श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०९] * भृगुमुनिका राजा सोमकान्तको गणेशपुराणके श्रवणका उपदेश देना * ५९ तुम पहले किसका भोग करोगे ? ॥ २८ ॥ तब तुमने कहा- 'हे सूर्यपुत्र ! मैं पहले पुण्योंका भोग करूँगा।' तब तुम्हें सौराष्ट्रदेशमें राजा बनाया गया ॥ २९ ॥ इस प्रकार शरणागतके प्रति करुणाभावसे तपोबलका आश्रय लेकर मैंने पापोंके खानरूप तुम्हारे पूर्वजन्मका वर्णन कर दिया ॥ ३० ॥ [जीर्ण] मन्दिरको कान्तिमान् बना देनेके कारण तुम सोमकान्त (चन्द्रतुल्य कान्तिवाले और) राजा हुए तथा अपनी अतीव कान्तिमती पत्नीके साथ चन्द्रिकासे समन्वित चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हुए ॥ ३१ ॥ सूतजी बोले - भृगुजीद्वारा [पूर्वजन्मका] वर्णन सुनकर वह अधम राजा सोमकान्त उनके वचनोंपर सन्देह करता हुआ पत्थरकी भाँति निष्क्रिय अर्थात् मौन हो गया ॥ ३२ ॥ जब उसे वेद-शास्त्रके तात्त्विक विद्वान्, भूत- भविष्य और वर्तमानको जाननेवाले तपस्वी भृगुके वाक्योंमें सन्देह हुआ तो उसके शरीरसे अनेक प्रकारके रंगों और आकृतियोंवाले बहुत-से पक्षी क्षणमात्रमें निकलने लगे और वे सब उस राजाको खाने लगे ॥ ३३-३४॥ [वे पक्षी] उड़-उड़कर अपनी दृढ़ चोंचोंके अग्रभागसे उस राजाको डँसने अर्थात् चोंचोंके प्रहारसे पीड़ित करने लगे और मुनिके ही समक्ष उसके मांसको काट-काटकर खाने लगे ॥ ३५ ॥ तब अत्यन्त दुःखित होकर वह पुनः उनकी शरणमें गया और ज्ञान एवं तपस्याके निधिरूप भृगुजीसे दीन वाणीमें बोला- ॥ ३६ ॥ राजाने कहा - समस्त प्राणियोंको अभय प्रदान करनेवाले हे मुने! आपके वन (आश्रम)-में जन्मजात वैरियाँको भी परस्पर भय नहीं है, फिर आपके समक्ष ये [पक्षी] मुझ मरे हुएको क्यों मार रहे हैं? मैं दीन हूँ, कुष्ठरोगसे ग्रस्त हूँ, शरणागत हूँ और आपके चरणोंमें पड़ा हूँ, आप इस समय मुझे इनसे बचाइये ॥ ३७-३८॥ सूतजी बोले- राजाके द्वारा ऐसा कहे जानेपर दीनवत्सल भृगुने उससे कहा- ॥ ३८१/२ ॥ भृगुजी बोले - हे राजन् ! मेरे वाक्योंपर संशय करनेके कारण तुम्हें ऐसा अनुभव हुआ है। मैं इसका प्रतिकार बताता हूँ, तुम क्षणभरमें स्वस्थ हो जाओगे। मेरे हुंकारमात्रसे ये पक्षी चले जायँगे ॥ ३९-४०॥ सूतजी बोले - तब द्विज [श्रेष्ठ] भृगुके हुंकारको सुनकर सभी पक्षी अन्तर्हित (लुप्त) हो गये तथा पत्नी और मन्त्रियोंसहित राजा भी प्रसन्न हो गये ॥ ४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नानापक्षिनिवारण' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८॥ नौवाँ अध्याय भृगुमुनिका राजा सोमकान्तको गणेशपुराणके श्रवणका उपदेश देना सूतजी बोले- तदनन्तर भृगुमुनिने क्षणभर ध्यान करके उस [राजा सोमकान्त]-के पूर्वकर्मजनित दुःखोंको देखकर अत्यन्त विह्वल होकर उस राजासे कहा- ॥ १ ॥ कहाँ तुम्हारे पापोंका समूह और कहाँ मेरे द्वारा कहा गया उपाय ! तथापि मैं तुमसे एक उपाय कहता हूँ, जो पापोंका नाश करनेवाला है ॥ २ ॥ यदि तुम शीघ्र ही 'गणेशपुराण' का श्रवण करोगे तो दुःखरूपी समुद्रसे मुक्त हो जाओगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ तब उस राजासे इस प्रकार कहकर [मुनिने] गणेशजीके एक सौ आठ श्रेष्ठ नामोंका जपकर [उससे] जलको अभिमन्त्रित करके राजाको अभिषिक्त किया ॥ ४ ॥ उस जलके सिंचनमात्रसे [राजाके] नासारन्ध्र (नाकके छिद्र)-से छोटा-सा एक काले रंगवाला पुरुष निकलकर भूमिपर गिर पड़ा और उसी क्षण वह सात ताड़ वृक्षोंके बराबर ऊँचा हो गया। वह अपना भयंकर मुख फैलाये हुए था, उसकी जिह्वा अत्यन्त भयंकर थी। उसकी आँखें रक्तवर्णकी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं।