श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 656 में से
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उ०ख०-अ०१३ ] * ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भगवान् गणेशकी स्तुति करना * ६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] उन 'चन्द्रस्वरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ १० ॥ जो प्रकाशस्वरूप, आकाश एवं वायुरूप, विकारों आदिके हेतुभूत, कला और कालरूप हैं, अनेक क्रियाओंकी अनेकानेक शक्तियाँ जिनकी स्वरूपभूता हैं; उन 'शक्तिरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ११ ॥ प्रधान, महत्तत्त्व, पृथ्वी, जल और दिशा-दिक्पाल आदि जिनके स्वरूप हैं; जो सत्-असत्रूप एवं जगत्के कारणरूप हैं; उन 'विश्वरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ १२ ॥ [हे गणनाथ!] जो आपके युगल चरणोंमें मन लगायेगा, वह विघ्नसमुहजनित पीड़ा नहीं प्राप्त कर सकता। शोभाशाली, विशाल सूर्यमण्डलके प्रकाशमें खड़ा हुआ मानव भला अन्धकारजनित क्लेश कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥ १३ ॥ हे विश्वम्भर ! हम अज्ञानके वशवर्ती होकर बहुत वर्षोंतक आपके चरणकमलोंको न प्राप्त कर सकनेके कारण सर्वथा भटकते रहे हैं। अब आपकी ही कृपासे आपके चरणोंकी शरणमें आ गये हैं। अतः हे आदिदेव! आप सदा हमारी रक्षा करें* ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे महामुने ! [त्रिदेवोंके द्वारा] इस प्रकार स्तुति किये जानेपर गणेशजी सन्तुष्ट हो गये और परम कृपायुक्त होकर उन्होंने उन (देवताओं)- से कहना प्रारम्भ किया— ॥ १५ ॥
[दायाँ स्तम्भ] भगवान् श्रीगणेशजीने कहा— [हे देवताओ!] जिसके लिये आप लोगोंने इतना क्लेश सहा है और जिसके लिये आप लोग यहाँ आये हैं, आप लोग उस वरको मुझसे माँगें; आप लोगोंकी इस स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ ॥ १६ ॥ आप सब उदार आत्मावालोंके द्वारा जो मेरी इस स्तोत्रद्वारा यह स्तुति की गयी, मेरी आज्ञासे यह स्तोत्र 'स्तोत्रराज' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ १७ ॥ जो बुद्धिमान् मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर भक्तियुक्त हो विशुद्ध भावसे सदा तीनों सन्ध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है; वह उत्तम पुत्र, लक्ष्मी तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है और अन्तकालमें परब्रह्मरूप हो जाता है ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले— उन गणेशजीके ऐसे वचनोंको सुनकर उन्हींकी इच्छासे रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणसे उत्पन्न वे [तीनों देवता— ब्रह्मा, विष्णु और शिव] प्रसन्नतापूर्वक उनसे बोले— ॥ १९ ॥ तीनों [त्रिदेवों]-ने कहा— सृष्टि और संहार करनेवाले हे देवाधिदेव ! यदि आप प्रसन्न हैं तो आपके चरणकमलोंमें हमारी अनन्य भक्ति हो ॥ २० ॥ [इसके अतिरिक्त] हमें क्या करना चाहिये, इस विषयमें भी आप हमें आज्ञा करें। हे गजानन! हमें यही वर अभीष्ट है ॥ २१ ॥ उनके ऐसे वचन सुनकर भगवान् गजाननने पुनः
[पाद-टिप्पणी / मूल संस्कृत श्लोक]
- अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं निरालम्बमद्वैतमानन्दपूर्णम् । परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ गुणातीतमाद्यं चिदानन्दरूपं चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम् । मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ जगत्कारणं कारणज्ञानहीनं सुरादिं सुखादिं युगादिं गणेशम् । जगद्व्यापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ रजोगुणतो ब्रह्मरूपं श्रुतिज्ञं सदा कार्यसक्तं हृदाचिन्त्यरूपम् । जगत्कारकं सर्वविद्यानिधानं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ सदा सत्त्वयोगं मुदा क्रीडमानं सुरारीन् हरन्तं जगत्पालयन्तम् । अनेकावतारं निजाज्ञानहारं सदा विष्णुरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ तमोगयोगिनं रुद्ररूपं त्रिनेत्रं जगद्धारकं तारकं ज्ञानहेतुम् । अनेकागमैः स्वं जनं बोधयन्तं सदा शर्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ तमस्तोमहादं जनाज्ञानहारं त्रयीवेदसारं परब्रह्मसारम् । मुनिज्ञानकारं विदूरे विकारं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ निजैरोषधीस्तर्पयन्तं करौधैः सुरौघान् कलाभिः सुधास्राविणीभिः । दिनेशांशुसन्तापहारं द्विजेशं शशाङ्कस्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ प्रकाशस्वरूपं नभोवायुरूपं विकारादिहेतुं कलाकालभूतम् । अनेकक्रियानेकशक्तिस्वरूपं सदा शक्तिरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ प्रधानस्वरूपं महत्तत्त्वरूपं धरावारिरूपं दिगीशादिरूपम् । असत्सत्स्वरूपं जगद्धेतुभूतं सदा विश्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ त्वदीये मनः स्थापयेदङ्घ्रियुग्मे जनो विघ्नसंधान्न पीडां लभेत । लसत्सूर्यबिम्बे विशाले स्थितोऽयं जनो ध्वान्तबाधां कथं वा लभेत ॥ वयं भ्रामिताः सर्वथाज्ञानयोगादलब्ध्वा तवाङ्घ्रीं बहून् वर्षपूगान् । इदानीमवाप्तास्तवैव प्रसादात् प्रपन्नान् सदा पाहि विश्वम्भराद्य ॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १३। ३-१४)