श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सुन्दर थी और उनके मुखकमलकी कान्तिने पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिको जीत लिया था। कमलसदृश उनके सुन्दर नेत्र दिन-रात प्रभासे युक्त रहते थे। अनेक सूर्योंकी शोभाको जीत लेनेवाले मुकुटसे उनका मस्तक देदीप्यमान था॥ ३५-३६ ॥ प्रकार] उनके एक दन्तकी शोभा भगवान् वराहकी दंष्ट्राकी शोभाको जीत रही थी॥ ३७॥ हे मुने ! उनकी सुन्दर सूँड़ ऐरावतादि दिग्गजोंको भी भयभीत कर रही थी। उन देव गणेशको सहसा देखते ही उन [ब्रह्मादि] देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर उनके कमलवत् चरणोंका स्पर्श करके उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥ उनके उत्तरीयकी कान्ति अनेक नक्षत्रोंसे समन्वित गगनमण्डलकी शोभाको भी जीत ले रही थी। [इसी ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'गजाननदर्शन' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भगवान् गणेशकी स्तुति करना तथा गणेशजीका अपने उदरमें स्थित असंख्य ब्रह्माण्डोंका उन्हें दर्शन कराना
व्यासजीने कहा- [हे ब्रह्मन्!] पाँच मुखोंवाले शिव, चार मुखोंवाले ब्रह्मा और सहस्र मस्तकोंवाले विष्णु*ने उन वरदायक देव गजानन गणेशजीका स्तवन कैसे किया था?॥ १॥ ब्रह्माजी बोले- कृपा करनेके लिये उन्मुख विघ्नराज गणेशजीकी कृपादृष्टि पड़नेसे बुद्धिकी निर्मलताको प्राप्तकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवने उनकी स्तुति की ॥ २ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर बोले- जो अजन्मा, विकल्परहित, निराकार, अद्वितीय, निरालम्ब, अद्वैत, आनन्दसे पूर्ण, सर्वोत्कृष्ट, निर्गुण, निर्विशेष, निरीह एवं परब्रह्मस्वरूप हैं; उन गणेशका हम भजन करें ॥ ३ ॥ जो तीनों गुणोंसे परे हैं, आदि (सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाले) हैं, जो चिदानन्दस्वरूप, चिदाभासक, सर्वव्यापी, ज्ञानगम्य, मुनियोंके ध्येय, आकाशस्वरूप एवं परमेश्वर हैं; उन परब्रह्मरूप गणेशका हम भजन करें ॥ ४ ॥ जो जगत्के कारण हैं, जिनका स्वरूप कारणज्ञानसे परे है, जो देवताओं, सुखों और युगोंके आदिकारण हैं, जो गणोंके स्वामी, विश्वव्यापी, जगद्वन्द्य तथा देवेश्वर हैं; उन परब्रह्मस्वरूप गणेशका हम भजन करें ॥ ५ ॥ जो रजोगुणके योगसे ब्रह्माका रूप धारण करते हैं, वेदोंके ज्ञाता हैं और सदा सृष्टिकार्यमें संलग्न रहते हैं, जिनका पारमार्थिक रूप मनसे अचिन्त्य है, जो जगत्की उत्पत्तिके हेतुभूत तथा समस्त विद्याओंके निधान हैं, उन 'ब्रह्मरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ६ ॥ जो सदा सत्त्वगुणसे युक्त हैं, आनन्दसे क्रीडा करते रहते हैं, देवशत्रुओंका नाश करते हैं और जगत्के रक्षण- कार्यमें संलग्न रहते हैं, जो अनेक अवतार लेते रहते हैं तथा अपने भक्तोंके अज्ञानका हरण करनेवाले हैं; उन 'विष्णुरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ७ ॥ जो तमोगुणके सम्पर्कसे रुद्ररूप धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो जगत्के हर्ता, तारक और ज्ञानके हेतु हैं तथा अनेक आगमोक्त वचनोंद्वारा अपने भक्तजनोंको सदा तत्त्वज्ञानोपदेश देते रहते हैं, उन 'शिवरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ८ ॥ जो अन्धकारराशिके नाशक, भक्तजनोंके अज्ञानके निवारक, तीनों वेदोंके सारस्वरूप, साक्षात् परब्रह्म, मुनियोंको ज्ञान देनेवाले, विकारोंसे सदा दूर रहनेवाले हैं; उन 'सूर्यरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ९ ॥ जो अपने किरण-समूहसे औषधियोंको तृप्त एवं पुष्ट करते हैं, अमृतवर्षिणी कलाओंद्वारा देवसमुदायको तृप्त किया करते हैं, सूर्य-किरणोंसे उत्पन्न संतापको हर लेते हैं और द्विजों (ब्राह्मणों एवं नक्षत्रों)-के राजा हैं;
- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। (यजु० ३१।१)