भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 656 में से

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पृष्ठ 80

७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विनायक' नाम दिया॥ २२॥ चूँकि श्रीहरिने इसी क्षेत्रमें यह शुभ सिद्धि प्राप्त की थी, अतः वह क्षेत्र पृथ्वीपर 'सिद्धक्षेत्र'* के नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ २३॥ तदनन्तर वे श्रीहरि उस स्थानपर गये, जहाँ वे दोनों—मधु और कैटभ स्थित थे। जब उन दोनोंने श्रीहरिको आते हुए देखा तो हँसते हुए उनकी निन्दा करने लगे॥ २४॥ [उन्होंने श्रीहरिसे कहा—] तुम्हारा मेघसदृश श्याम मुख आज हमें पुनः कहाँसे दिखायी दे रहा है? अतः हम दोनों पुनः तुम्हें महामुक्ति देंगे; तुम तो लघुता अर्थात् पराजयको प्राप्त हो गये थे, फिर [पुनः] किसलिये रणमें आ गये?॥ २५ १/२ ॥ श्रीहरि बोले—अग्निकी छोटी-सी चिनगारी सहसा सब कुछ जला डालती है। जैसे लघु [आकारवाला] दीपक रात्रिके महान् अन्धकारका संहार कर डालता है, वैसे ही मैं तुम दोनों मदोन्मत्त दुष्टोंका आज ही नाश कर देनेमें समर्थ हूँ॥ २६-२७॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजा सोमकान्त!] उन श्रीहरिके इस प्रकारके वचनको सुनकर मधु-कैटभने अत्यन्त क्रोधित होकर सहसा [भगवान्] विष्णुके हृदयदेशमें मुक्केसे घोर प्रहार किया॥ २८॥ तब पुनः उन दोनों (मधु-कैटभ)-का उन (भगवान् विष्णु)-के साथ मल्लयुद्ध शुरू हो गया, जो बढ़ता ही गया। [इस प्रकार] उन दोनोंके साथ बहुत दिनतक युद्ध करके श्रीहरि उन्हें वर देनेके लिये समुत्सुक हुए। उन्होंने मधुर वाणीमें उन दोनों दानवों—मधु-कैटभसे कहा— तुम दोनोंने मेरे प्रहारोंको बहुत समयतक सहन किया है। हे दैत्यश्रेष्ठो! मैं तुम दोनोंके पुरुषार्थसे प्रसन्न हूँ। तुम दोनोंके समान न कोई हुआ है, न होगा॥ २९-३१॥ वे दोनों (मधु-कैटभ) बोले—हे हरे! हम दोनों तुम्हारे युद्धसे बहुत सन्तुष्ट हुए हैं, इसलिये तुम हमसे वर माँगो; हम तुम्हें बहुत-से वर देंगे॥ ३२॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजन्!] मायासे मोहित उन दोनों [दैत्यों]-के वचन सुनकर भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर कहा—हे दैत्यद्वय! यदि तुम दोनों मुझे वर देनेके लिये समुद्यत हो तो तुम दोनों मेरे वध्य हो जाओ—यही मैंने वर माँगा है॥ ३३ १/२ ॥ तब सब जगह जल-ही-जल देखकर उन दोनों— मधु और कैटभने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—हे माधव! तुम्हारे हाथसे मृत्यु मंगलकारिणी है; अन्तकालमें तुम्हारे चिन्तनसे लोगोंको सद्यः सनातनी मुक्ति प्राप्त होती है, अतः जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी न हो, वहाँ हम दोनोंका वध करो। हम दोनों सब कुछ छोड़ सकते हैं, लेकिन सत्य नहीं; क्योंकि सब कुछ सत्यमें ही प्रतिष्ठित है॥ ३४-३६॥ मुनि बोले—[हे राजन्!] उन दोनों (मधु- कैटभ)-के इस प्रकारके वचनको सुनकर [श्रीहरिने] उनको अपने जघनप्रदेशपर लिटाया और तीक्ष्ण धारवाले चक्रसे उनके सिरोंको काट दिया॥ ३७॥ तब देवताओंने प्रसन्न होकर फूल बरसाये, गन्धर्वोंने नृत्य किया और अप्सराओंके समूहोंने गीत गाये॥ ३८॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने परमेष्ठी ब्रह्माजीके पास जाकर हर्षपूर्वक उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ ३९॥ श्रीहरि बोले—[हे ब्रह्मन्!] जब मैं उन दोनों (मधु-कैटभ)-को जीतनेमें समर्थ नहीं हो सका, तब मैं

  • मुम्बई-रायचूर लाइनपर धौंड जंक्शनसे ९ किमी० दूर बोरीवली स्टेशन है। वहाँसे लगभग ९ किमी० दूर भीमा नदीके किनारे यह स्थान है। इसका प्राचीन नाम 'सिद्धाश्रम' है। यहाँ भगवान् विष्णुने मधु-कैटभ दैत्योंको मारनेके लिये गणेशजीका पूजन किया था। द्वापरान्तमें व्यासजीने पुराणोंका प्रणयन निर्विघ्न सम्पन्न करनेके लिये भगवान् विष्णुद्वारा स्थापित गणपति-मूर्तिका पूजन किया था। Kalyana Visheshank 2021_Section_4_2_Back