श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- और उपवन हैं ॥ ४६ ॥ आप ही औषधियाँ, लता, वृक्ष, कन्द, मूल और फल हैं तथा आप ही अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्जरूप [जीव] हैं ॥ ४७ ॥ आप ही काम, क्रोध, क्षुधा, लोभ, दम्भ (आत्मश्लाघा), दर्प (अभिमान), दया (करुणा), क्षमा, निद्रा, तन्द्रा (शैथिल्य), विलास, हर्ष और शोक हैं* ॥ ४८ ॥ विश्वामित्रजी बोले—[हे राजन्!] दक्षके इस प्रकारके वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए विनायक श्रीगणेशजीने मन्द हास्य करते हुए मेघसदृश गम्भीर वाणीमें उससे कहा— ॥ ४९ ॥ गजानन (गणेशजी) बोले—हे महाभाग! तुम्हारे द्वारा की गयी इस गम्भीर स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें वरदान देनेके लिये यद्यपि अत्यन्त उत्कण्ठित हूँ, फिर भी नहीं दे रहा हूँ; क्योंकि यदि मैं तुम्हें वर दे देता हूँ तो मेरा भक्त मुझपर ही नाराज हो जायगा। मेरा वही भक्त तुम्हें वरदान देगा, जिसके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शसे तुम्हें नेत्र और श्रोत्रसे समन्वित दिव्य देहकी प्राप्ति हुई है। मैं उसका नाम भी बतलाता हूँ, उसका नाम मुद्गल है ॥ ५०-५२ ॥ तुम्हारे द्वारा ध्यान करनेमात्रसे वे विप्रश्रेष्ठ तुम्हें दर्शन देंगे। तुम जो-जो कामनाएँ करोगे, वे उन सबको पूर्ण करेंगे ॥ ५३ ॥ इस प्रकार कहकर वे परमात्मा [श्रीगणेशजी] वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्धान हो जानेपर अत्यन्त दुखित होकर [बालक] दक्ष वैसे ही रुदन करने लगा, जैसे दरिद्र निधि पा गया हो और उसके खो जानेपर रुदन करता है अथवा गायके चले जानेपर उसका बछड़ा अत्यन्त [करुण स्वरसे] रँभाता है ॥ ५४-५५ ॥ विघ्नविनायक गणेशजी कहाँ गये? कहाँ चले गये?—इस प्रकार बार-बार कहते हुए और अपने दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वह धरतीपर गिर पड़ा ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दक्षककृत विनायकस्तुतिवर्णन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय राजकुमार दक्षकी मुद्गलसे भेंट और मुद्गलका उसे गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका उपदेश देना [मुनि] विश्वामित्रजी बोले—[हे राजा भीम!] अत्यन्त विह्वल वल्लभपुत्र दक्ष इधर-उधर घूमता और दौड़ता रहा, उसे अपने वस्त्रों और आभूषणोंका भी ज्ञान न रहा ॥ १ ॥ वह मार्गमें ब्राह्मणों और [यहाँतक कि] वृक्षोंसे भी विनायक (श्रीगणेशजी)-के विषयमें पूछ रहा था कि विघ्नविनायक श्रीगणेशजी कहाँ चले गये? आप लोगोंने उन्हें कहीं देखा हो तो मुझे बतलाइये ॥ २ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार उसका चित्त भ्रान्त हो गया था और उसके नेत्र घूम रहे थे। [इसी दशामें] वह भूतलपर
- परं ज्ञेयं परं ब्रह्म श्रुतिमृग्यं सनातनम्। त्वमेव साक्षी सर्वस्य सर्वस्यान्तर्बहिस्तथा ॥ त्वमेव कर्ता कार्याणां लघुस्थूलशरीरिणाम्। नानारूप्येकरूपी त्वं निरूपश्च निराकृतिः ॥ त्वमेव शङ्करो विष्णुस्त्वमेवेन्द्रोनलोऽर्यमा । भूवायुखस्वरूपोऽपि जलसोमर्क्षरूपवान् ॥ विश्वकर्ता विश्वपाता विश्वसंहारकारकः । चराचरगुरोर्गोप्ता ज्ञानविज्ञानवानपि ॥ भूतं भावि भवच्चैव त्वमेवेन्द्रियदेवताः । कला काष्ठा मुहूर्ताश्च श्रीर्धृतिः कान्तिरेव च ॥ त्वमेव सांख्यं योगश्च शास्त्राणि श्रुतिरेव च। पुराणानि चतुःषष्टिः कला उपनिषत्तथा ॥ त्वमेव ब्राह्मणो वैश्यः क्षत्रियः शूद्र एव च । देशो विदेशस्त्वं क्षेत्रं पुण्यक्षेत्राणि यान्युत ॥ त्वं प्रमेयोऽप्रमेयश्च योगिनां ज्ञानगोचरः । त्वमेव स्वर्गः पातालं वनान्युपवनानि च ॥ ओषध्योऽथ लतावृक्षकन्दमूलफलानि च । अण्डजा जारजा जीवाः स्वेदजा उद्भ्रिजा अपि ॥ कामः क्रोधः क्षुधा लोभो दम्भो दर्पो दया क्षमा। निद्रा तन्द्री विलासश्च हर्षः शोकस्त्वमेव च ॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड २०। ३९-४८)