भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 656 में से

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पृष्ठ 84

८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

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[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

होते न देखा तो उसका धैर्य टूट गया और वह निराशा एवं क्रोधसे मूर्च्छित-सा होकर बोला— ॥ ४ ॥ हे रानी कमला ! तुम पुत्रसहित मेरे भवनसे चली जाओ, न मैं इस पुत्रको और न तुम्हें ही देखनेमें समर्थ हूँ ॥ ५ ॥ इस प्रकार [अपने पति] राजा वल्लभद्वारा भर्त्सना किये जानेपर रानी कमला अपने पुत्रको लेकर उस नगरसे वनको चल दी ॥ ६ ॥ शोकसे व्याकुल और दुखी होकर वह रोती और आँसुओंको पोंछती हुई तथा पुत्रको पीठपर लादे हुए एक ग्रामसे दूसरे ग्रामको जाती थी। भूख-प्यास और थकानसे कृश शरीरवाली उसको अत्यन्त व्याकुल होकर भिक्षावृत्तिसे जीवनयापन करना पड़ रहा था। लुटेरोंनें उसके वस्त्र और आभूषणादि भी लूट लिये थे ॥ ७-८ ॥ तदनन्तर किसी अन्य गाँवमें जाकर पुत्रको उसने एक शिव-मन्दिरमें बैठा दिया और वह स्वयं, जो कभी राजाकी प्रिय पत्नी थी, भिक्षाके लिये नगरमें भ्रमण करने लगी ॥ ९ ॥ किसी समय वह अपने पुत्रके साथ भिक्षाके लिये नगरमें गयी। [उस समय] किसी द्विजश्रेष्ठके शरीरके सम्पर्कसे आयी हुई वायुका उस बालकसे स्पर्श हुआ। उस द्विजश्रेष्ठकी भक्तिके अतिशय पुण्य-प्रभावसे उस बालकने लम्बोदर गणेशजीका साक्षात् दर्शन किया, जिससे वह नेत्रोंसे देखने और कानोंसे सुननेकी शक्तिसे सम्पन्न और दिव्य शरीरवाला हो गया ॥ १०-११ ॥ उसे देखकर और उसके द्वारा बार-बार उच्चारराकी जानेवाली मधुर एवं सुखद वाणीको सुनकर कमलाने सभी दुःखोंका त्यागकर अत्यन्त हर्षका अनुभव किया ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् कमला विचार करने लगी कि मेरा जो पुत्र मणि-मन्त्रके प्रयोगसे, महौषधियोंद्वारा चिकित्सासे और विशाल हवनात्मक अनुष्ठानोंसे भी स्वस्थ नहीं हुआ, वह [उन द्विजश्रेष्ठके शरीरके सम्पर्कवाली] वायुके स्पर्शमात्रसे कैसे स्वस्थ हो गया ! 'मैं उन दुष्कर्मनाशक पुरुष (द्विजश्रेष्ठ)-का कहाँ दर्शन कर सकूँगी ?' —यह कहती हुई वह पुत्रका आलिंगनकर


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

दुःखरहित हो गयी और उसे साथ लेकर भिक्षाके लिये उस नगरमें पुनः गयी ॥ १३-१५ ॥ [उस नगरके] नागरिकोंने उन दोनोंको सादर आमन्त्रित किया और नाना प्रकारके पक्वान्नों, शर्करा और घृतसे समन्वित खीर एवं शाकादिसे युक्त भोजन कराया ॥ १६ ॥ इस प्रकार वे दोनों दिन-प्रतिदिन उनके यहाँ भोजन करते और धन तथा नये-नये उत्तम कोटिके वस्त्र भी प्राप्त करते थे ॥ १७ ॥ [एक दिन] एक नागरिकने उस बालकसे पूछा कि तुम्हारा और तुम्हारे पिताका क्या नाम है ? तुम किस देश और किस नगरके निवासी हो ? तुम्हारी जाति क्या है ? और तुम्हारा व्यवसाय क्या है ? ॥ १८ ॥ उस नागरिकका इस प्रकारका वचन सुनकर उस बालकने अपना नाम 'दक्ष' बतलाया; तदनन्तर माँके पास आकर अपने पिता, नगर, कुल और व्यवसायके विषयमें पूछकर पुनः उस नागरिकसे कहा- [हे ब्रह्मन् !] कर्णाटकदेशान्तर्गत भानु नामक नगरमें वल्लभ नामक क्षत्रिय [राजा] हैं, जो महान् बलशाली और शत्रुसेनाओंका नाश करनेवालेके रूपमें विख्यात हैं—वे मेरे पिता हैं। उनकी कमला नामवाली यह पत्नी है और मैं दक्ष नामवाला इसका पुत्र हूँ ॥ १९-२१ ॥ हे ब्रह्मन् ! जब मैं उत्पन्न हुआ, तो अन्धा एवं बधिर था, मेरे शरीरमें अनेक घाव थे, तब माता मेरा त्याग करनेको उद्यत हो गयी ॥ २२ ॥ तब पिताने माँको ऐसा करनेसे रोका और मुझे स्वस्थ करनेके बहुत-से उपाय कराये। मेरे पिताने बारह वर्षतक तपस्या करके उसका पुण्य मुझे निवेदित किया ॥ २३ ॥ हे नागरिक ! परंतु जब तब भी मेरे शरीरमें कोई सुधार न देखा तो पिताने मुझे और माँको [भवनसे] बाहर निकाल दिया ॥ २४ ॥ यहाँ किसी [द्विजश्रेष्ठ]-के शरीरकी वायुके सम्पर्कसे मेरा शरीर सुन्दर हो गया है। माताके मुखसे कही गयी इन सब बातोंको बालक दक्षने उस नागरिकसे कहा ॥ २५ ॥