भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 656 में से

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पृष्ठ 83

उ०ख०-अ०२० ] * बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना * ८१ विश्वामित्रजी बोले- हे दुर्मते! तुमने धन- ऐश्वर्यके मदसे अन्धे होकर वेद-शास्त्र-पुराण और लोकमें प्रतिष्ठित कुलधर्मका त्याग कर दिया ॥ ३९ ॥ तुम्हारे सभी पूर्वज गणनायक गणेशजीका नित्य पूजन किया करते थे, [तुम्हारे द्वारा कुलमें की जानेवाली उस पूजाका त्याग करनेसे] उन गणेशजीके क्रोधके कारण ही तुम्हारे संतान नहीं हो रही है ॥ ४० ॥ हे महावीर! गजानन गणेशजीको जिस प्रकारसे तुम्हारे कुलका कुलदेवत्व प्राप्त हुआ, उसे बता रहा हूँ, तुम आदरपूर्वक प्रारम्भसे सुनो ॥ ४१ ॥ [तुम्हारे वंशमें] तुमसे सात पीढ़ी पहले भीम नामके एक राजा हुए थे। उनके वल्लभ नामका रूपवान् और धनसम्पन्न पुत्र था ॥ ४२ ॥ हे राजन् ! उसके भी बहुत समय बीतनेपर एक पुत्र हुआ। लेकिन वह शिशु मूक-बधिर था, उसकी देहसे अत्यन्त दुर्गन्धित पीबका स्राव होता था, साथ ही वह कुबड़ा भी था ॥ ४३१/२ ॥ उसे देखकर उसकी माँ कमला बहुत दुखी हुई। उसने अपने अन्तःकरणमें विचार किया कि लोकमें अपुत्रता ही श्लाघ्य है, न कि इस प्रकारका पुत्रवत्त्व ! क्योंकि यह तो अत्यन्त दुःखकर है ॥ ४४-४५ ॥ विधाता आज ही मेरा या इस (शिशु)-का मरण क्यों नहीं कर देता! मैं अपने प्रियजनोंको कैसे मुँह दिखाऊँगी ? ॥ ४६ ॥ इस प्रकार विलाप करती हुई वह अत्यन्त दारुण दुःखसे रोने लगी। उसके रुदनको सुनकर उसके पति [राजा वल्लभ] उस प्रसूति-कक्षमें आ गये ॥ ४७ ॥ उस प्रकारके बालक और अत्यन्त दुखी पत्नीको देखकर कर्मकी गतिको जाननेवाले [उन राजा]-ने मीठी वाणीमें [पत्नीको] सान्त्वना देते हुए कहा - ॥ ४८ ॥ हे कल्याणि ! दुःख न करो; क्योंकि कर्मोंकी गति ऐसी ही है। पूर्वजन्ममें किये हुए पापके कारण ही मनुष्य दुःखका भागी होता है ॥ ४९ ॥ जिसे दुःख प्राप्त है, उसे भी सुखकी प्राप्ति होती है; वैसे ही जिसे सुख प्राप्त है, उसे भी दुःखकी प्राप्ति होती है। इस बालकके विषयमें [तुम्हें] शोक नहीं करना चाहिये, यह ठीक हो जायगा ॥ ५० ॥ जिस प्रकारके इसके पूर्वजन्मके कर्म होंगे, उसी प्रकारका इसका भविष्य होगा। हम लोग मणि, मन्त्र और महौषधियोंका प्रयोग करके धार्मिक अनुष्ठानों एवं साधनोंके द्वारा [इसे स्वस्थ करनेका] प्रयत्न करेंगे ॥ ५१ ॥ हे सुन्दर भौंहोंवाली! तप, जप, देवपूजा और विधिपूर्वक तीर्थयात्राके द्वारा इसे ठीक करनेका प्रयत्न करेंगे। इस समय जो कर्तव्य है, उसका भलीभाँति सम्पादन करो ॥ ५२ ॥ [पतिद्वारा] इस प्रकार बोध कराये जानेपर उस साध्वीने शोकका त्याग कर दिया और तदनन्तर उस शिशुको जलसे प्रक्षालित करवाकर सखियोंके साथ प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ ५३ ॥ तदनन्तर उन राजा वल्लभने पत्नीके साथ पुत्रके समस्त जननोचित आभ्युदयिक कर्म किये और अनेक विप्रों तथा विप्रपत्नियोंका पूजन किया ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कमलापुत्र-वर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥ बीसवाँ अध्याय बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना और गणेशजीका उसे दर्शन देना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] तदनन्तर उस (राजा)-ने ब्राह्मणों, साधुओं, ज्योतिषियों और वेदज्ञोंको बुलाकर उनका रत्न, वस्त्र, धन आदिसे पूजनकर, तत्पश्चात् उनसे पूछकर उसने अपने पुत्रका नाम 'दक्ष' रखा ॥ १ १/२ ॥ उसने पुत्रको रोगसे मुक्ति दिलाने और अपनी संतानपरम्पराकी अभिवृद्धिके लिये जप और मन्त्रानुष्ठान कराये, औषधीय चिकित्सा करवायी और स्वयं भी बारह वर्षोंतक कठोर तप किया ॥ २-३ ॥ परंतु जब इतनेपर भी उस राजाने पुत्रको रोगसे मुक्त