाले छप्पन गणेशका नाम और उनके स्मरणका माहात्म्य सुनाया। पुराणके अन्तिम अध्यायमें उसके श्रवणका माहात्म्य गान किया गया है। गणेशपुराणके पाठ, श्रवण और उसकी पूजाकी तो अमित महिमा बतायी ही गयी है, ग्रन्थरत्नके लिखने और उसे घरमें रखनेका भी फल बतलाते हुए कहा गया है— यस्य गेहे गणेशस्य पुराणं लिखितं भवेत्। न तत्र राक्षसा भूताः प्रेताश्च पूतनादयः ॥ ग्रहा बालग्रहा नैव पीडां कुर्वन्ति कर्हिचित्। तद्गृहं हि गणेशेन रक्ष्यते सर्वदा स्वयम् ॥ इदं पुराणं शृणुयात् पूजयेद् वा समाहितः। तस्य दर्शनतः पूता भवन्ति पतिता नराः ॥ (श्रीगणेशपुराण २।१५५।९-११) इस प्रकार इन ललित कथाओंके माध्यमसे इस पुराणके द्वारा पाठकों एवं श्रोताओंको आसुरी प्रवृत्तियोंसे सतत सजग रहनेकी प्रेरणा तो प्राप्त होती ही है, दैवी सम्पदाओं एवं उनके मूलस्रोत परब्रह्म परमेश्वर गजवक्त्रके चरणकमलोंमें श्रद्धा और भक्ति भी उदित होती है। उस श्रद्धा-भक्तिसे दयामय गणेश सहज ही द्रवित होकर भक्तका लोक एवं परलोक—दोनों सफल कर देते हैं।* अनन्त जन्मोंकी ज्वाला सदाके लिये शान्तकर अक्षय सुख-शान्ति प्रदान कर देते हैं। निश्चय ही यह गणेश-पुराण गणेशोपासकोंके लिये सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ-रत्न है।


  • पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्। (श्रीगणेशपुराण २। १५५। २९)

उपासना-खण्ड

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमन्महर्षिकृष्णद्वैपायनव्यासविरचित श्रीगणेशपुराण [ पूर्वार्ध ] उपासना-खण्ड पहला अध्याय ऋषियों और सूतजीके संवादके प्रसंगमें गणेशजीकी महिमा और राजा सोमकान्तके चरित्रका वर्णन

नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्मविद्याप्रदायिने। यस्यागस्त्यायते नाम विघ्नसागरशोषणे ॥ ब्रह्मविद्याके प्रदाता उन गणेशजीको नमस्कार है, जिनका नाम अगस्त्यमुनि*की भाँति विघ्नरूपी समुद्रको सुखानेवाला है ॥ १ ॥ ऋषियोंने कहा—हे महाबुद्धिमान् वेदशास्त्रविशारद सूतजी ! आप समस्त विद्याओंके निधिरूप (खजाने) हैं, आपसे बढ़कर श्रेष्ठ वक्ता नहीं मिल सकता। हमारे जन्म-जन्मान्तरीय महान् पुण्योंका उदय हुआ है, जो कि आप-जैसे सर्वज्ञ सत्पुरुषका दर्शन हो रहा है। इस संसारमें हम सब सर्वाधिक धन्य हैं, हमारा जीवन सफल जीवन है। हमारे पूर्वज, हमारा वेद-शास्त्रोंका अध्ययन, हमारी तपस्याका श्रम—ये सब धन्य हो गये। [वक्ताओंमें] श्रेष्ठ [हे सूतजी] ! आपने हमें अठारह पुराणोंको विस्तारपूर्वक सुनाया है, हमारी अन्य पुराणोंको भी सुननेकी इच्छा है, अतः उन्हें भी सुनायें ॥ २-५ ॥ हम सब शौनकजीद्वारा आयोजित द्वादशवर्षीय महासत्रमें नियुक्त हैं, आपद्वारा कराये जानेवाले कथामृतपानके अतिरिक्त हमारे श्रमका निवारण किसी प्रकार नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

सूतजी बोले—पुण्य कर्ममें निरत हे महाभाग्यशाली [ऋषियो] ! आप लोगोंके द्वारा अत्यन्त उत्तम प्रश्न किया गया है; क्योंकि राग-द्वेषरहित, सम चित्तवाले साधुजनोंकी बुद्धि संसारके उपकारमें लगी रहती है ॥ ७ ॥ हे द्विजगण ! मुझे भी कथाओंके कहनेमें ही सन्तोष प्राप्त होता है, अतः मैं आप सब साधु चरितवाले सत्पुरुषोंको विशेष रूपसे कथा सुनाऊँगा ॥ ८ ॥ [अष्टादश महापुराणों, जिनकी कथा मैं सुना चुका

  • महाभारत-वनपर्व, अध्याय १०५ में वर्णित है कि अगस्त्यमुनिने समुद्रके सम्पूर्ण जलका पानकर उसे सुखा दिया था।

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४४          * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *          [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

हूँ, के अतिरिक्त] गणेश, नारदीय, नृसिंह आदि वैसे ही अन्य अठारह उपपुराण भी हैं, उनमें जो गणेशजीसे सम्बन्धित गणेशपुराण है, उसका प्रवचन मैं सर्वप्रथम करूँगा, जिसका कि विशेष रूपसे मर्त्यलोकमें श्रवण दुर्लभ है ॥ ९-१० ॥ जिस गणेशपुराणके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, जिसके प्रभावको कहनेमें [सहस्र मुखवाले] शेषजी और चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, तो भी आप सबकी आज्ञासे मैं इसको संक्षेपमें कहूँगा। बहुत- से जन्मोंके पुण्योंके एकत्र होनेसे ही इसका श्रवण होता है, पाखण्डियों, नास्तिकों और पापकर्मियोंको इसका श्रवण सम्भव नहीं होता ॥ ११-१२१/२ ॥ श्रीगणेशजी तत्त्वतः नित्य, निर्गुण और अनादि हैं; इसलिये उनके स्वरूपका कथन किसीके लिये सम्भव नहीं है; फिर भी उनकी उपासनामें निरत भक्तोंद्वारा उन्हें सगुणरूपमें निरूपित किया जाता है ॥ १३-१४॥ ॐकाररूपी जो भगवान् [गणेश] वेदोंमें सर्वप्रथम प्रतिष्ठित हैं, मुनिगण तथा इन्द्रादि देवगण जिनका हृदयमें सदा स्मरण करते रहते हैं, ब्रह्मा, ईशान (शिव), इन्द्र और विष्णु जिनका सतत पूजन करते हैं, जो समस्त जगतोंके हेतु और सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण हैं, जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजी [विश्वका] सृजन करते हैं, जिनकी आज्ञासे विष्णु पालन करते हैं, जिनकी आज्ञासे भगवान् शंकर संहार करते हैं, जिनकी आज्ञासे सूर्य संचरण (भ्रमण) करते हैं, जिनकी आज्ञासे पवनदेव प्रवहमान होते हैं, जिनकी आज्ञासे जल सभी दिशाओंमें प्रवाहित होता है, जिनकी आज्ञासे ग्रह-नक्षत्र (उल्कापिण्ड) पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, जिनकी आज्ञासे तीनों लोकोंमें अग्नि प्रज्वलित होती है, उन भगवान् गणेशका जो गुप्त चरित है, जिसे किसीके समक्ष प्रकट नहीं किया गया है, उसे मैं आप सबसे कहता हूँ। हे द्विजगण! आप लोग आदरपूर्वक उसे सुनें ॥ १५-१९ ॥ इसे पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अमिततेजस्वी व्यासजीसे कहा था, उन्होंने इसे भृगुजीसे और भृगुजीने इसे [राजा] सोमकान्तसे कहा- ॥ २० ॥


[दायाँ स्तम्भ]

जिन्होंने करोड़ों व्रतों, यज्ञों, तपस्याओं, दानों और तीर्थसेवनद्वारा पुण्य अर्जित किया है, हे श्रेष्ठ द्विजगणो! उन्हींकी बुद्धि इस गणेशसंज्ञक पुराणके श्रवणमें प्रवृत्त होती है। जिनका मन स्त्री, पुत्र, भूमि आदि सांसारिक मायाजालमें आसक्त नहीं होता, हे श्रेष्ठ मुनिगण! भगवान् मयूरेश (गणेशजी)-की कथाका वे ही सादर श्रवण करते हैं। अब आप लोग सोमकान्तके आख्यानके माध्यमसे इसकी (गणेशपुराणकी) महिमाका श्रवण करें ॥ २१-२३ ॥ सौराष्ट्र देशमें स्थित देवनगरमें सोमकान्त नामका एक राजा हुआ, जो वेद और शास्त्रके तत्त्वको जानने- वाला तथा धर्मशास्त्रके प्रयोजनभूत विहित कर्मानुष्ठानमें रत रहनेवाला था ॥ २४ ॥ जब वह प्रस्थान करता तो दस सहस्र गजारोही, उसके दुगुने अर्थात् बीस सहस्र अश्वारोही और छः हजार रथारोही उसका अनुगमन करते थे। साथ ही असंख्य पैदल सैनिक, आग्नेयास्त्रधारी तथा दो तरकस धारण करनेवाले धनुर्धारी भी उसके साथ होते थे ॥ २५-२६ ॥ उसने बुद्धिसे बृहस्पतिको, धन-सम्पत्तिसे कुबेरको, क्षमासे पृथ्वीको और गाम्भीर्यसे महासागरको जीत लिया था। उस राजाने अपनी प्रकाशमयी आभासे सूर्य और कान्तिसे चन्द्रमाको, प्रतापसे अग्निको और सौन्दर्यसे कामदेवको जीत लिया था ॥ २७-२८ ॥ उसके पाँच मन्त्री थे, जो प्रबल शक्तिशाली, दृढ़ पराक्रमी, नीतिशास्त्रके तत्त्वार्थको जाननेवाले और शत्रु- राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले थे ॥ २९ ॥ उनमेंसे प्रथमका नाम रूपवान्, दूसरेका विद्याधीश, तीसरेका क्षेमंकर, चौथा ज्ञानगम्य और पाँचवाँ सुबल नामवाला था ॥ ३० ॥ ये सभी नित्य राज्यकार्य करनेवाले और राजाके अत्यन्त प्रिय थे। इन्होंने अनेक देशोंपर आक्रमण करके अपने पराक्रमसे उन्हें विजित किया था ॥ ३१ ॥ ये सभी अत्यन्त सुन्दर थे तथा अनेक प्रकारके आभूषणों और वस्त्रोंसे अलंकृत रहते थे। उस राजाकी सुधर्मा नामक गुणशालिनी पत्नी थी, जिसके रूपको


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उ०ख०-अ०२ ] * गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना * ४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 देखकर [कामदेवकी पत्नी] रति तथा रम्भा और | रहती थी तथा पतिसेवा और उनके वचनोंके पालनमें तिलोत्तमा [-जैसी स्वर्गकी अप्सराएँ] भी लज्जित हो | सदा सन्नद्ध रहती ॥ ३६१/२ ॥ जाती थीं; वे न कहीं सुख पाती थीं, न कहीं सुख मानती | इन (दम्पती)-के एक हेमकण्ठ नामवाला शुभ थीं ॥ ३२-३३ ॥ | लक्षणोंसे युक्त पुत्र हुआ, जो दस हजार हाथियोंके समान वह अपने कानोंमें अनेक रत्नोंसे जड़ित और | बलशाली, बुद्धिमान्, पराक्रमी और शत्रुओंको सन्ताप स्वर्णनिर्मित सुन्दर कर्णफूल, कण्ठमें सोनेका हार तथा | देनेवाला था ॥ ३७१/२ ॥ मोतियोंकी माला, कटिप्रदेशमें रत्नमयी करधनी, पैरोंमें | हे श्रेष्ठ द्विजगण! इस प्रकार (-की गुण-समृद्धिसे वैसे ही नूपुर तथा हाथों और पैरोंकी अँगुलियोंमें उत्तम | परिपूर्ण) सोमकान्त पृथ्वीका एक श्रेष्ठ राजा हुआ। प्रकारकी अँगूठियाँ एवं अनेक रंगोंके सहस्रों बहुमूल्य | उसने सम्पूर्ण राजाओंको अपने वशमें करके इस पृथ्वीपर वस्त्र धारण करती थी ॥ ३४-३५१/२ ॥ | राज्य किया। वह नित्य धर्ममें रत रहनेवाला, यज्ञकर्ता, वह भगवद्भजन, दान एवं अतिथि-सत्कारमें लगी | दानी और त्यागी था ॥ ३८-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें पुराणोपक्रममें 'सोमकान्तवर्णन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥ दूसरा अध्याय गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना सूतजी बोले-हे ऋषियो! आप सब अब | राजा सोमकान्तने प्रयत्नपूर्वक मनको स्थिर करके मन्त्रियोंसे सोमकान्तके दुष्कृत्यको सुनें, उस धर्मशील राजाको | कहा- ॥ ६ ॥ पूर्वजन्मोंके कर्मफलसे अकस्मात् अत्यन्त दुःखदायी | राजाने कहा-मेरे राज्य और रूपको धिक्कार गलित कुष्ठ हो गया ॥ १ १/२ ॥ | है; [मेरे] बल, जीवन और धनको धिक्कार है! न जाने मनुष्यके द्वारा किया गया शुभ या अशुभ कर्म | मेरे किस कर्मका बीज इस कष्टके रूपमें [प्रस्फुटित उसका कभी पीछा नहीं छोड़ता; जिस-जिस अवस्थामें | होकर] समुपस्थित हुआ है ॥ ७ ॥ जैसा-जैसा कर्म किया गया होता है, उस-उस अवस्थामें | जिस [शरीर]-की कान्तिसे सोम (चन्द्रमा)-को प्राणीको उसका फल भोगना पड़ता है, यह ध्रुव सत्य | जीतकर मैं सोमकान्त कहलाया; जिससे मैंने साधुओं, है ॥ २-३ ॥ | दीनों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों और सभी आश्रमोंके लोगों, अनेक घावोंसे युक्त, इधर-उधर बहते हुए रक्तवाले, | जनपदके निवासियों और अन्य लोगोंका भी पुत्रवत् मवाद और खूनसे लथपथ राजा (सोमकान्त) कीड़ोंद्वारा | पालन किया; जिसके द्वारा मैंने अपने बाणोंसे भयंकर काटकर विह्वल कर दिये जाते थे। उस समय वे | रूपवाले शत्रुओंको जीत लिया; जिसके द्वारा मैंने सम्पूर्ण दुःखरूपी सागरमें उसी प्रकार निमग्न हो जाते थे, | पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया; सम्यक् रूपसे देवाधिदेव जैसे समुद्रमें बिना नौकाके मनुष्य। उस समय उन्हें | परमात्मा सदाशिवका आराधन किया; जो दुष्टोंके संगसे ऐसी पीड़ा प्राप्त होती थी, जैसी कि सर्पके डसनेसे | रहित और चित्तका निग्रह करनेवाला था, पूर्वकालमें मैंने होती है ॥ ४-५ ॥ | अपने जिस शरीरके द्वारा रुचिकर सुगन्धियोंका विशेषरूपसे उन राजाका शरीर क्षयरोगसे ग्रस्त रोगीकी भाँति | सेवन किया था, वही आज सड़े हुए मांसकी गन्धवाला हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया। सभी इन्द्रियोंके रोगयुक्त | हो गया है, अतः मेरा जीवन निरर्थक है; इसलिये मैं हो जानेसे वे चिन्तासे व्याकुल हो उठे। तदनन्तर उन | आप सबकी अनुमति लेकर वनमें जाऊँगा ॥ ८-१२ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_3_2_Front

४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- मेरे बुद्धि-पराक्रम-सम्पन्न पुत्र हेमकण्ठको आप सब राज्य-संचालनहेतु अभिषिक्त करें और अपने पराक्रमसे उसकी रक्षा करें॥ १३॥ हे महामन्त्रियो! अब मैं लोकमें अपना मुख किसीको नहीं दिखलाऊँगा; न मुझे [अब] राज्यसे कोई प्रयोजन है, न स्त्रीसे, न जीवनसे और न धनसे। अब मैं वनमें जाकर अपना हितसाधन करूँगा॥ १४१/२ ॥ सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ द्विजगण! ऐसा कहकर मवाद, रक्त और पसीनेसे लथपथ वे (राजा सोमकान्त) आँधीके झोंकेसे उखड़े हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। [उस समय] मन्त्रियों और स्त्रियोंका वहाँ महान् कोलाहल हो रहा था॥ १५-१६॥ क्षणभरमें ही लोगोंका वहाँ अत्यन्त दारुण हाहाकार होने लगा। तब मन्त्रियोंने वस्त्रसे पोंछकर, हवा करके, शीघ्र लाभ करनेवाली औषधियों और मन्त्रोंका प्रयोग करके उन्हें सचेतन किया और उन राजा सोमकान्तके स्वस्थ होनेपर उनसे मन्त्रियोंने इस प्रकार कहा—॥ १७-१८॥ मन्त्रियोंने कहा—हे राजन्! आपकी कृपासे सभी मनुष्योंके लिये दुर्लभ देवराज इन्द्रके तुल्य सुखोंका हमने भोग किया, अब हम आपके बिना कैसे रह सकते हैं? पशुओंका वध करनेवाले कसाईकी भाँति कैसे जीवन धारण कर सकते हैं? आपका पुत्र बलवान् है, शत्रुओंका नाश करनेवाला है और राजकोष भी प्रभूत धनसे सम्पन्न है, अतः वह अकेला ही राज्य कर सकता है। हम लोग सारे सुखोंका त्याग करके आपके साथ ही वनको चलते हैं॥ १९-२०॥ सूतजी बोले—तदनन्तर [राजा सोमकान्तकी रानी] सुधर्माने कहा कि हे श्रेष्ठ मन्त्रियो! मैं ही अकेली राजाकी सेवाके लिये इनके साथ वनको जाऊँगी और आप लोग मेरे पुत्रके साथ राज्यका भलीभाँति रक्षण- पालन करें॥ २१॥ पूर्वकालमें किये गये [पाप या पुण्य] कर्मका फल दुःख या सुखके रूपमें प्राणीको स्वयं ही भोगना पड़ता है, दूसरा कोई उसे नहीं भोग सकता। जिस-जिस प्रकारसे कर्मफलको भोगना निश्चित होता है, उसे वैसे ही और स्वयंको ही भोगना पड़ता है॥ २२॥ मैंने भी इनके साथ अनेक प्रकारके सुखोंका भोग और राज्य किया है। मुनियोंका कथन है कि नारीको इहलोक और परलोक—दोनोंमें पतिका ही अनुगमन करना चाहिये॥ २३॥ तब विनीत और शोकसंतप्त पुत्र हेमकण्ठने [अपने पिता] राजा सोमकान्तसे उस समय यह वचन कहा—॥ २४॥ हेमकण्ठ बोला—हे नृपश्रेष्ठ! आपके बिना मुझे राज्य, पत्नी, धनसंचय तथा प्राणोंसे भी कोई प्रयोजन नहीं है॥ २५॥ हे धर्मपालक! जैसे बिना तेलके दीपक और बिना प्राणोंके शरीर व्यर्थ हैं, वैसे ही हे राजन्! आपके बिना राज्य भी व्यर्थ है॥ २६॥ सूतजी बोले—मन्त्रियों, रानी सुधर्मा और पुत्र हेम- कण्ठके अमृतके समान वचनोंको सुनकर प्रसन्नमन सोम- कान्तने पुत्रसे इस प्रकार धर्मानुकूल बात कही—॥ २७॥ राजा बोले—पिताके वचनोंका पालन करनेमें नित्य रत रहनेवाला, [मरणोपरान्त] श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेवाला और गयामें पिण्डदान करनेवाला पुत्र ही पुत्र कहा जाता है*॥ २८॥ इसलिये मेरी आज्ञा मानकर मन्त्रियोंसहित तुम नीतिपूर्वक राज्य करो और सम्पूर्ण प्रजाका पुत्रवत् अनुशासन करो॥ २९॥ धर्मशास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाला, नीतिज्ञ, सबको सन्तुष्ट करनेवाला, पितरोंका उद्धार करनेवाला और जो स्वयं भी पुत्रवान् है, उसीको पुत्र कहा जाता है॥ ३०॥ हे उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले [पुत्र]! गलित कुष्ठवाला मैं अत्यन्त निन्दित हूँ, अतः पत्नी सुधर्माके साथ मैं वनमें जाऊँगा, इसका तुम समर्थन करो॥ ३१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सोमकान्तकुष्ठप्राप्तिवर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥

  • जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्। गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ (श्रीमद्देवीभागवत ६।४।१५) Kalyana Visheshank 2021_Section_3_2_Back

तीसरा अध्याय

उ०ख०-अ०३]* * राजा सोमकान्तका राजकुमार हेमकण्ठको सदाचार और राजनीतिकी शिक्षा देना * .४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

तीसरा अध्याय राजा सोमकान्तका राजकुमार हेमकण्ठको सदाचार और राजनीतिकी शिक्षा देना

सूतजी बोले—तत्पश्चात् राजाने उठकर पुत्रको | इन्द्रके अनुज, नियन्ता, पापोंको दूर करनेवाले, शत्रुओंका दाहिने हाथसे पकड़कर राजमहलके अग्रभागमें [स्थित | नाश करनेवाले और संसारसे मुक्तिके हेतु हैं॥ ८॥ उस कक्षमें] प्रवेश किया, जहाँ वे सर्वदा मन्त्रणा करते | [ श्रीशिव-प्रातःस्मरण—] मैं चन्द्रमाको थे; जहाँ बहुत-से रत्नोंसे युक्त, मोती और मूँगेसे जड़ा | [मुकुटरूपमें] सिरपर धारण करनेवाले गिरिराजन्न्दिनी हुआ स्वनिर्मित दिव्य सिंहासन इन्द्रासनकी भाँति | पार्वतीके पति त्रिपुरारि भगवान् शिवको प्रातः नमस्कार शोभायमान हो रहा था॥ १-२॥ | करता हूँ; जो बाघम्बरको [कटिप्रदेशमें] लपेटे रहनेवाले, वहाँ आसीन होनेपर वे दोनों-पिता-पुत्र दो | कामदेवको भस्म करनेमें दयारहित, नारायण और इन्द्रको होनेपर भी प्रत्येक रत्नमें प्रतिबिम्बित होनेसे अनेक दीख | वर देनेवाले, देवताओं और सिद्धोंसे सेवित तथा त्रिशूल- रहे थे, मानो वे जनसमुदायसे आवृत (घिरे) हों॥ ३॥ | डमरू एवं सर्पोंको धारण करनेवाले हैं॥ ९॥ अपने कुलकी कीर्तिके विस्तारके लिये राजाने | [ श्रीसूर्य-प्रातःस्मरण— ] मैं पापोंका हरण कृपापूर्वक पुत्रसे सर्वप्रथम आचार, तदनन्तर अनेक | करनेवाले दिनके अधिपति भगवान् सूर्यदेवको प्रातः प्रकारकी नीतियोंका वर्णन किया॥ ४॥ | नमस्कार करता हूँ; जो गहन अन्धकारका हरण करनेवाले, सोमकान्त बोले—जब रात्रि एक प्रहर शेष रहे, | श्रेष्ठ जनोंद्वारा वन्दित, वेदत्रयीस्वरूप, देवशत्रुओंकी तब पुरुषको जग जाना चाहिये। तत्पश्चात् शय्याका | मायाका नाश करनेवाले, ज्ञानके एकमात्र हेतु, अमितशक्ति त्याग करके पवित्र स्थानमें बैठकर गुरुका स्मरण करना | और उदार भाववाले हैं॥ १०॥ चाहिये॥ ५॥ | [देवी-प्रातःस्मरण—] मैं लौकिक ऐश्वर्यकी तदनन्तर इष्ट देवताका चिन्तन करके उन्हें स्तुतिपूर्वक | कारणरूपा गिरिराजनन्दिनी सुरेश्वरी भगवती पार्वतीको प्रणाम करे और पृथिवीकी हे जगन्मये ! मेरे पादस्पर्शको | प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो संसाररूपी समुद्रसे आत्यन्तिक क्षमा* करें-ऐसा कहकर प्रार्थना करे॥ ६॥ | रूपसे पार लगानेवाली, तीन नेत्रोंवाली, महत्तत्त्वाडिकी [ इष्टदेवरूप पंचदेवों- श्रीगणेश, विष्णु, शिव, | कारणरूपा मूलप्रकृति, देवशत्रुओंकी मायाका नाश करने- सूर्य और देवीकी स्तुतियाँ इस प्रकार हैं-] | वाली, मायामयी और देवताओं तथा श्रेष्ठ मुनियोंद्वारा [ श्रीगणेश-प्रातः स्मरण—] मैं गणोंके स्वामी | नमस्कृत हैं॥ ११॥ श्रीगणेशजीको प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो सम्पूर्ण | इसी प्रकार अन्य देवताओं और मुनियोंका स्मरण कारणोंके कारण, ब्रह्मादि देवताओंको वर देनेवाले, | करके तथा मानसिक उपचारोंसे पूजन करके क्षमा- सम्पूर्ण आगमोंके ज्ञाता, धर्म-अर्थ और कामरूपी फल | प्रार्थना करे॥ १२॥ देनेवाले, मुमुक्षुजनोंको मोक्ष देनेवाले, वाणीसे अनिर्वचनीय | तत्पश्चात् ब्राह्मण स्वच्छ सफेद मिट्टी, क्षत्रिय तथा अनादि और अनन्त रूपवाले हैं॥ ७॥ | लाल मिट्टी और वैश्य-शूद्र काली मिट्टी एवं जलपात्र [ श्रीविष्णु-प्रातःस्मरण-] मैं उग्र पराक्रमवाले | लेकर गाँवके नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा)-में लक्ष्मीपति श्रीविष्णुको प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो | जायें। नदीके किनारे, ऊसर और दीमककी बाँबी तथा अपने भक्तजनोंके रक्षणके लिये अनेक अवतार लेनेवाले, | ब्राह्मणके घरकी मिट्टी कभी न खोदे ॥ १३-१४॥ क्षीरसागरमें निवास करनेवाले, देवताओंके अधिपति | तदनन्तर धरतीको घास-फूस आदिसे ढककर

  • समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥

४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दिनमें उत्तराभिमुख और रात्रिमें दक्षिणकी ओर मुख करके मल-मूत्रका त्यागकर पहले तृण-काष्ठादिसे मनुष्य पुरीषेन्द्रियको स्वच्छकर तत्पश्चात् मिट्टी और जलसे पाँच बार उसका प्रक्षालन करे॥ १५-१६॥ तदनन्तर बायें हाथको दस बार, दोनों हाथोंको सात बार, मूत्रेन्द्रियको एक बार और पुनः बायें हाथको तीन बार धोना चाहिये॥ १७॥ मूत्रविसर्जन करनेपर दोनों हाथोंको सदा दो बार और दोनों पैरोंको एक बार धोना चाहिये। यह शौचविधि गृहस्थोंके लिये ही कही गयी है॥ १८॥ ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवालेको इसका दुगुना, वानप्रस्थीको तिगुना और संन्यासीको चार गुना शुद्धि करनी चाहिये। रात्रिमें सबको इसकी आधी ही शुद्धि मौन रहते हुए करनी चाहिये॥ १९॥ स्त्री और शूद्रको [उपर्युक्त शुद्धि]-की आधी शुद्धि दिनमें और चौथाई शुद्धि रात्रिमें करनेका विधान है। शुद्धिके पश्चात् दूधवाले या काँटेदार वृक्षकी लकड़ी (दातून)-को [उस वृक्षसे] इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक लेकर दाँत और जीभको साफ करे-हे वनस्पते! तुम मुझे बल, ओज, यश, तेज, पशु, बुद्धि, धन, मेधा (धारणाशक्ति), ब्रह्मज्ञान प्रदान करो॥ २०-२११/२॥ तदनन्तर पहले शीतल जलसे मलका हरण करनेवाला स्नान करे, फिर अपने गृह्यसूत्रमें कहे गये मन्त्रोंसे स्नान करनेके बाद सन्ध्योपासना करे। तत्पश्चात् जप, हवन, स्वाध्याय, तर्पण और देवपूजन करे। तदनन्तर बलिवैश्वदेव, अतिथि-सत्कार और ब्राह्मणावलोकनके उपरान्त स्वयं भोजनकर पुराणका श्रवण और दान करे, परनिन्दासे सदा दूर रहे॥ २२-२४॥ धन, प्राण तथा अमृतरूपी (सहानुभूतिपूर्ण) वचनोंसे दूसरोंका उपकार करे, कभी किसीका अपकार न करे और न ही आत्मप्रशंसा करे। गुरुद्रोह, वेदनिन्दा, नास्तिकताका भाव, पापीकी सेवा, निषिद्ध पदार्थोंका भक्षण और परस्त्रीगमन न करे॥ २५-२६॥ अपनी पत्नीका परित्याग न करे और ऋतुकालमें सहवास करे। माता-पिता, गुरु और गायकी सदा सेवा- शुश्रूषा करे॥ २७॥ दीनों, अन्धों और कृपणों (जो दयाके पात्र हैं)- को वस्त्रसहित अन्न प्रदान करे। प्राणोंके संकटमें आ जानेपर भी कभी सत्यका त्याग न करे। जिनपर ईश्वरकी कृपा है, ऐसे साधुजनोंका पालन करे॥ २८१/२॥ अपराधके अनुसार धर्मशास्त्रोंका विशेष रूपसे अवलोकनकर या विद्वानोंसे पूछकर नीतिज्ञ [राजा]-को दण्ड देना चाहिये। जो विश्वसनीय न हो, उसपर कभी भी विश्वास न करे। समृद्धिकी इच्छावाला राजा विश्वस्त व्यक्तिपर भी अत्यन्त विश्वास न करे। जिससे एक बार वैर हो गया हो, वह यदि पुनः विश्वस्त बन गया हो, तो उसपर तो कभी भी विश्वास न करे॥ २९-३१॥ षड्गुणों१ (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय)-का प्रयोग करके राजा अपने राष्ट्रका सम्वर्धन करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान करे, अन्यथा राष्ट्र क्षीण होने लगता है॥ ३२॥ शत्रुके व्याकुल अर्थात् संकटग्रस्त होनेपर उसपर चढ़ाई करना अधर्म कहा जाता है। राजाको चारदृष्टि (गुप्तचररूपी नेत्रोंवाला), दूतवक्त्र (दूतरूपी मुखवाला) और उद्यद्दण्ड (उठे हुए दण्डवाला) होना चाहिये। अर्थात् राजा गुप्तचरके नेत्रों और दूतके मुखसे सूचनाओंको प्राप्त करे और तदनुसार सेनाको तैयार रखे॥ ३३॥ दण्डके ही भयसे सभी लोग अपने-अपने धर्मोंमें व्यवस्थित रहते हैं, अन्यथा अपने और परायेका कोई नियम ही नहीं रहेगा। यदि अधम व्यक्ति कभी निन्दा करे अथवा प्रशंसा करे तो न तो उसपर क्रोधित हो, न ही प्रसन्न; क्योंकि उसकी निन्दा या स्तुतिका क्या अर्थ ! ॥ ३४-३५॥ जिसने पूर्वकालमें अपकार किया हो, परंतु पुनः शरणमें आ जाय तथा जो पूर्वकालमें धनिक रहा हो [परंतु किसी कारण निर्धन हो गया हो], उनका सदैव परिपालन करना चाहिये॥ ३६॥ [राजाको मन्त्रियोंके साथ की गयी] मन्त्रणाको सदा गुप्त रखना चाहिये; क्योंकि वह (मन्त्रणा) १. सन्धिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च। द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा॥ (मनुस्मृति ७। १६०)

उ०ख०-अ०४ ] * सोमकान्तका वनगमन * ४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 राज्यका मूल (आधार) कही जाती है। राजा कामादि | विद्याधीश नामक मन्त्रियोंको बुलवाया और शुभ मुहूर्त छः शत्रुओं* (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह तथा | देखकर [राज्याभिषेकके लिये आवश्यक] सामग्रियोंका मत्सर)-को जीतकर तत्पश्चात् अन्य शत्रुओंपर विजय | संकलनकर अनेक स्थानोंसे वेदके विद्वान्, यज्ञकर्ममें प्राप्त करे ॥ ३७ ॥ | निष्णात ब्राह्मणों, महान् राजाओं, महारानियों, अपने श्रेष्ठ राजा कभी किसीकी आजीविकाका उच्छेद, | सुहृज्जनों, सभी वर्गोंके प्रमुख लोगों और श्रेष्ठ नागरिकोंको प्रजाका विनाश, देवसम्पत्तिका हरण, वन-उपवनोंका | शत्रुओंका नाश करनेवाले अपने पुत्रके राज्याभिषेक- विनाश तथा देवालयों और स्मारकोंका ध्वंस न करे ॥ ३८ ॥ | समारोहका अवलोकन करनेके लिये आमन्त्रित पर्वकालमें दान दे, यशके लिये त्याग करे, मित्रके | किया ॥ ४२-४५ १/२ ॥ साथ छल न करे और गोपनीय विषयका कथन स्त्रियोंसे | तदनन्तर गणेशजीका और इष्टदेवताका यथाविधि न करे ॥ ३९ ॥ | पूजनकर मातृकाओंका पूजन और स्वस्तिवाचन करवाकर ब्राह्मणका ऋणसे और गायका कीचड़से सम्यक् | आभ्युदयिक श्राद्धकर और ब्राह्मणोंको भोजनादिसे सन्तुष्टकर रूपसे उद्धार करे। कभी असत्य न बोले और कभी | उन राजा सोमकान्तने वेदमन्त्रोंके उद्घोषके साथ पुत्र सत्यको न छोड़े ॥ ४० ॥ | हेमकण्ठका राज्याभिषेक करवाकर अपने तीन प्रमुख मन्त्रियों, प्रजा और सेवकोंके चित्तका हरण करनेवाला | मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा- ॥ ४६-४८ ॥ बने और सदा ब्राह्मणों एवं देवताओंको नमस्कार | राजा बोले- हे मन्त्रियो ! मैं अपने इस पुत्रको करे ॥ ४१ ॥ | आप लोगोंके हाथमें सौंपता हूँ। 'यह मेरा ही पुत्र है'— सूतजी बोले- इस प्रकार राजाने जैसे स्वयं | इस प्रकारकी बुद्धि आप लोगोंकी [मेरे इस पुत्रमें सदा] [परम्परासे] सुना था, वैसे ही धर्मशास्त्रके साथ | रहे। नीतिनिपुण आपलोगोंने जैसे मेरी आज्ञाओंका पालन आचार, नीतिशास्त्र एवं अन्य उपयोगी विषयोंकी शिक्षा | किया है, वैसे ही सभी वर्गोंके प्रमुखजनोंके साथ मिलकर अपने पुत्र हेमकण्ठको देकर क्षेमंकर, रूपवान् और | इसके भी राज्य-संचालनमें सहयोग दें ॥ ४९-५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'आचारादिनिरूपण' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥ चौथा अध्याय सोमकान्तका वनगमन सूतजी बोले- राज्याभिषेक सम्पन्न होनेपर उन | धन दिया ॥ २-४ ॥ राजा सोमकान्तने ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें | तदनन्तर पूर्वजन्मार्जित दोषोंके कारण दुःख और अंगभूत दक्षिणाके साथ दस सहस्र गौएँ तथा मणि, मोती | शोकसे युक्त राजा सोमकान्तने अत्यन्त मलिन और और मूँगे प्रदान किये। उन्होंने उन सबको हाथी, गौएँ, | अपवित्र अवस्थामें वनके लिये प्रस्थान किया ॥ ५ ॥ घोड़े, धन, रेशमी परिधान देकर सन्तुष्ट किया ॥ १ १/२ ॥ | उनके जाते ही लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। उन्होंने राजाओं, राजपत्नियों, उनके सेवकों, ग्रामप्रमुखों | सब लोग अपना-अपना कार्य छोड़कर राजाके पीछे चल तथा गुणीजनोंको यथायोग्य अनेक देशोंके सुवर्णजटित | दिये ॥ ६ ॥ वस्त्रों, कश्मीर देशमें निर्मित अनेक रंगोंके श्रेष्ठ वस्त्रोंको | मन्त्रिगण, राजाकी पत्नी सुधर्मा, पुत्र हेमकण्ठ तथा प्रदान किया। साथ ही मन्त्रियोंको अन्य अर्थात् पूर्वमें | सुहृद्गण भी उठते, गिरते, लुढ़कते, दौड़ते और रोते हुए दिये गये ग्रामोंके अतिरिक्त अनेक ग्राम और बहुत-सा | उनके पीछे गये ॥ ७ ॥

  • कामः क्रोधस्तथा लोभो मदमोहौ च मत्सरः । (किराता० १।९ पर मल्लिनाथकृत घण्टापथ टीका)

५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मन्त्रियों और नगरके लोगोंने भी दुखी होकर राजाको रोका। दो गव्यूति* (चार कोस) जानेके बाद श्रमित होकर राजा रुक गये॥ ८॥ [वहाँ] उन्होंने अनेक वृक्षोंसे घिरी हुई और शीतल जलसे सम्पन्न वापी (बावड़ी)-को देखकर सभी नागरिकों, मन्त्रियों और स्वजनोंसे कहा— ॥ ९॥ हे सज्जनो! दीर्घकालतक राज्य करते हुए मैंने जो अपराध किये हों, उनके लिये आप लोग [मुझे] क्षमा करें; मैं आप लोगोंको हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ॥ १०॥ मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ कि दैववश मुझे यह जो [रोग] प्राप्त हो गया है, इससे मेरे प्रति आप लोग अपने स्नेहको कम न करियेगा और मेरे पुत्रपर अपनी कृपा बनाये रखियेगा॥ ११॥ आप सभी आये हुए लोग स्त्रियों और वृद्धोंसहित नगरको वापस जायँ और मेरे पुत्रद्वारा पालित होते हुए दुःखरहित होकर निवास करें॥ १२॥ मैं प्रसन्न चित्तसे वन जाऊँ, इसके लिये आप सब लोग अनुज्ञा प्रदान करें [और घर लौट जायँ]। आप लोगोंके जानेके बाद ही मेरा मन शान्त हो सकेगा॥ १३॥ [अतः] आप लोग मेरे ऊपर यह महान् उपकार करनेकी कृपा करें; मैं दुखी हूँ, मरनेकी इच्छा करता हूँ, पर निष्ठुर वचन बोलनेका मुझमें उत्साह नहीं है॥ १४॥ मेरा यह जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित किया गया महान् पाप ही है, जिसके कारण मुझे राज्यके हितैषी प्रजाजनोंसे वियोग हो रहा है; परंतु मैं क्या करूँ? मैं तो गलित कुष्ठसे पीड़ित हूँ। सभीको अपने किये सुकृत (पुण्यकर्मों) और दुष्कृत (पापकर्मों)-का फल भोगना ही पड़ता है॥ १५-१६॥ सूतजी बोले—राजाकी इस प्रकारकी बात सुनकर उनके सुहृज्जन मूर्च्छित हो गये, कुछ लोग अत्यन्त दुखी होकर अपने हाथोंसे अपना सिर पीटने लगे। उनमेंसे जो कुछ विद्वान् लोग थे, वे पूर्वकालमें उत्पन्न हुए राजाओंके चरितोंकी चर्चाकर राजाको और परस्पर [एक-दूसरेको भी] सान्त्वना देने लगे॥ १७-१८॥ उस स्थितिको देखकर कुछ अन्य लोग अनिर्वचनीय अवस्थाको उसी प्रकार पहुँच गये, जैसे आत्मस्वरूपका ज्ञान होनेपर ज्ञानवृत्तिवाले योगी॥ १९॥ कुछ धैर्यशाली लोगोंने अपने दुःखका नियमन करके वन जानेको उद्यत उन दुखी राजा सोमकान्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २०॥ लोगोंने कहा—हे प्रजावत्सल! जैसे अग्नि उष्णताका और जल शीतलताका त्याग नहीं करता, समुद्र अपनी मर्यादाका और सूर्य अपने प्रकाशकत्व गुणका त्याग नहीं करता; वैसे ही आपको हमारा पालन-पोषण करके फिर त्यागकर जाना उचित नहीं है। हम आपके बिना नगरको वापस कैसे जा सकते हैं?॥ २१-२२॥ जैसे नक्षत्रोंसे भरा होनेपर भी बिना चन्द्रमाके आकाश सुशोभित नहीं होता, वैसे ही शत्रुओंका दमन करनेवाले हे राजन् ! आपके बिना यह नगर शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥ हे स्वामी! हम सब भी आपके साथ दो-तीन तीर्थोंकी यात्रापर चलेंगे; [हमें विश्वास है कि] तीर्थ- सेवनसे आपका रूप कान्तिमान् हो जायगा ॥ २४॥ तदनन्तर हम लोग आपके साथ महान् हर्षपूर्वक मंगलवाद्योंकी ध्वनिके साथ बन्दीजनोंको आगे करके ध्वज-पताकाओंसे सुसज्जित नगरमें आयेंगे ॥ २५॥ सूतजी बोले—इस प्रकार उनके वचनोंको सुनकर क्रोध और दुःखसे परिपूर्ण राजाने उन सबको नमस्कार करके 'ऐसा न करो, ऐसा न करो' बार-बार कहा॥ २६॥ तदनन्तर स्नेह और करुणापूर्ण भावोंसे युक्त हेमकण्ठने मन्त्रियोंके साथ पुत्रवत्सल राजासे विनयपूर्वक निवेदन किया— ॥ २७॥ पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा—मैं आपके बिना [नगरमें] जाने, राज्य करने और जीवित रहनेमें भी उत्साह नहीं रखता हूँ। मैंने इससे पूर्व कभी आपका वियोग नहीं देखा है, तो फिर उसे कैसे सहन करूँ?॥ २८॥ राजा (सोमकान्त)-ने कहा—इसीलिये मैंने

  • गव्यूतिः स्त्री क्रोशयुगम्। (अमरकोश २। १। १८)

उ०ख०-अ०५] * सुधर्मा-च्यवन-संवाद * ५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पहले ही तुम्हें उत्तम नीतिशास्त्रके सहित धर्मशास्त्रका | या गाड़े गये धनमें ही स्थित रहता है, वैसे ही वनमें चले उपदेश किया है। तुम्हें उस मंगलमय उपदेशको व्यर्थ | जानेपर भी मेरा मन तुम्हींमें लगा रहेगा। दैवयोगसे यदि नहीं करना चाहिये॥ २९ ॥ | [ मेरा कुष्ठ रोग दूर हो गया और] मैं सुन्दर शरीरवाला ऐसा सुना जाता है कि पूर्वकालमें नीतिज्ञ और परम | हो गया, तो पुनः घरको लौट आऊँगा ॥ ३३-३४ ॥ बुद्धिमान् जमदग्निनन्दन परशुरामने पिताके कहनेपर | मेरी आज्ञाका पालन करनेसे जैसा तुम्हें धर्मलाभ माताको मार डाला था ॥ ३० ॥ | होगा, वैसा मेरे साथ चलनेसे नहीं, इसलिये तुम [पिताकी आज्ञासे ही] श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मणके | [नगरको] जाओ और मैं भी [वनको] जाता हूँ॥ ३५ ॥ साथ राज्य छोड़कर वन चले गये और [ पितृसदृश | सूतजी बोले-तब मन्त्रियों, नगरके निवासियों ज्येष्ठ भ्राताकी आज्ञासे ही] बिना कारण पूछे लक्ष्मण | और पुत्र (हेमकण्ठ)-ने महान् कष्टके साथ वापस सीताको वनमें छोड़ आये थे॥ ३१ ॥ | लौटनेका मन बनाकर राजाको नमस्कार किया। राजाने इसलिये हे हेमकण्ठ! तुम तीनों मन्त्रियोंके साथ | भी आशीर्वाद एवं अभिनन्दनपूर्वक लौटनेका आदेश शीघ्र ही नगरको जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करते | दिया और सब लोग राजाकी प्रदक्षिणाकर नगरके लिये हुए मेरे द्वारा प्रदान किये गये राज्यका शासन करो ॥ ३२ ॥ | निकल पड़े ॥ ३६-३७ ॥ जैसे परमात्मतत्त्वके विद्वान् व्यक्तिका चित्त उसके | तब छत्र और ध्वजसे सुशोभित माननीय हेमकण्ठने लौकिक कार्योंमें लगे रहनेपर भी परमात्मामें ही संलग्न | गज-अश्व-रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त महान् सेनाको रहता है, जैसे सामान्य जनोंका चित्त अपने द्वारा रखे गये | आगे करके नगरको प्रस्थान किया ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हेमकण्ठपुरप्रवेशन' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥ पाँचवाँ अध्याय सुधर्मा-च्यवन-संवाद सूतजी बोले- [हेमकण्ठने] तत्पश्चात् (राजासे | मैं पातिव्रत धर्मके कारण पराधीन हूँ ॥ ४-५ ॥ विदा लेकर) माताके पास आकर स्नेहसे व्याकुल | सूतजी बोले-ऐसा सुनकर पुत्र हेमकण्ठने अपने बुद्धिसे उससे कहा कि हे माता ! मुझ निरपराधका त्याग | सुहृज्जनोंके साथ माताको प्रणाम किया और उनकी आप कैसे कर रही हैं ? ॥ १ ॥ | प्रदक्षिणा करके और उनकी आज्ञा प्राप्तकर नगरको पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा-'यह पुत्र भी हमारे | प्रस्थान किया ॥ ६ ॥ साथ चले'- ऐसा आपको पिताजीसे कहना चाहिये। | उस समय वह नगर इन्द्रके नगर अर्थात् स्वर्गलोककी यदि आपके अनुरोधपर वे मुझे साथ ले चलेंगे, तब मैं | भाँति नागरिकोंद्वारा ध्वजाओं, पताकाओं और पल्लवोंसे आप दोनोंकी सेवा करूँगा, मेरी बुद्धि राज्य करनेमें नहीं | अलंकृत किया गया था और उसके मार्गोंको सुगन्धित है। वह राज्य मुझे क्या सुख देगा, जो आप दोनोंसे रहित | द्रव्य आदिसे सींचा गया था ॥ ७॥ हो ! ॥ २-३ ॥ | [तदनन्तर] राजाने स्वजनोंको वस्त्र और पान सुधर्माने कहा-हे महाबाहु ! दुःख और शोकसे | देकर विदा किया और अपने ऐश्वर्यसम्पन्न भवनमें प्रवेश युक्त राजा इस समय मेरी बात नहीं मानेंगे। इसलिये मेरी | किया; उस समय उसे हर्ष और शोक दोनों था ॥ ८ ॥ आज्ञासे तुम [नगरको] जाओ। पुत्र! स्त्रियोंके लिये | [उसने] प्रजाका पुत्रवत् पालन करते हुए धर्मपूर्वक पतिके अतिरिक्त अन्य कोई देवता मान्य नहीं होता और | राज्य किया और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षकी जैसी शिक्षा

५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

प्राप्त हुई थी, उसमें उसी प्रकार मन लगाया ॥ ९ ॥ ऋषियोंने कहा- [हे सूतजी !] राजा सोमकान्त कैसे और किस वनको गये ? उनके सहायक कौन थे और [वहाँ जाकर] उन्होंने क्या कार्य किया ? - यह सब आप हमें विस्तारपूर्वक बतायें ॥ १० ॥ सूतजी बोले- हे निष्पाप ऋषियो ! सोमकान्त जिस प्रकार वनको गये और वहाँ जो कार्य किया, अब मैं उसे आप सबसे कहूँगा, उसे आदरपूर्वक सुनिये ॥ ११ ॥ [राजाने] सुबल और ज्ञानगम्य नामक दो मन्त्रियों और धर्मपत्नी सुधर्माके साथ दुर्गम वनमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥ आगे-आगे मन्त्री, मध्यमें राजा और उनके पीछे उनकी धर्मपत्नी सुधर्मा वैसे ही चल रही थी, जैसे रामके पीछे सीता [वनको गयी थीं] ॥ १३ ॥ वे चारों समान मनवाले, सुख-दुःखमें समान भाव रखते हुए एक बार ही भोजन करते, वनमें ही निवास करते और एक वनसे दूसरे वनको जाते थे ॥ १४ ॥ ऊँचे-नीचे रास्तोंपर चलनेके कारण भूख-प्यास और थकानसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर छायाका आश्रय लेकर वे कभी बैठ जाते थे ॥ १५ ॥ पुनः दूसरे वनमें जानेपर उन्होंने एक विशाल सरोवर देखा, जिसमें कछुओंसहित हाथीके समान [विशाल] मगरमच्छ दिखायी दे रहे थे ॥ १६ ॥ वह चारों ओरसे ताल (ताड़), तमाल (एक काली छालवाला वृक्ष), सरल (चीड़), प्रियाल (अंगूरोंकी बेल), मंगलकारी बकुल (मौलसिरी), रसाल (आम), पनस (कटहल), जम्बू (जामुन), निम्ब (नीम), अश्वत्थ (पीपल), वट (बरगद) आदिके वृक्षों और अनेक प्रकारके लताजालोंसे घिरा था, [जिसके कारण] वहाँ ऐसा घना अन्धकार व्याप्त था, जैसा कि पर्वतकी गुफामें रहता है ॥ १७-१८ ॥ वहाँकी वायु कमल और कदम्बके पुष्पोंकी सुगन्धसे सुगन्धित और स्पर्शमें सुखद थी, वहाँसे मुनिजन फूल और फल ले जाते थे ॥ १९ ॥ वहाँ हंस, बगुले, बाज, तोते, कौवे, कोयल, मैना और चकवा पक्षी अनेक प्रकारके शब्द कर रहे थे ॥ २० ॥ हे श्रेष्ठ द्विजगण ! वहाँ अनेक प्रकारकी लताओं और पुष्पोंके कुंजोंका आश्रय लेनेवालोंको सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें भी स्पर्श नहीं कर पाती थीं। वहाँ भूख-प्यास और मृत्युका भय वैसे ही नहीं था, जैसे पुण्यात्माओंको स्वर्गमें नहीं रहता ॥ २१ ॥ वहाँ जाकर उन सबने श्रमापहारी शीतल जलका पान किया और स्नान एवं नित्य क्रिया करके फलाहार किया। तदनन्तर राजा कोमल बालुकामय तट-प्रदेशमें सो गये और उनकी धर्मपत्नी सुधर्मा उनके पैर दबाने लगीं ॥ २२-२३ ॥ राजाका अभिप्राय समझकर दोनों मन्त्री कन्द, मूल, फल और कमल-नाल लाने चले गये ॥ २४ ॥ तब वहाँ सुधर्माने एक अद्भुत बालकको देखा, जो अपनी कान्तिसे देदीप्यमान हो रहा था। [उस समय सुधर्माने] उस उत्कृष्ट रूपवाले बालकको [देख करके] यही माना कि कामदेव ही इस बालकके रूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥ उस बालकको देखकर ही वह सुधर्मा हर्षित हो गयी और उसने उसे [अपना] हितकारी माना। क्षुब्ध या प्रसन्न हृदय स्वयं ही समीक्षा करके बता देता है कि कौन अपकारी है और कौन उपकारी ॥ २६ ॥ [तब सुधर्माने] उस बालकसे पूछा कि बताओ तुम कौन हो? कहाँ जा रहे हो? किसके पुत्र हो और तुम्हारी माता कौन है? अपने शब्दोंकी अमृतधारासे मित्रकी भाँति मेरे दोनों कानोंको शीघ्र सन्तुष्ट करो ॥ २७ ॥ सूतजी बोले- ऐसा पूछनेपर उस बालकने राजपुत्री (सुधर्मा)-को अमृतमयी वाणीमें उत्तर देते हुए कहा- हे भामिनि ! महर्षि भृगु मेरे पिता हैं और पुलोमा मेरी माता। जल लेनेकी इच्छासे मैं अपने घरसे यहाँ आया हूँ ॥ २८ ॥ हे शुभे ! मेरा नाम च्यवन है और मैं पिताका आज्ञाकारी हूँ; तुम कौन हो और ये तुम्हारे कौन हैं? तथा इस वनमें क्यों आये हैं? ॥ २९ ॥ इनके अंगोंसे वर्षाकालके पर्वतकी भाँति स्राव क्यों हो रहा है? किस कर्मके कारण इनके शरीरसे इतनी दुर्गन्ध आ रही है - यह बतलाओ ॥ ३० ॥

उ०ख०-अ०६ ] * राजा सोमकान्तका भृगुमुनिके आश्रममें जाना * ५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तुम स्वयं अत्यन्त सुन्दरी, सुकुमारी और सुन्दर | यहाँ राक्षस, प्रेत, भूत और अनेक प्रकारके पशु- नेत्रोंवाली होकर भी कीड़ोंसे भरे शरीरवाले इनकी सेवा | पक्षी हमें भयभीत करते रहते हैं, पर न जाने क्यों वे हमें कैसे करती हो ? ॥ ३१ ॥ | खाते नहीं हैं ? ॥ ४१ ॥ तुम सुन्दर और प्रसन्न मुखवाली तथा समस्त | न जाने वे आगे दुःख भोगनेके लिये ही हमें बनाये अंगोंसे सुन्दर एवं शोभनीय हो; क्या तुम्हारे पिता, | रखेंगे, मैं अपने पापकर्मजनित दुःखोंका अन्त नहीं देख सुहृज्जनों, भाइयों और [पुरोहित आदि] द्विजोंको विवाहसे | पा रही हूँ ॥ ४२ ॥ पूर्व यह ज्ञात नहीं था कि वर कुष्ठ रोगसे पीड़ित और | द्विजोंसे घिरे इन राजाकी [पूर्वकालमें] कड़वे, कृमियोंसे आक्रान्त है ? आपने कैसे इनका वरण कर | तीखे, खट्टे, नमकीन, मीठे, स्निग्ध (घृतपक्व) व्यंजनोंमें लिया और इस दुर्गम वनको चली आयीं ? ॥ ३२-३३ ॥ | वैसी रुचि नहीं होती थी, जैसी कि इस समय कन्द- सूतजी बोले- उस बुद्धिमान् मुनिपुत्रके द्वारा इस | मूल और कसैले-खट्टे फलोंमें होती है ॥ ४३१/२ ॥ प्रकार पूछे जानेपर शोक और हर्षसे युक्त उस सुधर्माने | दरिद्रोंका आहार बहुत अधिक होता है और उनके सम्पूर्ण वृत्तान्त उससे कह सुनाया ॥ ३४ ॥ | द्वारा खाया हुआ भोजन पच भी जाता है, जबकि सुधर्माने कहा- सौराष्ट्रदेशमें देवपुर नामसे | श्रीसम्पन्न (ऐश्वर्यवान्) लोगोंकी शक्ति उतना भोजन विख्यात एक विशाल नगर है, वहाँ ये मेरे पति | करने और उसे पचानेकी नहीं होती ॥ ४४१/२ ॥ सोमकान्त राज्य करते थे। ये अत्यन्त सम्मान्य, दानशील, | जो [राजा] कोमल, दिव्य और मनोरम शय्यापर शूरवीर, दृढ़ पराक्रमी, असंख्य सेनासे सम्पन्न, शत्रुओंके | शयन करता था; समय विपरीत होनेपर देखिये कि वह राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले, सौन्दर्यशाली, यज्ञशील, | आज यहाँ-वहाँ कहीं भी सो जाता है ॥ ४५१/२ ॥ ऐश्वर्यसम्पन्न, मित्रोंको आनन्द देनेवाले, सभी कार्योंके | जिसके चारों तरफ दिशाएँ अनेक प्रकारके मांगलिक विवेचक और नीतिशास्त्रके पण्डित थे ॥ ३५-३७ ॥ | सुगन्धित द्रव्योंकी सुगन्धसे व्याप्त रहती थीं, वही आज हे द्विजश्रेष्ठ ! राजाने दीर्घकालतक अपने राज्यका | मवाद, रक्त और सड़े मांसकी दुर्गन्धसे व्याप्त है ॥ ४६१/२ ॥ भोग किया, परंतु पूर्वजन्मोंके कर्म-विपाकके कारण इस | जो विद्वानोंसे घिरा हुआ आनन्दसिन्धुमें निमग्न रहता अवस्थाको प्राप्त हुए हैं, और पुत्रको राज्य देकर | था, आज वही दुःखदायी कीड़ोंसे घिरा हुआ है ॥ ४७१/२ ॥ मन्त्रिद्वयके साथ इस वनको आये हैं। मैं भी इनके पीछे- | हे भृगुनन्दन ! मेरी समझमें नहीं आ रहा कि हम पीछे चलती हुई सुबल और ज्ञानगम्य नामक मन्त्रियोंके | इस दुःखसागरको कैसे पार करेंगे? इस अगाध [दुःख]- साथ यहाँतक चली आयी। राजाकी आज्ञा लेकर वे दोनों | सागरमें डूबती हुई [हम लोगोंकी] नौकाके लिये आप फल लाने वनमें गये हैं ॥ ३८-४० ॥ | जहाज बन जाइये ॥ ४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सुधर्मा-च्यवन-संवादवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥ छठा अध्याय राजा सोमकान्तका भृगुमुनिके आश्रममें जाना सूतजी बोले- सुधर्माके इस प्रकारके वचन सुनकर | भृगु बोले- हे पुत्र! तुमने ऐसी क्या अपूर्व (जो भृगुपुत्र च्यवनने त्वरापूर्वक अपना जलसे भरा कलश | पहले न देखी हो) बात देख ली है, जो चकित-से उठाया और परदुःखकातर होनेके कारण चुपचाप अपने | दिखायी दे रहे हो; तुम्हें विलम्ब क्यों हो गया—यह घरको चले गये। तब भृगुने विलम्बकर आनेवाले पुत्रसे | मुझसे बताओ ॥ ३ ॥ पूछा-१-२ ॥ | पुत्र बोला- हे मुने! सौराष्ट्रदेशमें देवपुर नामसे

५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विख्यात एक नगर है, वहाँ कमलके समान नेत्रवाला सोमकान्त नामका प्रसिद्ध राजा था। उसने बहुत समयतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्य किया, परंतु दैववश वह दुर्भाग्यको प्राप्त हो गया। हे पिता! वह अपने पुत्रको राज्य देकर पतिकी आज्ञा माननेवाली अपनी पत्नी सुधर्मा और दो मन्त्रियों- सुबल और ज्ञानगम्यके साथ यहाँ आया है। गलित कुष्ठसे पीड़ित और कीड़ोंसे युक्त वह राजा भ्रमण करते हुए दुर्गम सरोवरतक आया है, वह ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे गौतममुनिद्वारा शापित सहस्र भगसे युक्त इन्द्र हो ॥ ४-७॥ कहाँ सुन्दर अंगोंवाली वह सुधर्मा और कहाँ उसका गलित कुष्ठसे पीड़ित पति ! इसी वृत्तान्तको उससे पूछनेपर मेरा कुछ समय बीत गया था ॥ ८ ॥ उसके करुणापूर्ण वचनोंसे मेरा चित्त द्रवीभूत हो गया, तब मैं शीघ्र ही कलश भरकर चला आया ॥ ९ ॥ सूतजी बोले- [इस प्रकार ] उस (सुधर्मा) ने जो कुछ कहा था, वह सब उसने उनसे (भृगुजीसे) कह दिया। उसे सुनकर पुत्र च्यवनसे भृगुने पुनः कहा- ॥ १० ॥ भृगु बोले- हे पुत्र ! दूसरोंका उपकार करनेवाले लोग तो स्वयं संसारमें विख्यात होते हैं। [वे] महाराज सोमकान्त धर्मनिष्ठ, पूज्य और सम्मान्य हैं, अतः उनको ले आओ। मेरी आज्ञासे तुम जाओ और उन सबको शीघ्र ले आओ, मैं उनकी आश्चर्यजनक स्थितिको देखूँगा और उन्हें भी अपना [तपोजेनित कौतुक ] दिखाऊँगा ॥ ११-१२॥ सूतजी बोले-पिताके द्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर सुधर्माको देखनेके लिये उत्सुक करुणानिधि च्यवन शीघ्रतापूर्वक वहाँ सरोवरके पास गये ॥ १३ ॥ उसी समय सुबल और ज्ञानगम्य नामवाले दोनों अमात्य भी फल और कन्दका भार लिये हुए राजाके समीप आ गये ॥ १४ ॥ तदनन्तर उन मुनिपुत्र च्यवनने सुन्दर नेत्रोंवाली सुधर्मासे कहा- हे सुव्रते ! मेरे पिता आप सबको अपने आश्रमपर बुला रहे हैं ॥ १५ ॥ तब उन (मुनि च्यवन)- का इस प्रकारका वचन सुनकर दुःखसे व्याकुल सुधर्मा वैसे ही सावधान हो गयी, मानो शरीरमें प्राण आ गये हों ॥ १६ ॥ तब उनके वचनामृतका पान करके सुन्दर अंगोंवाली और शीलसम्पन्न राजपत्नी सुधर्मा दोनों मन्त्रियों और पति राजा सोमकान्तके साथ मुनिपुत्रको आगे करके चली। उस समय मार्गके मध्यमें उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, जैसे बृहस्पतिको आगे करके शिवा (पार्वतीजी) गणेश और स्कन्दसहित शिवके साथ जा रही हों। इस प्रकार वे वेदमन्त्रोंके उच्च स्वरसे ध्वनित भृगुजीके आश्रम-मण्डलमें पहुँचीं ॥ १७-१९ ॥ [वह आश्रम] अनेक प्रकारकी पुष्पलताओंस आच्छादित और अनेक प्रकारके पक्षियोंके कलरवसे निनादित था। वहाँ बिलाव, बगुले, बाज, हाथी, गाय, मोर, सर्प, पक्षी, सिंह और व्याघ्र क्रीड़ा कर रहे थे। वहाँ न हवा तेज चलती थी, न ही सूर्य अधिक तपते थे और न बादल ही अधिक वर्षा करते थे, अपितु उन मुनिकी इच्छानुसार ही वर्षा करते थे—ऐसे आश्रममें मुनिपुत्रको आगे करके उन सबने प्रवेश किया ॥ २०-२२ ॥ वहाँ उन्होंने व्याघ्रचर्मपर विराजमान उन सूर्यसदृश अद्भुत स्वरूपवाले तेजस्वी भृगुमुनिको देखा। तब राजा सोमकान्त, उनकी पत्नी सुधर्मा और दोनों मन्त्रियोंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया तथा राजाने कहा- ॥ २३ ॥ राजा बोले - हे द्विजेन्द्र ! आज मुझे ब्राह्मणोंद्वारा दिये गये आशीष, मेरा धर्म और मेरी तपस्या भी सुफल हो गयी है, मैं आजन्म पवित्र हो गया हूँ और मेरे जननी-जनकका भी जीवन सुजीवन हो गया है ॥ २४ ॥ मेरे पूर्वार्जित पुण्योंके समूहसे इस समय आपका दर्शन हुआ है, जिससे [अतीत तथा वर्तमानके] पापोंका नाश हो गया। हे मुनीन्द्र ! इससे मेरा भविष्य भी कल्याणमय हो गया है। इस प्रकार आपका दर्शन तीनों कालोंमें मेरे जन्मको पवित्र बना रहा है ॥ २५ ॥ हे अमोघ दर्शनवाले मुनीन्द्र ! मैं सौराष्ट्रदेशमें देवपुर [नामक नगर]-में नीतिपूर्वक, पापोंसे डरते हुए और ब्राह्मणों एवं देवताओंकी पूजा करते हुए राज्य करता था। अकस्मात् मेरा यह कौन-सा उग्रतर और अन्तहीन पाप उदित हो गया, जिससे कि मैं इस

उ०ख०-अ०७ ] * भृगुमुनिके द्वारा राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका वर्णन * ५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दुर्दशाको प्राप्त हो गया? मैं इसका किंचित् प्रतिकार भी | जिसके कारण तुम इस अवस्थाको पहुँच गये हो—वह नहीं जानता हूँ॥ २६-२७॥ | भी मैं बताऊँगा ॥ ३१॥ मेरे द्वारा किये जानेवाले उपाय भी अपाय | [आप] सब लोग बहुत समयसे भूखे हैं, अतः (अनिष्टकारक) हो जाते हैं, लेकिन आपद्वारा किया | भोजन करें। एक वनसे दूसरे वनको जाते रहनेके कारण गया उपाय, उपाय ही होगा—ऐसा मुझे लगता है; | [आप सब] बहुत अधिक थक गये हैं और आप सबके क्योंकि आपके आश्रममें रहनेवाले जन्मजात वैरी भी | मुख कान्तिहीन हो गये हैं ॥ ३२ ॥ निर्वैर हो जाते हैं। मैं आपके शरणागत हूँ ॥ २८ ॥ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर [मुनिने] पहले सूतजी बोले—उन (राजा)-के इस प्रकारके | उनकी उत्तम तेलसे मालिश करवायी, फिर स्नान वचन सुनकर सद्‌व्रतोंका आचरण करनेवाले भृगुमुनि | करवाया, तत्पश्चात् षड्रसोंसे युक्त अनेक प्रकारके करुणामुक्त होकर ध्यानपूर्वक अवलोकनकर राजा | व्यंजनोंका भोजन करवाया ॥ ३३॥ सोमकान्तसे बोले— ॥ २९ ॥ | थके हुए उन लोगोंने भी अमित तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ भृगु बोले—हे राजन्! मैं उपाय बताता हूँ, तुम्हें | भृगुकी आज्ञा पाकर सम्यक् रूपसे स्नानादिपूर्वक अलंकृत चिन्ता करना उचित नहीं है। मेरे आश्रममें आनेवाले | होकर भोजन किया। तत्पश्चात् दुर्जय चिन्ताका त्यागकर प्राणी दुःख नहीं पाते हैं ॥ ३० ॥ | मुनिद्वारा परिकल्पित कोमल शय्याओंपर वे सब इस प्रकार हे नृपश्रेष्ठ ! जन्मान्तरमें जो तुमने पाप किया है, | सो गये, मानो अपने राज्यमें पहुँच गये हों ॥ ३४-३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भृगु-आश्रमगमनवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ सातवाँ अध्याय भृगुमुनिके द्वारा राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका वर्णन ऋषियोंने कहा—[हे सूतजी!] तब राजा सोमकान्तने | उत्तर नहीं देता—वे दोनों इस लोकमें गूँगे और बहरे होते वहाँ जाकर क्या किया और सर्वज्ञ भृगुमुनिने उन्हें क्या | देखे गये हैं। इसलिये हे श्रेष्ठ द्विजगण! मैं [राजा] उपाय बताया ? ॥ १ ॥ | सोमकान्तकी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें— ॥ ३-५ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! आप हम श्रोताओंके समक्ष इस | उस रात्रिके बीत जाने और दिवसाधिपति सूर्यके कथाको कहिये; क्योंकि आपके वचनामृतका पान करके | उदित होनेके बाद स्नान, सन्ध्या, जप, हवन आदि करके हम तृप्तितक नहीं पहुँच रहे हैं अर्थात् तृप्त नहीं हो पा | उन भृगुश्रेष्ठने पत्नी और मन्त्रियोंसहित स्नान और जप रहे हैं ॥ २ ॥ | कर चुके राजा सोमकान्तसे उनके पूर्वजन्मकी कथा सूतजी बोले—हे महाभाग [ऋषियो !] आपने | कहना आरम्भ किया ॥ ६-७ ॥ उचित प्रश्न किया है। आप लोग तो स्वयं ही ज्ञानके | भृगुजी बोले—विन्ध्यपर्वतके निकट रमणीय समुद्र हैं। हे द्विजगण! जो श्रोता कथाका अन्ततक | कोल्हारनगरमें चिद्रूप—इस नामसे विख्यात एक महान् श्रवण नहीं करता अथवा जो वक्ता कथाका अन्ततक | धनवान् वैश्य हुआ। उसकी सुलोचना नामसे प्रसिद्ध वाचन नहीं करता या केवल लिखे हुएका ही वाचन | पत्नी अत्यन्त सौभाग्यवती, सुशीला, दानी, पतिवाक्यपरायणा करता है अथवा पुस्तककी चोरी करता है और जो शिष्य | (पतिकी आज्ञा माननेवाली) और सती थी। हे नृपश्रेष्ठ ! गुरुसे प्रश्न नहीं करता तथा जो गुरु शिष्यके प्रश्नका | पूर्वजन्ममें तुम उसीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे।

५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- ब्राह्मणोंके कथनानुसार उन दोनोंने तुम्हारा 'कामन्द'- यह नाम रखा ॥ ८-१० ॥ माता-पिताकी वृद्धावस्थामें तुम्हारा जन्म हुआ था और तुम उनके एकमात्र पुत्र थे, इसलिये वे दोनों दिन- रात तुम्हें अत्यन्त स्नेह करते थे और तुम्हारा लालन- पालन करते थे ॥ ११ ॥ उन दोनोंने हिरणी-जैसे नेत्रोंवाली, सुकुमार अंगोंवाली और 'कुटुम्बिनी' नामसे प्रसिद्ध [कन्याके साथ] तुम्हारा पर्याप्त धन खर्चकर, कौतुक और मांगलिक उत्सवपूर्वक विवाह किया ॥ १२ ॥ [तुम्हारी पत्नी] ब्राह्मणों, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करनेमें प्रेम रखनेवाली और तुममें ही अनुरक्त चित्तवाली थी। समस्त स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा वह अत्यन्त सुन्दरी थी ॥ १३ ॥ पाँच बाण धारण करनेवाले कामदेवकी पत्नी रतिकी भाँति सुन्दर उस सात पुत्रों और पाँच पुत्रियोंवाली कुटुम्बिनीने अपने नामको सार्थक किया था ॥ १४ ॥ तदनन्तर बहुत समय बाद तुम्हारे पिता पंचतत्त्वोंमें विलीन हो गये और तुम्हारी साध्वी माता भी उन्हींके साथ दग्ध होकर स्वर्गको चली गयीं ॥ १५ ॥ तब तुमने अपनी मित्रमण्डलीके साथ [मौजमस्तीमें] बहुत-सा धन नष्ट कर दिया। [उनके द्वारा] कुछ धन उठा ले जाया गया, कुछ नष्ट कर दिया गया और कुछ खाने-पीनेमें समाप्त हो गया-इस प्रकार सम्पूर्ण धन विनाशको प्राप्त हो गया ॥ १६ ॥ चिन्तित होकर तुम्हारी धर्मपत्नीने तुम्हें बहुत रोका, किंतु तुमने उसकी बात नहीं मानी और घर भी बेच दिया ॥ १७ ॥ कुलके लिये कण्टकके समान तुम्हें छोड़कर वह अपने बच्चोंके पालन-पोषणके लिये तुम्हारी आज्ञा लेकर बच्चोंके साथ पिताके घर चली गयी ॥ १८ ॥ तदनन्तर तुम दुराचारी हो गये। मदिरापान करके उन्मत्त हो जाते और पागल हाथीकी भाँति नगरमें अत्याचार करते ॥ १९ ॥ तुम दूसरेका द्रव्य हरण करते, परनारियोंसे व्यभिचार करते, गाँवमें चोरी करते और लोगोंको सन्ताप दिया करते थे। तुम द्यूतक्रीडामें निपुण, मूर्तिमान् पापसमूह, हिंसाप्रिय तथा बलहीन होते हुए भी अपनेको शूरवीर माननेवाले थे ॥ २० ॥ जो-जो लोग तुम्हारे सुखके साथी थे और तुम्हारे द्वारा तृप्त किये गये थे, उनसे बहुत-सा धन लेकर तुम खा गये। तुम्हारे पिताने धरोहरके रूपमें अपने मित्रोंके यहाँ जो कुछ रखा था, उसे भी लेकर तुम खा गये ॥ २१ ॥ तुमने अनेक बार झूठी कसमें खायीं, अनेक बार स्त्रियोंसे झूठ बोले और झूठे प्रमाण दिये। इसलिये सभी लोग तुमसे वैसे ही भयभीत रहते थे, जैसे घरमें घुसे हुए अत्यन्त विषैले साँपसे ॥ २२ ॥ इस प्रकार जब तुम लोगोंके लिये पायसमें पड़े हुए [कँटीले] गोखुरकी भाँति हो गये, तब इसी कारणसे लोगोंने राजाकी अनुमति लेकर तुम्हें नगरसे निकलवा दिया ॥ २३ ॥ वनमें रहते हुए तुम नित्य बहुत-से प्राणियोंकी हत्या करते थे। तुम स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंकी हत्या करते थे और किसी श्रेष्ठ पुरुषको देखकर वैसे ही पलायन कर जाते थे, जैसे सिंहको देखकर भेड़िया या मृग भाग जाता है ॥ २४ ॥ तुमने मछलियों, बगुलों, सारस, मुर्गों, भेड़ियों, हिरनों, बन्दरों, कोयल, गैंडों, खरगोशों और घड़ियालोंको निष्प्रयोजन मारकर और उन्हें खाकर पापपूर्ण आचरणसे ही अपने शरीरका पोषण किया ॥ २५ ॥ तुमने अनेक स्थानोंमें रहनेवाले दुर्धर्ष चोरोंको अपने साथ मिलाकर और सिंहों, व्याघ्रों एवं सियारोंको पर्वत-कन्दराओंसे निकालकर लकड़ी, मिट्टी और पत्थरोंसे एक उत्तम गृहका निर्माण किया; जो एक कोस विस्तारवाला और अनेक प्रकारके चमत्कारोंसे युक्त था ॥ २६-२७ ॥ तुम्हारी पत्नीके पिताने जनता और राजाके भयसे उसे बालकोंके साथ तुम्हें सौंप दिया और वह तुम्हारे घर आ गयी ॥ २८ ॥

उ०ख०-अ०८ ] * राजा सोमकान्तद्वारा गणेश-मन्दिरके जीर्णोद्धारका वर्णन * ५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अनेक प्रकारके वस्त्रों एवं अलंकारोंसे सुशोभित तुम्हारी पत्नी देवांगनाकी भाँति शोभा पाती थी, तुम्हारे बालक भी तेजस्वी थे। वहाँ तुम चोरोंके साथ रहते तथा रास्तेमें चलनेवाले गरीब लोगोंकी हत्या करके घर भाग आते। चोरों, बालकों और स्त्रीके साथ तुम राजाकी भाँति प्रतीत होते थे। किसी समय गुणवर्धन नामसे विख्यात एक विद्वान् ब्राह्मण तुम्हें मध्याह्नकालमें रास्तेमें एकाकी दिखायी पड़ा ॥ २९-३१ ॥ तब तुमने उस ब्राह्मणका दाहिना हाथ पकड़कर उसे रोक लिया। तुम्हारे द्वारा पकड़कर खींचे जानेसे वह तुम्हारे मनकी बात जान गया और थर-थर काँपने लगा। तुम्हें अपना काल मानकर वह मूर्च्छित हो गया और जीवित रहनेकी इच्छासे अत्यन्त करुणापूर्ण एवं तर्कसंगत वाक्योंसे तुम्हारा प्रबोधन करते हुए कहने लगा - ॥ ३२-३३ ॥ गुणवर्धन बोला - मैं ब्राह्मण हूँ, नव-विवाहिताका पति हूँ, शान्त स्वभाववाला हूँ और निरपराध हूँ; धनवान् और सौभाग्यवान् होकर भी तुम मुझे मारनेकी इच्छा क्यों करते हो ? ॥ ३४ ॥ दुर्बुद्धिपूर्ण वासनाका त्याग करके तुम अपनी बुद्धिको सद्धर्ममें लगाओ। मेरी पहली पत्नी परलोकको चली गयी, तब मैंने उससे श्रेष्ठ यह दूसरी पत्नी प्राप्त की है। यह सुन्दर आचरणवाली, परम उदार, साध्वी और सभी गुणोंकी खान है। पितरोंके ऋणसे मुक्त होने, धर्म और सन्तानकी वृद्धिके लिये तथा गृहस्थ धर्मके पालनकी इच्छासे मैंने अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक उससे विवाह किया है। मेरे बिना उसका और उसके बिना मेरा जीवन व्यर्थ हो जायगा ॥ ३५-३७ ॥ अतः तुम मेरे रक्षक पिता हो जाओ, मैं भी तुम्हारा पुत्र हो जाऊँगा; क्योंकि शास्त्रमें जीवन देनेवाले और भयसे रक्षा करनेवाले-दोनोंको पिता कहा गया है। डाकू भी ब्राह्मण या शरणमें आये हुए-की रक्षा करते हैं, अतः मुझ ब्राह्मण, विद्वान् और शरणागतको तुम्हें मुक्त कर देना चाहिये, अन्यथा तुम हजारों कल्पोंतक नरकोंमें पड़ते रहोगे ॥ ३८-३९१/२ ॥ [तुम्हारे द्वारा लाये गये धनके] स्त्री, पुत्र और सुहृज्जन सभी उपभोक्ता हैं। ये ठग लोग तुम्हारे धनसे सुखी तो हैं, पर तुम्हारे पापमें भागीदार नहीं होंगे, अतः यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि तुम कितने जन्मांतक इस पापका फल भोगते रहोगे ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सोमकान्तके पूर्वजन्मका कथन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥ आठवाँ अध्याय राजा सोमकान्तद्वारा पूर्वजन्ममें किये गये पापों तथा वृद्धावस्थामें गणेश-मन्दिरके जीर्णोद्धारका वर्णन भृगुजी बोले - उस ब्राह्मण (गुणवर्धन)-ने इस प्रकार बार-बार करुणासे युक्त एवं अवसादपूर्ण वचन कहे, परंतु उन्हें सुनकर भी तुम्हारा हृदय नहीं पसीजा ॥ १ ॥ सचमुच, ब्रह्माने वज्रके सारभागसे ही तुम्हारा निर्माण किया था। बहुत-से जन्तुओं और हजारों मनुष्योंकी हत्यासे तुम्हारे मनने कृतघ्नकी भाँति अति निष्ठुरता प्राप्त कर ली थी। तदनन्तर (ब्राह्मणकी बात सुनकर) तुमने निष्ठुर यमराजकी भाँति उससे कहा - ॥ २-३ ॥ चोर [ जो इस जन्ममें राजा सोमकान्त था ] बोला - रे ब्राह्मण ! बधिरके सम्मुख पाण्डित्यकी बातें और अधोमुख घड़ेमें जल भरने-जैसा प्रयास तुम अपने इन वाक्यसमूहोंद्वारा मुझपर व्यर्थमें क्यों कर रहे हो ? कहाँ मेरी मूढ़ बुद्धि और कहाँ तुम्हारा यह [ज्ञानपूर्ण] उपदेश ! जैसे मदिरापान किये हुए-के सम्मुख तत्त्व- चिन्तन व्यर्थ है, वैसे ही तुम्हारी ये बातें मुझे रुचिकर नहीं लग रही हैं। जिसकी धनमें आसक्ति है, उसके लिये

५८      * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *      [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

पिता और भाईका कोई विचार नहीं होता, जैसे कि कामातुरको भय और लज्जा नहीं होती ॥ ४-६ ॥ क्या तुमने कौएको शुद्धिका विचार करते हुए, जुआ खेलनेवालेको सत्य बोलते हुए, नपुंसकको धैर्य रखते हुए, स्त्रियोंमें निष्कामता और सर्पोंमें क्षमाके भावको देखा है ? ॥ ७ ॥ विधाताने दैवयोगसे तुम्हें मुझ आजीविकारहितके पास भेज दिया है, मैं तुम्हें कदापि नहीं छोड़ सकता ॥ ८ ॥ भृगुजी बोले—ऐसा कहकर तुमने अपने दाहिने हाथमें तीक्ष्ण धारवाला खड्ग लेकर उस (ब्राह्मण)-का सिर उसी प्रकारसे काट दिया, जिस प्रकार बिलाव मूषकका ॥ ९ ॥ इस प्रकार तुम्हारे द्वारा की गयी ब्रह्महत्याओंकी गणना करना सम्भव नहीं है, उसमें भी विशेष रूपसे स्त्रियों, बालकों, वृद्धजनों और जीव-जन्तुओंकी हत्याओंकी गणना नहीं हो सकती [और गणना करनी भी नहीं चाहिये]; क्योंकि दूसरेके पापोंकी गणना करनेवाला भी उसमें विशेष रूपसे भागीदार हो जाता है ॥ १०१/२॥ हे कामन्द ! तदनन्तर बहुत समय बीतनेपर तुम्हारी वृद्धावस्था आ गयी। तुम्हें कफ, अवसाद, पसीना हिचकी और कँपकँपी होने लगी। तुम्हें बैठनेपर तो नींद आ जाती, परंतु लेटनेपर वह नहीं आती ॥ ११-१२ ॥ तुम्हारे पुत्र, सेवक-सेविकाएँ, मित्रगण, पुत्रियाँ और दौहित्र—सभी तुम्हारा अनादर करते थे ॥ १३ ॥ वहाँ तुम्हारे पास एक विश्वसनीय ब्राह्मण था, जो गोपनीय ढंगसे तुम्हारे कार्य करता था, वह तुम्हारा देखा-समझा था तथा घरमें बेरोकटोक आने-जानेमें समर्थ था, उसे तुमने सभी वनवासी मुनियोंको बुला लानेके लिये भेजा, तब तुम्हारे भयसे और उस ब्राह्मणके वचनका आदर करते हुए वे सब तुम्हारे पास आये ॥ १४-१५ ॥ तब तुमने उन [मुनियों]-को प्रणाम करके कहा— '[आप लोग] मुझसे दान ग्रहण करें।' तब उन लोगोंने कहा—'हम तुझ पतितसे दान नहीं ग्रहण करेंगे' ॥ १६ ॥ पापी व्यक्तिका यज्ञ कराने, उसे वेदाध्ययन कराने,


[दायाँ स्तम्भ]

उससे विवाहादि सम्बन्ध रखने, बातचीत करने, उसके साथ एक वाहनपर बैठने और साथ भोजन करनेसे उसका पाप दूसरेमें भी संचरित हो जाता है—ऐसा तुमसे कहकर वे लोग अपने-अपने आश्रमोंको चले गये और वहाँ जाकर उन सबने पावमानी ऋचाका जप करते हुए सचैल (वस्त्रसहित)-स्नान किया ॥ १७-१८॥ हे कामन्द (राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका नाम) ! तब रोग-पीड़ित होने, स्वजनोंद्वारा त्याग दिये जाने और ब्राह्मणोंद्वारा भी बहिष्कृत कर दिये जानेसे तुम्हारे मनमें अत्यधिक अनुताप (पापकर्मके बाद पछतावा) उत्पन्न हुआ ॥ १९ ॥ स्वर्ण-रजत एवं रत्नादिसे समन्वित अपनी विपुल सम्पत्ति देखकर तुम्हारी बुद्धिमें किसी देवालयके जीर्णोद्धारसम्बन्धी विचार प्रस्फुटित हुआ ॥ २० ॥ तब ब्राह्मणोंने तुमसे कहा कि वनमें एक छोटा- सा टूटा-फूटा देवमन्दिर है, उसमें गणेशजीकी श्रेष्ठ, अनादि और मंगलमयी मूर्ति स्थित है ॥ २१ ॥ तदनन्तर तुमने अत्यधिक विस्तार और ऊँचाईवाले, चार तोरणोंसे युक्त चार द्वारवाले, अत्यन्त सुन्दर चार शिखरोंसे शोभायमान, अनेक स्तम्भों और अनेक वेदियोंसे समन्वित, मोती-मूँगा-रत्नों आदिसे जड़ित सुन्दर आँगनवाले, अनेक प्रकारके पुष्पोंके वृक्षों और अनेक प्रकारके फलोंके वृक्षोंसे समन्वित, चारों दिशाओंमें निर्मल जलसे पूर्ण वापियोंसे सुशोभित मन्दिरका निर्माण करवाया; जिसमें तुम्हारा [अधिकांश] धन व्यय हो गया और कुछ धन स्त्री, पुत्रों, मित्रों और बान्धवोंद्वारा हरण कर लिया गया ॥ २२-२५ ॥ तदनन्तर थोड़े ही समय बाद तुम पंचतत्त्वोंमें विलीन हो गये। यमराजके दूतोंने तुम्हें बाँधकर कोड़ोंका प्रहार करते हुए बहुत ताड़ित किया ॥ २६ ॥ तुम्हारा सारा शरीर काँटोंसे बिंध गया, तुम्हें पत्थरपर पटका गया और मवाद तथा रक्तके कीचड़वाले भयंकर नरकमें तुम्हें डुबोया गया ॥ २७ ॥ इस प्रकार तुम उन दूतोंद्वारा चित्रगुप्त और यमराजके पास ले जाये गये। तब यमराजने पूछा—पुण्य और पापमें

उ०ख०-अ०९] * भृगुमुनिका राजा सोमकान्तको गणेशपुराणके श्रवणका उपदेश देना * ५९ तुम पहले किसका भोग करोगे ? ॥ २८ ॥ तब तुमने कहा- 'हे सूर्यपुत्र ! मैं पहले पुण्योंका भोग करूँगा।' तब तुम्हें सौराष्ट्रदेशमें राजा बनाया गया ॥ २९ ॥ इस प्रकार शरणागतके प्रति करुणाभावसे तपोबलका आश्रय लेकर मैंने पापोंके खानरूप तुम्हारे पूर्वजन्मका वर्णन कर दिया ॥ ३० ॥ [जीर्ण] मन्दिरको कान्तिमान् बना देनेके कारण तुम सोमकान्त (चन्द्रतुल्य कान्तिवाले और) राजा हुए तथा अपनी अतीव कान्तिमती पत्नीके साथ चन्द्रिकासे समन्वित चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हुए ॥ ३१ ॥ सूतजी बोले - भृगुजीद्वारा [पूर्वजन्मका] वर्णन सुनकर वह अधम राजा सोमकान्त उनके वचनोंपर सन्देह करता हुआ पत्थरकी भाँति निष्क्रिय अर्थात् मौन हो गया ॥ ३२ ॥ जब उसे वेद-शास्त्रके तात्त्विक विद्वान्, भूत- भविष्य और वर्तमानको जाननेवाले तपस्वी भृगुके वाक्योंमें सन्देह हुआ तो उसके शरीरसे अनेक प्रकारके रंगों और आकृतियोंवाले बहुत-से पक्षी क्षणमात्रमें निकलने लगे और वे सब उस राजाको खाने लगे ॥ ३३-३४॥ [वे पक्षी] उड़-उड़कर अपनी दृढ़ चोंचोंके अग्रभागसे उस राजाको डँसने अर्थात् चोंचोंके प्रहारसे पीड़ित करने लगे और मुनिके ही समक्ष उसके मांसको काट-काटकर खाने लगे ॥ ३५ ॥ तब अत्यन्त दुःखित होकर वह पुनः उनकी शरणमें गया और ज्ञान एवं तपस्याके निधिरूप भृगुजीसे दीन वाणीमें बोला- ॥ ३६ ॥ राजाने कहा - समस्त प्राणियोंको अभय प्रदान करनेवाले हे मुने! आपके वन (आश्रम)-में जन्मजात वैरियाँको भी परस्पर भय नहीं है, फिर आपके समक्ष ये [पक्षी] मुझ मरे हुएको क्यों मार रहे हैं? मैं दीन हूँ, कुष्ठरोगसे ग्रस्त हूँ, शरणागत हूँ और आपके चरणोंमें पड़ा हूँ, आप इस समय मुझे इनसे बचाइये ॥ ३७-३८॥ सूतजी बोले- राजाके द्वारा ऐसा कहे जानेपर दीनवत्सल भृगुने उससे कहा- ॥ ३८१/२ ॥ भृगुजी बोले - हे राजन् ! मेरे वाक्योंपर संशय करनेके कारण तुम्हें ऐसा अनुभव हुआ है। मैं इसका प्रतिकार बताता हूँ, तुम क्षणभरमें स्वस्थ हो जाओगे। मेरे हुंकारमात्रसे ये पक्षी चले जायँगे ॥ ३९-४०॥ सूतजी बोले - तब द्विज [श्रेष्ठ] भृगुके हुंकारको सुनकर सभी पक्षी अन्तर्हित (लुप्त) हो गये तथा पत्नी और मन्त्रियोंसहित राजा भी प्रसन्न हो गये ॥ ४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नानापक्षिनिवारण' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८॥ नौवाँ अध्याय भृगुमुनिका राजा सोमकान्तको गणेशपुराणके श्रवणका उपदेश देना सूतजी बोले- तदनन्तर भृगुमुनिने क्षणभर ध्यान करके उस [राजा सोमकान्त]-के पूर्वकर्मजनित दुःखोंको देखकर अत्यन्त विह्वल होकर उस राजासे कहा- ॥ १ ॥ कहाँ तुम्हारे पापोंका समूह और कहाँ मेरे द्वारा कहा गया उपाय ! तथापि मैं तुमसे एक उपाय कहता हूँ, जो पापोंका नाश करनेवाला है ॥ २ ॥ यदि तुम शीघ्र ही 'गणेशपुराण' का श्रवण करोगे तो दुःखरूपी समुद्रसे मुक्त हो जाओगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ तब उस राजासे इस प्रकार कहकर [मुनिने] गणेशजीके एक सौ आठ श्रेष्ठ नामोंका जपकर [उससे] जलको अभिमन्त्रित करके राजाको अभिषिक्त किया ॥ ४ ॥ उस जलके सिंचनमात्रसे [राजाके] नासारन्ध्र (नाकके छिद्र)-से छोटा-सा एक काले रंगवाला पुरुष निकलकर भूमिपर गिर पड़ा और उसी क्षण वह सात ताड़ वृक्षोंके बराबर ऊँचा हो गया। वह अपना भयंकर मुख फैलाये हुए था, उसकी जिह्वा अत्यन्त भयंकर थी। उसकी आँखें रक्तवर्णकी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं।

६०          * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *          [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

उसने जटा धारण कर रखी थी। उसके मुखसे [कभी] अग्निकी लपटें निकलती थीं, तो कभी क्षणमात्रमें वह रक्त और मवादका वमन करने लगता था। वह दूसरे [मूर्तिमान्] अन्धकारकी भाँति नेत्रोंको अन्धता प्रदान कर रहा था॥ ५-७॥

उसे देखकर उस आश्रममें निवास करनेवाले सभी लोग भाग खड़े हुए। उसने अपने दाँतोंके कटकटानेकी ध्वनिसे दसों दिशाओंको भर दिया था। तब द्विजश्रेष्ठ [भृगुमुनिने] उस अद्भुत पुरुषसे जानते हुए भी उस [राजा सोमकान्त]-के समक्ष पूछा—तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है?—मुझे बताओ ॥ ८-९ ॥

तब उन द्विजके पूछनेपर उसने मुनिको प्रत्युत्तर देते हुए कहा—मैं प्राणियोंके शरीरमें स्थित रहता हूँ, मेरा नाम 'पापपुरुष' है॥ १० ॥

तुम्हारे द्वारा अभिमन्त्रित जल छिड़कनेसे मैं राजाके शरीरसे बाहर निकला हूँ, मैं भूखसे पीड़ित हूँ और भोजन करना चाहता हूँ; मुझे भोजन दीजिये, नहीं तो मैं सारे लोगोंको और इस सोमकान्तको भी तुम्हारे आगे ही खा जाऊँगा। हे मुने! तुमने ही मुझे इसके शरीरसे बाहर निकाला है, अब कोई रमणीय स्थान मुझे निवासके लिये दो ॥ ११-१२॥

तब समीप जाकर मुनिने पुनः उससे कहा—मेरी आज्ञासे इस सीधे और सूखे आमके वृक्षके कोटरमें तुम निवास करो और गिरे हुए पत्तोंको खाओ; नहीं तो मैं तुझे भस्म कर दूँगा। रे अधम ! मेरी यह बात झूठी नहीं हो सकती ॥ १३-१४॥

**सूतजी बोले—**हे द्विजगण ! मुनिकी बात समाप्त होनेपर उस [पापपुरुष]-ने उस सूखे वृक्षका स्पर्श किया और उसके स्पर्शमात्रसे वह वृक्ष भस्मीभूत हो गया ॥ १५ ॥

तब मुनिको देखकर डरा हुआ वह (पापपुरुष) उसी भस्ममें विलीन हो गया। उसके छिप जानेपर [भृगु] मुनिने पुनः उस [राजा] सोमकान्तसे कहा— ॥ १६॥

**भृगुजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ ! पुराणके श्रवणसे जो तुम्हें पुण्य होगा, उसे तुम तबतक प्रतिदिन इस भस्ममें


[दायाँ स्तम्भ]

ही डालते रहना, जबतक कि यह आम्रवृक्ष [पूर्वकी भाँति] खड़ा न हो जाय। हे राजन् ! इस वृक्षके वृद्धिको प्राप्त होनेपर तुम निष्पाप हो जाओगे ॥ १७-१८॥

**राजाने कहा—**हे ब्रह्मन् ! गणेशजीके पुराणको, जिसे न देखा गया है और न ही सुना गया है, हे मुने! वह अथवा उसका व्याख्याता कहाँ प्राप्त होगा ? ॥ १९ ॥

**मुनि बोले—**पूर्वकालमें [वह पुराण] ब्रह्माजीद्वारा बुद्धिमान् वेदव्याससे कहा गया। व्यासजीसे यह पापनाशक पुराण मुझे विदित हुआ और मैं तुमसे कहूँगा। तुम तीर्थमें सम्यक् रूपसे स्नान करो और हे सुव्रत ! 'मैं पुराणका श्रवण करूँगा'—इस प्रकारका संकल्प करो ॥ २०-२१॥

**सूतजी बोले—**तदनन्तर भृगुजीद्वारा प्रेरित होकर राजा सोमकान्तने प्रसन्न चित्तसे अत्यन्त विख्यात भृगुतीर्थमें स्नानकर संकल्प किया कि 'जो गणेशजीका पुराण है, उसे मैं आजसे प्रारम्भकर प्रतिदिन सुनूँगा।' तब मात्र संकल्प करनेसे ही राजा रोगरहित हो गया ॥ २२-२३ ॥

भृगुजीकी कृपासे वह रक्तस्राव, कृमियों एवं घावोंसे रहित हो गया था। तब उस विस्मित और हर्षित राजाको भृगुजी लिवाकर ले गये और स्वयं अपने आसनपर बैठकर उसे भी आसन प्रदान किया। तब उस दिव्य कान्तिवाले नृपश्रेष्ठ [सोमकान्त]-ने उस आसनपर बैठनेके बाद कहा— ॥ २४-२५ ॥

**राजाने कहा—**आपकी कृपासे और [इस पुराणके श्रवण]-के संकल्पमात्रसे मेरी सारी बलीयसी व्यथा चली गयी। [अब आप] मुझसे गजानन (गणेशजी)-के इस आश्चर्यमय सम्पूर्ण पुराणको कहिये ॥ २६ ॥

**भृगुजी बोले—**मैं उस पुराण (गणेशपुराण)-को कहता हूँ, सावधान होकर सुनो ! जिसका अनन्त पुण्योंका समूह होता है, उसी पुरुषकी बुद्धिमें इसे श्रवण करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है, अन्यथा पापियोंकी नहीं होती। जिसके कानमें पड़नेमात्रसे सात जन्मोंमें किये गये लघु, शुष्क, आर्द्र और स्थूल पाप तथा महापाप भी अविनाशी, अप्रमेय, निर्गुण, निराकार, मन और वाणीसे परे, केवल आनन्दरूप गणेशजीकी कृपासे उसी क्षणसे विलीन होने लगते हैं ॥ २७-३० ॥