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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 656 में से

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पृष्ठ 82

८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

नाम सुमन्तु था। वे दोनों आन्वीक्षिकी १, वेदत्रयी २ और षोडश कलाओंके ज्ञाता थे ॥ १४-१५ ॥ हे मुने! उन्होंने उसी क्षण वहाँ आकर उन राजाको नमस्कार किया, तब राजा भीमने उन दोनों [मन्त्रियों]- से कहा कि 'तुम दोनों मेरे राज्यका परिपालन करना' ॥ १६ ॥ मेरे या मेरी पत्नीके द्वारा पूर्वजन्ममें कोई पाप हुआ था, जिसके कारण हम दोनोंको दोनों लोकोंमें सुख देनेवाली सन्तान नहीं प्राप्त हुई ॥ १७ ॥ यदि मैं पुनः आ जाऊँ तो मेरा राज्य मुझे दे देना, नहीं तो तुम दोनों राज्यको बाँटकर ले लेना ॥ १८ ॥ इस प्रकारका निश्चय करके राजाने पहले स्वस्ति- पाठ कराया, फिर ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान देकर नगरसे बाहर निकले ॥ १९ ॥ वे नृपश्रेष्ठ भीम अपनी पत्नी, दोनों मन्त्रियों और नगरवासियोंके साथ गव्यूतिमात्र (दो कोस)-तक गये और वहाँसे उन सबको वापस भेज दिया ॥ २० ॥ तब उन दोनों मन्त्रियोंने कहा—'हे राजन् ! हम दोनों भी आपके साथ चलेंगे।' राजाके सुहृज्जन और उनके नगरके निवासी अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगे ॥ २१ ॥ उन सबसे राजाने कहा 'आप लोग भयभीत न हों, मैंने इन दोनों मन्त्रियोंको आप सबका अधिपति बना दिया है। जैसे मैंने आप सबका पालन किया, वैसे ही भलीभाँति ये दोनों भी करेंगे' ॥ २२ ॥ इस प्रकार उन सबको भलीभाँति आश्वासन देकर उन दोनों (मन्त्रियों)-से राजाने पुनः कहा—'मैंने राज्य आप दोनोंको दे दिया है, आप दोनों नगरकी सब प्रकारसे रक्षा करना' ॥ २३ ॥ इस प्रकार सबको छोड़कर [राजा भीम] पत्नीके साथ नगरसे बाहर चले गये। [तदनन्तर] भ्रमण करते हुए उन्होंने एक सरोवर देखा, जो कमलोंसे युक्त था ॥ २४ ॥ वह पुष्पित वृक्षोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके जलचर जीवोंसे समन्वित था। तदनन्तर उन दोनों—राजा और रानीने उस सरोवरके निकट एक रमणीय और शुभ आश्रमको देखा, जो सबके आनन्दको बढ़ानेवाला था। जहाँ जातीय वैर रखनेवाले हाथी और सिंह, नेवला और


[दायाँ स्तम्भ]

साँप, बिल्ली और चूहे आदि वैर नहीं करते थे। राजा और रानीने वहाँ वेदाध्ययन कर रहे शिष्योंसे घिरे शान्त स्वरूपवाले मुनि विश्वामित्रको देखा, जो कुशके आसनपर विराजमान थे ॥ २५-२७१/२ ॥ उन दोनों (राजा भीम और उनकी रानी)- ने उन महात्मा विश्वामित्रको दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और उनके चरणोंसे गिरकर पुनः- पुनः नमस्कार किया। मुनिश्रेष्ठ तपोनिधि विश्वामित्रने उन्हें उठाकर और राजाके आशयको जानकर स्नेहयुक्त वाणीमें कहा— ॥ २८-२९१/२ ॥ [मुनि] विश्वामित्र बोले—हे राजन् ! तुम्हारा पुत्र गुणवान् और महान् यशस्वी होगा। हे नृपश्रेष्ठ ! तुम कहाँसे आये हो ? तुम्हारे नगरका क्या नाम है ? यह सब बतलाओ, तब मैं तुम्हारे पापके नाशके लिये यत्न करूँगा ॥ ३०-३१ ॥ [राजा] भीमने कहा—हे स्वामिन् ! विदर्भ देशमें मेरा कौण्डिन्य नामक नगर है। मेरा नाम भीम है और यह चारुहासिनी मेरी पत्नी है ॥ ३२ ॥ मैंने पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या, दान, व्रत आदि अनेक यत्न किये, परंतु पूर्वजन्ममें किये गये पापोंके कारण ईश्वरको मुझपर करुणा नहीं आयी ॥ ३३ ॥ हे मुने! राज्य छोड़कर हम दोनों वन चले आये और यहाँ आपके चरणोंका दर्शन हुआ। अनेक वनोंमें घूमते-घूमते दैवके द्वारा ही मैं यहाँ पहुँचाया गया हूँ ॥ ३४ ॥ साधुजनोंकी संगति शीघ्र ही उत्तम फल देती है, इसलिये आपके आशीर्वादसे मुझे अवश्य पुत्र-प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है। हे मुने! आप विद्या और तपसे सम्पन्न, व्रत-दान-यज्ञ और स्वाध्याय करनेवाले तथा दयावान् एवं संयमी हैं; आज आपके द्वारा दिया हुआ आशीर्वाद व्यर्थ नहीं होगा ॥ ३५-३६ ॥ परंतु हे मुने! पूर्वजन्ममें मैंने कौन-सा पाप किया है, उसका क्या प्रतिकार है—यह बताइये; क्योंकि मैं आपको सर्वज्ञ मानता हूँ ॥ ३७ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] इस प्रकार उन (राजा भीम)-के वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्रने उन राजा [भीम]-से आदरपूर्वक पूर्वकालकी कथा कही ॥ ३८ ॥


पाद-टिप्पणी (Footnotes): १-तर्कशास्त्र, २-ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद।