श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०२२ ] * दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति * ८७ बहुत देरतक स्थित रहे। तदनन्तर विनम्र राजपुत्रको मुद्गलने जप और ध्यानसहित एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और उससे पुनः कहा कि तुम इस मन्त्रका प्रतिदिन अनुष्ठान करो, इससे गजानन गणेशजी तुमपर प्रसन्न हो जायेंगे और जो भी तुम्हारी मनोऽभिलाषाएँ हैं, उन सबको प्रदान करेंगे ॥ ४८-५१॥ यदि इस मन्त्रका तुम त्याग कर दोगे, तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायगा। इस लोकमें यदि तुम सुदीर्घ कालपर्यन्त गणेशजीकी भक्ति-उपासनामें निरत रहोगे, तो इन्द्रादि लोकपालगण* भी तुम्हारे वशमें रहेंगे। तुम इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोगकर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करोगे ॥ ५२-५३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रोपदेशवर्णन' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति और बल्लालविनायककी महिमाका वर्णन
राजा बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! आपने कमलापुत्र दक्षकी चेष्टाओंसे सम्बन्धित आश्चर्यजनक वृत्तान्तका वर्णन किया, [जिसे सुनकर मेरे मनमें] महान् विस्मय उत्पन्न हो गया है ॥ १ ॥ जिसके घावयुक्त शरीरसे रक्तका स्राव हो रहा था, साथ ही जिससे सड़े हुए मांसकी दुर्गन्ध आ रही थी— ऐसे अन्धे, कुबड़े, गूँगे, अपवित्र और जिसकी श्वासमात्र चल रही थी, वह [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुद्गलके शरीरके सम्पर्कमें आयी वायुके स्पर्शसे कैसे दिव्य देहवाला हो गया ? और वह किस पुण्यके प्रभावसे किस पापसे मुक्त हुआ ? ॥ २-३ ॥ हे देव ! जिन्होंने दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम तपस्या की थी, उन (मुद्गलजी)-को [अपने इष्टदेवका] दर्शन क्यों नहीं हुआ था ? ॥ ४ ॥ वल्लभपुत्र दक्ष पूर्वजन्ममें कौन था ? और उसे देवाधिदेव गजानन गणेशजीका बिना किसी कष्टके प्रत्यक्ष दर्शन कैसे हो गया ? ॥ ५ ॥ हे सर्वज्ञ ! ऐसा मेरे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है, आप इसका निराकरण करें। आपको नमस्कार है। गजानन (गणेशजी)-की कथारूपिणी सुधाका नित्य पान करते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ६ ॥
विश्वामित्रजी बोले—हे राजन् ! आपने सम्यक् प्रश्न किया है, आपके संशयका निवारण करनेके लिये मैं सम्यक् रूपसे सम्पूर्ण कथा कहता हूँ। हे नृप ! इसे एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो ॥ ७ ॥ सिन्धुदेशमें पल्ली नामकी नगरी थी, जो अत्यन्त विख्यात थी। उस नगरीमें कल्याण नामवाला एक धनवान् वैश्यश्रेष्ठ था ॥ ८ ॥ वह उदार, समृद्ध, बुद्धिमान् और देवताओं एवं ब्राह्मणोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला था। उसकी सुन्दर स्वरूपवाली पत्नी इन्दुमती नामसे विख्यात थी ॥ ९ ॥ वह पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली, पतिको प्राणोंसे भी प्रिय माननेवाली और पतिके वचनोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली थी। कुछ समय बाद उनके एक गुणवान् और उत्तम पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥ कल्याणने उस अवसरपर ब्राह्मणोंको पर्याप्त मात्रामें गौएँ, वस्त्र, आभूषण, रत्न, स्वर्ण और दक्षिणा दी ॥ ११ ॥ तब ज्योतिषियोंद्वारा बतलानेपर उसने पुत्रका शुभ नाम बल्लाल रखा। बलशाली होनेके कारण वह इसी नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १२ ॥
- यहाँ इन्द्रादि लोकपालगणोंसे इन्द्रादि दस दिक्पालोंका बोध करना चाहिये; क्योंकि लोकपालके रूपमें गणेश, देवी दुर्गा, वायु, आकाश और दोनों अश्विनीकुमारोंका ही प्रायः बोध होता है— गणेशश्चाम्बिका वायुराकाशश्चाश्विनौ तथा। ग्रहाणामुत्तरे पञ्च लोकपालाः प्रकीर्तिताः ॥ (स्कन्दपुराण) दस दिक्पाल इस प्रकार हैं—१. इन्द्र, २. अग्नि, ३. यम, ४. निर्ऋति, ५. वरुण, ६. वायु, ७. कुबेर, ८. ईशान, ९. ब्रह्मा तथा १०. अनन्त।