श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- स्पर्श किया और ब्रह्माजीसे पूछना प्रारम्भ किया - ॥ ९ ॥ व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! दैववश मेरे साथ यह कैसी अद्भुत बाधा उपस्थित हो रही है, कलियुगमें सभी लोग ज्ञान एवं आचारसे रहित, कर्मजड़, स्तब्ध, नास्तिक और वेदनिन्दक होनेवाले हैं - ऐसा देखकर 'मेरे वाक्योंसे लोग विधि और निषेधका ज्ञान प्राप्त करेंगे'; यह सोचकर मैंने वेदोंके अर्थभूत पुराणोंकी रचना करनेमें अपनी बुद्धिको नियोजित किया, परंतु मेरा ही ज्ञान चला गया और मैं मदोन्मत्तकी भाँति भ्रान्त हो गया। मैं इसका कोई कारण नहीं देखता हूँ, मुझमें कोई स्फूर्ति भी नहीं हो रही है। उस कारणको जानने और पुनः स्फूर्तिप्राप्तिका उपाय पूछनेके लिये मैं आपके पास आया हूँ। हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! मैं आपके अतिरिक्त किसकी शरणमें जाऊँ ? आप सर्वज्ञ हैं, सर्वकर्ता हैं; मेरी भ्रान्तिका निवारण करें। हे ब्रह्मन् ! मैं नित्य आचारपरायण, सर्वज्ञ और नारायणस्वरूप होते हुए भी भ्रान्त हूँ; मेरी इस भ्रान्तिका कारण बताइये ॥ १०-१५ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार उनके वचनको सुनकर और विचारकर कमलासन ब्रह्माजी कुछ विस्मित-से हो गये और विनम्रतापूर्वक झुके हुए उन मुनिसे हँसते हुए बोले- ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोले-आश्चर्यकी बात है! फिर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि कर्मोंकी गति बड़ी ही सूक्ष्म होती है, अतः सत्कर्म या दुष्कर्मको भलीभाँति विचारकर करना चाहिये ॥ १७ ॥ यदि इसके विपरीत कोई व्यक्ति कार्य करता है, तो उसका फल भी विपरीत ही होगा। कार्य चाहे बड़े हों या छोटे; बुद्धिमान् मनुष्यको उन्हें बुद्धिद्वारा, युक्तिपूर्वक और विनम्रतासे सम्पन्न करना चाहिये न कि गर्व और मत्सर (ईर्ष्या)-पूर्वक। पक्षिराज गरुड़को गर्वके कारण ही [भगवान् विष्णुका] वाहनत्व प्राप्त हुआ ॥ १८-१९ ॥ ईर्ष्याके कारण ही अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधनने सम्पूर्ण कुलको नष्ट कर दिया। पूर्वकालमें परशुरामने भी ईर्ष्याके ही कारण क्षत्रियोंका संहार किया था ॥ २० ॥ जो आदि-अन्तसे रहित, जगत्कर्ता, जगन्मय, जगत्को धारण करनेवाले, जगत्का संहार करनेवाले, सत्-असत्रूप, अव्यक्त और अविनाशी देव हैं। जो सदा कर्तुं, अकर्तुं तथा अन्यथाकर्तुंमें समर्थ हैं; इन्द्रादि प्रमुख देवतागण, मैं, विष्णु और रुद्र, सूर्य, अग्नि, वरुण आदि जिनकी आज्ञाके वशवर्ती हैं; जो भक्तोंके विघ्नोंका हरण करनेवाले और उनसे अतिरिक्त (अभक्तों)-के कार्योंमें विघ्न करनेवाले हैं; उन गणेशजीके प्रति तुमने अपने विद्याबलका आश्रय लेकर गर्व किया, सर्वज्ञताके अभिमानसे तुमने उनका पूजन नहीं किया। हे निष्पाप व्यासजी ! तुमने [पुराणप्रणयनके] आरम्भमें गणेशजीका स्मरण अथवा न्यास नहीं किया, इसीलिये तुम्हें भ्रान्ति हो रही है ॥ २१-२५ ॥ श्रौत, स्मार्त, लौकिक आदि सभी कार्योंके आरम्भमें, गृह आदिमें प्रवेश करते समय या यात्रादिके लिये निर्गमन करते समय स्मरण न करनेपर जो विघ्न करते हैं; वेद-शास्त्रके तत्त्वदर्शी विद्वान् जिन्हें परमानन्द कहते हैं, परम गति कहते हैं, परम ब्रह्म कहते हैं; हे वत्स! उन गजानन गणेशजीकी शरणमें आदरपूर्वक जाओ ॥ २६-२७॥ वे भगवान् प्रसन्न होकर तुम्हारी इच्छाको पूरा करेंगे, नहीं तो हजारों वर्षोंमें भी तुम अपनी इच्छाको पूरा नहीं कर पाओगे ॥ २८ ॥ व्यासजी बोले- हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! ये गणेश कौन हैं? इनका रूप कैसा है? उन्हें कैसे जाना जाता है? पूर्वकालमें ये किसपर प्रसन्न हुए थे? ॥ २९ ॥ इनके कितने अवतार हुए हैं और उन्होंने क्या-क्या कार्य किये हैं ? पूर्वकालमें किसने इनका पूजन किया था और किस कालमें इनका स्मरण किया गया था ? ॥ ३० ॥ हे करुणानिधि प्रपितामह ! मुझ विक्षिप्त चित्तवाले प्रश्नकर्ताको यह सब सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ३१ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'व्यासप्रश्नवर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥