भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 656 में से

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पृष्ठ 88

८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

वायुके स्पर्शसे मुझे दिव्य देहकी प्राप्ति हुई है, जब मुझे उसका दर्शन होगा, तभी मैं यह देह धारण करूँगा अर्थात् जीवित रहूँगा—ऐसा सोचकर मैं बहुत दिनोंतक भ्रमण करता रहा, तब हम दोनों [माता-पुत्र]-की तपस्यासे सन्तुष्ट होकर वे करुणानिधान देवाधिदेव भगवान् गजानन (गणेशजी) मेरे सामने प्रकट हुए। उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान थी ॥ २५–२७॥ उनका दर्शनकर [मेरी माता] कमलाकी मनोभिलषित समस्त कामनाएँ पूर्ण हो गयीं। तब उन ब्राह्मणदेवताने प्रसन्न होकर मधुरवाणीमें कहा—जिसके [दर्शनके] लिये तुमने तपस्यारूपी व्रतका नियम लिया था और भ्रमण करते हुए कष्ट उठा रहे थे, वही मैं ब्राह्मणश्रेष्ठ मुद्गल तुम्हें दर्शन दे रहा हूँ। उनका वचन सुनकर मेरा मन हर्षित हो गया, तदनन्तर मैंने गजानन गणेशजीका अनेक स्तोत्रोंसे स्तवन किया ॥ २८–३०॥ तब अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने कहा—'हे महाबुद्धिमान् [दक्ष] ! तुम वर माँगो।' तब मेरे मनमें जो भी अभिलाषाएँ थीं, वे सब मैंने उनसे कहीं ॥ ३१ ॥ तब उन्होंने उस ब्राह्मणरूपका त्यागकर अन्य रूप धारण किया, जो चार भुजाओं और विशाल शरीरवाला था। उनके सिरपर मुकुट था और वे अपने चारों हाथोंमें क्रमशः परशु (फरसा), कमल, माला तथा मोदक लिये हुए थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा था और उनके [मुखमें] एक दाँत और सूँड शोभायमान थे। उन्होंने कानोंमें दो कुण्डल धारण कर रखे थे, जो दूसरे दो सूर्यबिम्बोंके सदृश प्रतीत हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत था और उनके उदरप्रदेशपर सर्प वलयाकार लिपटे हुए थे ॥ ३२–३४॥ देवर्षियों, गन्धर्वगणों और किन्नरोंसे उपशोभित उनके उस रूपको देखकर मैं आनन्दसे उसी प्रकार परिपूर्ण हो गया, जैसे पूर्णिमासीके चन्द्रमाको देखकर समुद्र [आनन्दसे] पूर्ण हो जाता है। तब उन गजानन गणेशजीने कहा कि [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुद्गल तुम्हारी समस्त कामनाओंको पूर्ण कर देंगे ॥ ३५-३६ ॥ जबतक मैं [गणेशजीके] उस रूपको आदरपूर्वक देख पाता, तबतक वह वैसे ही अन्तर्हित हो गया, जैसे जग जानेपर स्वप्न नहीं दिखायी देता ॥ ३७ ॥ तब मैं अत्यन्त दुखी होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया, तदनन्तर पुनः चेतना आनेपर गणेशजीके 'वर माँगो'—इस वचनका स्मरण करते हुए मैंने उन सर्वव्यापी ईश्वर देवाधिदेवसे याचना की कि 'मेरे घरमें सुस्थिर लक्ष्मीका वास हो और वैसे ही मेरे मनमें आपके प्रति सुस्थिर (दृढ़) भक्ति हो ॥ ३८-३९ ॥ पूर्वजन्मोंमें किये गये पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप मुझे आपके दर्शन हुए हैं, आप मुझे ये दो वर प्रदान करें।' तदनन्तर मुझे आकाशवाणी सुनायी दी कि 'मैंने तुम्हें वरदान दे दिये' ॥ ४० ॥ हे विप्र ! तब हर्षित मनवाला होकर मैं आपके सान्निध्यमें आया हूँ। आप मुद्गल ही गजानन हैं और आप गजानन ही मुद्गल हैं—ऐसा मेरे मनमें स्पष्ट प्रतीत होता है कि सब कुछ गजानन ही हैं ॥ ४१ १/२ ॥ भृगुजी बोले—उसका (दक्षका) इस प्रकारका वचन सुनकर मुद्गलने कहा— हे कमलापुत्र ! तुम भाग्यशाली हो, कृतकृत्य हो, भक्त हो; तुम्हारी भक्तिकी महिमाका कथन करनेमें कोई सक्षम नहीं है ॥ ४२-४३ ॥ मैं एक हजार वर्षोंसे तपस्यामें सुदृढ़ हूँ, फिर भी मुझे परमात्माका इस प्रकारसे दर्शन कभी नहीं हुआ ॥ ४४ ॥ जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, स्थावर-जंगमात्मक सभी प्राणियोंके गुरुके भी गुरु हैं, जो राजस-सात्त्विक और तामस गुणोंके प्रेरक और तीनों गुणोंके नित्य आश्रय हैं, जो ब्रह्मा, शिव और विष्णुके शरीरोंके सृजनकर्ता हैं, जो प्राणियों; विभूतियों; तन्मात्राओं; इन्द्रियों और बुद्धिके भी कर्ता हैं, जिसे देवता; वेद और ऋषिगण भी सम्यक् रूपसे नहीं जानते हैं—ऐसे गजानन गणेशजीका स्पष्ट रूपसे तुमने प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया! मैं आपके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; क्योंकि आप परम भक्तिमान् हैं ॥ ४५–४७ १/२ ॥ भृगुजी कहते हैं— [हे राजन्!] तदनन्तर उन दोनोंने परस्पर प्रणाम करके एक-दूसरेका आलिंगन किया। समान चित्तवाले वे दोनों गुरुभाई उसी अवस्थामें

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