श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०२१ ] * राजकुमार दक्षकी मुद्गलसे भेंट * ८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गिर पड़ा तथा क्षणभरके लिये चेतनाहीन हो गया॥ ३॥ इसी बीच स्वप्न (अर्धचेतनावस्था)-में उस [बालक दक्ष]-ने अपने आगे खड़े हुए ब्राह्मणको देखा, [जो कह रहा था—] हे बालक! मुझ मुद्गलने तुम्हें तुम्हारा इच्छित वह सब कुछ दे दिया, जिसकी पूर्वकालमें तुमने विघ्नेश्वर गणेशजीका दर्शन होनेपर याचना की थी। हे नृपोत्तम! इस प्रकार कहकर उस ब्राह्मणके [वहाँसे] प्रस्थान कर जानेपर दक्ष सुप्तावस्थासे जाग्रत् होनेकी भाँति उठ बैठा। उस समय उसका मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया था। उसी समय आये हुए एक द्विजसे उसने [ब्राह्मणश्रेष्ठ मुद्गलके विषयमें] पूछा— ॥४-६॥ तब उस ब्राह्मणने निकट ही स्थित, गजानन गणेशजीके अत्यन्त भक्त और उनकी भक्तिमें संलग्न रहनेवाले मुद्गलके परम दिव्य आश्रमका दर्शन कराया, जो अनेक शिष्योंसे शोभायमान और सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अभयप्रद था। मनमें मुद्गलका ध्यान करते और घूमते हुए दक्ष उनके आश्रममें पहुँचा, जो कि अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे युक्त और रमणीयतामें [यक्षराज कुबेरकी नगरी] अलकापुरी [-में स्थित चैत्ररथ वन] एवं [देवराज इन्द्रकी नगरी अमरावतीमें स्थित] नन्दनवनका भी अतिक्रमण कर रहा था। वहाँ उसने अत्यन्त मूल्यवान् आसनपर आसीन द्विज मुद्गलका दर्शन किया; जो सूर्यके समान तेजस्वी, योगबलसे अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ, वेद-वेदांगोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें निष्णात थे॥ ७-१०॥ वे भगवान् विनायक गणेशजीकी रत्नजटित सुवर्णमयी महान् मूर्ति; जो चार भुजाओं और तीन नेत्रोंवाली तथा अनेक प्रकारके अलंकारोंसे शोभायमान थी, का षोडशोपचारोंसे विधि-विधानपूर्वक पूजन कर रहे थे। उन्हें देखकर दक्षने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति लेटकर प्रणाम किया। [उस समय] उसके नेत्रोंसे आँसू गिर रहे थे और वह बार-बार लम्बी साँसें ले रहा था ॥ ११-१२१/२ ॥ विश्वामित्रजी कहते हैं—[हे राजन्!] तब मुद्गलजीने उससे पूछा कि तुम कौन हो और यहाँ किसलिये आये हो?॥ १३॥ कहो, तुम्हारा दुःख दूर करूँगा, तुम्हें क्या दुःख है? सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाओ। तब ब्राह्मणके इस प्रकारके वचनको सुनकर कमलानन्दन दक्षने सावधानमन होकर उन द्विजश्रेष्ठसे कहा— ॥ १४१/२ ॥ दक्ष बोला—हे ब्रह्मन्! मैं अपने अभिप्रायको सत्य-सत्य आपके समक्ष कह रहा हूँ— ॥ १५ ॥ कर्णाटदेशके अन्तर्गत भानु नामक नगरमें वल्लभ नामके नीतिमान्, ज्ञानी, दानी और दयालु राजा हुए ॥ १६ ॥ उनकी भार्या कमलाने जब मुझे जन्म दिया, तब मैं दुर्गन्धियुक्त था, मेरे शरीरमें घाव थे और मेरी नासिकासे रक्तस्राव हो रहा था ॥ १७ ॥ मैं अन्धा, कुबड़ा, बधिर और मूक था तथा जोर- जोरसे श्वास ले रहा था। मुझे देखकर वहाँके नागरिकोंने कहा कि इसका त्याग कर दीजिये ॥ १८ ॥ मेरे पिताने बारह वर्षोंतक मुझे स्वस्थ करनेके अनेक प्रयत्न किये; [यहाँतक कि भगवान् शंकरको उद्देश्यकर घोर तपस्या की।] परंतु वे महेश्वरसे भी मेरे स्वास्थ्यके सन्दर्भमें कुछ न प्राप्त कर सके, तब निर्दयी अन्तःकरणवाले होकर उन्होंने मुझे और मेरी माता कमलाको बाहर निकाल दिया ॥ १९-२०॥ तब मेरी दुखी माता एक पुर-से-दूसरे पुरमें मुझे साथ लेकर भ्रमण करती हुई भूखसे पीड़ित होकर कौण्डिन्यपुर आयी। यहाँ आकर भिक्षाटन करते हुए हम दोनोंको पूर्वजन्मोंके पुण्योंके प्रभावसे आपके वैसे ही दर्शन हो गये, जैसे अन्धेको आँखें मिल गयी हों ॥ २१-२२ ॥ आपके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शके प्रभावसे मेरे सारे दोष चले गये और जैसे पूर्वकालमें रघुनाथ श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके स्पर्शसे अहल्याको दिव्य शरीरकी प्राप्ति हो गयी थी, हे सुव्रत! वैसे ही आपके कृपाप्रसादसे मुझे भी दिव्य देहकी प्राप्ति हो गयी। [इस विषयमें] मुझे तो कुछ ज्ञात नहीं था, मेरी माताने ही मुझे सब कुछ बतलाया ॥ २३-२४ ॥ तब आश्चर्यचकित होकर मैंने अपने हृदयमें निश्चय किया कि जिसके शरीरके सम्पर्कमें आयी