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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 656 में से

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पृष्ठ 62

६०          * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *          [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

उसने जटा धारण कर रखी थी। उसके मुखसे [कभी] अग्निकी लपटें निकलती थीं, तो कभी क्षणमात्रमें वह रक्त और मवादका वमन करने लगता था। वह दूसरे [मूर्तिमान्] अन्धकारकी भाँति नेत्रोंको अन्धता प्रदान कर रहा था॥ ५-७॥

उसे देखकर उस आश्रममें निवास करनेवाले सभी लोग भाग खड़े हुए। उसने अपने दाँतोंके कटकटानेकी ध्वनिसे दसों दिशाओंको भर दिया था। तब द्विजश्रेष्ठ [भृगुमुनिने] उस अद्भुत पुरुषसे जानते हुए भी उस [राजा सोमकान्त]-के समक्ष पूछा—तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है?—मुझे बताओ ॥ ८-९ ॥

तब उन द्विजके पूछनेपर उसने मुनिको प्रत्युत्तर देते हुए कहा—मैं प्राणियोंके शरीरमें स्थित रहता हूँ, मेरा नाम 'पापपुरुष' है॥ १० ॥

तुम्हारे द्वारा अभिमन्त्रित जल छिड़कनेसे मैं राजाके शरीरसे बाहर निकला हूँ, मैं भूखसे पीड़ित हूँ और भोजन करना चाहता हूँ; मुझे भोजन दीजिये, नहीं तो मैं सारे लोगोंको और इस सोमकान्तको भी तुम्हारे आगे ही खा जाऊँगा। हे मुने! तुमने ही मुझे इसके शरीरसे बाहर निकाला है, अब कोई रमणीय स्थान मुझे निवासके लिये दो ॥ ११-१२॥

तब समीप जाकर मुनिने पुनः उससे कहा—मेरी आज्ञासे इस सीधे और सूखे आमके वृक्षके कोटरमें तुम निवास करो और गिरे हुए पत्तोंको खाओ; नहीं तो मैं तुझे भस्म कर दूँगा। रे अधम ! मेरी यह बात झूठी नहीं हो सकती ॥ १३-१४॥

**सूतजी बोले—**हे द्विजगण ! मुनिकी बात समाप्त होनेपर उस [पापपुरुष]-ने उस सूखे वृक्षका स्पर्श किया और उसके स्पर्शमात्रसे वह वृक्ष भस्मीभूत हो गया ॥ १५ ॥

तब मुनिको देखकर डरा हुआ वह (पापपुरुष) उसी भस्ममें विलीन हो गया। उसके छिप जानेपर [भृगु] मुनिने पुनः उस [राजा] सोमकान्तसे कहा— ॥ १६॥

**भृगुजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ ! पुराणके श्रवणसे जो तुम्हें पुण्य होगा, उसे तुम तबतक प्रतिदिन इस भस्ममें


[दायाँ स्तम्भ]

ही डालते रहना, जबतक कि यह आम्रवृक्ष [पूर्वकी भाँति] खड़ा न हो जाय। हे राजन् ! इस वृक्षके वृद्धिको प्राप्त होनेपर तुम निष्पाप हो जाओगे ॥ १७-१८॥

**राजाने कहा—**हे ब्रह्मन् ! गणेशजीके पुराणको, जिसे न देखा गया है और न ही सुना गया है, हे मुने! वह अथवा उसका व्याख्याता कहाँ प्राप्त होगा ? ॥ १९ ॥

**मुनि बोले—**पूर्वकालमें [वह पुराण] ब्रह्माजीद्वारा बुद्धिमान् वेदव्याससे कहा गया। व्यासजीसे यह पापनाशक पुराण मुझे विदित हुआ और मैं तुमसे कहूँगा। तुम तीर्थमें सम्यक् रूपसे स्नान करो और हे सुव्रत ! 'मैं पुराणका श्रवण करूँगा'—इस प्रकारका संकल्प करो ॥ २०-२१॥

**सूतजी बोले—**तदनन्तर भृगुजीद्वारा प्रेरित होकर राजा सोमकान्तने प्रसन्न चित्तसे अत्यन्त विख्यात भृगुतीर्थमें स्नानकर संकल्प किया कि 'जो गणेशजीका पुराण है, उसे मैं आजसे प्रारम्भकर प्रतिदिन सुनूँगा।' तब मात्र संकल्प करनेसे ही राजा रोगरहित हो गया ॥ २२-२३ ॥

भृगुजीकी कृपासे वह रक्तस्राव, कृमियों एवं घावोंसे रहित हो गया था। तब उस विस्मित और हर्षित राजाको भृगुजी लिवाकर ले गये और स्वयं अपने आसनपर बैठकर उसे भी आसन प्रदान किया। तब उस दिव्य कान्तिवाले नृपश्रेष्ठ [सोमकान्त]-ने उस आसनपर बैठनेके बाद कहा— ॥ २४-२५ ॥

**राजाने कहा—**आपकी कृपासे और [इस पुराणके श्रवण]-के संकल्पमात्रसे मेरी सारी बलीयसी व्यथा चली गयी। [अब आप] मुझसे गजानन (गणेशजी)-के इस आश्चर्यमय सम्पूर्ण पुराणको कहिये ॥ २६ ॥

**भृगुजी बोले—**मैं उस पुराण (गणेशपुराण)-को कहता हूँ, सावधान होकर सुनो ! जिसका अनन्त पुण्योंका समूह होता है, उसी पुरुषकी बुद्धिमें इसे श्रवण करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है, अन्यथा पापियोंकी नहीं होती। जिसके कानमें पड़नेमात्रसे सात जन्मोंमें किये गये लघु, शुष्क, आर्द्र और स्थूल पाप तथा महापाप भी अविनाशी, अप्रमेय, निर्गुण, निराकार, मन और वाणीसे परे, केवल आनन्दरूप गणेशजीकी कृपासे उसी क्षणसे विलीन होने लगते हैं ॥ २७-३० ॥