श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ
पृष्ठ 78, कुल 656 में से
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७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
परम प्रसन्नता प्राप्त हुई है। तुम मुझसे वर माँगो, मैं तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करूँगा ॥ ३०-३२१/२ ॥ भृगुजी बोले-[हे राजन् !] तब स्वयम्भू भगवान् विष्णुने उन दोनों दैत्यों (मधु-कैटभ)-का सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा- ॥ ३३ ॥ श्रीहरि बोले-हे करुणानिधान भगवान् शिव ! निद्रित-अवस्थामें क्षीरसागरमें शयन करते समय मेरे कर्णमलसे मधु-कैटभ [नामक दो दानव] उत्पन्न हुए। वे ब्रह्माजीको खानेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने भगवती निद्रादेवीकी स्तुति की, जिनसे मैं प्रतिबोधित (जाग्रत्) हुआ। तदनन्तर मैंने उन दोनोंसे मल्लयुद्ध किया, परंतु मैं उनको जीतनेमें समर्थ न हो सका, इसीलिये मैंने ऐसा किया अर्थात् गन्धर्वरूप धारण करके गायनसे आपको सन्तुष्ट किया। अब मुझे उनके वधका उपाय बतायें ॥ ३४-३६ ॥ भगवान् शिव बोले-हे विष्णो ! तुम बिना गणेशार्चन किये रणभूमिमें चले गये थे, इसीलिये तुम शक्तिहीन हो गये और महान् कष्टको प्राप्त किया। अब तुम गणेशका पूजन करके ही युद्धके लिये जाओ। वे (गणेश) अपनी मायासे उन दोनों दानवोंको मोहित कर देंगे। मेरी कृपासे तुम उन दोनों दुष्टोंका वध कर सकोगे, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३७-३८१/२ ॥ श्रीहरि बोले-हे शिवजी ! मैं विनायक गणेशकी उपासना कैसे करूँ? यह बतलाइये ॥ ३९ ॥ ईश्वर (शिवजी) बोले-हे भगवन् ! गणेश्वरके सात करोड़ मन्त्र कहे गये हैं। उनमें भी अनेक महामन्त्र हैं। उनमें भी एकाक्षर मन्त्र महान् है, एक अन्य विशिष्ट महामन्त्र षडक्षर महामन्त्र है। उन दोनोंमेंसे एक महामन्त्र मैं तुमको बतलाता हूँ ॥ ४०१/२ ॥ [ भृगु ] मुनि बोले-[हे राजन् !] तब एकाक्षर मन्त्रको छोड़कर [ भगवान् शिवने ] मन्त्रशास्त्रीय सिद्ध- शत्रु आदिकी प्रक्रियासे निर्णीत तथा ऋण-धनचक्रसे शोधित* षडक्षरमन्त्र श्रीहरिको बताया। गणेशजीका यह महामन्त्र मंगलकारी और सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है ॥ ४१-४२ ॥ [ भगवान् शिवने कहा-हे हरे ! ] 'इसके अनुष्ठान-मात्रसे तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जायगा।' तब वे श्रीहरि उसका अनुष्ठान करनेके लिये शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रोपदेश' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय विष्णुका गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका अनुष्ठान करना और गणेशजीकी कृपासे मधु-कैटभका वध करना सोमकान्त बोले-[हे मुनिश्रेष्ठ !] भगवान् श्रीहरिने कैसे और कहाँ उस उत्तम [ षडक्षर] मन्त्रका जप किया? उन्होंने किस प्रकार सिद्धि प्राप्त की, वह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ भृगुजी बोले-[हे राजन् !] पृथ्वीपर सिद्धक्षेत्र नामसे प्रसिद्ध परम सिद्धिप्रद क्षेत्र है, वहाँ जाकर महाविष्णुने महान् तपस्या की ॥ २ ॥ उन्होंने प्रयत्नपूर्वक अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्तकर षडक्षर विधानसे देवाधिदेव विनायक गणेशजीका ध्यान करते हुए उनकी आराधना की ॥ ३ ॥ उन्होंने बाणमुद्राको प्रदर्शित करते हुए अस्त्रमन्त्र (फट्)-से सर्वप्रथम आदरपूर्वक दिग्बन्धन किया। इसके
- जैसे विवाह-सम्बन्ध निश्चित होनेके पूर्व नाड़ी, भकूट आदिका ज्योतिषशास्त्रके अनुसार विचार किया जाता है, वैसे ही मन्त्र-दीक्षा- निर्णयके पूर्व साधक और मन्त्रके सम्बन्धका विचार भी मन्त्रशास्त्रके अनुसार किया जाता है। इसके अन्तर्गत साधकके नामके वर्ण आदिसे मन्त्रके वर्ण आदिका सम्बन्ध मुख्य रूपसे कुलाकुलचक्र, राशिचक्र, नक्षत्रचक्र, अकडमचक्र, अकथहचक्र, ऋणि-धनिचक्रके अनुसार विचार किया जाता है। परिणाम अनुकूल होनेपर ही साधकको मन्त्रका जप करना चाहिये। इस विषयमें विस्तारसे जाननेके लिये जिज्ञासुजनोंको कल्याणका साधनांक (कोड नं० ६०४) देखना चाहिये। Kalyana Visheshank 2021_Section_4_1_Back