भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 656 में से

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पृष्ठ 65

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उ०ख०-अ०११ ] * ब्रह्माजीका व्यासजीको गणेशजीके मन्त्रके अनुष्ठानकी विधि बताना * ६३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ग्यारहवाँ अध्याय ब्रह्माजीका व्यासजीको गणेशजीके मन्त्रके अनुष्ठानकी विधि बताना भृगुजी बोले— [हे राजन्!] चतुर्मुख ब्रह्माजी इसके अनन्तर [व्यासजीद्वारा] किये गये प्रश्नका समाधान करनेकी इच्छासे बोले— [हे व्यासजी!] मैं गणेशजीके मन्त्रोंका अनेक प्रकारसे विचारकर तुमसे सब कुछ क्रमसे बता रहा हूँ॥ १॥ ब्रह्माजी बोले— हे मुने! शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाले महात्मा गणेशजीके अनन्त मन्त्र हैं, मैं उनकी उपासना-विधि तुमसे कहता हूँ॥ २॥ हे मुने! आगमशास्त्रमें गणेशजीके सात करोड़ महामन्त्र विद्यमान हैं, उनका रहस्य तो शिवजी ही जानते हैं और कुछ-कुछ मैं जानता हूँ॥ ३ ॥ उनमें-से षडक्षर¹ और एकाक्षर²—ये दोनों मन्त्र श्रेष्ठ हैं, जिनके स्मरणमात्रसे सभी सिद्धियाँ करगत हो जाती हैं॥४॥ हे मुने! जिन [गणेशजी]-की उपासनासे [मनुष्य] जीवन्मुक्त, धन्य, पूज्य और देवताओंसे भी नमस्कार करनेयोग्य हो जाते हैं। जिन [गणेशजी]-की उपासनासे सिद्धियाँ उन [उपासकों]-का दास्य करती हैं, जो [मनुष्य] गणेशजीकी श्रद्धाभावसे समन्वित हो भक्ति करते हैं, वे लोग सर्वज्ञ, अनेक प्रकारके रूप धारण कर सकनेवाले और इच्छानुसार विहार करनेवाले हो जाते हैं। जिन लोगोंमें लेशमात्र भी [गणेशजीकी] भक्ति नहीं है, उनका तो जन्म ही निरर्थक है॥ ५-७॥ जो लोग गणेशजीकी भक्तिसे विमुख हैं, उनका तो मुख भी नहीं देखना चाहिये। उनके दर्शनमात्रसे पग- पगपर विघ्न उपस्थित होते हैं॥ ८ ॥ उनके उपासकके दर्शनसे विघ्न शान्त हो जाते हैं, स्थावर-जंगम-सभी प्राणी उसे नमस्कार करते हैं॥ ९॥ जिनपर गजाननदेव सन्तुष्ट होते हैं, वे अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करते हैं और जिनपर वे गजवदन रुष्ट होते हैं, वे केवल दुःखोंके ही भागी होते हैं॥ १०॥ अतः मैं तुम्हें [गणेशजीका] शुभ एकाक्षर मन्त्र बताता हूँ, उसके अनुष्ठानमात्रसे अपना वांछित सम्यक् रूपसे प्राप्त करोगे ॥ ११ ॥ भगवान् शंकरने जिस प्रकार मुझसे कहा था, उस अनुष्ठानको मैं [वैसे ही] तुमसे कहता हूँ। [सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता] मनुष्य स्नान करके पवित्र होकर धुले हुए वस्त्र धारण करे ॥ १२ ॥ [तदनन्तर] बुद्धिमान् साधक अपने कुशके आसनपर मृगचर्म बिछाकर और उसपर वस्त्र बिछाकर, उसके ऊपर स्थित हो भूतशुद्धि और प्राणप्रतिष्ठा करे ॥ १३॥ उसके बाद सावधानीपूर्वक अन्तर्मातृकान्यास और बहिर्मातृकान्यास करके हृदयमें मूलमन्त्रका जप करते हुए प्राणायाम करे, तदुपरान्त आगममें कहे गये मन्त्रोंसे यथाविधि सन्ध्या-उपासना करे और स्थिर मनसे आपाद- मस्तक देवता [गणेशजी]-का ध्यान करके समाहित चित्तसे मानसिक उपचारोंसे उनका पूजन करे। तदनन्तर पुरश्चरण पद्धतिसे यथाशक्ति उनके मन्त्रका जप करे॥ १४-१६॥ जबतक गजानन गणेशजी वर देनेके लिये अनुकूल नहीं हो जाते और अपने स्वरूपका दर्शन नहीं कराते, तबतक जप-परायण ही रहे ॥ १७ ॥ भृगुजी बोले— मुनि व्याससे ऐसा कहकर ब्रह्माजीने शुभ दिन देखकर भ्रमितचित्त मुनिश्रेष्ठ (व्यास)-को गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया॥ १८१/२॥ ब्रह्माजी बोले— जब तुम करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान उन भगवान् गणेशजीको वर देनेके लिये आया हुआ देखो तो अपने चित्तको स्थिर करके कहना—हे गजानन (गणेशजी) ! आप मेरे हृदयमें स्थिर होकर नित्य निवास करें ॥ १९-२० ॥ तब वे तुमसे 'वर माँगो'—ऐसा कहेंगे और तुमको वरदान देंगे, इसमें सन्देह नहीं है। उन देव गणेशके हृदयमें स्थित हो जानेपर तुम दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति १. वक्रतुण्डाय हुं। २. गं।