श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कहा, 'हे महाभाग्यवान् [देवताओ]! आप लोगोंकी मुझमें दृढ़ भक्ति होगी, जिससे आप लोग महान् संकटोंको भी पार कर लेंगे। आप लोगोंकी प्रसिद्धिके लिये मैं आप लोगोंको पृथक्-पृथक् कार्य बतलाता हूँ॥ २२-२३ ॥ [गणेशजीने कहा-] हे ब्रह्मन्! आप रजोगुणसे समुद्भूत हुए हैं, अतः आप सृष्टिकर्ता होवें। हे विष्णो! आप सत्त्वगुणके आश्रय और व्यापक हैं, अतः आप [सृष्टिका] पालन करें। हे हर! आप तमोगुणसे समुद्भूत हैं, अतः आप संहारकार्य करें॥ २४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर गणेशजीने मुझ ब्रह्माको आदरपूर्वक वेद, शास्त्र, पुराण, सृष्टि करनेकी सामर्थ्य तथा अन्य विद्याएँ प्रदान कीं। उन भगवान् गणेशने विष्णुको योगबलसे स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेकी सामर्थ्य प्रदान की॥ २५-२६ ॥ [इसी प्रकार] भगवान् गणेशने शिवको एकाक्षर मन्त्र, षडक्षर मन्त्र तथा सभी आगम* और संहार करनेकी शक्ति प्रदान की॥ २७॥ तब मैंने उन त्रैलोक्यके स्वामी, जगद्गुरु, वरदाता भगवान् गजानन (गणेशजी)-से दीन भावसे हाथ जोड़कर कहा- ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे प्रभो!] जिसने शब्दशक्तिको ग्रहण न किया हो अर्थात् जिसे शब्दशक्तिका ज्ञान न हो, वह कथनीय-अकथनीय-कुछ भी नहीं कह सकता; उसी प्रकार नानाविध (अनेक प्रकारकी) सृष्टिको कभी- कहीं देखा न हो, ऐसा मैं आप विभुकी आज्ञाका पालन करनेमें कैसे उत्साहित हो सकता हूँ अथवा आपकी आज्ञाका उल्लंघन भी कैसे कर सकता हूँ? [इस प्रकार हे प्रभो!] मेरे लिये एक ओर कूप और दूसरी ओर बावलीकी स्थिति कैसे हो गयी है? ॥ २९-३० ॥ तब भगवान् गजाननने उस प्रकारसे व्याकुल वेद- शास्त्रज्ञ ब्रह्माजीको दिव्य नेत्र प्रदान करके कहा- ॥ ३१ ॥ गजानन (गणेशजी)-ने कहा-हे कमलोद्भव ब्रह्माजी! मेरे शरीरके बाहर और अन्दर असंख्य ब्रह्माण्डोंको भ्रमण करते हुए तुम आज देखो ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर भगवान् गजाननके द्वारा अपनी श्वासवायुके द्वारा अपने उदरमें ले जाये गये मुझ विधाताने भी अनेक ब्रह्माण्डोंको वैसे ही देखा, जैसे गूलरके वृक्षमें लगे फलोंमें मशकसदृश कीट हों। तब मैंने अपने परम तेजसे उनमेंसे एकका भेदन किया और उसमें अन्तःस्थित सम्पूर्ण सृष्टिका [आश्चर्यपूर्वक] पुनः-पुनः अवलोकन किया। वहाँ मैंने दूसरे ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति, शिव, सूर्य, वायुदेव, वनों, सरिताओं, जलके स्वामी वरुण, समुद्रों, यक्षों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सर्पों, ऋषियों, गुह्यकों, साध्यों, मनुष्यों, पर्वतों, वृक्षों, उद्भिज्ज (अंकुरके रूपमें निकलनेवाले पौधे)-जरायुज (गर्भशयकी झिल्लीमें लिपटकर जन्म लेनेवाले)-स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले)-अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले) प्राणियों, पृथ्वी, सप्त पातालों, अन्य इक्कीस अव्यय लोकों, भावाभाव और स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्वको देखा ॥ ३३-३८ ॥ [इसी प्रकार] जिस-जिस ब्रह्माण्डका मैंने भेदन किया, उस-उसमें मैंने सब कुछ उसी प्रकार देखा। यह देखकर मैं पहलेकी ही भाँति भ्रमित हो गया; क्योंकि उन ब्रह्माण्डोंका अन्त मुझे कहीं नहीं मिल पाया ॥ ३९ ॥ हे ब्रह्मन्! [उस समय आश्चर्यचकित होनेके कारण] मैं न स्थिर रहनेमें सक्षम था, न ही कहीं जानेमें; तब मैंने पद्मासनमें स्थित होकर भगवान् गजाननका स्तवन किया ॥ ४० ॥ ब्रह्माजी बोले- जिनके श्रीविग्रहमें स्थित ब्रह्माण्डोंकी गणना करना सम्भव नहीं है, ऐसे देवाधिदेव भगवान् गणेशकी मैं वन्दना करता हूँ; भला, आकाशस्थित नक्षत्रों, सागरस्थित जलचरों और उसके किनारेके बालुका- कणोंकी गणना करनेवाला कौन हो सकता है! ॥ ४१ ॥ हे देवराजवन्दित [गणेशजी]! आपके चरणकमलोंका दर्शनकर जो मैं भ्रममें पड़ गया था, उसके लिये मुझे लज्जा नहीं है; क्योंकि आप-जैसे ज्ञाननिधिके प्रसन्न हो जानेपर मोक्ष भी तुच्छ प्रतीत होता है, फिर अन्यकी तो
- आगतं शिववक्त्रेभ्यो गतं च गिरजाश्रुतौ। मतं श्रीवासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते ॥
उ०ख०-अ०१४ ] * सृष्टि करते समय विघ्नोंद्वारा बाधित ब्रह्माजीका भगवान् गणेशकी प्रार्थना करना * ६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बात ही क्या है!॥ ४२ ॥ | जानेपर अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न गजानन [श्रीगणेशजी]-ने हे देवेश्वर! मैंने आपके उदरमें नाना प्रकारके | खिन्न मनःस्थितिवाले मुझ [ब्रह्मा]-को अपने नासिका- प्राणियों और पदार्थोंसे समन्वित ब्रह्माण्डसमूहोंको देखा। | छिद्रके मार्गसे बाहर निकाल दिया। मेरे अनुयायी श्रीहरि मैं यहाँ स्थिर रहनेमें या यहाँसे अन्यत्र बहिर्गमन करनेमें | और उनके साथ स्थित तमोगुणवाले भगवान् हर भी समर्थ नहीं हूँ; अतः मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्य | (शिव)-इन दोनोंको प्रभु गजाननने अपने कर्णछिद्रोंसे देवताकी शरणमें नहीं जाता हूँ॥ ४३ ॥ | बाहर निकाला। वे दोनों—हरि और हर उनके शरीरमें [हे व्यासजी!] मेरे द्वारा इस प्रकार स्तुति किये | सुखपूर्वक शयन कर रहे थे॥ ४४-४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्मस्तुति-वर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय सृष्टि करते समय विघ्नोंद्वारा बाधित ब्रह्माजीका भगवान् गणेशकी प्रार्थना करना राजा [सोमकान्त] बोले-[हे मुनिश्रेष्ठ!] | सुनकर ब्रह्माजी काँपने लगे ॥ ६-८ ॥ तब सहस्रों ब्रह्माण्डोंको देखनेके बाद ब्रह्माजीने क्या | उनमेंसे कुछने उनपर मुक्कोंसे प्रहार किया, कुछने किया ? उन्होंने गजानन (गणेशजी)-से आज्ञा प्राप्तकर | झुककर उन्हें प्रणाम किया, कुछने उनकी स्तुति की और किस प्रकार सृष्टि की ? ॥ १ ॥ | कुछने आदरपूर्वक उनकी चारों शिखाओंको हिलाया। भृगुजी बोले-[हे राजन्! सृष्टिकी रचनाके | कुछ उनके चार मुखोंकी हँसी उड़ा रहे थे। कुछ उनकी लिये उद्यत] ब्रह्माजी अपने विषयमें ऐसा विचार करते | निन्दा, तो कुछ प्रशंसा और कुछ उनकी सेवा कर रहे हुए गर्वसे भर गये कि मैं वेदों, पुराणों, शास्त्रों और | थे। कुछने उन्हें बाँध दिया, तो कुछने उन्हें खोल दिया। आगमोंका भी ज्ञाता हूँ। मैं ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और | तत्पश्चात् कुछ उन्हें इधर-उधर खींचने लगे। उनमेंसे शाप देने अथवा अनुग्रह करनेमें समर्थ हूँ। मैंने अनेक ब्रह्माण्डों | कुछने उनका आलिंगन किया, तो कुछ अन्यने उन्हें और सृष्टिकी रचनाओंको देखा है। इस समय मैं सृष्टि | शिशुकी भाँति चूम लिया। एक आठ हाथवाले [विघ्न]- करनेमें किसी भी प्रकार असमर्थ नहीं हूँ॥ २-३ १/२ ॥ | ने उनकी आठों मूछोंको पकड़ लिया और नाचने हे राजन्! इस प्रकार जब सृष्टि करनेमें पूर्णतया | लगा ॥ ९-१२ ॥ समर्थ कमलोद्भव ब्रह्माजी सृष्टि करने लगे तो वहाँ | इस प्रकार परवश हुए ब्रह्माजी चिन्ता और शोकसे अनेक प्रकारके सहस्रों विघ्न उत्पन्न हो गये ॥ ४ १/२ ॥ | युक्त हो गये। उन्होंने स्वयंके सृष्टिकर्ता होनेका जो उन अत्यन्त भयंकर विघ्नोंने ब्रह्माजीको उसी | हृदयमें स्थित महान् गर्व था, उसे त्याग दिया। वे अपने प्रकार घेर लिया, जैसे पुष्परसका पानकर मत्त हुए भ्रमर | जीवनके प्रति निराश होकर महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो मधुके छत्तेको घेर लेते हैं ॥ ५ १/२ ॥ | गये। तत्पश्चात् एक मुहूर्त बीतनेपर सचेत होकर उन्होंने वे विघ्न तीन नेत्रोंवाले, पाँच हाथोंवाले, कुएँ-जैसे | सर्वत्र व्यापक गणेशजीका मानसिक स्मरण किया और मुखवाले, सात हाथोंवाले, तीन पैरोंवाले, पाँच थूथूनोंवाले, | करुण स्वरसे रोते हुएके सदृश ब्रह्माने गजानन गणेशजीकी सात थूथूनोंवाले, छः पैरोंवाले, दस मुखोंवाले, पाँच | प्रार्थना की ॥ १३-१४ ॥ पैरोंवाले, ताड़-सदृश बड़े दाँतोंवाले, भेड़ियोंके-से पेटवाले, | ब्रह्माजी बोले-[हे प्रभो!] अनेक प्रकारके अनेक रूपोंवाले और महान् बलशाली थे; उनकी गणना | प्राणियोंकी सृष्टि करनेमें संलग्न मनवाले मुझ ब्रह्माकी नहीं की जा सकती थी। उनके अनेक प्रकारके कोलाहलको | आयु स्वल्प नहीं है, अर्थात् मैं बड़ी आयुवाला हो चुका
७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हूँ, फिर भी भवसागरसे पार करानेवाले अत्यन्त निर्मल तत्त्वज्ञानकी मुझे प्राप्ति नहीं हुई है। हे अखिलगुरो ! पृथ्वीपर जन्म लेकर आपका भजन करते हुए मैं कब परम भोग, अनुपम सुख और मोक्षको प्राप्त करूँगा ? हे विभो ! आपके [कृपा]-कटाक्षरूपी अमृतसे अभिसिंचित होने कारण मुझ चिरायुकी मृत्यु तो नहीं होगी, परंतु यह आपके लिये ही लज्जाकी बात होगी कि आपका भक्त कष्ट पा रहा है ॥ १५-१६ ॥ भृगुजी बोले- [हे राजन् !] ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करते ही 'तप करो' - इस प्रकारकी आकाशवाणी सुनायी दी। तब उन्होंने पुनः उन (गजानन)- से प्रार्थना की ॥ १७ ॥ [उधर] आकाशवाणी सुनते ही वे अनेकरूपधारी महान् बलशाली विघ्नसमूह उन कमलासन ब्रह्माजीको मुक्त करके अन्तर्धान हो गये ॥ १८ ॥ महान् यशस्वी कमलोद्भव ब्रह्माजी उन विघ्नोंसे मुक्त होकर विचार करने लगे कि 'बिना मन्त्र और बिना स्थानके मैं महान् तपस्या कैसे करूँ?' ॥ १९ ॥ इस प्रकार व्याकुल चित्तवाले ब्रह्माजी जलके मध्य भ्रमण करते रहे, तदनन्तर वे अनन्य भावसे मन-ही-मन अनामय (विघ्नरहित)-स्वरूपवाले गजानन गणेशजीका [इस प्रकारका] ध्यान करने लगे-जो मोतियों और रत्नोंसे जटित सुन्दर मुकुटवाले, लाल चन्दनसे आलिप्त शरीरवाले, सिन्दूरयुक्त अरुणित मस्तकवाले, मोतियोंकी मालासे सुशोभित सुन्दर कण्ठवाले, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित बाजूबन्दसे भूषित, देदीप्यमान पन्ना मणिकी अँगूठियोंसे सुशोभित अँगुलियोंवाले, विशाल नाभिसे शोभित और महासर्पोंसे वेष्टित महान् उदरवाले, विचित्र रत्नजटित करधनीसे सुशोभित कटिप्रदेशवाले, सुवर्णके धागोंसे निर्मित रक्तवस्त्रसे आवृत, मस्तकपर विराजमान चन्द्रमावाले और देदीप्यमान दाँतसे सुशोभित सूँडवाले हैं- ऐसे भगवान् गणेशके स्वरूपका ध्यान करते हुए पुनः यह आकाशवाणी हुई कि 'वटवृक्षको देखो, सुन्दर वटवृक्षको देखो।' तब इस प्रकारका वचन सुनकर ब्रह्माजी पुनः चिन्ताको प्राप्त हो गये ॥ २०-२६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्माजीकी चिन्ताका वर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥ पन्द्रहवाँ अध्याय ब्रह्माजीद्वारा भगवान् गणेशकी आराधना भृगुजी बोले-हे सोमकान्त ! लोकपितामह ब्रह्माजीने व्यासजीसे आगे जो कहा, उसे मैं कहता हूँ; तुम आदरपूर्वक श्रवण करो ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुनिवर ! तत्पश्चात् मैंने एक बड़ा सुन्दर स्वप्न देखा कि मैं आकाशमें भ्रमण कर रहा हूँ और भ्रमण करते हुए मैंने जलमें एक महान् वटवृक्षको देखा ॥ २॥ प्रचण्ड वायु, धूप एवं जलसे [प्रलयकालमें] सम्पूर्ण चराचर जगत्के नष्ट हो जानेपर यह एकमात्र महान् वटवृक्ष कैसे अवशिष्ट रह गया - इस प्रकार आश्चर्यमें पड़े मुझ ब्रह्माको उस महान् वटवृक्षके पत्तेपर एक छोटा-सा बालक दिखायी दिया, जिसके चार भुजाएँ थीं और वह मुकुट-कुण्डलसे सुशोभित था। उसके कण्ठदेशमें मणियों और मोतियोंसे निर्मित माला सुशोभित हो रही थी। उसने मस्तकपर अर्धचन्द्र, शरीरपर रक्तवर्णके वस्त्र और कटिप्रदेशमें करधनी धारण कर रखी थी। तेजसे जाज्वल्यमान उसके श्रीविग्रहमें सम्पूर्ण शरीर मनुष्यके जैसा, परंतु मुख हाथीका था, जिसमें एक दाँत था ॥ ३-५ १/२ ॥ उसे देखकर मैंने विचार किया कि यह बालक कहाँसे यहाँ आ गया? तब उस बालकने सूँडसे मेरे मस्तकपर जलका प्रक्षेप किया तो मैं चिन्ता और
उ०ख०-अ०१५ ] * ब्रह्माजीद्वारा भगवान् गणेशकी आराधना * ७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] आनन्दसे युक्त होकर उच्च स्वरसे हँस पड़ा ॥ ६-७॥ मेरे हँसनेपर वह बालक वटवृक्षसे नीचे उतर आया और मेरी गोदमें आकर वह मधुर वाणीमें बोला— ॥ ८ ॥ बालकने कहा— हे चतुरानन ! मूढ़ बुद्धिवाले तुम व्यर्थ ही वृद्ध हुए हो, तुम अल्पसे भी अल्प बुद्धिवाले हो। तुम विघ्नोंसे पीड़ित और सृष्टि करनेकी चिन्तासे युक्त हो। 'तप कहाँ करूँ'—इस चिन्तासे तुम निरन्तर जलके मध्य भ्रमण कर रहे हो। मैं तुम्हें सम्पूर्ण चिन्ताओंका हरण करनेवाले अपने एकाक्षरमन्त्ररूपी उपायका उपदेश करता हूँ; पुरश्चरणविधिसे तुम इसका दस लाख जप करो। तब मैं तुम्हारे समक्ष प्रत्यक्ष होकर तुम्हें [सृष्टि-रचनासम्बन्धी] उत्तम सामर्थ्य प्रदान करूँगा ॥ ९—११ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! ऐसा आश्चर्यकारक स्वप्न देखकर सहसा मैं जग गया और सोचने लगा कि मुझे परमेश्वर (गणेशजी)-के दर्शन कब होंगे ? इस प्रकार मैं देखे गये स्वप्नके कारण आनन्दरूपी सागरमें निमग्न हो गया ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर स्नान करके कमलपर एक पैरसे खड़े होकर भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए मैंने बहुत दिनोंतक [उनके] परम मन्त्रका जप किया ॥ १४ ॥ जितेन्द्रिय और जिताहार रहते हुए मैंने काष्ठ और पाषाणकी भाँति स्थिर होकर दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम महान् तप किया ॥ १५ ॥ तब मेरे मुखसे भयंकर ज्वालाएँ प्रकट हो गयीं, जिनसे समस्त प्राणी अत्यन्त दारुण कष्ट पाने लगे ॥ १६ ॥ तब भगवान् गजानन गणेशजी मेरी उस सुदृढ़ निष्ठाको देखकर और मेरी परम भक्तिसे सन्तुष्ट होकर मेरे समक्ष प्रकट हो गये ॥ १७ ॥ उनकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी, वे ज्वालामालाओंसे व्याप्त अग्निकी भाँति तीनों लोकोंका दहन करते हुए-से प्रतीत हो रहे थे और ऐसा लगता था कि वे आकाशसे लेकर पृथ्वीतकका संहार कर देनेवाले हैं ॥ १८ ॥ वे भगवान् गजानन दिव्य मालाओंसे विभूषित थे।
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] उन्होंने अपने हाथोंमें परशु और कमल धारण कर रखे थे। वे सम्पूर्ण पापोंका हरण करनेवाले और सम्पूर्ण सौन्दर्यराशिके कोशस्वरूप थे। श्रेष्ठ गजराजके मुखके सदृश उनके मुखकी शोभा थी। वे भक्तजनोंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले तथा देवताओं, मनुष्यों और मुनियोंकी विघ्न-बाधाओंका एकमात्र नाश करनेवाले थे ॥ १९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ व्यासजी ! उस तेजसमूहको देखकर मैं काँप उठा था, मेरा जप छूट गया और मैं व्याकुलचित्त होकर महान् चिन्तामें पड़ गया ॥ २० ॥ [उस समय] मेरी आँखें मुँद गयीं, स्मृति विलीन हो गयी। [तब] मेरी ऐसी अवस्थाको देखकर विघ्नराज गणेशजीने शीघ्र ही कहा— ॥ २१ ॥ गणेशजी बोले—हे लोकपितामह ! भय न करो; जिसने तुम्हें स्वप्नमें मंगलमय एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया था, वही मैं तुम्हारे समक्ष उपस्थित हूँ ॥ २२ ॥ उस मन्त्रके प्रभावसे तुम्हें सिद्धिकी प्राप्ति हो गयी है, अतः मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ। सम्प्रति मैं सौम्य भावको प्राप्त हुआ हूँ, अतः हे सुव्रत ! तुम वर माँगो ॥ २३ ॥ मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो भी इच्छा वर्तमान है, वह सब मैं तुम्हें दूँगा। मेरे प्रसन्न होनेसे वे सब [कामनाएँ] पूर्ण हो जायेंगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ २४ ॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजा सोमकान्त !] गणनायक गणेशजीके इस प्रकारके परम विशुद्ध वचनोंको सुनकर और उन्हें अपने सम्मुख देखकर ब्रह्माजी अत्यन्त हर्षित हुए और उन चराचरके गुरु गणेशजीको अपने सभी (चारों) सिरोंको झुकाते हुए प्रणामकर प्रसन्न हृदयसे कहा कि 'आज मेरा जन्म सफल हो गया है' ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे प्रभो !] जो वेदों, शास्त्रों, ज्ञानियों, योगियों और समस्त उपनिषदोंको भी कभी दृष्टिगोचर नहीं होते; जो अनादिनिधन (जन्म-मृत्युसे परे), अनन्त, अप्रमेय (प्रमेयों और प्रमाणोंसे परे) और निर्गुण हैं, वे भगवान् गणेश मेरे [न जाने किन] पुण्यसमूहोंके
७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कारण मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दे रहे हैं॥ २६-२७॥ हे देवेश ! हे विघ्नेश ! हे करुणाकर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो अपनी दृढ़ भक्ति मुझे प्रदान करें, जिससे दुःख हमारा स्पर्श भी न कर सकें ॥ २८ ॥ हे प्रभो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो मुझे विविध प्रकारकी सृष्टि कर सकनेकी सामर्थ्य प्रदान करें और [मेरे इस कार्यमें आनेवाली] विघ्न-बाधाएँ शान्त हो जायँ ॥ २९ ॥ मेरे स्मरण करनेमात्रसे आप सदा मेरे कार्योंको सम्पन्न कर दें, मुझे विमल ज्ञान प्रदान करें और अन्तकालमें मुझे स्थिर मुक्ति प्राप्त हो ॥ ३० ॥ श्रीगजानन (गणेशजी) बोले- [हे ब्रह्मन् !] 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) तुम विविध प्रकारकी विपुल सृष्टि करोगे। मेरा स्मरण करनेसे तुम्हारी सारी विघ्न- बाधाएँ सर्वथा नष्ट हो जायेंगी ॥ ३१ ॥ मेरी कृपासे तुम्हें दृढ़ भक्ति और शुभ ज्ञान प्राप्त होगा। हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! तुम शंकारहित होकर सारे कार्योंको करो ॥ ३२ ॥ [भृगु] मुनि बोले- [हे राजन्!] इस प्रकार उन प्रभुसे वर प्राप्तकर ब्रह्माजीने उनका पूजन किया। देवाधिदेव गणेशजीकी कृपासे उनके पूजनार्थ ब्रह्माजीने मनमें जिन-जिन वस्तुओंका चिन्तन किया, वे-वे वस्तुएँ उनके सम्मुख उपस्थित हो गयीं। दक्षिणाके अवसरपर [सिद्धि-बुद्धि नामक] दो कन्याएँ उनके सामने उपस्थित हो गयीं। वे दोनों सुन्दर नेत्रों और प्रसन्नतापूर्ण सुन्दर मुखसे सुशोभित थीं। उनका श्रीविग्रह अनेक रत्नोंसे जटिल नानाविध अलंकारोंसे शोभायमान था॥ ३३-३५॥ दिव्य गन्धसे युक्त तथा दिव्य वस्त्र और मालाओंसे विभूषित उन कन्याओंको गणेशजीके लिये दक्षिणाके रूपमें कमलयोनि ब्रह्माजीने प्रस्तुत किया ॥ ३६ ॥ कदलीगर्भसम्भूत कर्पूरसे [ब्रह्माजीने] गणेशजीका नीराजनकर उनको दिव्य पुष्पोंसे पुष्पांजलि दी और सहस्र नामोंसे उनका स्तवनकर उनकी परिक्रमा की ॥ ३७ ॥ तब ब्रह्माजीने प्रार्थना की कि हे वन्दनीय ! आप दीनोंका कल्याण करनेवाले हों। इस प्रकार उन परमेष्ठी ब्रह्माजीसे सम्यक् रूपसे पूजित हुए विघ्नहर्ता भगवान् गजानन गणेशजी सिद्धि-बुद्धिको लेकर अन्तर्धान हो गये ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर परमेश्वरकी कृपा और आज्ञासे प्रसन्न (निर्मल) बुद्धिवाले ब्रह्माजीने पूर्वकी भाँति सृष्टिका विस्तार किया ॥ ४० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें गजाननकी आराधनाका वर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥ ❖ सोलहवाँ अध्याय सृष्टि-वर्णन, मधु-कैटभकी उत्पत्ति और ब्रह्माजीद्वारा उनके वधहेतु योगनिद्रा देवीकी प्रार्थना करना राजा [सोमकान्त ] बोले- हे ब्रह्मर्षि ! भगवान् गणेशकी कथा सुनकर मनमें हर्ष हो रहा है। इस कथारूपी अमृतसे मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ, अतः आप इसे पुनः कहें ॥ १॥ हे प्रभो ! परमात्मा भगवान् गणेशके अन्तर्धान हो जानेपर ब्रह्माजीने किस प्रकार सृष्टि की, इसका आप वर्णन करें ॥ २ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आगे ब्रह्माजीने व्यासजीके प्रति जो आख्यान कहा, उसे मैं विस्तारसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥ भृगुजी बोले- [हे राजन्!] प्रभु ब्रह्माजीने व्यासजीके प्रति जो सिद्धक्षेत्रका माहात्म्य कहा तथा जो सृष्टिकी रचना की, उसे मैं तुमसे क्रमशः कहूँगा ॥ ४ ॥ उन ब्रह्माजीने सर्वप्रथम सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया और उनसे कहा कि सृष्टिकार्यमें सहायता करते
उ०ख०-अ०१६] सृष्टि-वर्णन, मधु-कैटभकी उत्पत्ति ७३
उ०ख०-अ०१६] * सृष्टि-वर्णन, मधु-कैटभकी उत्पत्ति * ७३ हुए अपनी-अपनी बुद्धिसे सृजन करो ॥ ५ ॥ उन सब [सातों मानस पुत्रों]-ने उन (ब्रह्माजी)- की बात सुनकर तपस्या करनेका निश्चय किया और अत्यन्त दीर्घकालतक तपस्या करके परब्रह्मको प्राप्त हो गये ॥ ६ ॥ तब प्रजापति ब्रह्माजीने अन्य सात पुत्रोंकी सृष्टि की, वे अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न थे, परंतु उन्होंने उत्तम सृष्टि नहीं की ॥ ७ ॥ तब उन सनकादि पुत्रोंको [सृष्टिकार्यमें उदासीन] देखकर उन्होंने स्वयं सृष्टि-रचना प्रारम्भ की। कमलासन ब्रह्माजीने मुखसे ब्राह्मणों और अग्निको जन्म दिया ॥ ८ ॥ उन्होंने भुजाओं, जंघाओं और पैरोंसे अन्य तीन वर्णों [क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र]-की सृष्टि की। उन्होंने अपने हृदयसे चन्द्रमाको, नेत्रोंसे सूर्यको, कानोंसे वायु तथा प्राणको, नाभिसे अन्तरिक्षको, सिरसे द्युलोकको, पैरोंसे भूमिको तथा कानोंसे दिशाओं एवं अन्य लोकोंको प्रादुर्भूत किया ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर स्थावर-जंगमात्मक इस विश्वमें उच्च और निम्न स्थानों, समुद्रों, सरिताओं, पर्वतों, तृणों, गुल्मों (झाड़ियों) और वृक्षोंकी सृष्टि की ॥ ११ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर कुछ दिन बीतनेके बाद महाविष्णुके निद्रित होनेपर उनके कानोंसे दो महान् असुर उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥ तीनों भुवनोंमें विख्यात उन दोनों [महासुरों]-के नाम मधु और कैटभ थे। वे विकराल दाढ़ों, भयंकर मुख, पीली आँखों और दीर्घ नासिकावाले थे ॥ १३ ॥ वे दोनों विशालकाय, वज्रदेहवाले और पर्वतके सदृश ऊँचे थे। अत्यन्त घमण्डी वे दोनों वर्षाकालीन मेघकी भाँति गर्जन कर रहे थे ॥ १४ ॥ उन दोनों दुष्टोंने बहुत-से अपशब्दोंका प्रयोगकर उन ब्रह्माजीको धिक्कारा और विप्रों, देवताओं, ऋषियों, साधुओं और शास्त्रोंकी निन्दा की ॥ १५ ॥ उन दोनोंके शब्द (गर्जन)-से पृथ्वी और शेष काँपने लगे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनकी ध्वनिसे उद्विग्न हो गया ॥ १६ ॥ तब वे दोनों क्रोधसे आँखें लाल किये हुए उन ब्रह्माजीको खानेके लिये उद्यत हो गये। तब चिन्ता और हर्षसे युक्त उन कमलासन ब्रह्माने सम्यक् रूपसे यह विचारकर कि गजानन गणेशजीकी कृपासे विष्णुके हाथसे इन दोनोंका वध होगा, मधु-कैटभके नाश और श्रीहरिके प्रबोधनके लिये विष्णुभगवान्के नेत्रोंमें स्थित विष्णुमोहनकारिणी वरप्रदायिनी निद्रादेवीका स्तवन किया ॥ १७-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे देवि!] आप [देवताओंको हव्य प्रदान करनेवाली] स्वाहारूपा, [पितरोंको कव्य प्रदान करनेवाली] स्वधारूपा और अमृतस्वरूपा हैं। आप ही मात्रा, अर्धमात्रा और स्वररूपिणी भी हैं। आप ही सृष्टिकी कर्त्री, हर्त्री और लोकजननी हैं। आप ही सत् और असत्शक्तिरूपा हैं ॥ २० ॥ आप श्रुतिरूपा, स्वरस्वरूपा, कालरात्रि, जन्म- मृत्युसे रहित, रात्रिरूपा, जगज्जननी, जगद्धात्री और सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाली हैं ॥ २१ ॥ हे पर्वतराजपुत्री! आप ही सावित्री, सन्ध्या, महामाया, क्षुधा और तृषारूपिणी हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणि- पदार्थोंमें निहित उनकी शक्ति हैं। [हे देवि! हे महालक्ष्मीरूपिणि!] आपके स्वामी तीनों लोकोंके कर्ता, दैत्यों और दानवोंके संहारक और ज्ञान-विज्ञानवान् हैं; ऐसे उन श्रीहरिके नेत्रोंमें निद्रा व्याप्त है ॥ २२-२३ ॥ जिन [श्रीहरि]-के द्वारा जगत्की उत्पत्ति, उसका पालन और संहार किया जाता है; आपके द्वारा उन्हें भी
७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अवतार-ग्रहणरूपी संकटमें डाल दिया जाता है ॥ २४ ॥ आप इन दोनों दुष्टात्मा दुराधर्ष दैत्यों मधु और कैटभको मोहित कीजिये और इन्हें मारनेके लिये इन (श्रीहरि)-को ज्ञान प्रदान कीजिये * ॥ २५ ॥ मैं उन दोनोंके द्वारा पूर्वजन्ममें सावधानीपूर्वक आराधित हुआ था तथा मैंने उन्हें अनेक प्रकारके वर दिये थे, इसलिये वे दोनों मेरे द्वारा अवध्य हैं ॥ २६ ॥ इसीलिये मैंने उनके द्वारा कहे गये ऊँचे-नीचे अनेक अपशब्दोंको सहन किया। वे दोनों मुझे मारना चाहते थे; मैंने अनेक स्तोत्रोंसे उनका स्तवन किया, फिर भी वे दोनों अपने दुष्ट स्वभावके कारण मेरा वध करनेके प्रयत्नसे निवृत्त नहीं हुए। हे देवि ! इसीलिये मैंने भगवान् विष्णुका प्रबोधन करनेके लिये आपसे प्रार्थना की ॥ २७-२८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भगवतीकी प्रार्थना' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥ सत्रहवाँ अध्याय भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे मल्लयुद्ध करना, उन्हें जीतनेमें अपनेको असमर्थ समझ गन्धर्वरूपसे गायन-वादनकर भगवान् शिवको प्रसन्न करना और भगवान् शिवका उन्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश देना भृगुजी बोले- जबतक भगवान् विष्णु [निद्रा त्यागकर] उठते, तबतक उन दोनों (मधु और कैटभ)- ने स्वर्गपर आक्रमणकर इन्द्र, यम और कुबेरके भवनोंको अपने अधीन कर लिया ॥ १ ॥ उन दोनों (मधु और कैटभ) - को देखकर देवता सभी ओरको पलायन करने लगे। [उनमेंसे] कुछ चक्कर खाकर गिर गये, कुछ मूर्च्छित हो गये और कुछ अन्य लड़खड़ा गये ॥ २ ॥ तब भगवती योगनिद्राद्वारा निद्रावस्थासे मुक्त किये गये भगवान् श्रीहरिने उन सभी देवताओंको आश्वासन देकर उन दोनों (मधु और कैटभ) - से युद्ध प्रारम्भ किया, जिससे सम्पूर्ण देवताओं, शेषादि सभी नागों, मुनियों, यक्षों और राक्षसोंपर उनके द्वारा किये गये आक्रमणका निवारण किया जा सके ॥ ३-४ ॥ किरीट-कुण्डल धारण किये शंख-चक्र-गदाधारी उन भगवान् श्रीहरिकी वहाँ (उस रणांगणमें) ऐसी शोभा हुई, जैसे घने नीले बादलकी श्यामल छवि हो ॥ ५ ॥ तब उन भगवान् श्रीहरिने महान् ध्वनि करनेवाले शंखको बजाया। उस महान् शब्दसे पृथ्वी और अन्तरिक्ष क्षुभित हो गये ॥ ६ ॥ उस पांचजन्य नामक महान् शंखकी ध्वनि सुनकर उन दोनोंके हृदय विदीर्ण-से हो गये। तब उन दोनोंने भयभीत होकर आपसमें एक-दूसरेसे कहा - ॥ ७ ॥ हम दोनोंने भूमण्डल, पाताल और इक्कीस स्वर्गोंमें सम्यक् रूपसे आक्रमण किया, परंतु ऐसी ध्वनि नहीं सुनी, जिससे हम दोनोंके वज्रसदृश हृदय काँप उठें, अतः ऐसे बलवान् पुरुषके साथ हमें युद्ध करना चाहिये ॥ ८-९ ॥ युद्धकी इच्छाकी शान्तिके लिये हमें युद्ध करना चाहिये, चाहे विजय मिले या पराजय। या तो हम इस
- स्वाहास्वधारूपधरा सुधा त्वं मात्रार्धमात्रा स्वररूपिणी च। कर्त्री च हर्त्री जननी जनस्य सतोऽसतः शक्तिरसि त्वमेव ॥ श्रुतिः स्वरा कालरात्रिरनादिनिधना क्षपा। जगन्माता जगद्धात्री सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥ सावित्री च तथा सन्ध्या महामाया तृषा क्षुधा। सर्वेषां वस्तुजातानां शक्तिस्त्वमसि पार्वति ॥ त्रैलोक्यकर्ता त्वन्नाथो दैत्यदानवसूदनः। निद्रया व्याप्तनेत्रोऽसौ ज्ञानविज्ञानवान् हरिः ॥ जगदुत्पाद्यते येन पाल्यते ह्रियतेऽपि च। सोऽपि त्वयावताराणां सङ्कटे विनियोज्यते ॥ दुष्टात्मानौ मोहयतौ त्वं दैत्यौ मधुकैटभौ। हन्तुमेतौ दुराधर्षौ ज्ञानमस्य प्रदीयताम् ॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १६।२०-२५)
उ०ख०-अ०१७ ] * भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे मल्लयुद्ध करना * ७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
शत्रु्का वध करेंगे या मरकर पुनर्जन्म प्राप्त करेंगे॥ १० ॥ उन दोनोंने इस प्रकारका निश्चय करके युद्धकी इच्छावाले श्रीहरिसे कहा- हे पुरुषश्रेष्ठ! हमारी रणेच्छाकी शान्तिके लिये तुम दिखायी दिये हो। अब हम दोनोंके दृष्टिगोचर हो जानेपर तुम कैसे श्रेष्ठताको प्राप्त कर सकते हो ? ॥ १११/२ ॥ [ भृगु ] मुनि बोले- [ हे राजन् ! ] उन दोनोंकी इस प्रकारकी बात सुनकर विष्टरश्रवा भगवान् श्रीहरिने कहा- ॥ १२ ॥ श्रीहरि बोले- हे महादैत्यो ! तुम दोनोंने ठीक ही कहा है, अब तुम दोनों मुझसे यथेष्ट युद्ध करो। [वैसे] कोई भी अपने मरणकी कामना स्वयं नहीं करता ॥ १३ ॥ वे दोनों [ मधु और कैटभ ] बोले- हे देवेश ! आप चार भुजाओंवाले हैं, इसलिये आप हम दोनोंको बाहुयुद्ध प्रदान करें अर्थात् हम दोनोंसे बाहुयुद्ध करें ॥ १३१/२ ॥ मुनि बोले- [हे राजा सोमकान्त !] उनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीहरिने प्रसन्नतापूर्वक 'तथास्तु' कहा ॥ १४ ॥ चतुर्भुज भगवान् श्रीहरिने अपने आयुधोंका त्यागकर उन दोनोंसे युद्ध करना प्रारम्भ किया। वे दोनों (मधु और कैटभ) भुजाओंसे ताल ठोंकते हुए श्रीहरिका वध करनेके लिये उनके सिरपर अपने सिरसे, जंघाओंपर जंघाओंसे, कुहनियोंपर कुहनियोंसे, भुजाओंपर भुजाओंसे, टखनोंपर टखनोंसे, नासिकापर नासिकासे, मुष्टियोंपर मुष्टियोंसे, पीठपर पीठसे प्रहार कर रहे थे और उन्हें मण्डलाकार (गोल-गोल) घुमा भी रहे थे ॥ १५-१७ ॥ [ ब्रह्माजी कहते हैं-] हे महामुने ! इस प्रकार उनका (विष्णु और मधु-कैटभका) वह आपसका युद्ध बहुत समयतक चलता रहा और पाँच सहस्र दिव्य वर्ष बीत गये, परंतु भगवान् श्रीहरि उन दोनोंको जीतनेमें समर्थ नहीं हो सके। तब उन्होंने गानविशारद गन्धर्वका रूप धारण किया और वनके अन्तःभागमें जाकर वीणावादन और सुन्दर गायन प्रारम्भ किया। [उनके इस गायन और वादनको सुनकर] हरिण, हिंसक पशु,
[दायाँ स्तम्भ]
मनुष्य, देवता, गन्धर्व और राक्षस अपने-अपने क्रियाकलाप छोड़कर उसे सुननेमें तत्पर हो गये। उनके इस आलापको कैलासपर्वतपर विराजमान भगवान् शंकरने बार-बार सुना ॥ १८-२१ ॥ तब भगदेवताके नेत्रोंका हरण करनेवाले भगवान् शंकरने निकुम्भ और पुष्पदन्तसे कहा कि 'यह जो वनमें गायन कर रहा है, उसे शीघ्र ले आओ' ॥ २२ ॥ तब उन दोनोंने वहाँ जाकर उन गन्धर्वरूपधारी श्रीहरिका दर्शन किया और उनसे कहा कि हे निष्पाप ! तुम्हारे गीतकी ध्वनि सुनकर देवाधिदेव भगवान् शंकर अत्यन्त हर्षित हुए हैं, उन्होंने तुम्हारे गायनका श्रवण करनेके लिये तुम्हें बुलाया है, तुम हम दोनोंके साथ शीघ्र ही उनके पास चलो ॥ २३-२४ ॥ उन दोनोंकी ऐसी बात सुनकर वे शिवभक्त गन्धर्वरूपी विष्णु उन दोनोंके साथ वहाँ गये, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर थे। वहाँ उन्होंने अर्धचन्द्रको सिरपर धारण किये हुए, गजासुरके चर्मको परिधानके रूपमें पहने हुए, रुण्डमालासे विभूषित, पिंगल वर्णकी जटाओंसे शोभित, सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए पार्वतीवल्लभ [ भगवान् शिव]-को देखा और शरणागतोंके कष्टोंको नष्ट करनेवाले भगवान् विश्वेश्वरको पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया ॥ २५-२७ ॥ तब उन गिरिशायी भगवान् शिवने उन अधोक्षज विष्णुको अपने हाथोंसे उठाकर उन्हें आसन प्रदान किया और उनका पूजन किया ॥ २८ ॥ तब उन [गन्धर्वरूपधारी] श्रीहरिने कहा कि आज मेरा जन्म सफल हो गया; जो कि आज मुझे धर्म-अर्थ- काम और मोक्षके प्रदायक आपका दर्शन हो गया ॥ २९ ॥ तदनन्तर उन गन्धर्वरूपधारी श्रीहरिने गानपरायण होकर वीणाके निनाद, विविध आलाप और पदोंके मधुर गानसे उन देवाधिदेवको तथा स्कन्द, गणेश्वर, देवी पार्वती, देवताओं और ऋषियोंको सन्तुष्ट किया। तब महेश्वर भगवान् शंकरने शंख-चक्र-गदा-पद्म और सुन्दर पीताम्बर धारणकर प्रकट हुए श्रीहरि विष्णुका आलिंगनकर प्रेमपूर्वक कहा-हे हरे ! मुझे तुम्हारे गायनसे
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७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
परम प्रसन्नता प्राप्त हुई है। तुम मुझसे वर माँगो, मैं तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करूँगा ॥ ३०-३२१/२ ॥ भृगुजी बोले-[हे राजन् !] तब स्वयम्भू भगवान् विष्णुने उन दोनों दैत्यों (मधु-कैटभ)-का सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा- ॥ ३३ ॥ श्रीहरि बोले-हे करुणानिधान भगवान् शिव ! निद्रित-अवस्थामें क्षीरसागरमें शयन करते समय मेरे कर्णमलसे मधु-कैटभ [नामक दो दानव] उत्पन्न हुए। वे ब्रह्माजीको खानेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने भगवती निद्रादेवीकी स्तुति की, जिनसे मैं प्रतिबोधित (जाग्रत्) हुआ। तदनन्तर मैंने उन दोनोंसे मल्लयुद्ध किया, परंतु मैं उनको जीतनेमें समर्थ न हो सका, इसीलिये मैंने ऐसा किया अर्थात् गन्धर्वरूप धारण करके गायनसे आपको सन्तुष्ट किया। अब मुझे उनके वधका उपाय बतायें ॥ ३४-३६ ॥ भगवान् शिव बोले-हे विष्णो ! तुम बिना गणेशार्चन किये रणभूमिमें चले गये थे, इसीलिये तुम शक्तिहीन हो गये और महान् कष्टको प्राप्त किया। अब तुम गणेशका पूजन करके ही युद्धके लिये जाओ। वे (गणेश) अपनी मायासे उन दोनों दानवोंको मोहित कर देंगे। मेरी कृपासे तुम उन दोनों दुष्टोंका वध कर सकोगे, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३७-३८१/२ ॥ श्रीहरि बोले-हे शिवजी ! मैं विनायक गणेशकी उपासना कैसे करूँ? यह बतलाइये ॥ ३९ ॥ ईश्वर (शिवजी) बोले-हे भगवन् ! गणेश्वरके सात करोड़ मन्त्र कहे गये हैं। उनमें भी अनेक महामन्त्र हैं। उनमें भी एकाक्षर मन्त्र महान् है, एक अन्य विशिष्ट महामन्त्र षडक्षर महामन्त्र है। उन दोनोंमेंसे एक महामन्त्र मैं तुमको बतलाता हूँ ॥ ४०१/२ ॥ [ भृगु ] मुनि बोले-[हे राजन् !] तब एकाक्षर मन्त्रको छोड़कर [ भगवान् शिवने ] मन्त्रशास्त्रीय सिद्ध- शत्रु आदिकी प्रक्रियासे निर्णीत तथा ऋण-धनचक्रसे शोधित* षडक्षरमन्त्र श्रीहरिको बताया। गणेशजीका यह महामन्त्र मंगलकारी और सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है ॥ ४१-४२ ॥ [ भगवान् शिवने कहा-हे हरे ! ] 'इसके अनुष्ठान-मात्रसे तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जायगा।' तब वे श्रीहरि उसका अनुष्ठान करनेके लिये शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रोपदेश' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय विष्णुका गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका अनुष्ठान करना और गणेशजीकी कृपासे मधु-कैटभका वध करना सोमकान्त बोले-[हे मुनिश्रेष्ठ !] भगवान् श्रीहरिने कैसे और कहाँ उस उत्तम [ षडक्षर] मन्त्रका जप किया? उन्होंने किस प्रकार सिद्धि प्राप्त की, वह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ भृगुजी बोले-[हे राजन् !] पृथ्वीपर सिद्धक्षेत्र नामसे प्रसिद्ध परम सिद्धिप्रद क्षेत्र है, वहाँ जाकर महाविष्णुने महान् तपस्या की ॥ २ ॥ उन्होंने प्रयत्नपूर्वक अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्तकर षडक्षर विधानसे देवाधिदेव विनायक गणेशजीका ध्यान करते हुए उनकी आराधना की ॥ ३ ॥ उन्होंने बाणमुद्राको प्रदर्शित करते हुए अस्त्रमन्त्र (फट्)-से सर्वप्रथम आदरपूर्वक दिग्बन्धन किया। इसके
- जैसे विवाह-सम्बन्ध निश्चित होनेके पूर्व नाड़ी, भकूट आदिका ज्योतिषशास्त्रके अनुसार विचार किया जाता है, वैसे ही मन्त्र-दीक्षा- निर्णयके पूर्व साधक और मन्त्रके सम्बन्धका विचार भी मन्त्रशास्त्रके अनुसार किया जाता है। इसके अन्तर्गत साधकके नामके वर्ण आदिसे मन्त्रके वर्ण आदिका सम्बन्ध मुख्य रूपसे कुलाकुलचक्र, राशिचक्र, नक्षत्रचक्र, अकडमचक्र, अकथहचक्र, ऋणि-धनिचक्रके अनुसार विचार किया जाता है। परिणाम अनुकूल होनेपर ही साधकको मन्त्रका जप करना चाहिये। इस विषयमें विस्तारसे जाननेके लिये जिज्ञासुजनोंको कल्याणका साधनांक (कोड नं० ६०४) देखना चाहिये। Kalyana Visheshank 2021_Section_4_1_Back
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उ०ख०-अ०१८] * विष्णुका गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका अनुष्ठान करना * ७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
बाद भूतशुद्धि और प्राणोंका व्यवस्थापन करके आधार आदिके क्रमसे अन्तर्मातृकान्यास सम्पन्न किया। तदुपरान्त मस्तक आदिमें बहिर्मातृकान्यास करनेके अनन्तर मूल मन्त्रसे प्राणायाम किया। तत्पश्चात् गजाननदेवका ध्यान करके आवाहनी आदि मुद्राएँ प्रदर्शित करते हुए पहले नानाविध भावनात्मक उपचारोंसे और बादमें षोडशोपचारोंके द्वारा गजाननकी अर्चना की। इसके अनन्तर वे योगेश्वरेश्वर विष्णु उस परम मन्त्र (षडक्षरमन्त्र)-का जप करने लगे ॥ ४-७ ॥ तदनन्तर सौ वर्षका समय बीत जानेपर करोड़ों सूर्यों और अग्निके समान प्रकाशमान परमात्मा गणेश उनके समक्ष प्रकट हुए और अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे गरुड़ांकित ध्वजावाले भगवान् विष्णुसे कहा—हे हरे! तुम्हारी जो कामना हो, वह वर मुझसे माँग लो। तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट मैं वह सब तुम्हें प्रदान करूँगा। यदि तुमने पहले ही मेरी आराधना कर ली होती, तो तुम्हें निश्चय ही विजय प्राप्त हो जाती ॥ ८-१० ॥ **श्रीहरि बोले—**ब्रह्मा, ईशान (शिव), इन्द्र आदि प्रमुख देवता जिन आपका तपस्याके द्वारा दर्शन करनेमें सक्षम नहीं हैं; उन्हीं नानारूप और एक (अद्वय) स्वरूपवाले तथा व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूपवाले आप गणेशजीका मैं दर्शन कर रहा हूँ॥ ११॥ आप अणुसे भी अणु स्वरूपवाले और आकाशादि महान् पदार्थोंसे भी महान् एवं सत्त्वमय स्वरूपवाले हैं। प्राणियोंके प्रारब्धवश आप ही बार-बार उनका सृजन, पालन और संहार करते हैं॥ १२॥ आप सबके आत्मा, सर्वत्र गमनशील, सर्वशक्तिमान्, सर्वत्र व्याप्त, सब कुछ करनेवाले, परमेश्वर, सब कुछ देखनेवाले, सबका संहार करनेवाले, सबका रक्षण करनेवाले, सबको धारण करनेवाले, विश्वके नेता और
[दायाँ स्तम्भ]
पिता भी हैं*॥ १३॥ हे देव! इस प्रकारके आपके दर्शनसे मुझे सर्वत्र सिद्धियाँ सम्भव होंगी, फिर भी मैं आपसे एक बात कहता हूँ॥ १४॥ मेरी योगनिद्राके अन्तिम समयमें मेरे कर्णमलसे मधु-कैटभ नामक दो महान् बलशाली [दानव] उत्पन्न हुए और वे दोनों ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्यत हो गये॥ १५॥ तब मैंने उन दोनोंसे बहुत वर्षोंतक युद्ध किया, तदनन्तर क्षीणबल होनेसे मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १६॥ अतः हे परमेश्वर! उन दोनोंका जिस प्रकारसे मेरे द्वारा वध हो सके तथा अन्य दैत्योंपर भी विजय प्राप्तकर मुझे यश प्राप्त हो, उसपर विचार कीजिये। आप मुझे अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें, जिससे होने- वाली मेरी अतुलनीय कीर्ति त्रैलोक्यको पावन करेगी॥ १७-१८॥ **गणेशजी बोले—**हे विष्णो! तुमने जो-जो प्रार्थना की है, वह निश्चित रूपसे पूर्ण होगी। तुम्हें यश, बल, परम कीर्ति और [कार्योंमें] निर्विघ्नताकी प्राप्ति होगी॥ १९॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजन्!] महाविष्णुके प्रति ऐसा कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये। तब आनन्दसे पूर्ण होकर उन्होंने मान लिया कि अब वे दोनों असुर उनके द्वारा जीत लिये गये॥ २०॥ उन्होंने वहाँ [गणेशजीका] एक मन्दिर बनवाया, जो स्फटिक मणियों और अनेक रत्नोंसे जटिल था। वह सुवर्णमय शिखर और चार द्वारोंसे सुशोभित था॥ २१॥ उन्होंने गण्डकी नदीसे प्राप्त पाषाणसे [गणेशजीकी] प्रतिमाका निर्माण कराया और उसे मन्दिरमें स्थापित किया। देवताओं और मुनियोंने उस प्रतिमाको 'सिद्धि-
[पाद-टिप्पणी (Footnote)]
* हरिरुवाच ब्रह्मेशानाविन्द्रमुख्याश्च देवा यं त्वां द्रष्टुं नैव शक्तास्तपोभिः। तं त्वां नानारूपमेकस्वरूपं पश्ये व्यक्ताव्यक्तरूपं गणेशम्॥ त्वं योऽणुभ्योऽणुस्वरूपो महद्भ्यो व्योमादिभ्यस्त्वं महान् सत्त्वरूपः। सृष्टिं चान्तं पालनं त्वं करोषि वारं वारं प्राणिनां दैवयोगात्॥ सर्वस्यात्मा सर्वगः सर्वशक्तिः सर्वव्यापी सर्वकर्ता परेशः। सर्वद्रष्टा सर्वसंहारकर्ता पाता धाता विश्वनेता पितापि॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १८।११-१३)
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७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विनायक' नाम दिया॥ २२॥ चूँकि श्रीहरिने इसी क्षेत्रमें यह शुभ सिद्धि प्राप्त की थी, अतः वह क्षेत्र पृथ्वीपर 'सिद्धक्षेत्र'* के नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ २३॥ तदनन्तर वे श्रीहरि उस स्थानपर गये, जहाँ वे दोनों—मधु और कैटभ स्थित थे। जब उन दोनोंने श्रीहरिको आते हुए देखा तो हँसते हुए उनकी निन्दा करने लगे॥ २४॥ [उन्होंने श्रीहरिसे कहा—] तुम्हारा मेघसदृश श्याम मुख आज हमें पुनः कहाँसे दिखायी दे रहा है? अतः हम दोनों पुनः तुम्हें महामुक्ति देंगे; तुम तो लघुता अर्थात् पराजयको प्राप्त हो गये थे, फिर [पुनः] किसलिये रणमें आ गये?॥ २५ १/२ ॥ श्रीहरि बोले—अग्निकी छोटी-सी चिनगारी सहसा सब कुछ जला डालती है। जैसे लघु [आकारवाला] दीपक रात्रिके महान् अन्धकारका संहार कर डालता है, वैसे ही मैं तुम दोनों मदोन्मत्त दुष्टोंका आज ही नाश कर देनेमें समर्थ हूँ॥ २६-२७॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजा सोमकान्त!] उन श्रीहरिके इस प्रकारके वचनको सुनकर मधु-कैटभने अत्यन्त क्रोधित होकर सहसा [भगवान्] विष्णुके हृदयदेशमें मुक्केसे घोर प्रहार किया॥ २८॥ तब पुनः उन दोनों (मधु-कैटभ)-का उन (भगवान् विष्णु)-के साथ मल्लयुद्ध शुरू हो गया, जो बढ़ता ही गया। [इस प्रकार] उन दोनोंके साथ बहुत दिनतक युद्ध करके श्रीहरि उन्हें वर देनेके लिये समुत्सुक हुए। उन्होंने मधुर वाणीमें उन दोनों दानवों—मधु-कैटभसे कहा— तुम दोनोंने मेरे प्रहारोंको बहुत समयतक सहन किया है। हे दैत्यश्रेष्ठो! मैं तुम दोनोंके पुरुषार्थसे प्रसन्न हूँ। तुम दोनोंके समान न कोई हुआ है, न होगा॥ २९-३१॥ वे दोनों (मधु-कैटभ) बोले—हे हरे! हम दोनों तुम्हारे युद्धसे बहुत सन्तुष्ट हुए हैं, इसलिये तुम हमसे वर माँगो; हम तुम्हें बहुत-से वर देंगे॥ ३२॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजन्!] मायासे मोहित उन दोनों [दैत्यों]-के वचन सुनकर भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर कहा—हे दैत्यद्वय! यदि तुम दोनों मुझे वर देनेके लिये समुद्यत हो तो तुम दोनों मेरे वध्य हो जाओ—यही मैंने वर माँगा है॥ ३३ १/२ ॥ तब सब जगह जल-ही-जल देखकर उन दोनों— मधु और कैटभने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—हे माधव! तुम्हारे हाथसे मृत्यु मंगलकारिणी है; अन्तकालमें तुम्हारे चिन्तनसे लोगोंको सद्यः सनातनी मुक्ति प्राप्त होती है, अतः जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी न हो, वहाँ हम दोनोंका वध करो। हम दोनों सब कुछ छोड़ सकते हैं, लेकिन सत्य नहीं; क्योंकि सब कुछ सत्यमें ही प्रतिष्ठित है॥ ३४-३६॥ मुनि बोले—[हे राजन्!] उन दोनों (मधु- कैटभ)-के इस प्रकारके वचनको सुनकर [श्रीहरिने] उनको अपने जघनप्रदेशपर लिटाया और तीक्ष्ण धारवाले चक्रसे उनके सिरोंको काट दिया॥ ३७॥ तब देवताओंने प्रसन्न होकर फूल बरसाये, गन्धर्वोंने नृत्य किया और अप्सराओंके समूहोंने गीत गाये॥ ३८॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने परमेष्ठी ब्रह्माजीके पास जाकर हर्षपूर्वक उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ ३९॥ श्रीहरि बोले—[हे ब्रह्मन्!] जब मैं उन दोनों (मधु-कैटभ)-को जीतनेमें समर्थ नहीं हो सका, तब मैं
- मुम्बई-रायचूर लाइनपर धौंड जंक्शनसे ९ किमी० दूर बोरीवली स्टेशन है। वहाँसे लगभग ९ किमी० दूर भीमा नदीके किनारे यह स्थान है। इसका प्राचीन नाम 'सिद्धाश्रम' है। यहाँ भगवान् विष्णुने मधु-कैटभ दैत्योंको मारनेके लिये गणेशजीका पूजन किया था। द्वापरान्तमें व्यासजीने पुराणोंका प्रणयन निर्विघ्न सम्पन्न करनेके लिये भगवान् विष्णुद्वारा स्थापित गणपति-मूर्तिका पूजन किया था। Kalyana Visheshank 2021_Section_4_2_Back
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उ०ख०-अ०१९] $\qquad$ * राजा भीमकी निःसंतानताके कारणका वर्णन * $\qquad$ ७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[ऊपरी भाग - बायाँ स्तम्भ]
भगवान् शंकरके पास गया। शंकरजीने मुझे षडक्षर मन्त्र (वक्रतुण्डाय हुं)-का उपदेश दिया ॥ ४० ॥ उससे मैंने देवाधिदेव भगवान् विघ्नेश्वर (गणेशजी)- की आराधना की। उन्होंने मुझे कामनाओंको फलीभूत करनेवाले अनेक वरदान दिये ॥ ४१ ॥ वे भगवान् गणेश मेरे द्वारा स्तुत और पूजित होकर उसी समय अन्तर्धान हो गये। उन वरदानोंके प्रभावसे मैंने उन दोनों दुष्टों-मधु और कैटभका वध कर दिया ॥ ४२ ॥ भगवान् शंकरकी कृपासे मुझे उन महात्मा गणेशजीकी
[ऊपरी भाग - दायाँ स्तम्भ]
महिमा विशेष रूपसे ज्ञात हो चुकी है, अब मैं दैत्यों और दानवोंका हनन करता रहूँगा ॥ ४३ ॥ उस समय समस्त देवताओं और मुनियोंने गजाननदेव, आप ब्रह्माजी, भगवान् शंकर और मेरी (विष्णुकी) स्तुति की और अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये ॥ ४४ ॥ [सूतजी कहते हैं—हे मुनियो!] जो इस पापनाशक [गणपति]-माहात्म्यका नित्य श्रवण करता है; उसे कभी भय नहीं होता और वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको फलीभूत कर लेता है ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सिद्धक्षेत्रोत्पत्तिवर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय राजा भीमकी निःसंतानताके कारणका वर्णन
[निचला भाग - बायाँ स्तम्भ]
भृगुजी बोले—[हे राजन्!] इस आख्यानको सुनकर और षडक्षर मन्त्रकी [जप]-विधि जानकर भी व्यासजीने ब्रह्माजीसे पुनः इस प्रकार पूछा, जैसे उनकी तद्विषयक इच्छा पूर्ण न हुई हो ॥ १ ॥ व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन्! मैंने पापहारी, सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले और पुण्यवर्धक सिद्धक्षेत्र एवं गणेशजीके माहात्म्यको सुना, परंतु मुझे इस कथा- सुधाके पानसे परम तृप्ति नहीं हुई है, अतः आप भगवान् विनायकके कथानकको पुनः कहें ॥ २-३ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**हे पराशरपुत्र व्यासजी! मैं सर्वदेवाधिदेव भगवान् गणेशके इस मंगलमय महान् आख्यानको तुम्हारे सम्मुख कहता हूँ — ॥ ४ ॥ विदर्भदेशमें भीम नामक एक राजा हुआ; जो दानवीर, महान् बलशाली, उदार और प्रचण्ड पराक्रमी था। हे महामते! कौण्डिन्यनगरमें उसका निवास था। सामन्तगण और दूसरे राजा उसको कर दिया करते थे॥ ५-६ ॥ उसके आगे-आगे अश्वारोहियों, गजारोहियों, पैदल सैनिकों और रथारोहियोंसे युक्त दस करोड़ सैनिकोंवाली सेना चलती थी तथा उसके पीछे भी वैसे ही तथा उतने ही सैनिक होते थे ॥ ७ ॥
[निचला भाग - दायाँ स्तम्भ]
हजारों ब्राह्मण उसके आश्रयमें रहते हुए प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन करते थे। उसकी महान् भाग्यशालिनी भार्याका नाम चारुहासिनी था ॥ ८ ॥ खिले हुए कमलके समान मुख और मृगशावकके समान नेत्रोंवाली वह ब्राह्मण-भक्त, देवपरायण और नित्य धर्ममें सतत तत्पर रहनेवाली थी ॥ ९ ॥ वह पतिव्रता, पतिप्राणा और सदा पतिकी आज्ञा माननेवाली थी, परंतु उत्तम और सुन्दर रंग-रूपवाली होते हुए भी दैवयोगसे वह पुत्रहीना थी ॥ १० ॥ उस सर्वांगसुन्दरी रानीको देखकर पुत्रहीन नृपश्रेष्ठ भीम दुखी होकर कहने लगे—सम्पूर्ण राज्यका परित्याग करके अब मुझे [किसी] श्रेष्ठ वनमें चले जाना चाहिये; क्योंकि अपुत्रकी सद्गति नहीं होती, उसे स्वर्ग या सुख नहीं प्राप्त होता। देवता उसके द्वारा दिये गये हव्यका और पितर लोग कव्यका ग्रहण नहीं करते; इसलिये मेरा तो जननीके गर्भसे जन्म लेना ही व्यर्थ हो गया। मेरे लिये [यह] राजमहल, धन-सम्पत्ति और कुल-परिवार—सब व्यर्थ है ॥ ११–१३ ॥ 'बिना पुत्रके सारे कर्म निश्चित ही व्यर्थ होते हैं'—ऐसा निश्चित मानकर उन्होंने अपने दो मन्त्रियोंको बुलाया। उनमेंसे एकका नाम मनोरंजन और दूसरेका
८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ]
नाम सुमन्तु था। वे दोनों आन्वीक्षिकी १, वेदत्रयी २ और षोडश कलाओंके ज्ञाता थे ॥ १४-१५ ॥ हे मुने! उन्होंने उसी क्षण वहाँ आकर उन राजाको नमस्कार किया, तब राजा भीमने उन दोनों [मन्त्रियों]- से कहा कि 'तुम दोनों मेरे राज्यका परिपालन करना' ॥ १६ ॥ मेरे या मेरी पत्नीके द्वारा पूर्वजन्ममें कोई पाप हुआ था, जिसके कारण हम दोनोंको दोनों लोकोंमें सुख देनेवाली सन्तान नहीं प्राप्त हुई ॥ १७ ॥ यदि मैं पुनः आ जाऊँ तो मेरा राज्य मुझे दे देना, नहीं तो तुम दोनों राज्यको बाँटकर ले लेना ॥ १८ ॥ इस प्रकारका निश्चय करके राजाने पहले स्वस्ति- पाठ कराया, फिर ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान देकर नगरसे बाहर निकले ॥ १९ ॥ वे नृपश्रेष्ठ भीम अपनी पत्नी, दोनों मन्त्रियों और नगरवासियोंके साथ गव्यूतिमात्र (दो कोस)-तक गये और वहाँसे उन सबको वापस भेज दिया ॥ २० ॥ तब उन दोनों मन्त्रियोंने कहा—'हे राजन् ! हम दोनों भी आपके साथ चलेंगे।' राजाके सुहृज्जन और उनके नगरके निवासी अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगे ॥ २१ ॥ उन सबसे राजाने कहा 'आप लोग भयभीत न हों, मैंने इन दोनों मन्त्रियोंको आप सबका अधिपति बना दिया है। जैसे मैंने आप सबका पालन किया, वैसे ही भलीभाँति ये दोनों भी करेंगे' ॥ २२ ॥ इस प्रकार उन सबको भलीभाँति आश्वासन देकर उन दोनों (मन्त्रियों)-से राजाने पुनः कहा—'मैंने राज्य आप दोनोंको दे दिया है, आप दोनों नगरकी सब प्रकारसे रक्षा करना' ॥ २३ ॥ इस प्रकार सबको छोड़कर [राजा भीम] पत्नीके साथ नगरसे बाहर चले गये। [तदनन्तर] भ्रमण करते हुए उन्होंने एक सरोवर देखा, जो कमलोंसे युक्त था ॥ २४ ॥ वह पुष्पित वृक्षोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके जलचर जीवोंसे समन्वित था। तदनन्तर उन दोनों—राजा और रानीने उस सरोवरके निकट एक रमणीय और शुभ आश्रमको देखा, जो सबके आनन्दको बढ़ानेवाला था। जहाँ जातीय वैर रखनेवाले हाथी और सिंह, नेवला और
[दायाँ स्तम्भ]
साँप, बिल्ली और चूहे आदि वैर नहीं करते थे। राजा और रानीने वहाँ वेदाध्ययन कर रहे शिष्योंसे घिरे शान्त स्वरूपवाले मुनि विश्वामित्रको देखा, जो कुशके आसनपर विराजमान थे ॥ २५-२७१/२ ॥ उन दोनों (राजा भीम और उनकी रानी)- ने उन महात्मा विश्वामित्रको दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और उनके चरणोंसे गिरकर पुनः- पुनः नमस्कार किया। मुनिश्रेष्ठ तपोनिधि विश्वामित्रने उन्हें उठाकर और राजाके आशयको जानकर स्नेहयुक्त वाणीमें कहा— ॥ २८-२९१/२ ॥ [मुनि] विश्वामित्र बोले—हे राजन् ! तुम्हारा पुत्र गुणवान् और महान् यशस्वी होगा। हे नृपश्रेष्ठ ! तुम कहाँसे आये हो ? तुम्हारे नगरका क्या नाम है ? यह सब बतलाओ, तब मैं तुम्हारे पापके नाशके लिये यत्न करूँगा ॥ ३०-३१ ॥ [राजा] भीमने कहा—हे स्वामिन् ! विदर्भ देशमें मेरा कौण्डिन्य नामक नगर है। मेरा नाम भीम है और यह चारुहासिनी मेरी पत्नी है ॥ ३२ ॥ मैंने पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या, दान, व्रत आदि अनेक यत्न किये, परंतु पूर्वजन्ममें किये गये पापोंके कारण ईश्वरको मुझपर करुणा नहीं आयी ॥ ३३ ॥ हे मुने! राज्य छोड़कर हम दोनों वन चले आये और यहाँ आपके चरणोंका दर्शन हुआ। अनेक वनोंमें घूमते-घूमते दैवके द्वारा ही मैं यहाँ पहुँचाया गया हूँ ॥ ३४ ॥ साधुजनोंकी संगति शीघ्र ही उत्तम फल देती है, इसलिये आपके आशीर्वादसे मुझे अवश्य पुत्र-प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है। हे मुने! आप विद्या और तपसे सम्पन्न, व्रत-दान-यज्ञ और स्वाध्याय करनेवाले तथा दयावान् एवं संयमी हैं; आज आपके द्वारा दिया हुआ आशीर्वाद व्यर्थ नहीं होगा ॥ ३५-३६ ॥ परंतु हे मुने! पूर्वजन्ममें मैंने कौन-सा पाप किया है, उसका क्या प्रतिकार है—यह बताइये; क्योंकि मैं आपको सर्वज्ञ मानता हूँ ॥ ३७ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] इस प्रकार उन (राजा भीम)-के वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्रने उन राजा [भीम]-से आदरपूर्वक पूर्वकालकी कथा कही ॥ ३८ ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes): १-तर्कशास्त्र, २-ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद।
उ०ख०-अ०२० ] * बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना * ८१ विश्वामित्रजी बोले- हे दुर्मते! तुमने धन- ऐश्वर्यके मदसे अन्धे होकर वेद-शास्त्र-पुराण और लोकमें प्रतिष्ठित कुलधर्मका त्याग कर दिया ॥ ३९ ॥ तुम्हारे सभी पूर्वज गणनायक गणेशजीका नित्य पूजन किया करते थे, [तुम्हारे द्वारा कुलमें की जानेवाली उस पूजाका त्याग करनेसे] उन गणेशजीके क्रोधके कारण ही तुम्हारे संतान नहीं हो रही है ॥ ४० ॥ हे महावीर! गजानन गणेशजीको जिस प्रकारसे तुम्हारे कुलका कुलदेवत्व प्राप्त हुआ, उसे बता रहा हूँ, तुम आदरपूर्वक प्रारम्भसे सुनो ॥ ४१ ॥ [तुम्हारे वंशमें] तुमसे सात पीढ़ी पहले भीम नामके एक राजा हुए थे। उनके वल्लभ नामका रूपवान् और धनसम्पन्न पुत्र था ॥ ४२ ॥ हे राजन् ! उसके भी बहुत समय बीतनेपर एक पुत्र हुआ। लेकिन वह शिशु मूक-बधिर था, उसकी देहसे अत्यन्त दुर्गन्धित पीबका स्राव होता था, साथ ही वह कुबड़ा भी था ॥ ४३१/२ ॥ उसे देखकर उसकी माँ कमला बहुत दुखी हुई। उसने अपने अन्तःकरणमें विचार किया कि लोकमें अपुत्रता ही श्लाघ्य है, न कि इस प्रकारका पुत्रवत्त्व ! क्योंकि यह तो अत्यन्त दुःखकर है ॥ ४४-४५ ॥ विधाता आज ही मेरा या इस (शिशु)-का मरण क्यों नहीं कर देता! मैं अपने प्रियजनोंको कैसे मुँह दिखाऊँगी ? ॥ ४६ ॥ इस प्रकार विलाप करती हुई वह अत्यन्त दारुण दुःखसे रोने लगी। उसके रुदनको सुनकर उसके पति [राजा वल्लभ] उस प्रसूति-कक्षमें आ गये ॥ ४७ ॥ उस प्रकारके बालक और अत्यन्त दुखी पत्नीको देखकर कर्मकी गतिको जाननेवाले [उन राजा]-ने मीठी वाणीमें [पत्नीको] सान्त्वना देते हुए कहा - ॥ ४८ ॥ हे कल्याणि ! दुःख न करो; क्योंकि कर्मोंकी गति ऐसी ही है। पूर्वजन्ममें किये हुए पापके कारण ही मनुष्य दुःखका भागी होता है ॥ ४९ ॥ जिसे दुःख प्राप्त है, उसे भी सुखकी प्राप्ति होती है; वैसे ही जिसे सुख प्राप्त है, उसे भी दुःखकी प्राप्ति होती है। इस बालकके विषयमें [तुम्हें] शोक नहीं करना चाहिये, यह ठीक हो जायगा ॥ ५० ॥ जिस प्रकारके इसके पूर्वजन्मके कर्म होंगे, उसी प्रकारका इसका भविष्य होगा। हम लोग मणि, मन्त्र और महौषधियोंका प्रयोग करके धार्मिक अनुष्ठानों एवं साधनोंके द्वारा [इसे स्वस्थ करनेका] प्रयत्न करेंगे ॥ ५१ ॥ हे सुन्दर भौंहोंवाली! तप, जप, देवपूजा और विधिपूर्वक तीर्थयात्राके द्वारा इसे ठीक करनेका प्रयत्न करेंगे। इस समय जो कर्तव्य है, उसका भलीभाँति सम्पादन करो ॥ ५२ ॥ [पतिद्वारा] इस प्रकार बोध कराये जानेपर उस साध्वीने शोकका त्याग कर दिया और तदनन्तर उस शिशुको जलसे प्रक्षालित करवाकर सखियोंके साथ प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ ५३ ॥ तदनन्तर उन राजा वल्लभने पत्नीके साथ पुत्रके समस्त जननोचित आभ्युदयिक कर्म किये और अनेक विप्रों तथा विप्रपत्नियोंका पूजन किया ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कमलापुत्र-वर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥ बीसवाँ अध्याय बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना और गणेशजीका उसे दर्शन देना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] तदनन्तर उस (राजा)-ने ब्राह्मणों, साधुओं, ज्योतिषियों और वेदज्ञोंको बुलाकर उनका रत्न, वस्त्र, धन आदिसे पूजनकर, तत्पश्चात् उनसे पूछकर उसने अपने पुत्रका नाम 'दक्ष' रखा ॥ १ १/२ ॥ उसने पुत्रको रोगसे मुक्ति दिलाने और अपनी संतानपरम्पराकी अभिवृद्धिके लिये जप और मन्त्रानुष्ठान कराये, औषधीय चिकित्सा करवायी और स्वयं भी बारह वर्षोंतक कठोर तप किया ॥ २-३ ॥ परंतु जब इतनेपर भी उस राजाने पुत्रको रोगसे मुक्त
८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
होते न देखा तो उसका धैर्य टूट गया और वह निराशा एवं क्रोधसे मूर्च्छित-सा होकर बोला— ॥ ४ ॥ हे रानी कमला ! तुम पुत्रसहित मेरे भवनसे चली जाओ, न मैं इस पुत्रको और न तुम्हें ही देखनेमें समर्थ हूँ ॥ ५ ॥ इस प्रकार [अपने पति] राजा वल्लभद्वारा भर्त्सना किये जानेपर रानी कमला अपने पुत्रको लेकर उस नगरसे वनको चल दी ॥ ६ ॥ शोकसे व्याकुल और दुखी होकर वह रोती और आँसुओंको पोंछती हुई तथा पुत्रको पीठपर लादे हुए एक ग्रामसे दूसरे ग्रामको जाती थी। भूख-प्यास और थकानसे कृश शरीरवाली उसको अत्यन्त व्याकुल होकर भिक्षावृत्तिसे जीवनयापन करना पड़ रहा था। लुटेरोंनें उसके वस्त्र और आभूषणादि भी लूट लिये थे ॥ ७-८ ॥ तदनन्तर किसी अन्य गाँवमें जाकर पुत्रको उसने एक शिव-मन्दिरमें बैठा दिया और वह स्वयं, जो कभी राजाकी प्रिय पत्नी थी, भिक्षाके लिये नगरमें भ्रमण करने लगी ॥ ९ ॥ किसी समय वह अपने पुत्रके साथ भिक्षाके लिये नगरमें गयी। [उस समय] किसी द्विजश्रेष्ठके शरीरके सम्पर्कसे आयी हुई वायुका उस बालकसे स्पर्श हुआ। उस द्विजश्रेष्ठकी भक्तिके अतिशय पुण्य-प्रभावसे उस बालकने लम्बोदर गणेशजीका साक्षात् दर्शन किया, जिससे वह नेत्रोंसे देखने और कानोंसे सुननेकी शक्तिसे सम्पन्न और दिव्य शरीरवाला हो गया ॥ १०-११ ॥ उसे देखकर और उसके द्वारा बार-बार उच्चारराकी जानेवाली मधुर एवं सुखद वाणीको सुनकर कमलाने सभी दुःखोंका त्यागकर अत्यन्त हर्षका अनुभव किया ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् कमला विचार करने लगी कि मेरा जो पुत्र मणि-मन्त्रके प्रयोगसे, महौषधियोंद्वारा चिकित्सासे और विशाल हवनात्मक अनुष्ठानोंसे भी स्वस्थ नहीं हुआ, वह [उन द्विजश्रेष्ठके शरीरके सम्पर्कवाली] वायुके स्पर्शमात्रसे कैसे स्वस्थ हो गया ! 'मैं उन दुष्कर्मनाशक पुरुष (द्विजश्रेष्ठ)-का कहाँ दर्शन कर सकूँगी ?' —यह कहती हुई वह पुत्रका आलिंगनकर
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
दुःखरहित हो गयी और उसे साथ लेकर भिक्षाके लिये उस नगरमें पुनः गयी ॥ १३-१५ ॥ [उस नगरके] नागरिकोंने उन दोनोंको सादर आमन्त्रित किया और नाना प्रकारके पक्वान्नों, शर्करा और घृतसे समन्वित खीर एवं शाकादिसे युक्त भोजन कराया ॥ १६ ॥ इस प्रकार वे दोनों दिन-प्रतिदिन उनके यहाँ भोजन करते और धन तथा नये-नये उत्तम कोटिके वस्त्र भी प्राप्त करते थे ॥ १७ ॥ [एक दिन] एक नागरिकने उस बालकसे पूछा कि तुम्हारा और तुम्हारे पिताका क्या नाम है ? तुम किस देश और किस नगरके निवासी हो ? तुम्हारी जाति क्या है ? और तुम्हारा व्यवसाय क्या है ? ॥ १८ ॥ उस नागरिकका इस प्रकारका वचन सुनकर उस बालकने अपना नाम 'दक्ष' बतलाया; तदनन्तर माँके पास आकर अपने पिता, नगर, कुल और व्यवसायके विषयमें पूछकर पुनः उस नागरिकसे कहा- [हे ब्रह्मन् !] कर्णाटकदेशान्तर्गत भानु नामक नगरमें वल्लभ नामक क्षत्रिय [राजा] हैं, जो महान् बलशाली और शत्रुसेनाओंका नाश करनेवालेके रूपमें विख्यात हैं—वे मेरे पिता हैं। उनकी कमला नामवाली यह पत्नी है और मैं दक्ष नामवाला इसका पुत्र हूँ ॥ १९-२१ ॥ हे ब्रह्मन् ! जब मैं उत्पन्न हुआ, तो अन्धा एवं बधिर था, मेरे शरीरमें अनेक घाव थे, तब माता मेरा त्याग करनेको उद्यत हो गयी ॥ २२ ॥ तब पिताने माँको ऐसा करनेसे रोका और मुझे स्वस्थ करनेके बहुत-से उपाय कराये। मेरे पिताने बारह वर्षतक तपस्या करके उसका पुण्य मुझे निवेदित किया ॥ २३ ॥ हे नागरिक ! परंतु जब तब भी मेरे शरीरमें कोई सुधार न देखा तो पिताने मुझे और माँको [भवनसे] बाहर निकाल दिया ॥ २४ ॥ यहाँ किसी [द्विजश्रेष्ठ]-के शरीरकी वायुके सम्पर्कसे मेरा शरीर सुन्दर हो गया है। माताके मुखसे कही गयी इन सब बातोंको बालक दक्षने उस नागरिकसे कहा ॥ २५ ॥
उ०ख०-अ०२० ] * बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना * ८३ इस प्रकार सुनकर उस नगरनिवासी व्यक्तिके चले जानेपर दक्ष अपनी माताको आनन्दित करते हुए उसके पास शीघ्रतापूर्वक चला गया ॥ २६॥ तब उस नगरमें रहनेवाले एक करुणापूर्ण चित्तवाले द्विजने उन दोनोंको गणेशजीकी आराधनाकी विधिका उपदेश दिया ॥ २७॥ तदनन्तर कमला और दक्ष परम शान्तिपूर्वक एक अँगुठेपर स्थित होकर तपस्या करते हुए गणेशजीकी आराधनामें संलग्न हो गये ॥ २८ ॥ [इष्ट] देव श्रीगणेशजीके नाममें चतुर्थी तथा प्रारम्भमें ओंकार लगाकर बने अष्टाक्षर¹ परम मन्त्रको वे दोनों भक्तिपूर्वक जपनेमें तत्पर हो गये ॥ २९ ॥ वायुमात्रका भक्षण करनेके कारण शुष्क शरीरवाले उन दोनोंको देखकर करुणासागर भगवान् विनायक उनके समक्ष प्रकट हो गये ॥ ३० ॥ उनका श्रीविग्रह चतुर्भुज, विशाल शरीरवाला, गजमुख, अत्यन्त सुन्दर और रात्रिमें उदय हुए अनेक सूर्योंकी प्रभाके समान कान्तिमान् था ॥ ३१ ॥ उनका मस्तक रत्नों और मोतियोंसे जटित सुवर्ण मुकुटसे सुशोभित हो रहा था, उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था तथा सोनेके बने बाजूबन्दोंसे वे अलंकृत थे ॥ ३२ ॥ एक घुटना नीचे झुकाये हुए वे उत्तम आसनपर आसीन थे। उन्होंने सुवर्णनिर्मित करधनी और रत्नजटित अँगुठी धारण कर रखी थी ॥ ३३ ॥ उनके तीन नेत्र थे, वे अपने जठरप्रदेशपर एक महासर्पको लपेटे हुए थे, उनके मुखमें एक दाँत सुशोभित था। इस प्रकारका रूप दिखाकर वे पुनः द्विजरूप हो गये ॥ ३४॥ तदनन्तर द्विजरूपधारी उन गणेशजीने कहा कि मैं तुम दोनोंकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर वरदान देनेके लिये आया हूँ, तुम दोनों अपना मनोवांछित वर माँगो ॥ ३५॥ विश्वामित्रजी बोले- [हे राजा भीम!] इस प्रकार विघ्नराज गणेशजीके प्रसन्न होने और द्विजरूपमें प्रत्यक्ष दर्शन देनेपर [दक्षने] हाथ जोड़कर परम भक्तिभावसे प्रणामकर उनसे कहा - ॥ ३६ ॥ दक्ष बोला- हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे पूर्वजन्मोंमें किये पुण्य फलित हुए हैं, जिससे मुझे आपके दो प्रकारके परम महनीय रूपोंका दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ ३७ ॥ आपके विनायकरूप और विप्ररूपका दर्शनकर मेरा जन्म सार्थक हो गया। आप कारणोंके भी परम कारण और वेदोंके भी कारणरूप हैं ॥ ३८ ॥ आप परम ज्ञेय (जाननेयोग्य), परम ब्रह्म, श्रुतिके द्वारा अनुसन्धेय, सनातन, सबके साक्षी और सबके अन्दर एवं बाहर व्याप्त हैं ॥ ३९ ॥ समस्त कार्योंके कर्ता आप ही हैं, आप ही सूक्ष्म एवं महाकाय प्राणियोंके भी कर्ता हैं। आप अनेक रूपवाले होते हुए भी एक (अद्वितीय) रूपवाले हैं, आप रूपरहित और आकाररहित भी हैं ॥ ४० ॥ आप ही शंकर हैं, आप ही विष्णु, इन्द्र, अग्नि, अर्यमा, पृथ्वी, वायु, आकाशस्वरूप तथा जल, चन्द्रमा और नक्षत्ररूप भी हैं ॥ ४१ ॥ आप ही विश्वके सृजनकर्ता, विश्वके पालनकर्ता और विश्वके संहारकर्ता हैं। आप ही इस स्थावर- जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत्के गुरुके भी संरक्षक और ज्ञान-विज्ञानवान् हैं ॥ ४२ ॥ आप ही भूत, भविष्य और वर्तमान हैं। आप ही इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता हैं। आप ही कला, काष्ठा और मुहूर्तरूप हैं तथा आप ही श्री, धृति और कान्ति हैं। आप ही सांख्य, योग [आदि दर्शन], [विविध] शास्त्र, वेद, पुराण, चौंसठ कलाएँ और उपनिषद् हैं ॥ ४३-४४ ॥ आप ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र (चारों वर्ण) हैं तथा आप ही देश, विदेश, क्षेत्र एवं पुण्य क्षेत्रोंके रूपमें स्थित हैं ॥ ४५ ॥ आप ही प्रमेय (प्रमाणित किये जानेयोग्य) और अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे) हैं। आप ही योगियोंको ज्ञानद्वारा अधिगत होते हैं। आप ही स्वर्ग, पाताल, वन १. ॐ गं गणपतये नमः।
८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- और उपवन हैं ॥ ४६ ॥ आप ही औषधियाँ, लता, वृक्ष, कन्द, मूल और फल हैं तथा आप ही अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्जरूप [जीव] हैं ॥ ४७ ॥ आप ही काम, क्रोध, क्षुधा, लोभ, दम्भ (आत्मश्लाघा), दर्प (अभिमान), दया (करुणा), क्षमा, निद्रा, तन्द्रा (शैथिल्य), विलास, हर्ष और शोक हैं* ॥ ४८ ॥ विश्वामित्रजी बोले—[हे राजन्!] दक्षके इस प्रकारके वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए विनायक श्रीगणेशजीने मन्द हास्य करते हुए मेघसदृश गम्भीर वाणीमें उससे कहा— ॥ ४९ ॥ गजानन (गणेशजी) बोले—हे महाभाग! तुम्हारे द्वारा की गयी इस गम्भीर स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें वरदान देनेके लिये यद्यपि अत्यन्त उत्कण्ठित हूँ, फिर भी नहीं दे रहा हूँ; क्योंकि यदि मैं तुम्हें वर दे देता हूँ तो मेरा भक्त मुझपर ही नाराज हो जायगा। मेरा वही भक्त तुम्हें वरदान देगा, जिसके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शसे तुम्हें नेत्र और श्रोत्रसे समन्वित दिव्य देहकी प्राप्ति हुई है। मैं उसका नाम भी बतलाता हूँ, उसका नाम मुद्गल है ॥ ५०-५२ ॥ तुम्हारे द्वारा ध्यान करनेमात्रसे वे विप्रश्रेष्ठ तुम्हें दर्शन देंगे। तुम जो-जो कामनाएँ करोगे, वे उन सबको पूर्ण करेंगे ॥ ५३ ॥ इस प्रकार कहकर वे परमात्मा [श्रीगणेशजी] वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्धान हो जानेपर अत्यन्त दुखित होकर [बालक] दक्ष वैसे ही रुदन करने लगा, जैसे दरिद्र निधि पा गया हो और उसके खो जानेपर रुदन करता है अथवा गायके चले जानेपर उसका बछड़ा अत्यन्त [करुण स्वरसे] रँभाता है ॥ ५४-५५ ॥ विघ्नविनायक गणेशजी कहाँ गये? कहाँ चले गये?—इस प्रकार बार-बार कहते हुए और अपने दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वह धरतीपर गिर पड़ा ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दक्षककृत विनायकस्तुतिवर्णन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय राजकुमार दक्षकी मुद्गलसे भेंट और मुद्गलका उसे गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका उपदेश देना [मुनि] विश्वामित्रजी बोले—[हे राजा भीम!] अत्यन्त विह्वल वल्लभपुत्र दक्ष इधर-उधर घूमता और दौड़ता रहा, उसे अपने वस्त्रों और आभूषणोंका भी ज्ञान न रहा ॥ १ ॥ वह मार्गमें ब्राह्मणों और [यहाँतक कि] वृक्षोंसे भी विनायक (श्रीगणेशजी)-के विषयमें पूछ रहा था कि विघ्नविनायक श्रीगणेशजी कहाँ चले गये? आप लोगोंने उन्हें कहीं देखा हो तो मुझे बतलाइये ॥ २ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार उसका चित्त भ्रान्त हो गया था और उसके नेत्र घूम रहे थे। [इसी दशामें] वह भूतलपर
- परं ज्ञेयं परं ब्रह्म श्रुतिमृग्यं सनातनम्। त्वमेव साक्षी सर्वस्य सर्वस्यान्तर्बहिस्तथा ॥ त्वमेव कर्ता कार्याणां लघुस्थूलशरीरिणाम्। नानारूप्येकरूपी त्वं निरूपश्च निराकृतिः ॥ त्वमेव शङ्करो विष्णुस्त्वमेवेन्द्रोनलोऽर्यमा । भूवायुखस्वरूपोऽपि जलसोमर्क्षरूपवान् ॥ विश्वकर्ता विश्वपाता विश्वसंहारकारकः । चराचरगुरोर्गोप्ता ज्ञानविज्ञानवानपि ॥ भूतं भावि भवच्चैव त्वमेवेन्द्रियदेवताः । कला काष्ठा मुहूर्ताश्च श्रीर्धृतिः कान्तिरेव च ॥ त्वमेव सांख्यं योगश्च शास्त्राणि श्रुतिरेव च। पुराणानि चतुःषष्टिः कला उपनिषत्तथा ॥ त्वमेव ब्राह्मणो वैश्यः क्षत्रियः शूद्र एव च । देशो विदेशस्त्वं क्षेत्रं पुण्यक्षेत्राणि यान्युत ॥ त्वं प्रमेयोऽप्रमेयश्च योगिनां ज्ञानगोचरः । त्वमेव स्वर्गः पातालं वनान्युपवनानि च ॥ ओषध्योऽथ लतावृक्षकन्दमूलफलानि च । अण्डजा जारजा जीवाः स्वेदजा उद्भ्रिजा अपि ॥ कामः क्रोधः क्षुधा लोभो दम्भो दर्पो दया क्षमा। निद्रा तन्द्री विलासश्च हर्षः शोकस्त्वमेव च ॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड २०। ३९-४८)
उ०ख०-अ०२१ ] * राजकुमार दक्षकी मुद्गलसे भेंट * ८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गिर पड़ा तथा क्षणभरके लिये चेतनाहीन हो गया॥ ३॥ इसी बीच स्वप्न (अर्धचेतनावस्था)-में उस [बालक दक्ष]-ने अपने आगे खड़े हुए ब्राह्मणको देखा, [जो कह रहा था—] हे बालक! मुझ मुद्गलने तुम्हें तुम्हारा इच्छित वह सब कुछ दे दिया, जिसकी पूर्वकालमें तुमने विघ्नेश्वर गणेशजीका दर्शन होनेपर याचना की थी। हे नृपोत्तम! इस प्रकार कहकर उस ब्राह्मणके [वहाँसे] प्रस्थान कर जानेपर दक्ष सुप्तावस्थासे जाग्रत् होनेकी भाँति उठ बैठा। उस समय उसका मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया था। उसी समय आये हुए एक द्विजसे उसने [ब्राह्मणश्रेष्ठ मुद्गलके विषयमें] पूछा— ॥४-६॥ तब उस ब्राह्मणने निकट ही स्थित, गजानन गणेशजीके अत्यन्त भक्त और उनकी भक्तिमें संलग्न रहनेवाले मुद्गलके परम दिव्य आश्रमका दर्शन कराया, जो अनेक शिष्योंसे शोभायमान और सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अभयप्रद था। मनमें मुद्गलका ध्यान करते और घूमते हुए दक्ष उनके आश्रममें पहुँचा, जो कि अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे युक्त और रमणीयतामें [यक्षराज कुबेरकी नगरी] अलकापुरी [-में स्थित चैत्ररथ वन] एवं [देवराज इन्द्रकी नगरी अमरावतीमें स्थित] नन्दनवनका भी अतिक्रमण कर रहा था। वहाँ उसने अत्यन्त मूल्यवान् आसनपर आसीन द्विज मुद्गलका दर्शन किया; जो सूर्यके समान तेजस्वी, योगबलसे अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ, वेद-वेदांगोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें निष्णात थे॥ ७-१०॥ वे भगवान् विनायक गणेशजीकी रत्नजटित सुवर्णमयी महान् मूर्ति; जो चार भुजाओं और तीन नेत्रोंवाली तथा अनेक प्रकारके अलंकारोंसे शोभायमान थी, का षोडशोपचारोंसे विधि-विधानपूर्वक पूजन कर रहे थे। उन्हें देखकर दक्षने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति लेटकर प्रणाम किया। [उस समय] उसके नेत्रोंसे आँसू गिर रहे थे और वह बार-बार लम्बी साँसें ले रहा था ॥ ११-१२१/२ ॥ विश्वामित्रजी कहते हैं—[हे राजन्!] तब मुद्गलजीने उससे पूछा कि तुम कौन हो और यहाँ किसलिये आये हो?॥ १३॥ कहो, तुम्हारा दुःख दूर करूँगा, तुम्हें क्या दुःख है? सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाओ। तब ब्राह्मणके इस प्रकारके वचनको सुनकर कमलानन्दन दक्षने सावधानमन होकर उन द्विजश्रेष्ठसे कहा— ॥ १४१/२ ॥ दक्ष बोला—हे ब्रह्मन्! मैं अपने अभिप्रायको सत्य-सत्य आपके समक्ष कह रहा हूँ— ॥ १५ ॥ कर्णाटदेशके अन्तर्गत भानु नामक नगरमें वल्लभ नामके नीतिमान्, ज्ञानी, दानी और दयालु राजा हुए ॥ १६ ॥ उनकी भार्या कमलाने जब मुझे जन्म दिया, तब मैं दुर्गन्धियुक्त था, मेरे शरीरमें घाव थे और मेरी नासिकासे रक्तस्राव हो रहा था ॥ १७ ॥ मैं अन्धा, कुबड़ा, बधिर और मूक था तथा जोर- जोरसे श्वास ले रहा था। मुझे देखकर वहाँके नागरिकोंने कहा कि इसका त्याग कर दीजिये ॥ १८ ॥ मेरे पिताने बारह वर्षोंतक मुझे स्वस्थ करनेके अनेक प्रयत्न किये; [यहाँतक कि भगवान् शंकरको उद्देश्यकर घोर तपस्या की।] परंतु वे महेश्वरसे भी मेरे स्वास्थ्यके सन्दर्भमें कुछ न प्राप्त कर सके, तब निर्दयी अन्तःकरणवाले होकर उन्होंने मुझे और मेरी माता कमलाको बाहर निकाल दिया ॥ १९-२०॥ तब मेरी दुखी माता एक पुर-से-दूसरे पुरमें मुझे साथ लेकर भ्रमण करती हुई भूखसे पीड़ित होकर कौण्डिन्यपुर आयी। यहाँ आकर भिक्षाटन करते हुए हम दोनोंको पूर्वजन्मोंके पुण्योंके प्रभावसे आपके वैसे ही दर्शन हो गये, जैसे अन्धेको आँखें मिल गयी हों ॥ २१-२२ ॥ आपके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शके प्रभावसे मेरे सारे दोष चले गये और जैसे पूर्वकालमें रघुनाथ श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके स्पर्शसे अहल्याको दिव्य शरीरकी प्राप्ति हो गयी थी, हे सुव्रत! वैसे ही आपके कृपाप्रसादसे मुझे भी दिव्य देहकी प्राप्ति हो गयी। [इस विषयमें] मुझे तो कुछ ज्ञात नहीं था, मेरी माताने ही मुझे सब कुछ बतलाया ॥ २३-२४ ॥ तब आश्चर्यचकित होकर मैंने अपने हृदयमें निश्चय किया कि जिसके शरीरके सम्पर्कमें आयी
८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
वायुके स्पर्शसे मुझे दिव्य देहकी प्राप्ति हुई है, जब मुझे उसका दर्शन होगा, तभी मैं यह देह धारण करूँगा अर्थात् जीवित रहूँगा—ऐसा सोचकर मैं बहुत दिनोंतक भ्रमण करता रहा, तब हम दोनों [माता-पुत्र]-की तपस्यासे सन्तुष्ट होकर वे करुणानिधान देवाधिदेव भगवान् गजानन (गणेशजी) मेरे सामने प्रकट हुए। उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान थी ॥ २५–२७॥ उनका दर्शनकर [मेरी माता] कमलाकी मनोभिलषित समस्त कामनाएँ पूर्ण हो गयीं। तब उन ब्राह्मणदेवताने प्रसन्न होकर मधुरवाणीमें कहा—जिसके [दर्शनके] लिये तुमने तपस्यारूपी व्रतका नियम लिया था और भ्रमण करते हुए कष्ट उठा रहे थे, वही मैं ब्राह्मणश्रेष्ठ मुद्गल तुम्हें दर्शन दे रहा हूँ। उनका वचन सुनकर मेरा मन हर्षित हो गया, तदनन्तर मैंने गजानन गणेशजीका अनेक स्तोत्रोंसे स्तवन किया ॥ २८–३०॥ तब अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने कहा—'हे महाबुद्धिमान् [दक्ष] ! तुम वर माँगो।' तब मेरे मनमें जो भी अभिलाषाएँ थीं, वे सब मैंने उनसे कहीं ॥ ३१ ॥ तब उन्होंने उस ब्राह्मणरूपका त्यागकर अन्य रूप धारण किया, जो चार भुजाओं और विशाल शरीरवाला था। उनके सिरपर मुकुट था और वे अपने चारों हाथोंमें क्रमशः परशु (फरसा), कमल, माला तथा मोदक लिये हुए थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा था और उनके [मुखमें] एक दाँत और सूँड शोभायमान थे। उन्होंने कानोंमें दो कुण्डल धारण कर रखे थे, जो दूसरे दो सूर्यबिम्बोंके सदृश प्रतीत हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत था और उनके उदरप्रदेशपर सर्प वलयाकार लिपटे हुए थे ॥ ३२–३४॥ देवर्षियों, गन्धर्वगणों और किन्नरोंसे उपशोभित उनके उस रूपको देखकर मैं आनन्दसे उसी प्रकार परिपूर्ण हो गया, जैसे पूर्णिमासीके चन्द्रमाको देखकर समुद्र [आनन्दसे] पूर्ण हो जाता है। तब उन गजानन गणेशजीने कहा कि [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुद्गल तुम्हारी समस्त कामनाओंको पूर्ण कर देंगे ॥ ३५-३६ ॥ जबतक मैं [गणेशजीके] उस रूपको आदरपूर्वक देख पाता, तबतक वह वैसे ही अन्तर्हित हो गया, जैसे जग जानेपर स्वप्न नहीं दिखायी देता ॥ ३७ ॥ तब मैं अत्यन्त दुखी होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया, तदनन्तर पुनः चेतना आनेपर गणेशजीके 'वर माँगो'—इस वचनका स्मरण करते हुए मैंने उन सर्वव्यापी ईश्वर देवाधिदेवसे याचना की कि 'मेरे घरमें सुस्थिर लक्ष्मीका वास हो और वैसे ही मेरे मनमें आपके प्रति सुस्थिर (दृढ़) भक्ति हो ॥ ३८-३९ ॥ पूर्वजन्मोंमें किये गये पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप मुझे आपके दर्शन हुए हैं, आप मुझे ये दो वर प्रदान करें।' तदनन्तर मुझे आकाशवाणी सुनायी दी कि 'मैंने तुम्हें वरदान दे दिये' ॥ ४० ॥ हे विप्र ! तब हर्षित मनवाला होकर मैं आपके सान्निध्यमें आया हूँ। आप मुद्गल ही गजानन हैं और आप गजानन ही मुद्गल हैं—ऐसा मेरे मनमें स्पष्ट प्रतीत होता है कि सब कुछ गजानन ही हैं ॥ ४१ १/२ ॥ भृगुजी बोले—उसका (दक्षका) इस प्रकारका वचन सुनकर मुद्गलने कहा— हे कमलापुत्र ! तुम भाग्यशाली हो, कृतकृत्य हो, भक्त हो; तुम्हारी भक्तिकी महिमाका कथन करनेमें कोई सक्षम नहीं है ॥ ४२-४३ ॥ मैं एक हजार वर्षोंसे तपस्यामें सुदृढ़ हूँ, फिर भी मुझे परमात्माका इस प्रकारसे दर्शन कभी नहीं हुआ ॥ ४४ ॥ जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, स्थावर-जंगमात्मक सभी प्राणियोंके गुरुके भी गुरु हैं, जो राजस-सात्त्विक और तामस गुणोंके प्रेरक और तीनों गुणोंके नित्य आश्रय हैं, जो ब्रह्मा, शिव और विष्णुके शरीरोंके सृजनकर्ता हैं, जो प्राणियों; विभूतियों; तन्मात्राओं; इन्द्रियों और बुद्धिके भी कर्ता हैं, जिसे देवता; वेद और ऋषिगण भी सम्यक् रूपसे नहीं जानते हैं—ऐसे गजानन गणेशजीका स्पष्ट रूपसे तुमने प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया! मैं आपके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; क्योंकि आप परम भक्तिमान् हैं ॥ ४५–४७ १/२ ॥ भृगुजी कहते हैं— [हे राजन्!] तदनन्तर उन दोनोंने परस्पर प्रणाम करके एक-दूसरेका आलिंगन किया। समान चित्तवाले वे दोनों गुरुभाई उसी अवस्थामें
उ०ख०-अ०२२ ] * दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति * ८७ बहुत देरतक स्थित रहे। तदनन्तर विनम्र राजपुत्रको मुद्गलने जप और ध्यानसहित एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और उससे पुनः कहा कि तुम इस मन्त्रका प्रतिदिन अनुष्ठान करो, इससे गजानन गणेशजी तुमपर प्रसन्न हो जायेंगे और जो भी तुम्हारी मनोऽभिलाषाएँ हैं, उन सबको प्रदान करेंगे ॥ ४८-५१॥ यदि इस मन्त्रका तुम त्याग कर दोगे, तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायगा। इस लोकमें यदि तुम सुदीर्घ कालपर्यन्त गणेशजीकी भक्ति-उपासनामें निरत रहोगे, तो इन्द्रादि लोकपालगण* भी तुम्हारे वशमें रहेंगे। तुम इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोगकर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करोगे ॥ ५२-५३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रोपदेशवर्णन' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति और बल्लालविनायककी महिमाका वर्णन
राजा बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! आपने कमलापुत्र दक्षकी चेष्टाओंसे सम्बन्धित आश्चर्यजनक वृत्तान्तका वर्णन किया, [जिसे सुनकर मेरे मनमें] महान् विस्मय उत्पन्न हो गया है ॥ १ ॥ जिसके घावयुक्त शरीरसे रक्तका स्राव हो रहा था, साथ ही जिससे सड़े हुए मांसकी दुर्गन्ध आ रही थी— ऐसे अन्धे, कुबड़े, गूँगे, अपवित्र और जिसकी श्वासमात्र चल रही थी, वह [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुद्गलके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शसे कैसे दिव्य देहवाला हो गया ? और वह किस पुण्यके प्रभावसे किस पापसे मुक्त हुआ ? ॥ २-३ ॥ हे देव ! जिन्होंने दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम तपस्या की थी, उन (मुद्गलजी)-को [अपने इष्टदेवका] दर्शन क्यों नहीं हुआ था ? ॥ ४ ॥ वल्लभपुत्र दक्ष पूर्वजन्ममें कौन था ? और उसे देवाधिदेव गजानन गणेशजीका बिना किसी कष्टके प्रत्यक्ष दर्शन कैसे हो गया ? ॥ ५ ॥ हे सर्वज्ञ ! ऐसा मेरे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है, आप इसका निराकरण करें। आपको नमस्कार है। गजानन (गणेशजी)-की कथारूपिणी सुधाका नित्य पान करते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ६ ॥
विश्वामित्रजी बोले—हे राजन् ! आपने सम्यक् प्रश्न किया है, आपके संशयका निवारण करनेके लिये मैं सम्यक् रूपसे सम्पूर्ण कथा कहता हूँ। हे नृप ! इसे एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो ॥ ७ ॥ सिन्धुदेशमें पल्ली नामकी नगरी थी, जो अत्यन्त विख्यात थी। उस नगरीमें कल्याण नामवाला एक धनवान् वैश्यश्रेष्ठ था ॥ ८ ॥ वह उदार, समृद्ध, बुद्धिमान् और देवताओं एवं ब्राह्मणोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला था। उसकी सुन्दर स्वरूपवाली पत्नी इन्दुमती नामसे विख्यात थी ॥ ९ ॥ वह पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली, पतिको प्राणोंसे भी प्रिय माननेवाली और पतिके वचनोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली थी। कुछ समय बाद उनके एक गुणवान् और उत्तम पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥ कल्याणने उस अवसरपर ब्राह्मणोंको पर्याप्त मात्रामें गौएँ, वस्त्र, आभूषण, रत्न, स्वर्ण और दक्षिणा दी ॥ ११ ॥ तब ज्योतिषियोंद्वारा बतलानेपर उसने पुत्रका शुभ नाम बल्लाल रखा। बलशाली होनेके कारण वह इसी नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १२ ॥
- यहाँ इन्द्रादि लोकपालगणोंसे इन्द्रादि दस दिक्पालोंका बोध करना चाहिये; क्योंकि लोकपालके रूपमें गणेश, देवी दुर्गा, वायु, आकाश और दोनों अश्विनीकुमारोंका ही प्रायः बोध होता है— गणेशश्चाम्बिका वायुराकाशश्चाश्विनौ तथा। ग्रहाणामुत्तरे पञ्च लोकपालाः प्रकीर्तिताः ॥ (स्कन्दपुराण) दस दिक्पाल इस प्रकार हैं—१. इन्द्र, २. अग्नि, ३. यम, ४. निर्ऋति, ५. वरुण, ६. वायु, ७. कुबेर, ८. ईशान, ९. ब्रह्मा तथा १०. अनन्त।