श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 656 में से
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उ०ख०-अ०१९] $\qquad$ * राजा भीमकी निःसंतानताके कारणका वर्णन * $\qquad$ ७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[ऊपरी भाग - बायाँ स्तम्भ]
भगवान् शंकरके पास गया। शंकरजीने मुझे षडक्षर मन्त्र (वक्रतुण्डाय हुं)-का उपदेश दिया ॥ ४० ॥ उससे मैंने देवाधिदेव भगवान् विघ्नेश्वर (गणेशजी)- की आराधना की। उन्होंने मुझे कामनाओंको फलीभूत करनेवाले अनेक वरदान दिये ॥ ४१ ॥ वे भगवान् गणेश मेरे द्वारा स्तुत और पूजित होकर उसी समय अन्तर्धान हो गये। उन वरदानोंके प्रभावसे मैंने उन दोनों दुष्टों-मधु और कैटभका वध कर दिया ॥ ४२ ॥ भगवान् शंकरकी कृपासे मुझे उन महात्मा गणेशजीकी
[ऊपरी भाग - दायाँ स्तम्भ]
महिमा विशेष रूपसे ज्ञात हो चुकी है, अब मैं दैत्यों और दानवोंका हनन करता रहूँगा ॥ ४३ ॥ उस समय समस्त देवताओं और मुनियोंने गजाननदेव, आप ब्रह्माजी, भगवान् शंकर और मेरी (विष्णुकी) स्तुति की और अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये ॥ ४४ ॥ [सूतजी कहते हैं—हे मुनियो!] जो इस पापनाशक [गणपति]-माहात्म्यका नित्य श्रवण करता है; उसे कभी भय नहीं होता और वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको फलीभूत कर लेता है ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सिद्धक्षेत्रोत्पत्तिवर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय राजा भीमकी निःसंतानताके कारणका वर्णन
[निचला भाग - बायाँ स्तम्भ]
भृगुजी बोले—[हे राजन्!] इस आख्यानको सुनकर और षडक्षर मन्त्रकी [जप]-विधि जानकर भी व्यासजीने ब्रह्माजीसे पुनः इस प्रकार पूछा, जैसे उनकी तद्विषयक इच्छा पूर्ण न हुई हो ॥ १ ॥ व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन्! मैंने पापहारी, सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले और पुण्यवर्धक सिद्धक्षेत्र एवं गणेशजीके माहात्म्यको सुना, परंतु मुझे इस कथा- सुधाके पानसे परम तृप्ति नहीं हुई है, अतः आप भगवान् विनायकके कथानकको पुनः कहें ॥ २-३ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**हे पराशरपुत्र व्यासजी! मैं सर्वदेवाधिदेव भगवान् गणेशके इस मंगलमय महान् आख्यानको तुम्हारे सम्मुख कहता हूँ — ॥ ४ ॥ विदर्भदेशमें भीम नामक एक राजा हुआ; जो दानवीर, महान् बलशाली, उदार और प्रचण्ड पराक्रमी था। हे महामते! कौण्डिन्यनगरमें उसका निवास था। सामन्तगण और दूसरे राजा उसको कर दिया करते थे॥ ५-६ ॥ उसके आगे-आगे अश्वारोहियों, गजारोहियों, पैदल सैनिकों और रथारोहियोंसे युक्त दस करोड़ सैनिकोंवाली सेना चलती थी तथा उसके पीछे भी वैसे ही तथा उतने ही सैनिक होते थे ॥ ७ ॥
[निचला भाग - दायाँ स्तम्भ]
हजारों ब्राह्मण उसके आश्रयमें रहते हुए प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन करते थे। उसकी महान् भाग्यशालिनी भार्याका नाम चारुहासिनी था ॥ ८ ॥ खिले हुए कमलके समान मुख और मृगशावकके समान नेत्रोंवाली वह ब्राह्मण-भक्त, देवपरायण और नित्य धर्ममें सतत तत्पर रहनेवाली थी ॥ ९ ॥ वह पतिव्रता, पतिप्राणा और सदा पतिकी आज्ञा माननेवाली थी, परंतु उत्तम और सुन्दर रंग-रूपवाली होते हुए भी दैवयोगसे वह पुत्रहीना थी ॥ १० ॥ उस सर्वांगसुन्दरी रानीको देखकर पुत्रहीन नृपश्रेष्ठ भीम दुखी होकर कहने लगे—सम्पूर्ण राज्यका परित्याग करके अब मुझे [किसी] श्रेष्ठ वनमें चले जाना चाहिये; क्योंकि अपुत्रकी सद्गति नहीं होती, उसे स्वर्ग या सुख नहीं प्राप्त होता। देवता उसके द्वारा दिये गये हव्यका और पितर लोग कव्यका ग्रहण नहीं करते; इसलिये मेरा तो जननीके गर्भसे जन्म लेना ही व्यर्थ हो गया। मेरे लिये [यह] राजमहल, धन-सम्पत्ति और कुल-परिवार—सब व्यर्थ है ॥ ११–१३ ॥ 'बिना पुत्रके सारे कर्म निश्चित ही व्यर्थ होते हैं'—ऐसा निश्चित मानकर उन्होंने अपने दो मन्त्रियोंको बुलाया। उनमेंसे एकका नाम मनोरंजन और दूसरेका