भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 656 में से

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पृष्ठ 63

उ०ख०-अ०१०] * गणेशपूजन न करनेसे व्यासजीका विघ्नोंसे अभिभूत होना * ६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जिसके स्वरूपको ब्रह्मा, ईशान (शिव) आदि | तो विघ्न-समूह सुखपूर्वक कहाँ विचरण कर पाते! और देवता भी नहीं जानते। जिसकी महिमाका वर्णन करनेमें | अनेक प्रकारके विरहजनित दुःखोंका अनुभव कौन विशिष्ट विद्वान् होते हुए भी सहस्र मुखवाले शेषजी भी | करता ? ॥ ३५१/२ ॥ सक्षम नहीं हैं; हे राजश्रेष्ठ ! उनके सुन्दर पुण्यप्रद पुराण | पूर्वकालमें भूत-भविष्य और वर्तमानको जाननेवाले (गणेशपुराण)-को अतीन्द्रिय ज्ञानसम्पन्न और अमित | व्यासजीने वेदोंके अर्थज्ञानसे रहित, वेदाध्ययनसे वर्जित, तेजस्वी वेदव्यासजीसे मैंने पूर्वकालमें जैसा सुना था, | वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचरणोंसे शून्य, जातियोंका [वैसा ही तुम्हें सुनाऊँगा।] यज्ञ-विध्वंससे दुखी दक्षको | संकर करनेवाले, कुटिल और पापपूर्ण आचरण करनेवाले मुद्गलजीने इसे सुनाया था ॥ ३१-३३॥ | लोग कलियुगमें होंगे-ऐसा विचारकर इस पुराणकी हे राजन्! सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाले गणेशजीमें | रचना की। धर्मकी रक्षाके लिये उन्होंने ही अठारह जिसकी दृढ़ भक्ति हो, उसे ही इस पुराणको नित्य सुनाना | पुराणोंकी भी रचना की ॥ ३६-३८ ॥ चाहिये, उससे इतर व्यक्तिको अर्थात् भक्तिहीनको इसे | उन्होंने उतने ही उपपुराणोंकी भी रचना की, नहीं सुनाना चाहिये ॥ ३४॥ | जिससे लोगोंको वेदार्थका बोध हुआ। उससे ही उन यदि सभी लोग विघ्नराज गणेशजीकी सेवा करते, | लोगोंको गणेशजीके तात्त्विक स्वरूपका बोध हुआ ॥ ३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'राजोपदेशकथन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥ दसवाँ अध्याय गणेशपूजन न करनेसे व्यासजीका विघ्नोंसे अभिभूत होना और ब्रह्माजीका उन्हें गणेशाराधनका उपदेश देना भृगुजी बोले-[भगवान्] नारायणके अंशसे | वास्तविक अर्थका स्मरण नहीं होता था ॥ ३-५ ॥ उत्पन्न, पराशरके पुत्र महामुनि वेदव्यासजी भूत और | जैसे औषधियों और मन्त्रोंके प्रयोगसे किसी श्रेष्ठ भविष्यके ज्ञाता तथा वेद एवं शास्त्रके अर्थको तत्त्वपूर्वक | नागको सामर्थ्यहीन कर दिया गया हो, वैसे ही वे जाननेवाले थे। उन्होंने चार भागोंमें वेदका विभाजन | स्वयंको स्तम्भित-सा अनुभव कर रहे थे और वे इसके करके उसके ज्ञान एवं प्रयोजनकी सिद्धिके लिये विद्याके | हेतूतक भी नहीं पहुँच पा रहे थे अर्थात् इस बुद्धि- मदसे गर्वयुक्त होकर पुराणोंकी रचना करना आरम्भ | स्तम्भनका कारण भी नहीं समझ पा रहे थे ॥ ६ ॥ किया ॥ १-२ ॥ | तब आश्चर्याभिभूत और लज्जित अन्तःकरणवाले परंतु ग्रन्थरम्भके पूर्व उन्होंने उसकी निर्विघ्न | वे पराशरपुत्र व्यासमुनि ब्रह्माजीसे इसका कारण पूछनेके समाप्तिके लिये साधनरूपमें न तो मंगलाचरण किया, न | लिये आदरपूर्वक सत्यलोकको गये ॥ ७ ॥ गणेशजीको नमस्कार किया और न ही उनकी कहीं | वहाँ देवगणों, देवर्षियों और कमलके आसनपर स्तुति ही की। तब तो नित्य, नैमित्तिक, काम्य, श्रौत और | विराजमान ब्रह्माजीको नमस्कारकर वे ब्रह्माजीद्वारा सत्कृत स्मार्त कर्मोंके व्याख्याता; वेद-शास्त्रोंके सर्वज्ञ विद्वान् | होकर उनके द्वारा दिये गये मंगलमय आसनपर आसीन होते हुए भी उन वेदव्यासजीको लौकिक तथा अलौकिक- | हुए ॥ ८ ॥ दोनों प्रकारके विषयोंमें भ्रान्ति ही बनी रहने लगी। | [तत्पश्चात्] पराशरपुत्र महामुनि वेदव्यासजीने विघ्नोंसे अभिभूत होनेके कारण उन्हें उन विषयोंके | आदरपूर्वक झुककर अपने हाथोंसे उनके युगल चरणोंका

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