भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 656 में से

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पृष्ठ 79

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उ०ख०-अ०१८] * विष्णुका गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका अनुष्ठान करना * ७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

बाद भूतशुद्धि और प्राणोंका व्यवस्थापन करके आधार आदिके क्रमसे अन्तर्मातृकान्यास सम्पन्न किया। तदुपरान्त मस्तक आदिमें बहिर्मातृकान्यास करनेके अनन्तर मूल मन्त्रसे प्राणायाम किया। तत्पश्चात् गजाननदेवका ध्यान करके आवाहनी आदि मुद्राएँ प्रदर्शित करते हुए पहले नानाविध भावनात्मक उपचारोंसे और बादमें षोडशोपचारोंके द्वारा गजाननकी अर्चना की। इसके अनन्तर वे योगेश्वरेश्वर विष्णु उस परम मन्त्र (षडक्षरमन्त्र)-का जप करने लगे ॥ ४-७ ॥ तदनन्तर सौ वर्षका समय बीत जानेपर करोड़ों सूर्यों और अग्निके समान प्रकाशमान परमात्मा गणेश उनके समक्ष प्रकट हुए और अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे गरुड़ांकित ध्वजावाले भगवान् विष्णुसे कहा—हे हरे! तुम्हारी जो कामना हो, वह वर मुझसे माँग लो। तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट मैं वह सब तुम्हें प्रदान करूँगा। यदि तुमने पहले ही मेरी आराधना कर ली होती, तो तुम्हें निश्चय ही विजय प्राप्त हो जाती ॥ ८-१० ॥ **श्रीहरि बोले—**ब्रह्मा, ईशान (शिव), इन्द्र आदि प्रमुख देवता जिन आपका तपस्याके द्वारा दर्शन करनेमें सक्षम नहीं हैं; उन्हीं नानारूप और एक (अद्वय) स्वरूपवाले तथा व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूपवाले आप गणेशजीका मैं दर्शन कर रहा हूँ॥ ११॥ आप अणुसे भी अणु स्वरूपवाले और आकाशादि महान् पदार्थोंसे भी महान् एवं सत्त्वमय स्वरूपवाले हैं। प्राणियोंके प्रारब्धवश आप ही बार-बार उनका सृजन, पालन और संहार करते हैं॥ १२॥ आप सबके आत्मा, सर्वत्र गमनशील, सर्वशक्तिमान्, सर्वत्र व्याप्त, सब कुछ करनेवाले, परमेश्वर, सब कुछ देखनेवाले, सबका संहार करनेवाले, सबका रक्षण करनेवाले, सबको धारण करनेवाले, विश्वके नेता और


[दायाँ स्तम्भ]

पिता भी हैं*॥ १३॥ हे देव! इस प्रकारके आपके दर्शनसे मुझे सर्वत्र सिद्धियाँ सम्भव होंगी, फिर भी मैं आपसे एक बात कहता हूँ॥ १४॥ मेरी योगनिद्राके अन्तिम समयमें मेरे कर्णमलसे मधु-कैटभ नामक दो महान् बलशाली [दानव] उत्पन्न हुए और वे दोनों ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्यत हो गये॥ १५॥ तब मैंने उन दोनोंसे बहुत वर्षोंतक युद्ध किया, तदनन्तर क्षीणबल होनेसे मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १६॥ अतः हे परमेश्वर! उन दोनोंका जिस प्रकारसे मेरे द्वारा वध हो सके तथा अन्य दैत्योंपर भी विजय प्राप्तकर मुझे यश प्राप्त हो, उसपर विचार कीजिये। आप मुझे अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें, जिससे होने- वाली मेरी अतुलनीय कीर्ति त्रैलोक्यको पावन करेगी॥ १७-१८॥ **गणेशजी बोले—**हे विष्णो! तुमने जो-जो प्रार्थना की है, वह निश्चित रूपसे पूर्ण होगी। तुम्हें यश, बल, परम कीर्ति और [कार्योंमें] निर्विघ्नताकी प्राप्ति होगी॥ १९॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजन्!] महाविष्णुके प्रति ऐसा कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये। तब आनन्दसे पूर्ण होकर उन्होंने मान लिया कि अब वे दोनों असुर उनके द्वारा जीत लिये गये॥ २०॥ उन्होंने वहाँ [गणेशजीका] एक मन्दिर बनवाया, जो स्फटिक मणियों और अनेक रत्नोंसे जटिल था। वह सुवर्णमय शिखर और चार द्वारोंसे सुशोभित था॥ २१॥ उन्होंने गण्डकी नदीसे प्राप्त पाषाणसे [गणेशजीकी] प्रतिमाका निर्माण कराया और उसे मन्दिरमें स्थापित किया। देवताओं और मुनियोंने उस प्रतिमाको 'सिद्धि-


[पाद-टिप्पणी (Footnote)]

* हरिरुवाच ब्रह्मेशानाविन्द्रमुख्याश्च देवा यं त्वां द्रष्टुं नैव शक्तास्तपोभिः। तं त्वां नानारूपमेकस्वरूपं पश्ये व्यक्ताव्यक्तरूपं गणेशम्॥ त्वं योऽणुभ्योऽणुस्वरूपो महद्भ्यो व्योमादिभ्यस्त्वं महान् सत्त्वरूपः। सृष्टिं चान्तं पालनं त्वं करोषि वारं वारं प्राणिनां दैवयोगात्॥ सर्वस्यात्मा सर्वगः सर्वशक्तिः सर्वव्यापी सर्वकर्ता परेशः। सर्वद्रष्टा सर्वसंहारकर्ता पाता धाता विश्वनेता पितापि॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १८।११-१३)


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