भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 656 में से

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पृष्ठ 70

६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कहा, 'हे महाभाग्यवान् [देवताओ]! आप लोगोंकी मुझमें दृढ़ भक्ति होगी, जिससे आप लोग महान् संकटोंको भी पार कर लेंगे। आप लोगोंकी प्रसिद्धिके लिये मैं आप लोगोंको पृथक्-पृथक् कार्य बतलाता हूँ॥ २२-२३ ॥ [गणेशजीने कहा-] हे ब्रह्मन्! आप रजोगुणसे समुद्भूत हुए हैं, अतः आप सृष्टिकर्ता होवें। हे विष्णो! आप सत्त्वगुणके आश्रय और व्यापक हैं, अतः आप [सृष्टिका] पालन करें। हे हर! आप तमोगुणसे समुद्भूत हैं, अतः आप संहारकार्य करें॥ २४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर गणेशजीने मुझ ब्रह्माको आदरपूर्वक वेद, शास्त्र, पुराण, सृष्टि करनेकी सामर्थ्य तथा अन्य विद्याएँ प्रदान कीं। उन भगवान् गणेशने विष्णुको योगबलसे स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेकी सामर्थ्य प्रदान की॥ २५-२६ ॥ [इसी प्रकार] भगवान् गणेशने शिवको एकाक्षर मन्त्र, षडक्षर मन्त्र तथा सभी आगम* और संहार करनेकी शक्ति प्रदान की॥ २७॥ तब मैंने उन त्रैलोक्यके स्वामी, जगद्गुरु, वरदाता भगवान् गजानन (गणेशजी)-से दीन भावसे हाथ जोड़कर कहा- ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे प्रभो!] जिसने शब्दशक्तिको ग्रहण न किया हो अर्थात् जिसे शब्दशक्तिका ज्ञान न हो, वह कथनीय-अकथनीय-कुछ भी नहीं कह सकता; उसी प्रकार नानाविध (अनेक प्रकारकी) सृष्टिको कभी- कहीं देखा न हो, ऐसा मैं आप विभुकी आज्ञाका पालन करनेमें कैसे उत्साहित हो सकता हूँ अथवा आपकी आज्ञाका उल्लंघन भी कैसे कर सकता हूँ? [इस प्रकार हे प्रभो!] मेरे लिये एक ओर कूप और दूसरी ओर बावलीकी स्थिति कैसे हो गयी है? ॥ २९-३० ॥ तब भगवान् गजाननने उस प्रकारसे व्याकुल वेद- शास्त्रज्ञ ब्रह्माजीको दिव्य नेत्र प्रदान करके कहा- ॥ ३१ ॥ गजानन (गणेशजी)-ने कहा-हे कमलोद्भव ब्रह्माजी! मेरे शरीरके बाहर और अन्दर असंख्य ब्रह्माण्डोंको भ्रमण करते हुए तुम आज देखो ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर भगवान् गजाननके द्वारा अपनी श्वासवायुके द्वारा अपने उदरमें ले जाये गये मुझ विधाताने भी अनेक ब्रह्माण्डोंको वैसे ही देखा, जैसे गूलरके वृक्षमें लगे फलोंमें मशकसदृश कीट हों। तब मैंने अपने परम तेजसे उनमेंसे एकका भेदन किया और उसमें अन्तःस्थित सम्पूर्ण सृष्टिका [आश्चर्यपूर्वक] पुनः-पुनः अवलोकन किया। वहाँ मैंने दूसरे ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति, शिव, सूर्य, वायुदेव, वनों, सरिताओं, जलके स्वामी वरुण, समुद्रों, यक्षों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सर्पों, ऋषियों, गुह्यकों, साध्यों, मनुष्यों, पर्वतों, वृक्षों, उद्भिज्ज (अंकुरके रूपमें निकलनेवाले पौधे)-जरायुज (गर्भशयकी झिल्लीमें लिपटकर जन्म लेनेवाले)-स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले)-अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले) प्राणियों, पृथ्वी, सप्त पातालों, अन्य इक्कीस अव्यय लोकों, भावाभाव और स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्वको देखा ॥ ३३-३८ ॥ [इसी प्रकार] जिस-जिस ब्रह्माण्डका मैंने भेदन किया, उस-उसमें मैंने सब कुछ उसी प्रकार देखा। यह देखकर मैं पहलेकी ही भाँति भ्रमित हो गया; क्योंकि उन ब्रह्माण्डोंका अन्त मुझे कहीं नहीं मिल पाया ॥ ३९ ॥ हे ब्रह्मन्! [उस समय आश्चर्यचकित होनेके कारण] मैं न स्थिर रहनेमें सक्षम था, न ही कहीं जानेमें; तब मैंने पद्मासनमें स्थित होकर भगवान् गजाननका स्तवन किया ॥ ४० ॥ ब्रह्माजी बोले- जिनके श्रीविग्रहमें स्थित ब्रह्माण्डोंकी गणना करना सम्भव नहीं है, ऐसे देवाधिदेव भगवान् गणेशकी मैं वन्दना करता हूँ; भला, आकाशस्थित नक्षत्रों, सागरस्थित जलचरों और उसके किनारेके बालुका- कणोंकी गणना करनेवाला कौन हो सकता है! ॥ ४१ ॥ हे देवराजवन्दित [गणेशजी]! आपके चरणकमलोंका दर्शनकर जो मैं भ्रममें पड़ गया था, उसके लिये मुझे लज्जा नहीं है; क्योंकि आप-जैसे ज्ञाननिधिके प्रसन्न हो जानेपर मोक्ष भी तुच्छ प्रतीत होता है, फिर अन्यकी तो

  • आगतं शिववक्त्रेभ्यो गतं च गिरजाश्रुतौ। मतं श्रीवासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते ॥