श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०२० ] * बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना * ८३ इस प्रकार सुनकर उस नगरनिवासी व्यक्तिके चले जानेपर दक्ष अपनी माताको आनन्दित करते हुए उसके पास शीघ्रतापूर्वक चला गया ॥ २६॥ तब उस नगरमें रहनेवाले एक करुणापूर्ण चित्तवाले द्विजने उन दोनोंको गणेशजीकी आराधनाकी विधिका उपदेश दिया ॥ २७॥ तदनन्तर कमला और दक्ष परम शान्तिपूर्वक एक अँगुठेपर स्थित होकर तपस्या करते हुए गणेशजीकी आराधनामें संलग्न हो गये ॥ २८ ॥ [इष्ट] देव श्रीगणेशजीके नाममें चतुर्थी तथा प्रारम्भमें ओंकार लगाकर बने अष्टाक्षर¹ परम मन्त्रको वे दोनों भक्तिपूर्वक जपनेमें तत्पर हो गये ॥ २९ ॥ वायुमात्रका भक्षण करनेके कारण शुष्क शरीरवाले उन दोनोंको देखकर करुणासागर भगवान् विनायक उनके समक्ष प्रकट हो गये ॥ ३० ॥ उनका श्रीविग्रह चतुर्भुज, विशाल शरीरवाला, गजमुख, अत्यन्त सुन्दर और रात्रिमें उदय हुए अनेक सूर्योंकी प्रभाके समान कान्तिमान् था ॥ ३१ ॥ उनका मस्तक रत्नों और मोतियोंसे जटित सुवर्ण मुकुटसे सुशोभित हो रहा था, उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था तथा सोनेके बने बाजूबन्दोंसे वे अलंकृत थे ॥ ३२ ॥ एक घुटना नीचे झुकाये हुए वे उत्तम आसनपर आसीन थे। उन्होंने सुवर्णनिर्मित करधनी और रत्नजटित अँगुठी धारण कर रखी थी ॥ ३३ ॥ उनके तीन नेत्र थे, वे अपने जठरप्रदेशपर एक महासर्पको लपेटे हुए थे, उनके मुखमें एक दाँत सुशोभित था। इस प्रकारका रूप दिखाकर वे पुनः द्विजरूप हो गये ॥ ३४॥ तदनन्तर द्विजरूपधारी उन गणेशजीने कहा कि मैं तुम दोनोंकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर वरदान देनेके लिये आया हूँ, तुम दोनों अपना मनोवांछित वर माँगो ॥ ३५॥ विश्वामित्रजी बोले- [हे राजा भीम!] इस प्रकार विघ्नराज गणेशजीके प्रसन्न होने और द्विजरूपमें प्रत्यक्ष दर्शन देनेपर [दक्षने] हाथ जोड़कर परम भक्तिभावसे प्रणामकर उनसे कहा - ॥ ३६ ॥ दक्ष बोला- हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे पूर्वजन्मोंमें किये पुण्य फलित हुए हैं, जिससे मुझे आपके दो प्रकारके परम महनीय रूपोंका दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ ३७ ॥ आपके विनायकरूप और विप्ररूपका दर्शनकर मेरा जन्म सार्थक हो गया। आप कारणोंके भी परम कारण और वेदोंके भी कारणरूप हैं ॥ ३८ ॥ आप परम ज्ञेय (जाननेयोग्य), परम ब्रह्म, श्रुतिके द्वारा अनुसन्धेय, सनातन, सबके साक्षी और सबके अन्दर एवं बाहर व्याप्त हैं ॥ ३९ ॥ समस्त कार्योंके कर्ता आप ही हैं, आप ही सूक्ष्म एवं महाकाय प्राणियोंके भी कर्ता हैं। आप अनेक रूपवाले होते हुए भी एक (अद्वितीय) रूपवाले हैं, आप रूपरहित और आकाररहित भी हैं ॥ ४० ॥ आप ही शंकर हैं, आप ही विष्णु, इन्द्र, अग्नि, अर्यमा, पृथ्वी, वायु, आकाशस्वरूप तथा जल, चन्द्रमा और नक्षत्ररूप भी हैं ॥ ४१ ॥ आप ही विश्वके सृजनकर्ता, विश्वके पालनकर्ता और विश्वके संहारकर्ता हैं। आप ही इस स्थावर- जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत्के गुरुके भी संरक्षक और ज्ञान-विज्ञानवान् हैं ॥ ४२ ॥ आप ही भूत, भविष्य और वर्तमान हैं। आप ही इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता हैं। आप ही कला, काष्ठा और मुहूर्तरूप हैं तथा आप ही श्री, धृति और कान्ति हैं। आप ही सांख्य, योग [आदि दर्शन], [विविध] शास्त्र, वेद, पुराण, चौंसठ कलाएँ और उपनिषद् हैं ॥ ४३-४४ ॥ आप ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र (चारों वर्ण) हैं तथा आप ही देश, विदेश, क्षेत्र एवं पुण्य क्षेत्रोंके रूपमें स्थित हैं ॥ ४५ ॥ आप ही प्रमेय (प्रमाणित किये जानेयोग्य) और अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे) हैं। आप ही योगियोंको ज्ञानद्वारा अधिगत होते हैं। आप ही स्वर्ग, पाताल, वन १. ॐ गं गणपतये नमः।