श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करोगे ॥ २१ ॥ | इन जैसोंको इस मन्त्रराजका उपदेश नहीं करना; परंतु हे वत्स ! तब तुम भूत, भविष्य और वर्तमानका | शरणागत, दृढ़ भक्तिवाले, श्रद्धावान्, विनयशील, वेदवादी, अशेष (सम्पूर्ण) ज्ञान प्राप्त कर लोगे और इस दृढ़ | [मन्त्रप्राप्तिकी] आकांक्षावाले, दयालु और शास्त्रज्ञके भ्रान्तिको दूरकर अनेक ग्रन्थोंकी रचना करोगे ॥ २२ ॥ | समक्ष इसे प्रकट करना। मन्त्रराजका वक्ता यदि इसे व्यासजी बोले—हे पिता ! आपके द्वारा किये गये | अनधिकारीके सम्मुख प्रकाशित करता है तो वह [अपने उपदेशसे मेरी भ्रान्ति चली गयी। हे पितामह ! [अब] | साथ-साथ] अपनी दस पहलेकी और दस बादकी मैं आपकी आज्ञाके अनुसार अनुष्ठान करूँगा ॥ २३ ॥ | पीढ़ियोंको भी नरककी प्राप्ति कराता हैं ॥ २५-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे विभो ! अब तुम गजानन | जो इसका भक्तिपूर्वक जप करता है, वह इच्छित गणेशजीका स्मरण करके व्यग्रताके कारणोंसे रहित, | फलकी प्राप्ति करता है और पुत्र-पौत्र तथा धन-धान्यसे एकान्त निर्जन देशमें अनुष्ठान करो ॥ २४ ॥ | सम्पन्न हो जाता है। वह एकदन्त (गणेशजी)-के प्रभावसे नास्तिक (अनीश्वरवादी), [ईश्वर और वेदकी] | निर्मल ज्ञानकी प्राप्ति करके इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंको निन्दा करनेवाले, निर्दयी, अनाचारी, दुष्ट और मूर्ख— | भोगकर अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति करता है ॥ २८-२९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रकथन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥ ❧ बारहवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भगवान् गणेशके दर्शन सूतजी बोले—[हे शौनकजी !] ब्रह्माजीके मुखसे | इस उपासनामार्गका मैं तुम्हें भलीभाँति बोध कराता निकले हुए इन वचनोंको सुनकर महान् हर्षसे युक्त मुनि | हूँ; क्योंकि स्नेहपात्र और अत्यन्त प्रज्ञावान् शिष्यसे कुछ व्यासजीने उनसे पुनः पूछा ॥ १ ॥ | भी गोप्य नहीं रखना चाहिये ॥ ६ ॥ व्यासजीने कहा—[हे ब्रह्मन् !] आपकी अमृतमयी | मैंने तुमसे कहा था कि ये गणनायक गणेशजी वाणीका पान करके मैंने बोध प्राप्त कर लिया है अर्थात् | ओंकारस्वरूप हैं, इसीलिये इन विनायककी सम्पूर्ण मेरा भ्रम दूर हो गया है। हे पिता! अब मैं इस | कार्योंमें [प्रथम] पूजा होती है ॥ ७ ॥ मन्त्रराजको सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥ | निर्विघ्नताकी कामना करनेवालोंको इनका पूजन इस मन्त्रका किसने जप किया था और उसे | अवश्य करना चाहिये, अन्यथा वे कार्यमें विघ्न कर देते गजानन गणेशजीसे कैसे सिद्धि प्राप्त हुई थी? मेरे इस | हैं। समस्त आगम-ग्रन्थोंमें इनके ओंकारबीजसे युक्त संशयका उन्मूलन कीजिये, आपके अतिरिक्त मेरा कोई | और ओंकार-पल्लवसे समन्वित मन्त्र कहे गये हैं। इनसे गुरु नहीं है ॥ ३ ॥ | (ओंकारबीजसे) अतिरिक्त जो मन्त्र हैं, वे निष्फल होते भृगुजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! मुनिके द्वारा इस | हैं। इस प्रकार सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्तके रूपमें सब प्रकार पूछे जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने कृपापूर्वक | कुछ गणनायक गणेशजी ही हैं ॥ ८-९ ॥ उन विनीत व्यासजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥ | इस प्रकार सभी देवता, सिद्ध, मुनि, राक्षस, किन्नर, ब्रह्माजी बोले—हे ब्रह्मन्! तुम्हें साधुवाद है, | गन्धर्व, चारण, नाग, यक्ष, गुह्यक (यक्ष-जैसी अर्धदेवोंकी साधुवाद है, जो कि तुमने इस समय यह प्रश्न पूछा है। | श्रेणी) और मनुष्य तथा सम्पूर्ण जड़-चेतन प्राणी तुम पुण्यवान् हो; क्योंकि पुण्यहीन मनुष्योंमें कथा- | गणेशजीके उपासक हैं; अतएव गणेशजीसे श्रेष्ठ कोई श्रवणके प्रति प्रेम ही नहीं होता ॥ ५ ॥ | नहीं है ॥ १० १/२ ॥