भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 656 में से

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पृष्ठ 67

उ०ख०-अ०१२] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भगवान् गणेशके दर्शन * ६५ हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं एक प्राचीन कथा कहूँगा, जिसमें बताया गया है कि कैसे इस मन्त्रराजके जपसे गजानन गणेशजी प्रसन्न हुए॥ १९१/२ ॥ किसी समय दैवयोगसे प्रलयकाल उपस्थित हो गया। उस समय वायुवेगसे पर्वत छिन्न-भिन्न होकर चारों दिशाओंमें गिर पड़े। बारहों सूर्य महान् जलराशिका शोषण करके तपने लगे। ज्वालामालाओंसे युक्त महान् अग्नि सम्पूर्ण सृष्टिको जलाने लगी। [तत्पश्चात्] महामेघ संवर्तक चारों ओर वर्षा करने लगे। उनकी वह वर्षा हाथीकी सूँडसे गिरती हुई जलधाराके समान थी। समुद्र और नदियाँ भी अपनी सीमाका उल्लंघन कर रहे थे। इस प्रकार ब्रह्मासे लेकर स्थावर आदि सभी [पदार्थ] विनष्ट हो गये ॥ १२-१५१/२ ॥ इस प्रकार प्रकृतिकी विकाररूपा मायामय सृष्टिके नष्ट हो जानेपर भगवान् गजानन गणेशजी अणुसे भी अणुतर (सूक्ष्म) रूप धारण करके कहीं स्थित हो गये। तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर [सब ओर] व्याप्त गहन अन्धकारमेंसे उस नादयुक्त एकाक्षर ब्रह्म (गं)- का आविर्भाव हुआ। अपने आनन्दमय स्वरूपमें स्थित वही वैकारिक ब्रह्म अर्थात् नादविशिष्ट अक्षरब्रह्म पुनः मायाशक्तिको स्वीकार करके गजानन स्वरूपमें प्रकट हो गया। तदनन्तर उन (गजानन)-से ही सत्त्व, रज और तमोगुण उत्पन्न हुए ॥ १६-१९॥ तत्पश्चात् उनसे ही विष्णु, ब्रह्मा और शिव—ये तीनों भी उत्पन्न हुए और उन (गणेश)-की मायासे ही स्थावर-जंगमात्मक त्रैलोक्यकी रचना हुई ॥ २० ॥ तदुपरान्त उनकी मायासे भ्रान्त वे तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) अपने उस जन्म देनेवाले (जनक)-को देखने और उससे यह पूछनेके लिये कि हमें 'कौन-सा कार्य करना चाहिये', उत्सुकतापूर्वक भटकने लगे। हे मुने! इस जिज्ञासासे उन्होंने पहले ऊपरकी ओर जाकर इक्कीस स्वर्ग (आदि)-लोकोंको देखा और तत्पश्चात् अन्तरिक्षमें तिरछे जाकर फिर पातालमें गये। तब भी परमात्मा (गणेशजी)-का दर्शन न होनेपर उन्होंने अत्यन्त घोर तपस्या की ॥ २१-२३ ॥ वे निराहार रहते हुए दिव्य सहस्र वर्षोंतक जप- परायण रहे। [उस श्रमसे] थककर और उदास होकर वे पुनः पृथ्वीपर आ गये ॥ २४ ॥ पृथ्वीपर [उन परमात्माकी] खोज करते हुए वे [परमात्माके] दर्शनार्थ वनों, उपवनों, सरिताओं, सागरों, पर्वतों, शिखरों और गृहोंमें गये ॥ २५ ॥ तदनन्तर उन्होंने अपने समक्ष एक महान् जलाशयको देखा, जो अनेक प्रकारके जलचर प्राणियों, वृक्षों और अनेक प्रकारके पक्षियोंसे समन्वित था ॥ २६ ॥ [वह सरोवर] कमलोंसे आच्छादित तथा कमलनाल खाते हुए बगुलों, चक्रवाकों, हंसों और बत्तखोंके कलरवसे निनादित था ॥ २७ ॥ हे मुने! अनेक प्रकारकी तरंगोंसे युक्त, मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुस्तर, मछलियों और मगरमच्छोंसे भरे हुए उस महान् जलाशयमें स्नान करके और उसके किनारे विश्राम करके जब वे सरोवरको पारकर आगे बढ़े तो उन्होंने प्रलयकालीन अग्निके सदृश, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, अत्यन्त कठिनाईसे देखे जा सकनेवाले तेजःपुंजको अपने समक्ष देखा। उस तेजके प्रभावसे उन्हें दिखायी देना बन्द हो गया और वे अत्यधिक चिन्तामें पड़ गये ॥ २८-३० ॥ तब वे आकाशमार्गसे चलकर उस तेजःपुंजके मध्यसे बाहर निकल गये। उस समय वे भूख-प्यास और परिश्रमसे थके होनेके कारण बार-बार [गहरी] साँस ले रहे थे। [उस समय] वे अपनी ही निन्दा कर रहे थे और अपनेको ही कोस रहे थे तथा भयके कारण व्याकुल थे। तब अत्यन्त करुणामय, लोकाध्यक्ष, अखिलार्थविद् गणेशजीने उन्हें मन और नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले अपने रूपका दर्शन कराया। उनके पैरकी अँगुलियोंके नखोंकी शोभाने लाल कमलके केसरकी शोभाको जीत लिया था। उनके रक्तवर्णके वस्त्रोंकी प्रभाने सन्ध्याकालीन सूर्यमण्डलकी आभाको जीत लिया था। उनके कटिप्रदेशमें बँधी करधनीकी प्रभाने सुमेरुपर्वतके शिखरोंकी प्रभाको फीका कर दिया था ॥ ३१-३४ ॥ उनके चारों सुन्दर हाथोंमें खड्ग, खेट, धनुष और शक्ति सुशोभित हो रहे थे। उनकी नासिका अत्यन्त

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