श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
परम प्रसन्नता प्राप्त हुई है। तुम मुझसे वर माँगो, मैं तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करूँगा ॥ ३०-३२१/२ ॥ भृगुजी बोले-[हे राजन् !] तब स्वयम्भू भगवान् विष्णुने उन दोनों दैत्यों (मधु-कैटभ)-का सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा- ॥ ३३ ॥ श्रीहरि बोले-हे करुणानिधान भगवान् शिव ! निद्रित-अवस्थामें क्षीरसागरमें शयन करते समय मेरे कर्णमलसे मधु-कैटभ [नामक दो दानव] उत्पन्न हुए। वे ब्रह्माजीको खानेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने भगवती निद्रादेवीकी स्तुति की, जिनसे मैं प्रतिबोधित (जाग्रत्) हुआ। तदनन्तर मैंने उन दोनोंसे मल्लयुद्ध किया, परंतु मैं उनको जीतनेमें समर्थ न हो सका, इसीलिये मैंने ऐसा किया अर्थात् गन्धर्वरूप धारण करके गायनसे आपको सन्तुष्ट किया। अब मुझे उनके वधका उपाय बतायें ॥ ३४-३६ ॥ भगवान् शिव बोले-हे विष्णो ! तुम बिना गणेशार्चन किये रणभूमिमें चले गये थे, इसीलिये तुम शक्तिहीन हो गये और महान् कष्टको प्राप्त किया। अब तुम गणेशका पूजन करके ही युद्धके लिये जाओ। वे (गणेश) अपनी मायासे उन दोनों दानवोंको मोहित कर देंगे। मेरी कृपासे तुम उन दोनों दुष्टोंका वध कर सकोगे, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३७-३८१/२ ॥ श्रीहरि बोले-हे शिवजी ! मैं विनायक गणेशकी उपासना कैसे करूँ? यह बतलाइये ॥ ३९ ॥ ईश्वर (शिवजी) बोले-हे भगवन् ! गणेश्वरके सात करोड़ मन्त्र कहे गये हैं। उनमें भी अनेक महामन्त्र हैं। उनमें भी एकाक्षर मन्त्र महान् है, एक अन्य विशिष्ट महामन्त्र षडक्षर महामन्त्र है। उन दोनोंमेंसे एक महामन्त्र मैं तुमको बतलाता हूँ ॥ ४०१/२ ॥ [ भृगु ] मुनि बोले-[हे राजन् !] तब एकाक्षर मन्त्रको छोड़कर [ भगवान् शिवने ] मन्त्रशास्त्रीय सिद्ध- शत्रु आदिकी प्रक्रियासे निर्णीत तथा ऋण-धनचक्रसे शोधित* षडक्षरमन्त्र श्रीहरिको बताया। गणेशजीका यह महामन्त्र मंगलकारी और सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है ॥ ४१-४२ ॥ [ भगवान् शिवने कहा-हे हरे ! ] 'इसके अनुष्ठान-मात्रसे तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जायगा।' तब वे श्रीहरि उसका अनुष्ठान करनेके लिये शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रोपदेश' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय विष्णुका गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका अनुष्ठान करना और गणेशजीकी कृपासे मधु-कैटभका वध करना सोमकान्त बोले-[हे मुनिश्रेष्ठ !] भगवान् श्रीहरिने कैसे और कहाँ उस उत्तम [ षडक्षर] मन्त्रका जप किया? उन्होंने किस प्रकार सिद्धि प्राप्त की, वह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ भृगुजी बोले-[हे राजन् !] पृथ्वीपर सिद्धक्षेत्र नामसे प्रसिद्ध परम सिद्धिप्रद क्षेत्र है, वहाँ जाकर महाविष्णुने महान् तपस्या की ॥ २ ॥ उन्होंने प्रयत्नपूर्वक अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्तकर षडक्षर विधानसे देवाधिदेव विनायक गणेशजीका ध्यान करते हुए उनकी आराधना की ॥ ३ ॥ उन्होंने बाणमुद्राको प्रदर्शित करते हुए अस्त्रमन्त्र (फट्)-से सर्वप्रथम आदरपूर्वक दिग्बन्धन किया। इसके
- जैसे विवाह-सम्बन्ध निश्चित होनेके पूर्व नाड़ी, भकूट आदिका ज्योतिषशास्त्रके अनुसार विचार किया जाता है, वैसे ही मन्त्र-दीक्षा- निर्णयके पूर्व साधक और मन्त्रके सम्बन्धका विचार भी मन्त्रशास्त्रके अनुसार किया जाता है। इसके अन्तर्गत साधकके नामके वर्ण आदिसे मन्त्रके वर्ण आदिका सम्बन्ध मुख्य रूपसे कुलाकुलचक्र, राशिचक्र, नक्षत्रचक्र, अकडमचक्र, अकथहचक्र, ऋणि-धनिचक्रके अनुसार विचार किया जाता है। परिणाम अनुकूल होनेपर ही साधकको मन्त्रका जप करना चाहिये। इस विषयमें विस्तारसे जाननेके लिये जिज्ञासुजनोंको कल्याणका साधनांक (कोड नं० ६०४) देखना चाहिये। Kalyana Visheshank 2021_Section_4_1_Back
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उ०ख०-अ०१८] * विष्णुका गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका अनुष्ठान करना * ७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
बाद भूतशुद्धि और प्राणोंका व्यवस्थापन करके आधार आदिके क्रमसे अन्तर्मातृकान्यास सम्पन्न किया। तदुपरान्त मस्तक आदिमें बहिर्मातृकान्यास करनेके अनन्तर मूल मन्त्रसे प्राणायाम किया। तत्पश्चात् गजाननदेवका ध्यान करके आवाहनी आदि मुद्राएँ प्रदर्शित करते हुए पहले नानाविध भावनात्मक उपचारोंसे और बादमें षोडशोपचारोंके द्वारा गजाननकी अर्चना की। इसके अनन्तर वे योगेश्वरेश्वर विष्णु उस परम मन्त्र (षडक्षरमन्त्र)-का जप करने लगे ॥ ४-७ ॥ तदनन्तर सौ वर्षका समय बीत जानेपर करोड़ों सूर्यों और अग्निके समान प्रकाशमान परमात्मा गणेश उनके समक्ष प्रकट हुए और अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे गरुड़ांकित ध्वजावाले भगवान् विष्णुसे कहा—हे हरे! तुम्हारी जो कामना हो, वह वर मुझसे माँग लो। तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट मैं वह सब तुम्हें प्रदान करूँगा। यदि तुमने पहले ही मेरी आराधना कर ली होती, तो तुम्हें निश्चय ही विजय प्राप्त हो जाती ॥ ८-१० ॥ **श्रीहरि बोले—**ब्रह्मा, ईशान (शिव), इन्द्र आदि प्रमुख देवता जिन आपका तपस्याके द्वारा दर्शन करनेमें सक्षम नहीं हैं; उन्हीं नानारूप और एक (अद्वय) स्वरूपवाले तथा व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूपवाले आप गणेशजीका मैं दर्शन कर रहा हूँ॥ ११॥ आप अणुसे भी अणु स्वरूपवाले और आकाशादि महान् पदार्थोंसे भी महान् एवं सत्त्वमय स्वरूपवाले हैं। प्राणियोंके प्रारब्धवश आप ही बार-बार उनका सृजन, पालन और संहार करते हैं॥ १२॥ आप सबके आत्मा, सर्वत्र गमनशील, सर्वशक्तिमान्, सर्वत्र व्याप्त, सब कुछ करनेवाले, परमेश्वर, सब कुछ देखनेवाले, सबका संहार करनेवाले, सबका रक्षण करनेवाले, सबको धारण करनेवाले, विश्वके नेता और
[दायाँ स्तम्भ]
पिता भी हैं*॥ १३॥ हे देव! इस प्रकारके आपके दर्शनसे मुझे सर्वत्र सिद्धियाँ सम्भव होंगी, फिर भी मैं आपसे एक बात कहता हूँ॥ १४॥ मेरी योगनिद्राके अन्तिम समयमें मेरे कर्णमलसे मधु-कैटभ नामक दो महान् बलशाली [दानव] उत्पन्न हुए और वे दोनों ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्यत हो गये॥ १५॥ तब मैंने उन दोनोंसे बहुत वर्षोंतक युद्ध किया, तदनन्तर क्षीणबल होनेसे मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १६॥ अतः हे परमेश्वर! उन दोनोंका जिस प्रकारसे मेरे द्वारा वध हो सके तथा अन्य दैत्योंपर भी विजय प्राप्तकर मुझे यश प्राप्त हो, उसपर विचार कीजिये। आप मुझे अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें, जिससे होने- वाली मेरी अतुलनीय कीर्ति त्रैलोक्यको पावन करेगी॥ १७-१८॥ **गणेशजी बोले—**हे विष्णो! तुमने जो-जो प्रार्थना की है, वह निश्चित रूपसे पूर्ण होगी। तुम्हें यश, बल, परम कीर्ति और [कार्योंमें] निर्विघ्नताकी प्राप्ति होगी॥ १९॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजन्!] महाविष्णुके प्रति ऐसा कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये। तब आनन्दसे पूर्ण होकर उन्होंने मान लिया कि अब वे दोनों असुर उनके द्वारा जीत लिये गये॥ २०॥ उन्होंने वहाँ [गणेशजीका] एक मन्दिर बनवाया, जो स्फटिक मणियों और अनेक रत्नोंसे जटिल था। वह सुवर्णमय शिखर और चार द्वारोंसे सुशोभित था॥ २१॥ उन्होंने गण्डकी नदीसे प्राप्त पाषाणसे [गणेशजीकी] प्रतिमाका निर्माण कराया और उसे मन्दिरमें स्थापित किया। देवताओं और मुनियोंने उस प्रतिमाको 'सिद्धि-
[पाद-टिप्पणी (Footnote)]
* हरिरुवाच ब्रह्मेशानाविन्द्रमुख्याश्च देवा यं त्वां द्रष्टुं नैव शक्तास्तपोभिः। तं त्वां नानारूपमेकस्वरूपं पश्ये व्यक्ताव्यक्तरूपं गणेशम्॥ त्वं योऽणुभ्योऽणुस्वरूपो महद्भ्यो व्योमादिभ्यस्त्वं महान् सत्त्वरूपः। सृष्टिं चान्तं पालनं त्वं करोषि वारं वारं प्राणिनां दैवयोगात्॥ सर्वस्यात्मा सर्वगः सर्वशक्तिः सर्वव्यापी सर्वकर्ता परेशः। सर्वद्रष्टा सर्वसंहारकर्ता पाता धाता विश्वनेता पितापि॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १८।११-१३)
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७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विनायक' नाम दिया॥ २२॥ चूँकि श्रीहरिने इसी क्षेत्रमें यह शुभ सिद्धि प्राप्त की थी, अतः वह क्षेत्र पृथ्वीपर 'सिद्धक्षेत्र'* के नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ २३॥ तदनन्तर वे श्रीहरि उस स्थानपर गये, जहाँ वे दोनों—मधु और कैटभ स्थित थे। जब उन दोनोंने श्रीहरिको आते हुए देखा तो हँसते हुए उनकी निन्दा करने लगे॥ २४॥ [उन्होंने श्रीहरिसे कहा—] तुम्हारा मेघसदृश श्याम मुख आज हमें पुनः कहाँसे दिखायी दे रहा है? अतः हम दोनों पुनः तुम्हें महामुक्ति देंगे; तुम तो लघुता अर्थात् पराजयको प्राप्त हो गये थे, फिर [पुनः] किसलिये रणमें आ गये?॥ २५ १/२ ॥ श्रीहरि बोले—अग्निकी छोटी-सी चिनगारी सहसा सब कुछ जला डालती है। जैसे लघु [आकारवाला] दीपक रात्रिके महान् अन्धकारका संहार कर डालता है, वैसे ही मैं तुम दोनों मदोन्मत्त दुष्टोंका आज ही नाश कर देनेमें समर्थ हूँ॥ २६-२७॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजा सोमकान्त!] उन श्रीहरिके इस प्रकारके वचनको सुनकर मधु-कैटभने अत्यन्त क्रोधित होकर सहसा [भगवान्] विष्णुके हृदयदेशमें मुक्केसे घोर प्रहार किया॥ २८॥ तब पुनः उन दोनों (मधु-कैटभ)-का उन (भगवान् विष्णु)-के साथ मल्लयुद्ध शुरू हो गया, जो बढ़ता ही गया। [इस प्रकार] उन दोनोंके साथ बहुत दिनतक युद्ध करके श्रीहरि उन्हें वर देनेके लिये समुत्सुक हुए। उन्होंने मधुर वाणीमें उन दोनों दानवों—मधु-कैटभसे कहा— तुम दोनोंने मेरे प्रहारोंको बहुत समयतक सहन किया है। हे दैत्यश्रेष्ठो! मैं तुम दोनोंके पुरुषार्थसे प्रसन्न हूँ। तुम दोनोंके समान न कोई हुआ है, न होगा॥ २९-३१॥ वे दोनों (मधु-कैटभ) बोले—हे हरे! हम दोनों तुम्हारे युद्धसे बहुत सन्तुष्ट हुए हैं, इसलिये तुम हमसे वर माँगो; हम तुम्हें बहुत-से वर देंगे॥ ३२॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजन्!] मायासे मोहित उन दोनों [दैत्यों]-के वचन सुनकर भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर कहा—हे दैत्यद्वय! यदि तुम दोनों मुझे वर देनेके लिये समुद्यत हो तो तुम दोनों मेरे वध्य हो जाओ—यही मैंने वर माँगा है॥ ३३ १/२ ॥ तब सब जगह जल-ही-जल देखकर उन दोनों— मधु और कैटभने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—हे माधव! तुम्हारे हाथसे मृत्यु मंगलकारिणी है; अन्तकालमें तुम्हारे चिन्तनसे लोगोंको सद्यः सनातनी मुक्ति प्राप्त होती है, अतः जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी न हो, वहाँ हम दोनोंका वध करो। हम दोनों सब कुछ छोड़ सकते हैं, लेकिन सत्य नहीं; क्योंकि सब कुछ सत्यमें ही प्रतिष्ठित है॥ ३४-३६॥ मुनि बोले—[हे राजन्!] उन दोनों (मधु- कैटभ)-के इस प्रकारके वचनको सुनकर [श्रीहरिने] उनको अपने जघनप्रदेशपर लिटाया और तीक्ष्ण धारवाले चक्रसे उनके सिरोंको काट दिया॥ ३७॥ तब देवताओंने प्रसन्न होकर फूल बरसाये, गन्धर्वोंने नृत्य किया और अप्सराओंके समूहोंने गीत गाये॥ ३८॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने परमेष्ठी ब्रह्माजीके पास जाकर हर्षपूर्वक उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ ३९॥ श्रीहरि बोले—[हे ब्रह्मन्!] जब मैं उन दोनों (मधु-कैटभ)-को जीतनेमें समर्थ नहीं हो सका, तब मैं
- मुम्बई-रायचूर लाइनपर धौंड जंक्शनसे ९ किमी० दूर बोरीवली स्टेशन है। वहाँसे लगभग ९ किमी० दूर भीमा नदीके किनारे यह स्थान है। इसका प्राचीन नाम 'सिद्धाश्रम' है। यहाँ भगवान् विष्णुने मधु-कैटभ दैत्योंको मारनेके लिये गणेशजीका पूजन किया था। द्वापरान्तमें व्यासजीने पुराणोंका प्रणयन निर्विघ्न सम्पन्न करनेके लिये भगवान् विष्णुद्वारा स्थापित गणपति-मूर्तिका पूजन किया था। Kalyana Visheshank 2021_Section_4_2_Back
यहाँ पृष्ठ का यथावत पाठ दिया गया है:
उ०ख०-अ०१९] $\qquad$ * राजा भीमकी निःसंतानताके कारणका वर्णन * $\qquad$ ७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[ऊपरी भाग - बायाँ स्तम्भ]
भगवान् शंकरके पास गया। शंकरजीने मुझे षडक्षर मन्त्र (वक्रतुण्डाय हुं)-का उपदेश दिया ॥ ४० ॥ उससे मैंने देवाधिदेव भगवान् विघ्नेश्वर (गणेशजी)- की आराधना की। उन्होंने मुझे कामनाओंको फलीभूत करनेवाले अनेक वरदान दिये ॥ ४१ ॥ वे भगवान् गणेश मेरे द्वारा स्तुत और पूजित होकर उसी समय अन्तर्धान हो गये। उन वरदानोंके प्रभावसे मैंने उन दोनों दुष्टों-मधु और कैटभका वध कर दिया ॥ ४२ ॥ भगवान् शंकरकी कृपासे मुझे उन महात्मा गणेशजीकी
[ऊपरी भाग - दायाँ स्तम्भ]
महिमा विशेष रूपसे ज्ञात हो चुकी है, अब मैं दैत्यों और दानवोंका हनन करता रहूँगा ॥ ४३ ॥ उस समय समस्त देवताओं और मुनियोंने गजाननदेव, आप ब्रह्माजी, भगवान् शंकर और मेरी (विष्णुकी) स्तुति की और अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये ॥ ४४ ॥ [सूतजी कहते हैं—हे मुनियो!] जो इस पापनाशक [गणपति]-माहात्म्यका नित्य श्रवण करता है; उसे कभी भय नहीं होता और वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको फलीभूत कर लेता है ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सिद्धक्षेत्रोत्पत्तिवर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय राजा भीमकी निःसंतानताके कारणका वर्णन
[निचला भाग - बायाँ स्तम्भ]
भृगुजी बोले—[हे राजन्!] इस आख्यानको सुनकर और षडक्षर मन्त्रकी [जप]-विधि जानकर भी व्यासजीने ब्रह्माजीसे पुनः इस प्रकार पूछा, जैसे उनकी तद्विषयक इच्छा पूर्ण न हुई हो ॥ १ ॥ व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन्! मैंने पापहारी, सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले और पुण्यवर्धक सिद्धक्षेत्र एवं गणेशजीके माहात्म्यको सुना, परंतु मुझे इस कथा- सुधाके पानसे परम तृप्ति नहीं हुई है, अतः आप भगवान् विनायकके कथानकको पुनः कहें ॥ २-३ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**हे पराशरपुत्र व्यासजी! मैं सर्वदेवाधिदेव भगवान् गणेशके इस मंगलमय महान् आख्यानको तुम्हारे सम्मुख कहता हूँ — ॥ ४ ॥ विदर्भदेशमें भीम नामक एक राजा हुआ; जो दानवीर, महान् बलशाली, उदार और प्रचण्ड पराक्रमी था। हे महामते! कौण्डिन्यनगरमें उसका निवास था। सामन्तगण और दूसरे राजा उसको कर दिया करते थे॥ ५-६ ॥ उसके आगे-आगे अश्वारोहियों, गजारोहियों, पैदल सैनिकों और रथारोहियोंसे युक्त दस करोड़ सैनिकोंवाली सेना चलती थी तथा उसके पीछे भी वैसे ही तथा उतने ही सैनिक होते थे ॥ ७ ॥
[निचला भाग - दायाँ स्तम्भ]
हजारों ब्राह्मण उसके आश्रयमें रहते हुए प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन करते थे। उसकी महान् भाग्यशालिनी भार्याका नाम चारुहासिनी था ॥ ८ ॥ खिले हुए कमलके समान मुख और मृगशावकके समान नेत्रोंवाली वह ब्राह्मण-भक्त, देवपरायण और नित्य धर्ममें सतत तत्पर रहनेवाली थी ॥ ९ ॥ वह पतिव्रता, पतिप्राणा और सदा पतिकी आज्ञा माननेवाली थी, परंतु उत्तम और सुन्दर रंग-रूपवाली होते हुए भी दैवयोगसे वह पुत्रहीना थी ॥ १० ॥ उस सर्वांगसुन्दरी रानीको देखकर पुत्रहीन नृपश्रेष्ठ भीम दुखी होकर कहने लगे—सम्पूर्ण राज्यका परित्याग करके अब मुझे [किसी] श्रेष्ठ वनमें चले जाना चाहिये; क्योंकि अपुत्रकी सद्गति नहीं होती, उसे स्वर्ग या सुख नहीं प्राप्त होता। देवता उसके द्वारा दिये गये हव्यका और पितर लोग कव्यका ग्रहण नहीं करते; इसलिये मेरा तो जननीके गर्भसे जन्म लेना ही व्यर्थ हो गया। मेरे लिये [यह] राजमहल, धन-सम्पत्ति और कुल-परिवार—सब व्यर्थ है ॥ ११–१३ ॥ 'बिना पुत्रके सारे कर्म निश्चित ही व्यर्थ होते हैं'—ऐसा निश्चित मानकर उन्होंने अपने दो मन्त्रियोंको बुलाया। उनमेंसे एकका नाम मनोरंजन और दूसरेका
८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ]
नाम सुमन्तु था। वे दोनों आन्वीक्षिकी १, वेदत्रयी २ और षोडश कलाओंके ज्ञाता थे ॥ १४-१५ ॥ हे मुने! उन्होंने उसी क्षण वहाँ आकर उन राजाको नमस्कार किया, तब राजा भीमने उन दोनों [मन्त्रियों]- से कहा कि 'तुम दोनों मेरे राज्यका परिपालन करना' ॥ १६ ॥ मेरे या मेरी पत्नीके द्वारा पूर्वजन्ममें कोई पाप हुआ था, जिसके कारण हम दोनोंको दोनों लोकोंमें सुख देनेवाली सन्तान नहीं प्राप्त हुई ॥ १७ ॥ यदि मैं पुनः आ जाऊँ तो मेरा राज्य मुझे दे देना, नहीं तो तुम दोनों राज्यको बाँटकर ले लेना ॥ १८ ॥ इस प्रकारका निश्चय करके राजाने पहले स्वस्ति- पाठ कराया, फिर ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान देकर नगरसे बाहर निकले ॥ १९ ॥ वे नृपश्रेष्ठ भीम अपनी पत्नी, दोनों मन्त्रियों और नगरवासियोंके साथ गव्यूतिमात्र (दो कोस)-तक गये और वहाँसे उन सबको वापस भेज दिया ॥ २० ॥ तब उन दोनों मन्त्रियोंने कहा—'हे राजन् ! हम दोनों भी आपके साथ चलेंगे।' राजाके सुहृज्जन और उनके नगरके निवासी अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगे ॥ २१ ॥ उन सबसे राजाने कहा 'आप लोग भयभीत न हों, मैंने इन दोनों मन्त्रियोंको आप सबका अधिपति बना दिया है। जैसे मैंने आप सबका पालन किया, वैसे ही भलीभाँति ये दोनों भी करेंगे' ॥ २२ ॥ इस प्रकार उन सबको भलीभाँति आश्वासन देकर उन दोनों (मन्त्रियों)-से राजाने पुनः कहा—'मैंने राज्य आप दोनोंको दे दिया है, आप दोनों नगरकी सब प्रकारसे रक्षा करना' ॥ २३ ॥ इस प्रकार सबको छोड़कर [राजा भीम] पत्नीके साथ नगरसे बाहर चले गये। [तदनन्तर] भ्रमण करते हुए उन्होंने एक सरोवर देखा, जो कमलोंसे युक्त था ॥ २४ ॥ वह पुष्पित वृक्षोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके जलचर जीवोंसे समन्वित था। तदनन्तर उन दोनों—राजा और रानीने उस सरोवरके निकट एक रमणीय और शुभ आश्रमको देखा, जो सबके आनन्दको बढ़ानेवाला था। जहाँ जातीय वैर रखनेवाले हाथी और सिंह, नेवला और
[दायाँ स्तम्भ]
साँप, बिल्ली और चूहे आदि वैर नहीं करते थे। राजा और रानीने वहाँ वेदाध्ययन कर रहे शिष्योंसे घिरे शान्त स्वरूपवाले मुनि विश्वामित्रको देखा, जो कुशके आसनपर विराजमान थे ॥ २५-२७१/२ ॥ उन दोनों (राजा भीम और उनकी रानी)- ने उन महात्मा विश्वामित्रको दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और उनके चरणोंसे गिरकर पुनः- पुनः नमस्कार किया। मुनिश्रेष्ठ तपोनिधि विश्वामित्रने उन्हें उठाकर और राजाके आशयको जानकर स्नेहयुक्त वाणीमें कहा— ॥ २८-२९१/२ ॥ [मुनि] विश्वामित्र बोले—हे राजन् ! तुम्हारा पुत्र गुणवान् और महान् यशस्वी होगा। हे नृपश्रेष्ठ ! तुम कहाँसे आये हो ? तुम्हारे नगरका क्या नाम है ? यह सब बतलाओ, तब मैं तुम्हारे पापके नाशके लिये यत्न करूँगा ॥ ३०-३१ ॥ [राजा] भीमने कहा—हे स्वामिन् ! विदर्भ देशमें मेरा कौण्डिन्य नामक नगर है। मेरा नाम भीम है और यह चारुहासिनी मेरी पत्नी है ॥ ३२ ॥ मैंने पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या, दान, व्रत आदि अनेक यत्न किये, परंतु पूर्वजन्ममें किये गये पापोंके कारण ईश्वरको मुझपर करुणा नहीं आयी ॥ ३३ ॥ हे मुने! राज्य छोड़कर हम दोनों वन चले आये और यहाँ आपके चरणोंका दर्शन हुआ। अनेक वनोंमें घूमते-घूमते दैवके द्वारा ही मैं यहाँ पहुँचाया गया हूँ ॥ ३४ ॥ साधुजनोंकी संगति शीघ्र ही उत्तम फल देती है, इसलिये आपके आशीर्वादसे मुझे अवश्य पुत्र-प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है। हे मुने! आप विद्या और तपसे सम्पन्न, व्रत-दान-यज्ञ और स्वाध्याय करनेवाले तथा दयावान् एवं संयमी हैं; आज आपके द्वारा दिया हुआ आशीर्वाद व्यर्थ नहीं होगा ॥ ३५-३६ ॥ परंतु हे मुने! पूर्वजन्ममें मैंने कौन-सा पाप किया है, उसका क्या प्रतिकार है—यह बताइये; क्योंकि मैं आपको सर्वज्ञ मानता हूँ ॥ ३७ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] इस प्रकार उन (राजा भीम)-के वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्रने उन राजा [भीम]-से आदरपूर्वक पूर्वकालकी कथा कही ॥ ३८ ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes): १-तर्कशास्त्र, २-ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद।
उ०ख०-अ०२० ] * बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना * ८१ विश्वामित्रजी बोले- हे दुर्मते! तुमने धन- ऐश्वर्यके मदसे अन्धे होकर वेद-शास्त्र-पुराण और लोकमें प्रतिष्ठित कुलधर्मका त्याग कर दिया ॥ ३९ ॥ तुम्हारे सभी पूर्वज गणनायक गणेशजीका नित्य पूजन किया करते थे, [तुम्हारे द्वारा कुलमें की जानेवाली उस पूजाका त्याग करनेसे] उन गणेशजीके क्रोधके कारण ही तुम्हारे संतान नहीं हो रही है ॥ ४० ॥ हे महावीर! गजानन गणेशजीको जिस प्रकारसे तुम्हारे कुलका कुलदेवत्व प्राप्त हुआ, उसे बता रहा हूँ, तुम आदरपूर्वक प्रारम्भसे सुनो ॥ ४१ ॥ [तुम्हारे वंशमें] तुमसे सात पीढ़ी पहले भीम नामके एक राजा हुए थे। उनके वल्लभ नामका रूपवान् और धनसम्पन्न पुत्र था ॥ ४२ ॥ हे राजन् ! उसके भी बहुत समय बीतनेपर एक पुत्र हुआ। लेकिन वह शिशु मूक-बधिर था, उसकी देहसे अत्यन्त दुर्गन्धित पीबका स्राव होता था, साथ ही वह कुबड़ा भी था ॥ ४३१/२ ॥ उसे देखकर उसकी माँ कमला बहुत दुखी हुई। उसने अपने अन्तःकरणमें विचार किया कि लोकमें अपुत्रता ही श्लाघ्य है, न कि इस प्रकारका पुत्रवत्त्व ! क्योंकि यह तो अत्यन्त दुःखकर है ॥ ४४-४५ ॥ विधाता आज ही मेरा या इस (शिशु)-का मरण क्यों नहीं कर देता! मैं अपने प्रियजनोंको कैसे मुँह दिखाऊँगी ? ॥ ४६ ॥ इस प्रकार विलाप करती हुई वह अत्यन्त दारुण दुःखसे रोने लगी। उसके रुदनको सुनकर उसके पति [राजा वल्लभ] उस प्रसूति-कक्षमें आ गये ॥ ४७ ॥ उस प्रकारके बालक और अत्यन्त दुखी पत्नीको देखकर कर्मकी गतिको जाननेवाले [उन राजा]-ने मीठी वाणीमें [पत्नीको] सान्त्वना देते हुए कहा - ॥ ४८ ॥ हे कल्याणि ! दुःख न करो; क्योंकि कर्मोंकी गति ऐसी ही है। पूर्वजन्ममें किये हुए पापके कारण ही मनुष्य दुःखका भागी होता है ॥ ४९ ॥ जिसे दुःख प्राप्त है, उसे भी सुखकी प्राप्ति होती है; वैसे ही जिसे सुख प्राप्त है, उसे भी दुःखकी प्राप्ति होती है। इस बालकके विषयमें [तुम्हें] शोक नहीं करना चाहिये, यह ठीक हो जायगा ॥ ५० ॥ जिस प्रकारके इसके पूर्वजन्मके कर्म होंगे, उसी प्रकारका इसका भविष्य होगा। हम लोग मणि, मन्त्र और महौषधियोंका प्रयोग करके धार्मिक अनुष्ठानों एवं साधनोंके द्वारा [इसे स्वस्थ करनेका] प्रयत्न करेंगे ॥ ५१ ॥ हे सुन्दर भौंहोंवाली! तप, जप, देवपूजा और विधिपूर्वक तीर्थयात्राके द्वारा इसे ठीक करनेका प्रयत्न करेंगे। इस समय जो कर्तव्य है, उसका भलीभाँति सम्पादन करो ॥ ५२ ॥ [पतिद्वारा] इस प्रकार बोध कराये जानेपर उस साध्वीने शोकका त्याग कर दिया और तदनन्तर उस शिशुको जलसे प्रक्षालित करवाकर सखियोंके साथ प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ ५३ ॥ तदनन्तर उन राजा वल्लभने पत्नीके साथ पुत्रके समस्त जननोचित आभ्युदयिक कर्म किये और अनेक विप्रों तथा विप्रपत्नियोंका पूजन किया ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कमलापुत्र-वर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥ बीसवाँ अध्याय बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना और गणेशजीका उसे दर्शन देना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] तदनन्तर उस (राजा)-ने ब्राह्मणों, साधुओं, ज्योतिषियों और वेदज्ञोंको बुलाकर उनका रत्न, वस्त्र, धन आदिसे पूजनकर, तत्पश्चात् उनसे पूछकर उसने अपने पुत्रका नाम 'दक्ष' रखा ॥ १ १/२ ॥ उसने पुत्रको रोगसे मुक्ति दिलाने और अपनी संतानपरम्पराकी अभिवृद्धिके लिये जप और मन्त्रानुष्ठान कराये, औषधीय चिकित्सा करवायी और स्वयं भी बारह वर्षोंतक कठोर तप किया ॥ २-३ ॥ परंतु जब इतनेपर भी उस राजाने पुत्रको रोगसे मुक्त
८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
होते न देखा तो उसका धैर्य टूट गया और वह निराशा एवं क्रोधसे मूर्च्छित-सा होकर बोला— ॥ ४ ॥ हे रानी कमला ! तुम पुत्रसहित मेरे भवनसे चली जाओ, न मैं इस पुत्रको और न तुम्हें ही देखनेमें समर्थ हूँ ॥ ५ ॥ इस प्रकार [अपने पति] राजा वल्लभद्वारा भर्त्सना किये जानेपर रानी कमला अपने पुत्रको लेकर उस नगरसे वनको चल दी ॥ ६ ॥ शोकसे व्याकुल और दुखी होकर वह रोती और आँसुओंको पोंछती हुई तथा पुत्रको पीठपर लादे हुए एक ग्रामसे दूसरे ग्रामको जाती थी। भूख-प्यास और थकानसे कृश शरीरवाली उसको अत्यन्त व्याकुल होकर भिक्षावृत्तिसे जीवनयापन करना पड़ रहा था। लुटेरोंनें उसके वस्त्र और आभूषणादि भी लूट लिये थे ॥ ७-८ ॥ तदनन्तर किसी अन्य गाँवमें जाकर पुत्रको उसने एक शिव-मन्दिरमें बैठा दिया और वह स्वयं, जो कभी राजाकी प्रिय पत्नी थी, भिक्षाके लिये नगरमें भ्रमण करने लगी ॥ ९ ॥ किसी समय वह अपने पुत्रके साथ भिक्षाके लिये नगरमें गयी। [उस समय] किसी द्विजश्रेष्ठके शरीरके सम्पर्कसे आयी हुई वायुका उस बालकसे स्पर्श हुआ। उस द्विजश्रेष्ठकी भक्तिके अतिशय पुण्य-प्रभावसे उस बालकने लम्बोदर गणेशजीका साक्षात् दर्शन किया, जिससे वह नेत्रोंसे देखने और कानोंसे सुननेकी शक्तिसे सम्पन्न और दिव्य शरीरवाला हो गया ॥ १०-११ ॥ उसे देखकर और उसके द्वारा बार-बार उच्चारराकी जानेवाली मधुर एवं सुखद वाणीको सुनकर कमलाने सभी दुःखोंका त्यागकर अत्यन्त हर्षका अनुभव किया ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् कमला विचार करने लगी कि मेरा जो पुत्र मणि-मन्त्रके प्रयोगसे, महौषधियोंद्वारा चिकित्सासे और विशाल हवनात्मक अनुष्ठानोंसे भी स्वस्थ नहीं हुआ, वह [उन द्विजश्रेष्ठके शरीरके सम्पर्कवाली] वायुके स्पर्शमात्रसे कैसे स्वस्थ हो गया ! 'मैं उन दुष्कर्मनाशक पुरुष (द्विजश्रेष्ठ)-का कहाँ दर्शन कर सकूँगी ?' —यह कहती हुई वह पुत्रका आलिंगनकर
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
दुःखरहित हो गयी और उसे साथ लेकर भिक्षाके लिये उस नगरमें पुनः गयी ॥ १३-१५ ॥ [उस नगरके] नागरिकोंने उन दोनोंको सादर आमन्त्रित किया और नाना प्रकारके पक्वान्नों, शर्करा और घृतसे समन्वित खीर एवं शाकादिसे युक्त भोजन कराया ॥ १६ ॥ इस प्रकार वे दोनों दिन-प्रतिदिन उनके यहाँ भोजन करते और धन तथा नये-नये उत्तम कोटिके वस्त्र भी प्राप्त करते थे ॥ १७ ॥ [एक दिन] एक नागरिकने उस बालकसे पूछा कि तुम्हारा और तुम्हारे पिताका क्या नाम है ? तुम किस देश और किस नगरके निवासी हो ? तुम्हारी जाति क्या है ? और तुम्हारा व्यवसाय क्या है ? ॥ १८ ॥ उस नागरिकका इस प्रकारका वचन सुनकर उस बालकने अपना नाम 'दक्ष' बतलाया; तदनन्तर माँके पास आकर अपने पिता, नगर, कुल और व्यवसायके विषयमें पूछकर पुनः उस नागरिकसे कहा- [हे ब्रह्मन् !] कर्णाटकदेशान्तर्गत भानु नामक नगरमें वल्लभ नामक क्षत्रिय [राजा] हैं, जो महान् बलशाली और शत्रुसेनाओंका नाश करनेवालेके रूपमें विख्यात हैं—वे मेरे पिता हैं। उनकी कमला नामवाली यह पत्नी है और मैं दक्ष नामवाला इसका पुत्र हूँ ॥ १९-२१ ॥ हे ब्रह्मन् ! जब मैं उत्पन्न हुआ, तो अन्धा एवं बधिर था, मेरे शरीरमें अनेक घाव थे, तब माता मेरा त्याग करनेको उद्यत हो गयी ॥ २२ ॥ तब पिताने माँको ऐसा करनेसे रोका और मुझे स्वस्थ करनेके बहुत-से उपाय कराये। मेरे पिताने बारह वर्षतक तपस्या करके उसका पुण्य मुझे निवेदित किया ॥ २३ ॥ हे नागरिक ! परंतु जब तब भी मेरे शरीरमें कोई सुधार न देखा तो पिताने मुझे और माँको [भवनसे] बाहर निकाल दिया ॥ २४ ॥ यहाँ किसी [द्विजश्रेष्ठ]-के शरीरकी वायुके सम्पर्कसे मेरा शरीर सुन्दर हो गया है। माताके मुखसे कही गयी इन सब बातोंको बालक दक्षने उस नागरिकसे कहा ॥ २५ ॥
उ०ख०-अ०२० ] * बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना * ८३ इस प्रकार सुनकर उस नगरनिवासी व्यक्तिके चले जानेपर दक्ष अपनी माताको आनन्दित करते हुए उसके पास शीघ्रतापूर्वक चला गया ॥ २६॥ तब उस नगरमें रहनेवाले एक करुणापूर्ण चित्तवाले द्विजने उन दोनोंको गणेशजीकी आराधनाकी विधिका उपदेश दिया ॥ २७॥ तदनन्तर कमला और दक्ष परम शान्तिपूर्वक एक अँगुठेपर स्थित होकर तपस्या करते हुए गणेशजीकी आराधनामें संलग्न हो गये ॥ २८ ॥ [इष्ट] देव श्रीगणेशजीके नाममें चतुर्थी तथा प्रारम्भमें ओंकार लगाकर बने अष्टाक्षर¹ परम मन्त्रको वे दोनों भक्तिपूर्वक जपनेमें तत्पर हो गये ॥ २९ ॥ वायुमात्रका भक्षण करनेके कारण शुष्क शरीरवाले उन दोनोंको देखकर करुणासागर भगवान् विनायक उनके समक्ष प्रकट हो गये ॥ ३० ॥ उनका श्रीविग्रह चतुर्भुज, विशाल शरीरवाला, गजमुख, अत्यन्त सुन्दर और रात्रिमें उदय हुए अनेक सूर्योंकी प्रभाके समान कान्तिमान् था ॥ ३१ ॥ उनका मस्तक रत्नों और मोतियोंसे जटित सुवर्ण मुकुटसे सुशोभित हो रहा था, उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था तथा सोनेके बने बाजूबन्दोंसे वे अलंकृत थे ॥ ३२ ॥ एक घुटना नीचे झुकाये हुए वे उत्तम आसनपर आसीन थे। उन्होंने सुवर्णनिर्मित करधनी और रत्नजटित अँगुठी धारण कर रखी थी ॥ ३३ ॥ उनके तीन नेत्र थे, वे अपने जठरप्रदेशपर एक महासर्पको लपेटे हुए थे, उनके मुखमें एक दाँत सुशोभित था। इस प्रकारका रूप दिखाकर वे पुनः द्विजरूप हो गये ॥ ३४॥ तदनन्तर द्विजरूपधारी उन गणेशजीने कहा कि मैं तुम दोनोंकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर वरदान देनेके लिये आया हूँ, तुम दोनों अपना मनोवांछित वर माँगो ॥ ३५॥ विश्वामित्रजी बोले- [हे राजा भीम!] इस प्रकार विघ्नराज गणेशजीके प्रसन्न होने और द्विजरूपमें प्रत्यक्ष दर्शन देनेपर [दक्षने] हाथ जोड़कर परम भक्तिभावसे प्रणामकर उनसे कहा - ॥ ३६ ॥ दक्ष बोला- हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे पूर्वजन्मोंमें किये पुण्य फलित हुए हैं, जिससे मुझे आपके दो प्रकारके परम महनीय रूपोंका दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ ३७ ॥ आपके विनायकरूप और विप्ररूपका दर्शनकर मेरा जन्म सार्थक हो गया। आप कारणोंके भी परम कारण और वेदोंके भी कारणरूप हैं ॥ ३८ ॥ आप परम ज्ञेय (जाननेयोग्य), परम ब्रह्म, श्रुतिके द्वारा अनुसन्धेय, सनातन, सबके साक्षी और सबके अन्दर एवं बाहर व्याप्त हैं ॥ ३९ ॥ समस्त कार्योंके कर्ता आप ही हैं, आप ही सूक्ष्म एवं महाकाय प्राणियोंके भी कर्ता हैं। आप अनेक रूपवाले होते हुए भी एक (अद्वितीय) रूपवाले हैं, आप रूपरहित और आकाररहित भी हैं ॥ ४० ॥ आप ही शंकर हैं, आप ही विष्णु, इन्द्र, अग्नि, अर्यमा, पृथ्वी, वायु, आकाशस्वरूप तथा जल, चन्द्रमा और नक्षत्ररूप भी हैं ॥ ४१ ॥ आप ही विश्वके सृजनकर्ता, विश्वके पालनकर्ता और विश्वके संहारकर्ता हैं। आप ही इस स्थावर- जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत्के गुरुके भी संरक्षक और ज्ञान-विज्ञानवान् हैं ॥ ४२ ॥ आप ही भूत, भविष्य और वर्तमान हैं। आप ही इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता हैं। आप ही कला, काष्ठा और मुहूर्तरूप हैं तथा आप ही श्री, धृति और कान्ति हैं। आप ही सांख्य, योग [आदि दर्शन], [विविध] शास्त्र, वेद, पुराण, चौंसठ कलाएँ और उपनिषद् हैं ॥ ४३-४४ ॥ आप ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र (चारों वर्ण) हैं तथा आप ही देश, विदेश, क्षेत्र एवं पुण्य क्षेत्रोंके रूपमें स्थित हैं ॥ ४५ ॥ आप ही प्रमेय (प्रमाणित किये जानेयोग्य) और अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे) हैं। आप ही योगियोंको ज्ञानद्वारा अधिगत होते हैं। आप ही स्वर्ग, पाताल, वन १. ॐ गं गणपतये नमः।
८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- और उपवन हैं ॥ ४६ ॥ आप ही औषधियाँ, लता, वृक्ष, कन्द, मूल और फल हैं तथा आप ही अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्जरूप [जीव] हैं ॥ ४७ ॥ आप ही काम, क्रोध, क्षुधा, लोभ, दम्भ (आत्मश्लाघा), दर्प (अभिमान), दया (करुणा), क्षमा, निद्रा, तन्द्रा (शैथिल्य), विलास, हर्ष और शोक हैं* ॥ ४८ ॥ विश्वामित्रजी बोले—[हे राजन्!] दक्षके इस प्रकारके वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए विनायक श्रीगणेशजीने मन्द हास्य करते हुए मेघसदृश गम्भीर वाणीमें उससे कहा— ॥ ४९ ॥ गजानन (गणेशजी) बोले—हे महाभाग! तुम्हारे द्वारा की गयी इस गम्भीर स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें वरदान देनेके लिये यद्यपि अत्यन्त उत्कण्ठित हूँ, फिर भी नहीं दे रहा हूँ; क्योंकि यदि मैं तुम्हें वर दे देता हूँ तो मेरा भक्त मुझपर ही नाराज हो जायगा। मेरा वही भक्त तुम्हें वरदान देगा, जिसके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शसे तुम्हें नेत्र और श्रोत्रसे समन्वित दिव्य देहकी प्राप्ति हुई है। मैं उसका नाम भी बतलाता हूँ, उसका नाम मुद्गल है ॥ ५०-५२ ॥ तुम्हारे द्वारा ध्यान करनेमात्रसे वे विप्रश्रेष्ठ तुम्हें दर्शन देंगे। तुम जो-जो कामनाएँ करोगे, वे उन सबको पूर्ण करेंगे ॥ ५३ ॥ इस प्रकार कहकर वे परमात्मा [श्रीगणेशजी] वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्धान हो जानेपर अत्यन्त दुखित होकर [बालक] दक्ष वैसे ही रुदन करने लगा, जैसे दरिद्र निधि पा गया हो और उसके खो जानेपर रुदन करता है अथवा गायके चले जानेपर उसका बछड़ा अत्यन्त [करुण स्वरसे] रँभाता है ॥ ५४-५५ ॥ विघ्नविनायक गणेशजी कहाँ गये? कहाँ चले गये?—इस प्रकार बार-बार कहते हुए और अपने दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वह धरतीपर गिर पड़ा ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दक्षककृत विनायकस्तुतिवर्णन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय राजकुमार दक्षकी मुद्गलसे भेंट और मुद्गलका उसे गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका उपदेश देना [मुनि] विश्वामित्रजी बोले—[हे राजा भीम!] अत्यन्त विह्वल वल्लभपुत्र दक्ष इधर-उधर घूमता और दौड़ता रहा, उसे अपने वस्त्रों और आभूषणोंका भी ज्ञान न रहा ॥ १ ॥ वह मार्गमें ब्राह्मणों और [यहाँतक कि] वृक्षोंसे भी विनायक (श्रीगणेशजी)-के विषयमें पूछ रहा था कि विघ्नविनायक श्रीगणेशजी कहाँ चले गये? आप लोगोंने उन्हें कहीं देखा हो तो मुझे बतलाइये ॥ २ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार उसका चित्त भ्रान्त हो गया था और उसके नेत्र घूम रहे थे। [इसी दशामें] वह भूतलपर
- परं ज्ञेयं परं ब्रह्म श्रुतिमृग्यं सनातनम्। त्वमेव साक्षी सर्वस्य सर्वस्यान्तर्बहिस्तथा ॥ त्वमेव कर्ता कार्याणां लघुस्थूलशरीरिणाम्। नानारूप्येकरूपी त्वं निरूपश्च निराकृतिः ॥ त्वमेव शङ्करो विष्णुस्त्वमेवेन्द्रोनलोऽर्यमा । भूवायुखस्वरूपोऽपि जलसोमर्क्षरूपवान् ॥ विश्वकर्ता विश्वपाता विश्वसंहारकारकः । चराचरगुरोर्गोप्ता ज्ञानविज्ञानवानपि ॥ भूतं भावि भवच्चैव त्वमेवेन्द्रियदेवताः । कला काष्ठा मुहूर्ताश्च श्रीर्धृतिः कान्तिरेव च ॥ त्वमेव सांख्यं योगश्च शास्त्राणि श्रुतिरेव च। पुराणानि चतुःषष्टिः कला उपनिषत्तथा ॥ त्वमेव ब्राह्मणो वैश्यः क्षत्रियः शूद्र एव च । देशो विदेशस्त्वं क्षेत्रं पुण्यक्षेत्राणि यान्युत ॥ त्वं प्रमेयोऽप्रमेयश्च योगिनां ज्ञानगोचरः । त्वमेव स्वर्गः पातालं वनान्युपवनानि च ॥ ओषध्योऽथ लतावृक्षकन्दमूलफलानि च । अण्डजा जारजा जीवाः स्वेदजा उद्भ्रिजा अपि ॥ कामः क्रोधः क्षुधा लोभो दम्भो दर्पो दया क्षमा। निद्रा तन्द्री विलासश्च हर्षः शोकस्त्वमेव च ॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड २०। ३९-४८)
उ०ख०-अ०२१ ] * राजकुमार दक्षकी मुद्गलसे भेंट * ८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गिर पड़ा तथा क्षणभरके लिये चेतनाहीन हो गया॥ ३॥ इसी बीच स्वप्न (अर्धचेतनावस्था)-में उस [बालक दक्ष]-ने अपने आगे खड़े हुए ब्राह्मणको देखा, [जो कह रहा था—] हे बालक! मुझ मुद्गलने तुम्हें तुम्हारा इच्छित वह सब कुछ दे दिया, जिसकी पूर्वकालमें तुमने विघ्नेश्वर गणेशजीका दर्शन होनेपर याचना की थी। हे नृपोत्तम! इस प्रकार कहकर उस ब्राह्मणके [वहाँसे] प्रस्थान कर जानेपर दक्ष सुप्तावस्थासे जाग्रत् होनेकी भाँति उठ बैठा। उस समय उसका मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया था। उसी समय आये हुए एक द्विजसे उसने [ब्राह्मणश्रेष्ठ मुद्गलके विषयमें] पूछा— ॥४-६॥ तब उस ब्राह्मणने निकट ही स्थित, गजानन गणेशजीके अत्यन्त भक्त और उनकी भक्तिमें संलग्न रहनेवाले मुद्गलके परम दिव्य आश्रमका दर्शन कराया, जो अनेक शिष्योंसे शोभायमान और सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अभयप्रद था। मनमें मुद्गलका ध्यान करते और घूमते हुए दक्ष उनके आश्रममें पहुँचा, जो कि अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे युक्त और रमणीयतामें [यक्षराज कुबेरकी नगरी] अलकापुरी [-में स्थित चैत्ररथ वन] एवं [देवराज इन्द्रकी नगरी अमरावतीमें स्थित] नन्दनवनका भी अतिक्रमण कर रहा था। वहाँ उसने अत्यन्त मूल्यवान् आसनपर आसीन द्विज मुद्गलका दर्शन किया; जो सूर्यके समान तेजस्वी, योगबलसे अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ, वेद-वेदांगोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें निष्णात थे॥ ७-१०॥ वे भगवान् विनायक गणेशजीकी रत्नजटित सुवर्णमयी महान् मूर्ति; जो चार भुजाओं और तीन नेत्रोंवाली तथा अनेक प्रकारके अलंकारोंसे शोभायमान थी, का षोडशोपचारोंसे विधि-विधानपूर्वक पूजन कर रहे थे। उन्हें देखकर दक्षने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति लेटकर प्रणाम किया। [उस समय] उसके नेत्रोंसे आँसू गिर रहे थे और वह बार-बार लम्बी साँसें ले रहा था ॥ ११-१२१/२ ॥ विश्वामित्रजी कहते हैं—[हे राजन्!] तब मुद्गलजीने उससे पूछा कि तुम कौन हो और यहाँ किसलिये आये हो?॥ १३॥ कहो, तुम्हारा दुःख दूर करूँगा, तुम्हें क्या दुःख है? सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाओ। तब ब्राह्मणके इस प्रकारके वचनको सुनकर कमलानन्दन दक्षने सावधानमन होकर उन द्विजश्रेष्ठसे कहा— ॥ १४१/२ ॥ दक्ष बोला—हे ब्रह्मन्! मैं अपने अभिप्रायको सत्य-सत्य आपके समक्ष कह रहा हूँ— ॥ १५ ॥ कर्णाटदेशके अन्तर्गत भानु नामक नगरमें वल्लभ नामके नीतिमान्, ज्ञानी, दानी और दयालु राजा हुए ॥ १६ ॥ उनकी भार्या कमलाने जब मुझे जन्म दिया, तब मैं दुर्गन्धियुक्त था, मेरे शरीरमें घाव थे और मेरी नासिकासे रक्तस्राव हो रहा था ॥ १७ ॥ मैं अन्धा, कुबड़ा, बधिर और मूक था तथा जोर- जोरसे श्वास ले रहा था। मुझे देखकर वहाँके नागरिकोंने कहा कि इसका त्याग कर दीजिये ॥ १८ ॥ मेरे पिताने बारह वर्षोंतक मुझे स्वस्थ करनेके अनेक प्रयत्न किये; [यहाँतक कि भगवान् शंकरको उद्देश्यकर घोर तपस्या की।] परंतु वे महेश्वरसे भी मेरे स्वास्थ्यके सन्दर्भमें कुछ न प्राप्त कर सके, तब निर्दयी अन्तःकरणवाले होकर उन्होंने मुझे और मेरी माता कमलाको बाहर निकाल दिया ॥ १९-२०॥ तब मेरी दुखी माता एक पुर-से-दूसरे पुरमें मुझे साथ लेकर भ्रमण करती हुई भूखसे पीड़ित होकर कौण्डिन्यपुर आयी। यहाँ आकर भिक्षाटन करते हुए हम दोनोंको पूर्वजन्मोंके पुण्योंके प्रभावसे आपके वैसे ही दर्शन हो गये, जैसे अन्धेको आँखें मिल गयी हों ॥ २१-२२ ॥ आपके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शके प्रभावसे मेरे सारे दोष चले गये और जैसे पूर्वकालमें रघुनाथ श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके स्पर्शसे अहल्याको दिव्य शरीरकी प्राप्ति हो गयी थी, हे सुव्रत! वैसे ही आपके कृपाप्रसादसे मुझे भी दिव्य देहकी प्राप्ति हो गयी। [इस विषयमें] मुझे तो कुछ ज्ञात नहीं था, मेरी माताने ही मुझे सब कुछ बतलाया ॥ २३-२४ ॥ तब आश्चर्यचकित होकर मैंने अपने हृदयमें निश्चय किया कि जिसके शरीरके सम्पर्कमें आयी
८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
वायुके स्पर्शसे मुझे दिव्य देहकी प्राप्ति हुई है, जब मुझे उसका दर्शन होगा, तभी मैं यह देह धारण करूँगा अर्थात् जीवित रहूँगा—ऐसा सोचकर मैं बहुत दिनोंतक भ्रमण करता रहा, तब हम दोनों [माता-पुत्र]-की तपस्यासे सन्तुष्ट होकर वे करुणानिधान देवाधिदेव भगवान् गजानन (गणेशजी) मेरे सामने प्रकट हुए। उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान थी ॥ २५–२७॥ उनका दर्शनकर [मेरी माता] कमलाकी मनोभिलषित समस्त कामनाएँ पूर्ण हो गयीं। तब उन ब्राह्मणदेवताने प्रसन्न होकर मधुरवाणीमें कहा—जिसके [दर्शनके] लिये तुमने तपस्यारूपी व्रतका नियम लिया था और भ्रमण करते हुए कष्ट उठा रहे थे, वही मैं ब्राह्मणश्रेष्ठ मुद्गल तुम्हें दर्शन दे रहा हूँ। उनका वचन सुनकर मेरा मन हर्षित हो गया, तदनन्तर मैंने गजानन गणेशजीका अनेक स्तोत्रोंसे स्तवन किया ॥ २८–३०॥ तब अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने कहा—'हे महाबुद्धिमान् [दक्ष] ! तुम वर माँगो।' तब मेरे मनमें जो भी अभिलाषाएँ थीं, वे सब मैंने उनसे कहीं ॥ ३१ ॥ तब उन्होंने उस ब्राह्मणरूपका त्यागकर अन्य रूप धारण किया, जो चार भुजाओं और विशाल शरीरवाला था। उनके सिरपर मुकुट था और वे अपने चारों हाथोंमें क्रमशः परशु (फरसा), कमल, माला तथा मोदक लिये हुए थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा था और उनके [मुखमें] एक दाँत और सूँड शोभायमान थे। उन्होंने कानोंमें दो कुण्डल धारण कर रखे थे, जो दूसरे दो सूर्यबिम्बोंके सदृश प्रतीत हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत था और उनके उदरप्रदेशपर सर्प वलयाकार लिपटे हुए थे ॥ ३२–३४॥ देवर्षियों, गन्धर्वगणों और किन्नरोंसे उपशोभित उनके उस रूपको देखकर मैं आनन्दसे उसी प्रकार परिपूर्ण हो गया, जैसे पूर्णिमासीके चन्द्रमाको देखकर समुद्र [आनन्दसे] पूर्ण हो जाता है। तब उन गजानन गणेशजीने कहा कि [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुद्गल तुम्हारी समस्त कामनाओंको पूर्ण कर देंगे ॥ ३५-३६ ॥ जबतक मैं [गणेशजीके] उस रूपको आदरपूर्वक देख पाता, तबतक वह वैसे ही अन्तर्हित हो गया, जैसे जग जानेपर स्वप्न नहीं दिखायी देता ॥ ३७ ॥ तब मैं अत्यन्त दुखी होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया, तदनन्तर पुनः चेतना आनेपर गणेशजीके 'वर माँगो'—इस वचनका स्मरण करते हुए मैंने उन सर्वव्यापी ईश्वर देवाधिदेवसे याचना की कि 'मेरे घरमें सुस्थिर लक्ष्मीका वास हो और वैसे ही मेरे मनमें आपके प्रति सुस्थिर (दृढ़) भक्ति हो ॥ ३८-३९ ॥ पूर्वजन्मोंमें किये गये पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप मुझे आपके दर्शन हुए हैं, आप मुझे ये दो वर प्रदान करें।' तदनन्तर मुझे आकाशवाणी सुनायी दी कि 'मैंने तुम्हें वरदान दे दिये' ॥ ४० ॥ हे विप्र ! तब हर्षित मनवाला होकर मैं आपके सान्निध्यमें आया हूँ। आप मुद्गल ही गजानन हैं और आप गजानन ही मुद्गल हैं—ऐसा मेरे मनमें स्पष्ट प्रतीत होता है कि सब कुछ गजानन ही हैं ॥ ४१ १/२ ॥ भृगुजी बोले—उसका (दक्षका) इस प्रकारका वचन सुनकर मुद्गलने कहा— हे कमलापुत्र ! तुम भाग्यशाली हो, कृतकृत्य हो, भक्त हो; तुम्हारी भक्तिकी महिमाका कथन करनेमें कोई सक्षम नहीं है ॥ ४२-४३ ॥ मैं एक हजार वर्षोंसे तपस्यामें सुदृढ़ हूँ, फिर भी मुझे परमात्माका इस प्रकारसे दर्शन कभी नहीं हुआ ॥ ४४ ॥ जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, स्थावर-जंगमात्मक सभी प्राणियोंके गुरुके भी गुरु हैं, जो राजस-सात्त्विक और तामस गुणोंके प्रेरक और तीनों गुणोंके नित्य आश्रय हैं, जो ब्रह्मा, शिव और विष्णुके शरीरोंके सृजनकर्ता हैं, जो प्राणियों; विभूतियों; तन्मात्राओं; इन्द्रियों और बुद्धिके भी कर्ता हैं, जिसे देवता; वेद और ऋषिगण भी सम्यक् रूपसे नहीं जानते हैं—ऐसे गजानन गणेशजीका स्पष्ट रूपसे तुमने प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया! मैं आपके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; क्योंकि आप परम भक्तिमान् हैं ॥ ४५–४७ १/२ ॥ भृगुजी कहते हैं— [हे राजन्!] तदनन्तर उन दोनोंने परस्पर प्रणाम करके एक-दूसरेका आलिंगन किया। समान चित्तवाले वे दोनों गुरुभाई उसी अवस्थामें
उ०ख०-अ०२२ ] * दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति * ८७ बहुत देरतक स्थित रहे। तदनन्तर विनम्र राजपुत्रको मुद्गलने जप और ध्यानसहित एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और उससे पुनः कहा कि तुम इस मन्त्रका प्रतिदिन अनुष्ठान करो, इससे गजानन गणेशजी तुमपर प्रसन्न हो जायेंगे और जो भी तुम्हारी मनोऽभिलाषाएँ हैं, उन सबको प्रदान करेंगे ॥ ४८-५१॥ यदि इस मन्त्रका तुम त्याग कर दोगे, तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायगा। इस लोकमें यदि तुम सुदीर्घ कालपर्यन्त गणेशजीकी भक्ति-उपासनामें निरत रहोगे, तो इन्द्रादि लोकपालगण* भी तुम्हारे वशमें रहेंगे। तुम इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोगकर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करोगे ॥ ५२-५३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रोपदेशवर्णन' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति और बल्लालविनायककी महिमाका वर्णन
राजा बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! आपने कमलापुत्र दक्षकी चेष्टाओंसे सम्बन्धित आश्चर्यजनक वृत्तान्तका वर्णन किया, [जिसे सुनकर मेरे मनमें] महान् विस्मय उत्पन्न हो गया है ॥ १ ॥ जिसके घावयुक्त शरीरसे रक्तका स्राव हो रहा था, साथ ही जिससे सड़े हुए मांसकी दुर्गन्ध आ रही थी— ऐसे अन्धे, कुबड़े, गूँगे, अपवित्र और जिसकी श्वासमात्र चल रही थी, वह [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुद्गलके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शसे कैसे दिव्य देहवाला हो गया ? और वह किस पुण्यके प्रभावसे किस पापसे मुक्त हुआ ? ॥ २-३ ॥ हे देव ! जिन्होंने दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम तपस्या की थी, उन (मुद्गलजी)-को [अपने इष्टदेवका] दर्शन क्यों नहीं हुआ था ? ॥ ४ ॥ वल्लभपुत्र दक्ष पूर्वजन्ममें कौन था ? और उसे देवाधिदेव गजानन गणेशजीका बिना किसी कष्टके प्रत्यक्ष दर्शन कैसे हो गया ? ॥ ५ ॥ हे सर्वज्ञ ! ऐसा मेरे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है, आप इसका निराकरण करें। आपको नमस्कार है। गजानन (गणेशजी)-की कथारूपिणी सुधाका नित्य पान करते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ६ ॥
विश्वामित्रजी बोले—हे राजन् ! आपने सम्यक् प्रश्न किया है, आपके संशयका निवारण करनेके लिये मैं सम्यक् रूपसे सम्पूर्ण कथा कहता हूँ। हे नृप ! इसे एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो ॥ ७ ॥ सिन्धुदेशमें पल्ली नामकी नगरी थी, जो अत्यन्त विख्यात थी। उस नगरीमें कल्याण नामवाला एक धनवान् वैश्यश्रेष्ठ था ॥ ८ ॥ वह उदार, समृद्ध, बुद्धिमान् और देवताओं एवं ब्राह्मणोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला था। उसकी सुन्दर स्वरूपवाली पत्नी इन्दुमती नामसे विख्यात थी ॥ ९ ॥ वह पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली, पतिको प्राणोंसे भी प्रिय माननेवाली और पतिके वचनोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली थी। कुछ समय बाद उनके एक गुणवान् और उत्तम पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥ कल्याणने उस अवसरपर ब्राह्मणोंको पर्याप्त मात्रामें गौएँ, वस्त्र, आभूषण, रत्न, स्वर्ण और दक्षिणा दी ॥ ११ ॥ तब ज्योतिषियोंद्वारा बतलानेपर उसने पुत्रका शुभ नाम बल्लाल रखा। बलशाली होनेके कारण वह इसी नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १२ ॥
- यहाँ इन्द्रादि लोकपालगणोंसे इन्द्रादि दस दिक्पालोंका बोध करना चाहिये; क्योंकि लोकपालके रूपमें गणेश, देवी दुर्गा, वायु, आकाश और दोनों अश्विनीकुमारोंका ही प्रायः बोध होता है— गणेशश्चाम्बिका वायुराकाशश्चाश्विनौ तथा। ग्रहाणामुत्तरे पञ्च लोकपालाः प्रकीर्तिताः ॥ (स्कन्दपुराण) दस दिक्पाल इस प्रकार हैं—१. इन्द्र, २. अग्नि, ३. यम, ४. निर्ऋति, ५. वरुण, ६. वायु, ७. कुबेर, ८. ईशान, ९. ब्रह्मा तथा १०. अनन्त।
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उ०ख०-अ०२२ ] * दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति * ८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] पृथिवीको धारण करना छोड़ दें, सूर्य प्रकाश करना छोड़ दे, चन्द्रमा अमृत [-की वर्षा करना] छोड़ दे या अग्नि उष्णता छोड़ दे, परंतु आप भक्तोंको नहीं छोड़ते—ऐसा वेदों और शास्त्रोंमें कैसे प्रसिद्ध है ? — इस प्रकार विलाप करते हुए उसने अपने कल्याण नामवाले अत्यन्त दुष्ट पिताको शाप दे दिया— ॥ ३५-३६ ॥ 'यदि मेरी गजानन गणेशजीमें सुदृढ़ और उत्तम भक्ति हो तो जिसने मेरे इस उत्तम देवालयका विध्वंस किया है, गणेशजीकी मूर्तिको फेंक दिया है और मुझे प्रताड़ित किया है—वह निश्चित रूपसे बहरा, कुबड़ा और गूँगा होगा। [हे प्रभो!] मैंने जो कुछ भी कहा, वह सब सत्य हो जाय। उस [मेरे पिता] - की शक्ति मेरे शरीरको ही बाँध सकनेकी है, वह मेरी भक्ति और मेरे मनको नहीं बाँध सकता। अनन्य बुद्धिसे भगवान् गणेशका चिन्तन करके मैं इस विजन वनमें अपनी देहका त्याग करता हूँ; क्योंकि [पिताद्वारा पीटे जानेके भयसे] जब मैंने पलायन नहीं किया था, तभी मैंने इस देहका देवताको अर्पण कर दिया था' ॥ ३७-४० ॥ उसके इस प्रकारके निश्चयको जानकर भगवान् गजानन गणेशजी बल्लाल [-की भक्ति] -के प्रभावसे ब्राह्मण स्वरूपसे प्रकट हो गये ॥ ४१ ॥
[दायाँ स्तम्भ] जैसे भगवान् सूर्यदेवके उदयाचलपर आगमनसे रात्रिका अन्धकार दूर हो जाता है, वैसे ही बल्लालके बन्धन उन गणेशजीके तेजसे शिथिल हो गये ॥ ४२ ॥ तत्पश्चात् उसने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। उस समय उसकी देह सौन्दर्यपूर्ण हो गयी, उसमें न तो घाव थे, न ही रक्तस्राव हो रहा था। उन देवाधिदेवके दर्शनसे उसके अन्तःकरणमें निर्मल ज्ञानका प्रादुर्भाव हो गया और तब उसने बुद्धिके अनुसार विविध स्तोत्रोंसे उन गजानन गणेशजीका स्तवन किया ॥ ४३-४४ ॥ बल्लाल बोला— [हे प्रभो!] आप ही [मेरे] माता, पिता और बन्धु हैं। आप ही इस स्थावर- जंगमात्मक जगत्के कर्ता हैं। आप ही दुष्टों, अत्याचारियों और साधुजनोंका सृजन करते हैं। आप ही प्राणियोंको विभिन्न शुभ योनियों और कुत्सित योनियोंमें जन्म देते हैं ॥ ४५ ॥ आप ही दिशाचक्र, आकाश, पृथिवी, समुद्र, पर्वत, इन्द्र, काल, अग्नि और वायुरूपवाले हैं। सूर्य, चन्द्रमा, तारा, ग्रह, लोकपाल, वर्ण, इन्द्रियोंके विषय, औषधि और धातुके रूपमें आप ही हैं ॥ ४६ ॥ मुनि [विश्वामित्र] बोले— [हे राजा भीम! बल्लालद्वारा की गयी] इस स्तुतिको सम्यक् रूपसे सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए गजानन गणेशजीने अपने भक्त [बल्लाल]-का आलिंगनकर मेघसदृश [गम्भीर] वाणीमें कहा— ॥ ४७ ॥ गजानन (गणेशजी) बोले— मेरे मन्दिरको जिसने तोड़ा है, वह अवश्य ही नरकमें गिरेगा। मेरी आज्ञासे तुम्हारा शाप भी उसपर वैसे ही प्रभावी होगा ॥ ४८ ॥ मेरे शापसे वह अन्धा, बहरा, कुबड़ा, गूँगा और रक्तस्राव करते हुए घावोंसे युक्त शरीरवाला होगा— इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४९ ॥ इसका पिता इसे माताके साथ घरसे बाहर कर देगा। अब तुम अपनी अन्य इच्छाओंको बताओ, दुष्प्राप्य होनेपर भी मैं तुम्हें उन्हें दूँगा ॥ ५० ॥ मुनि बोले— इसपर बल्लालने भगवान् गणेशसे कहा— [हे देव!] मुझमें आपकी दृढ़ भक्ति हो। आप
९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इस क्षेत्रमें स्थिर रहकर विघ्नोंसे मनुष्योंकी रक्षा करें॥ ५१॥ गणेशजी बोले—यहाँके मनुष्य पहले तुम्हारे नामका उच्चारणकर फिर मेरा शुभ नाम बोलेंगे। इस नगरमें मैं 'बल्लालविनायक'—इस नामसे प्रतिष्ठित रहूँगा॥ ५२॥ तुम्हारा मन मुझमें स्थिर रहेगा और तुम्हारी [मेरे प्रति] भक्ति अनन्य होगी। जो भाद्रपदमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्थी तिथिको मेरे पल्ली* नामक नगरकी यात्रा करेंगे, मैं उनकी समस्त मनोकामनाओंको पूर्ण करूँगा॥ ५३ १/२॥ भृगुजी बोले—[हे राजा सोमकान्त!] इस प्रकार वर देकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ५४॥ तदनन्तर बल्लालने ब्राह्मणोंके साथ अनेक प्रकारकी शोभासे समन्वित मन्दिरका निर्माण करवाया और वहीं रहने लगा, वह फिर पिताके घर नहीं गया॥ ५५॥ विश्वामित्रजी बोले—[हे राजा भीम!] मैंने तुमसे बल्लालविनायकसे सम्बन्धित इस कथानकका वर्णन किया, जिसको सुनकर व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ ५६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'बल्लालविनायकका वर्णन' नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥ तेईसवाँ अध्याय बल्लालके शापसे कल्याण वैश्यको अन्धत्व, बधिरत्व और मूकत्वकी प्राप्ति; माताकी प्रार्थनापर बल्लालद्वारा शापमुक्तिका उपाय बताना भृगुजी बोले—[हे राजा सोमकान्त!] विश्वामित्रके वचन सुनकर [कल्याण नामवाले] उस वैश्यसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाके श्रवणमें परम उत्सुक राजा भीमने उनसे पुनः पूछा। हे नृपश्रेष्ठ सोमकान्त! मैं उसे तुमसे कहता हूँ, उसे सुनो॥ १ १/२॥ [राजा] भीम बोले—[हे मुने!] मैंने दक्षके चरितका श्रवण किया, इससे मेरा मन शान्त हुआ। कल्याण वैश्यकी क्या गति हुई ? अब आप उसे कहिये॥ २ १/२॥ विश्वामित्रजी बोले—हे भीम! मैं इस कथाको तुमसे कहता हूँ, तुम एकाग्र मनसे इसका श्रवण करो। बल्लालके शापके कारण कल्याणकी देहसे रक्तस्राव होने लगा। उसका शरीर असंख्य घावोंसे भर गया। उससे सड़े मांसकी दुर्गन्ध आने लगी। उस दुष्टमें बाधिर्य (बहरापन), अन्धत्व और मूकत्व (गूँगापन) उत्पन्न हो गये। तदनन्तर जब इन्दुमतीने उसकी ऐसी दशा देखी, जो कि अचानक ही उत्पन्न हो गयी थी, तो वह 'यह क्या हुआ?' 'यह क्या हुआ?' 'यह कैसे हुआ?' विचार करती हुई अत्यन्त शोकमें पड़ गयी कि मेरे ज्ञानी, उदार, देवद्विजपरायण, धर्मशास्त्रोक्त कर्तव्योंमें निष्ठा रखनेवाले, एकपत्नीव्रती निष्पाप पतिकी ऐसी अवस्था क्यों हो गयी ?॥ ३-७॥ मुनि बोले—इस प्रकार अत्यन्त विलाप करती हुई और बार-बार दीर्घ श्वास लेती हुई उस (इन्दुमती)- ने जब यह सुना कि उसके पतिने पुत्र बल्लालको वनमें बाँध रखा है, तो वह और भी रुदन करती हुई पुरवासियोंके साथ वनमें उस स्थानपर गयी, जहाँ उसका पुत्र बँधा हुआ था। वहाँ उसने भगवान् गणपति और उनके देवालयका दर्शन किया। भगवान् गजाननका सिन्दूरालेपित विग्रह अरुण वर्णका था, वह चार भुजाओं और तीन नेत्रोंसे युक्त था। उसका पुत्र बल्लाल वहाँ उन गजाननका पूजन कर रहा था॥ ८-१०॥ इन्दुमतीने जब देखा कि उसका पुत्र बन्धनमुक्त, घावरहित और स्वस्थ शरीरवाला है तो क्रुद्ध होकर पुरवासियोंकी बार-बार भर्त्सना करते हुए कहने लगी— तुम सब असत्यवादियोंने मेरे पतिके समीप मुझसे क्यों वंचना की कि मैं उनको वैसी स्थितिमें छोड़कर पुत्रस्नेहवश यहाँ चली आयी ? देखो, मेरा पुत्र इस प्रकार
- महाराष्ट्रके रायगढ़ जिलेके सुधागढ़ तालुकेमें अम्बा नदीके तटपर पाली ग्राम है। यह स्थान मुम्बईसे १२० किमी०की दूरीपर स्थित है। कहा जाता है कि 'बल्लाल विनायक क्षेत्र' सिन्धुदेशमें था, किंतु अब वह लुप्त हो गया है।
उ०ख०-अ०२३] * बल्लालके शापसे कल्याण वैश्यको अन्धत्वकी प्राप्ति * ९१ देवभक्ति कर रहा है! ॥ ११-१२१/२॥ मुनि बोले- ऐसा देखकर वे सभी [पुरवासी] आश्चर्यचकित हो गये और अणुमात्र (कुछ) भी नहीं बोले। तत्पश्चात् उनमेंसे कुछ लोग कहने लगे- महाभक्तिकी महिमा कौन जान सकता है ? ॥ १३१/२ ॥ सिन्दूरकी आभासे अरुण वर्णवाले, लाल चन्दनका लेप किये हुए, लाल वस्त्र पहने, लाल पुष्पोंकी मालासे शोभायमान, आसक्तिरहित, निरहंकार और बिना सूँड़के विघ्नराज गणेशके जैसे अपने पुत्रको देखकर वह इन्दुमती शोकका त्यागकर आनन्दित हो उठी। उसने पुत्रका आलिंगन किया, उस समय वात्सल्यस्नेहवश उसके स्तनोंसे दुग्ध-प्रवाह होने लगा ॥ १४-१६ ॥ उसने पुत्रसे कहा- हे महामते! अपने घरको चलो, तुम्हारे पिता महान् संकटमें फँस गये हैं। वहाँ चलकर तुम उनके स्वस्थ होनेका कुछ उपाय करो ॥ १७ ॥ तुम्हारे सदृश पुत्रको प्राप्तकर हम दोनों इस संसारमें धन्य हो गये। तुम्हारे पिताका सम्पूर्ण शरीर घावयुक्त हो गया है, उससे रक्तस्राव होता है और सड़े हुए मांसकी-सी गन्ध आती है। उनका मुख काला पड़ गया है। वे कृशकाय, बधिर और अन्धे हो गये हैं। मैं उनकी यह स्थिति तुमसे निवेदन करने यहाँ आयी हूँ ॥ १८-१९ ॥ यद्यपि उन्होंने तुम्हें ताड़ित करके अनर्थ ही किया है, पर पिताके कर्तव्यके कारण ही उन्होंने ऐसा किया है। वेदों, स्मृतियों और पुराणोंके अनुसार इसमें उनका अपराध नहीं है ॥ २० ॥ हे पितृभक्त! तुम अपने पुत्रधर्मका निरीक्षणकर उन्हें निरोग करनेपर विचार करो। तुम्हारे कारण ही तुम्हारे पिता इस संसारमें अत्यन्त प्रशंसनीय हैं ॥ २१ ॥ माता-पिताके वचनका पालन करना, उनका पूजन करना और उन दोनोंका पालन-पोषण करना यशस्वी सत्पुत्रके लिये कर्तव्य है ॥ २२ ॥ हे पुत्र! तुम मुझपर [कृपा]-दृष्टि करो। औषधि- प्रयोग, मन्त्रजप और देवप्रार्थनासे [पिताके स्वस्थ होनेका] उपाय करो ॥ २३ ॥ हे मेरे बालक (पुत्र) ! इससे संसारमें तुम्हारा यश होगा और मेरा सौभाग्य सुरक्षित रहेगा। उस (माता)- की इस प्रकारकी बात सुनकर बल्लालने इस प्रकार कहा - ॥ २४ ॥ बल्लाल बोला- कौन किसकी माता है ? कौन किसका पिता है ? कौन किसका पुत्र है ? अथवा कौन किसका मित्र है ? यह सब विघ्नराज गणेशजीद्वारा निर्मित आनुषंगिक सम्बन्ध कहा जाता है ॥ २५ ॥ हे भद्रे ! इसलिये मेरे माता-पिता भगवान् विनायक ही हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल भोगता है ॥ २६ ॥ मैंने अपना जीवन देवाधिदेव गजानन गणेशजीको समर्पित कर दिया है। मेरी सुन्दर भक्तिसे प्रसन्न होकर उन्होंने ही मुझे प्राण और ज्ञान प्रदान किया है ॥ २७ ॥ हे कल्याणी! देवालय तोड़ने, देवप्रतिमाको फेंकने और विघ्नविनायक गणेशजीके अतिशय भक्त मुझको पीटनेके कारण उन्हें वैसा फल प्राप्त हुआ है ॥ २८ ॥ [तात्त्विक दृष्टिसे] विचार किया जाय तो न तुम मेरी माता हो और न वह [कल्याण] मेरा पिता है; क्योंकि सबके माता-पिता तो वे भगवान् गजानन गणेशजी ही हैं ॥ २९ ॥ वे ही ज्ञानदाता, रक्षक और कालरूप संहारक हैं। सम्पूर्ण स्वरूपोंमें वे ही हैं। वे ही देवेन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु और शिवस्वरूप हैं ॥ ३० ॥ जिस घमण्डी, दुष्ट और निर्दयोने व्यर्थमें ही मुझे पीटा; देव-प्रतिमाको फेंक दिया और [उनके] मन्दिरको भी तोड़ डाला- ऐसे उस पतितके मुखको देखनेसे भी महान् दोष होगा। अतः आप मेरे प्रति स्नेहका त्याग करके अपने पतिकी विशेष रूपसे सेवा कीजिये ॥ ३१-३२ ॥ विश्वामित्रजी बोले - पुत्रके इस प्रकारके वचन सुनकर वह पुनः उससे बोली- ॥ ३२१/२ ॥ माताने कहा- [हे पुत्र!] तुम मुझपर अनुग्रह करके अथवा स्नेहसम्बन्धके कारण इस शापसे मुक्तिके विषयमें कृपापूर्वक बताओ ॥ ३३ ॥ पुत्र बोला- हे उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाली! वर माँगनेवाली तुम अगले जन्ममें इस (कल्याण)-की जननी होओगी। यह (कल्याण) तुम्हारा इसी प्रकारका
९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अर्थात् गूँगा-बहरा, अन्धा और रक्तस्रावयुक्त पुत्र होगा। हे मंगलमयि ! इस प्रकार मैंने उसकी शापमुक्तिका वल्लभ नामक श्रेष्ठ क्षत्रिय तुम्हारा पति होगा और तुम उपाय बता दिया और भविष्यके विषयमें भी तुम्हें आज कमला नामसे प्रसिद्ध होओगी ॥ ३४-३५ ॥ ही बता दिया। अब तुम जहाँ इच्छा हो, वहाँ चली तुम्हारा पुत्र दक्ष नामसे प्रसिद्ध होगा। तदनन्तर जाओ ॥ ४१ ॥ दक्षके अन्धत्व, बधिरत्व, मूकत्व [आदि दोषों] और विश्वामित्रजी बोले- [हे राजन्!] उस घावोंसे निवृत्तिके लिये वल्लभ बारह वर्षोंतक तपस्याके (बल्लाल)-के द्वारा इस प्रकार निराकरण किये जानेपर नियमोंका दृढ़तापूर्वक पालन करते हुए कठोर तप दुःख और शोकसे युक्त उसकी माता (इन्दुमती)-को करेगा ॥ ३६-३७ ॥ कुछ हर्ष हुआ और वह वहाँसे चली गयी ॥ ४२ ॥ हे शुभानने ! [तपस्यासम्बन्धी] फलकी प्राप्ति न तदनन्तर वह (बल्लाल) भी गणेशजीकी भक्तिसे होनेसे वह पुत्रसहित तुम्हें घरसे बाहर निकाल देगा और भावित होकर गजानन गणेशजीद्वारा प्रस्तुत विमानपर तब तुम दूसरे देशमें जाकर रहने लगोगी ॥ ३८ ॥ आरूढ़ होकर स्वर्गको चला गया ॥ ४३ ॥ हे कल्याणि ! दैवयोगसे गजानन गणेशजीमें अनुरक्त इस प्रकार तुमने जो कुछ पूछा था, वह मैंने तुमसे चित्तवाले किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके स्पर्शसे तुम्हारा पुत्र सब कुछ कह दिया। उस [कल्याण नामवाले] वैश्यने ठीक हो जायगा ॥ ३९ ॥ दोनों जन्मोंमें जो गति प्राप्त की, और बल्लालने जैसा वहीं उसे गणनाथ गणेशजीका दर्शन भी हो कहा था, वह सब वैसा ही हुआ। वह [इन्दुमती] जायगा और गजानन गणेशजीकी कृपासे उसे दिव्य कमला हुई और वह [कल्याण] क्षत्रियश्रेष्ठ (वल्लभके देहकी भी प्राप्ति हो जायगी ॥ ४० ॥ पुत्र)-के रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ४४-४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भविष्यकथन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
चौबीसवाँ अध्याय दक्षको राज्यप्राप्तिसूचक स्वप्नका दर्शन राजा भीमने पूछा-हे मुनिवर ! बुद्धिमान् राजपुत्रने वहींपर स्थित रहकर उस दक्षने गजानन गणेशजीको कहाँ, कैसे और किसका अनुष्ठान किया था ? हे मुने ! प्रसन्न करनेके लिये तपस्या की। उसने मुद्गलद्वारा उपदिष्ट इसका विस्तारपूर्वक आप वर्णन कीजिये; क्योंकि मैं [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका बारह वर्षोंतक जपकर [इस कथाको] सुनकर भी तृप्त नहीं हो पा रहा उन भगवान् गणेशको प्रसन्न किया। [इसके अनन्तर] हूँ ॥ १ १/२ ॥ उसने उस गणेशप्रतिमाका स्नान, वस्त्र, सुगन्धि-द्रव्य, विश्वामित्रजी बोले-उस कौण्डिन्यपुरके निकट माला, धूप, दीप आदि उपचारोंसे पूजन किया; कन्द-मूल ही एक महान् रमणीय वन था, जो विविध प्रकारके आदि भक्ष्य पदार्थोंका नैवेद्य निवेदित किया। तदनन्तर उस वृक्षोंसे युक्त; अनेक हिंस्र पशुओंसे परिपूरित, नाना क्षत्रियश्रेष्ठने दक्षिणाकी मानसिक कल्पना की ॥ ५-७॥ प्रकारके पक्षी-समूहोंसे समन्वित और लताजालोंसे सुशोभित हे राजन्! इस प्रकार पूजन करते हुए उसके इक्कीस था ॥ २-३ ॥ दिन बीत गये। तदनन्तर [एक दिन] प्रभातकालमें उसने सत्पुरुषोंके मनकी भाँति निर्मल जलवाले सरोवर इस प्रकारका स्वप्न देखा कि एक सुन्दर और पर्वतसदृश और वापियाँ वहाँ स्थित थे, वहीं एक प्राचीन देवालयके महान् गजराज सिन्दूरसे आलिप्त होनेके कारण अत्यन्त मध्यभागमें गजानन गणेशजीकी प्रतिमा विराजमान थी ॥ ४ ॥ शोभायमान हो रहा है, उसके दोनों सुन्दर गण्डस्थलोंसे
उ०ख०-अ०२५ ] * कौण्डिन्यनगरके राजा चन्द्रसेनकी पुत्रहीन-अवस्थामें मृत्यु * ९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मदका स्राव हो रहा है। उसका मुख सुन्दर और | किया है। [स्वप्नमें] गजारोहणका फल राज्यकी प्राप्ति प्रसन्नतासे युक्त है। उसकी सूँड़ विशाल और एक दाँतसे | ही है—इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १४॥ शोभित थी। भ्रमर-समूहोंसे वह समाकीर्ण था अर्थात् भौरै | दक्ष बोला—यदि मुझे राज्यकी प्राप्ति होती है, उसपर मँडरा रहे थे। [इस प्रकार] वह दूसरे गजानन | तो मैं तुम्हें एक पालकी, आजीविकाके लिये बहुत-से (गणेश)-के समान प्रतीत हो रहा था॥८-१०॥ | ग्राम और मोतियोंकी माला दूँगा॥ १५॥ उस गजराजने उस (दक्ष)-के गलेमें रत्नमाला | गोदान और अष्टापद (सुवर्ण)-दानकर धर्म करूँगा। समर्पित की। तदनन्तर जनताने उसे उठाकर हाथीके | व्रतों और नियमोंका पालन करते हुए अनेक प्रकारके स्कन्धदेशपर विराजित कर दिया ॥ ११ ॥ | अन्यान्य दान भी दूँगा॥ १६॥ तत्पश्चात् उस गजश्रेष्ठने पताकाओं और ध्वजाओंसे | मुनि बोले—यह सुनकर कमला हर्षित होकर सुशोभित नगरके लिये प्रस्थान किया। स्वप्नावस्थासे | पुत्रसे बोली—हे पुत्र ! तुम जब राजसिंहासनपर विराजमान जाग्रत् होनेपर उस दक्षने अपनी मातासे पूछा—हे माता | होगे, तो मुझे परम आनन्दकी प्राप्ति होगी॥ १७॥ कमला! मेरे इस स्वप्नका अभिप्राय बताओ—गजस्कन्धपर | तुम्हारा मन सज्जनोंद्वारा आचरित धर्ममें रत हो, आरोहण शुभ होता है या अशुभ ? ॥ १२-१३ ॥ | तुम सज्जनोंका भरण-पोषण करनेवाले होओ, तुम्हें कमला बोली—[हे पुत्र!] तुम धन्य हो, तुमने | विपुल आयुष्यकी प्राप्ति हो तथा तुम्हारी ब्राह्मणों और गजरूपधारी भगवान् विनायक (गणेशजी)-का दर्शन | देवताओंके अर्चनमें प्रीति हो ॥ १८॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'स्वप्नकथन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
पच्चीसवाँ अध्याय कौण्डिन्यनगरके राजा चन्द्रसेनकी पुत्रहीन-अवस्थामें मृत्यु, मुद्गलमुनिका उनके उत्तराधिकारीके सम्बन्धमें निर्णय देना
विश्वामित्रजी बोले—हे राजन् ! दैव और कालके | दोनों पैरोंको पकड़कर उनके चरणोंमें झुक गये, कुछने प्रभावसे घटित इस मंगलमयी आश्चर्यकारी घटनाके | उनका हाथ पकड़कर अपने सिरपर रख लिया ॥ ५ ॥ विषयमें श्रवण करो। कौण्डिन्यनगरमें महाबुद्धिमान् | कुछ लोग तीव्र स्वरमें रोने लगे तो कुछ लोग मुखपर चन्द्रसेन राजा थे। अपने कर्मफलका भोग कर लेनेपर | हथेली रखकर धीमे स्वरमें रोने लगे। कुछ अन्य लोग कालयोगसे वे मृत्युको प्राप्त हुए। [किये गये] धर्मपूर्ण | अतिशय स्नेहके कारण मृतककी भाँति गिर पड़े ॥ ६ ॥ कार्योंकी बहुलताके कारण वे दिव्य विमानसे स्वर्गको | उस (राजा)-की पत्नी सुलभा अत्यन्त दुखी गये ॥ १-२ ॥ | होकर अपने दोनों हाथोंसे अपने हृदयपर आघात करते इस समाचारको सुनकर नगरके निवासी हाहाकार | हुए करुण स्वरमें रुदन कर रही थी ॥ ७ ॥ करने लगे। अनेक कार्योंका त्यागकर वे लोग दौड़ते हुए | उसके आभूषण बिखर गये थे और मूर्च्छा आ वहाँ पहुँचे ॥ ३ ॥ | जानेसे वह पृथ्वीपर गिर पड़ी थी। उसीके समान शोकसे व्याकुल होकर लोग अपने हाथोंसे अपना | शोकाकुल नगरकी अन्य स्त्रियोंने उसे पकड़कर बैठाया ॥ ८ ॥ सिर पीट रहे थे। गिरते-पड़ते उन्होंने वहाँ पहुँचकर | उस समय राजा चन्द्रसेनकी वह सुन्दरी पत्नी राजाके मृत शरीरका दर्शन किया॥ ४॥ | विलाप करने लगी। 'हा नाथ! हा नाथ!' कहती हुई दुःख और मोहके वश होकर उनमेंसे कुछ राजाके | वह लज्जाका त्यागकर विधाताको कोसते हुए इस प्रकार
९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ] प्रलाप करने लगी—रे विधाता! तुझे दया नहीं है। तेरे क्रिया-कलाप बालकोंके-से हैं। पहले तुम दो प्राणियोंमें स्नेहभावसे संयोग कराते हो, फिर उनके कृतार्थ हुए बिना ही उनमें वियोग करा देते हो॥ ९-१०॥ हे राजन्! हे करुणानिधे! मुझे बताओ, तुम मुझसे पूछे बिना कहाँ चले गये? तुम तो प्रतिदिन कहते थे कि हे प्रिये! भद्रासनपर बैठने जा रहा हूँ। मेरे किस अपराधके कारण आज तुम इतने निष्ठुर हो गये हो? मेरे उस अपराधको तुम क्षमा कर दो। मैं लज्जा छोड़कर प्रजाजनोंके मध्य तुम्हें नमस्कार करती हूँ॥ ११-१२॥ मैं आपका प्रिय करनेवाली प्रिया हूँ, पुत्रहीना होनेके कारण बिना पतिके मैं इस त्रिलोकीको शून्य देख रही हूँ, इसलिये आप जहाँ जा रहे हैं, वहाँ मुझे भी लेते चलें ॥ १३॥ मुनि बोले—उस (राजा चन्द्रसेन)-के सुमन्तु और मनोरंजन नामवाले दो मन्त्री थे, वे भी रो-रोकर कहने लगे—अब राज्यका क्या होगा?॥ १४॥ हे राजश्रेष्ठ! आप हम दोनोंसे बिना विचार-विमर्श किये कहाँ चले गये? हे राजन्! आप बोल क्यों नहीं रहे हैं? आपने मौन क्यों साध लिया है?॥ १५॥ आप अनाथकी भाँति विह्वल अपनी प्रिय पत्नीको भी नहीं देख रहे हैं। हम दोनों भी सम्पूर्ण गृहस्थाश्रमका त्याग करके आपके साथ चलते हैं। आपका नगर और राष्ट्र अनाथ हो गया है, कौन इसका पालन करेगा?॥ १६ १/२॥ मुनि बोले—इसी बीच वहाँ वेद और शास्त्रके तात्त्विक अर्थको जाननेवाले और सुन्दर बुद्धिवाले एक ब्राह्मणने निष्ठुर वाणीमें कहा—तुम सभी स्वार्थपरायण हो, कोई भी वास्तविक हितैषी नहीं है। सुहृज्जनोंके रोनेसे जो अश्रु गिरते हैं, वे मृत प्राणीके मुखमें जाते हैं। प्राणहीन शरीर पृथ्वीपर भार होता है॥ १७-१९॥ इस ब्रह्माण्डगोलकमें ऐसा कौन है, जो मृतकका अनुगमन करता हो? यह रानी सुलभा अपने जीवनकी आशासे रो रही है॥ २०॥ जिसका मन अनुगमनका होता है, वह कभी नहीं रोता। आप सभी नगरवासी अपने-अपने कार्योंपर जानेके
[दायाँ स्तम्भ] लिये आकुल हैं॥ २१॥ जो राजा सूर्यवंश और चन्द्रवंशमें हुए, क्या वे नहीं मरे? इसलिये आप सभी उठकर राजाका संस्कार करें॥ २२॥ मृतकका [अन्तिम] संस्कार करनेवाला ही उसका सच्चा हितैषी होता है, दूसरा नहीं। इसीलिये लोगोंमें पुत्रप्राप्तिकी कामना रहती है॥ २३॥ इसलिये धर्मपुत्र या किसी अन्य प्रकारके पुत्रको ले आओ। वह [अन्त्येष्टि] क्रियाका आरम्भ करे और तत्पश्चात् सभी लोग [राजाको] तिलांजलि दें॥ २४॥ मुनि बोले—तदनन्तर सभी नगरनिवासी, दोनों मन्त्री और वे स्त्रियाँ—सभीने उस ब्राह्मणद्वारा प्रबोधित होकर [राजाका] और्ध्वदैहिक कर्म किया॥ २५॥ सुमन्तुने राजाकी समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न की और सभीने तिलांजलि दी। पुनः सभीने स्नान करके देरसे नगरमें प्रवेश किया॥ २६॥ तदनन्तर उन लोगोंने परमात्माको नमस्कार करके निम्बपत्रोंका प्राशन किया और रानी सुलभाको सान्त्वना देकर अपने-अपने घरको चले गये॥ २७॥ त्रयोदशाहकी समाप्तिपर उन लोगोंने रानीको वस्त्र देकर बहुत दिनोंतक [उनके यहाँ राजाके प्रति] प्रीतिवश प्रतिदिन भोजन किया॥ २८॥ एक बारकी बात है, कौण्डिन्यनगरके सभी निवासी, दोनों मन्त्री और राजाके प्रियजन प्रजापालन कर्मके सम्बन्धमें संशयमें पड़े थे। उसी समय वहाँ मुद्गलमुनि आये और बोले—‘राजा (चन्द्रसेन)-का जो गजराज है, वह उनके सभी अभिप्रायोंको जाननेवाला है। वह ‘गहन’ नामवाला गजराज कमल-पुष्पोंसे बनी माला [अपनी सूँड़में] ग्रहण करे। सम्पूर्ण समाजमें वह जिसके गलेमें उस मालाको डाल देगा, वही राजा होगा'॥ २९-३१॥ तब उन अतीन्द्रिय ज्ञानसे सम्पन्न ब्राह्मण मुद्गलके इस प्रकारके वचनोंका सबने 'साधु-साधु', 'ऐसा ही हो' कहकर अभिनन्दन किया॥ ३२॥
[पाद-टिप्पणी / अध्याय समाप्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संस्कारका वर्णन' नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
छब्बीसवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०२६ ] * दक्षको राज्यकी प्राप्ति और उनकी वंश-परम्पराका वर्णन * ९५ छब्बीसवाँ अध्याय दक्षको राज्यकी प्राप्ति और उनकी वंश-परम्पराका वर्णन विश्वामित्रजी बोले- [हे राजा भीम !] एक दिन जब शुभ ग्रहोंकी युति थी, [उस समय] शुभ लग्न, शुभ दिन और शुभ फल प्रदान करनेवाले योगमें नगरमें अनेक प्रकारके जनसमुदायोंके एकत्रित होनेपर राजा चन्द्रसेनकी रानी सुलभाने यह प्रार्थना करते हुए कि 'इस जनसमुदायमेंसे जिसे तुम्हारा अभिमत हो, उसे राजा बनाओ' रत्नमयी माला उस गजराजकी सूँडमें थमा दी ॥ १ ॥ रानीकी आज्ञा स्वीकारकर धातुओंसे सम्यक् प्रकारसे रंजित तथा ब्राह्मणों, बन्दीजनों एवं चारणगणोंसे प्रशंसित और अनेक प्रकारके वाद्योंका वादन करनेवालोंसे घिरा हुआ वह गजेन्द्र राजभटों और राज्यार्थी पुरुषोंके मध्य भ्रमण करने लगा। तदनन्तर सभाके चारों ओर उपस्थित सभी लोगोंको सूँघता हुआ नगरसे बाहर चला गया ॥ २ ॥ उस नगरकी स्त्रियाँ अपने पुत्रों और पतियोंको सुसज्जितकर अपने आगे करके खड़ी थीं, बहुत-से मनुष्य और श्रेणियोंके प्रमुख लोग भी वहाँ उपस्थित थे-वे सभी उस गहन नामवाले गजराजके नगरसे बाहर चले जानेपर अनमने होकर अपने-अपने घरको चले गये ॥ ३ ॥ वह हाथी वहाँ गया, जहाँ कमलापुत्र दक्ष गजानन गणेशजीका सम्यक् रूपसे पूजन कर रहा था। उसे देखते ही उसने वह माला [पृथ्वीपर] लोगोंके और स्वर्गमें देवताओंके देखते-देखते पहना दी ॥ ४ ॥ हे राजन्! तब कौण्डिन्यनगरके निवासियों, [दिवंगत] राजा चन्द्रसेन और दोनों मन्त्रियोंके अभिमतको जानकर लोगोंने दक्षको अनेक वस्त्र, मालाएँ एवं आभूषण प्रदान किये ॥ ५ ॥ उस समय देवलोकमें और पृथ्वीपर अनेक प्रकारके वाद्यसमूह बजने लगे। देववृन्द प्रसन्नतापूर्वक मांगलिक पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६ ॥ समाजमें जिसका जैसा स्थान और क्रम था, लोग उस प्रकार बैठ गये और दोनों मन्त्रियोंसहित उन सबने राजा दक्षको नमन किया ॥ ७ ॥ राजा दक्षने उपस्थित जनसमुदायको वस्त्र और ताम्बूल प्रदान किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजनकर [उन्हें] अनेक प्रकारके दान दे करके अपनी माताका भी वस्त्रों और अलंकारों आदिसे पूजन किया तथा उनसे भी विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको दान दिलवाया ॥ ८-९ ॥ उन्हें पालकीपर बैठाकर स्वयं राजा दक्ष हाथीपर आरूढ़ हुआ और ध्वजों-पताकाओंसे समन्वित, अलंकृत एवं जल छिड़के हुए मार्गसे नगरको चला। उस समय राजाके दोनों मन्त्री घोड़ेपर सवार होकर उसके आगे- आगे चल रहे थे। बन्दीजन और नगरवासी उसकी स्तुति कर रहे थे, अप्सराएँ उसके आगे नृत्य कर रही थीं, गानविद्यामें प्रवीण गन्धर्व दौड़ते हुए उसके आगे चल रहे थे। उस समय 'जय' शब्द, 'नमः' शब्द और वाद्योंकी ध्वनि स्वर्गलोकतक पहुँच गयी ॥ १०-१२ ॥ राजद्वारपर पहुँचकर कुछ लोग उस (राजा दक्ष)- को प्रणामकर अपने घर चले गये, तदनन्तर उसके साथ इतने राजा उसकी सभामें प्रविष्ट हुए, जिनकी गणना नहीं हो सकती थी ॥ १३ ॥ उस महाबुद्धिमान् राजा दक्षने मुद्गलमुनिको लानेके लिये मन्त्री सुमन्तुके साथ छत्र, ध्वज, चामरसहित पालकी भेजी ॥ १४ ॥ मुद्गलमुनिको आते देखकर [राजा दक्षने] अपने आसनसे उठकर और आगे बढ़कर मुकुटसहित उनके चरणोंमें सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें अपने आसनपर बैठाया तथा उनकी आज्ञासे स्वयं दूसरे आसनपर बैठा एवं राजसमुदायके साथ उन मुनि मुद्गलका पूजन किया ॥ १५-१७ ॥ महाबुद्धिमान् राजा दक्षने उन ब्राह्मण (मुद्गल मुनि)-को गौ भी प्रदान की और उनसे कहा-हे महामुने ! हे मुद्गल ! आज आपकी इस महान् महिमाका संसारको ज्ञान हो गया। मुझे शारीरिक सुन्दरता और राज्यकी प्राप्ति आपकी ही कृपासे हुई है ॥ १८ ॥ हे महामुने ! कहाँ मेरे पूर्व शरीरकी वह अवस्था