भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 656 में से

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पृष्ठ 77

उ०ख०-अ०१७ ] * भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे मल्लयुद्ध करना * ७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]

शत्रु्का वध करेंगे या मरकर पुनर्जन्म प्राप्त करेंगे॥ १० ॥ उन दोनोंने इस प्रकारका निश्चय करके युद्धकी इच्छावाले श्रीहरिसे कहा- हे पुरुषश्रेष्ठ! हमारी रणेच्छाकी शान्तिके लिये तुम दिखायी दिये हो। अब हम दोनोंके दृष्टिगोचर हो जानेपर तुम कैसे श्रेष्ठताको प्राप्त कर सकते हो ? ॥ १११/२ ॥ [ भृगु ] मुनि बोले- [ हे राजन् ! ] उन दोनोंकी इस प्रकारकी बात सुनकर विष्टरश्रवा भगवान् श्रीहरिने कहा- ॥ १२ ॥ श्रीहरि बोले- हे महादैत्यो ! तुम दोनोंने ठीक ही कहा है, अब तुम दोनों मुझसे यथेष्ट युद्ध करो। [वैसे] कोई भी अपने मरणकी कामना स्वयं नहीं करता ॥ १३ ॥ वे दोनों [ मधु और कैटभ ] बोले- हे देवेश ! आप चार भुजाओंवाले हैं, इसलिये आप हम दोनोंको बाहुयुद्ध प्रदान करें अर्थात् हम दोनोंसे बाहुयुद्ध करें ॥ १३१/२ ॥ मुनि बोले- [हे राजा सोमकान्त !] उनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीहरिने प्रसन्नतापूर्वक 'तथास्तु' कहा ॥ १४ ॥ चतुर्भुज भगवान् श्रीहरिने अपने आयुधोंका त्यागकर उन दोनोंसे युद्ध करना प्रारम्भ किया। वे दोनों (मधु और कैटभ) भुजाओंसे ताल ठोंकते हुए श्रीहरिका वध करनेके लिये उनके सिरपर अपने सिरसे, जंघाओंपर जंघाओंसे, कुहनियोंपर कुहनियोंसे, भुजाओंपर भुजाओंसे, टखनोंपर टखनोंसे, नासिकापर नासिकासे, मुष्टियोंपर मुष्टियोंसे, पीठपर पीठसे प्रहार कर रहे थे और उन्हें मण्डलाकार (गोल-गोल) घुमा भी रहे थे ॥ १५-१७ ॥ [ ब्रह्माजी कहते हैं-] हे महामुने ! इस प्रकार उनका (विष्णु और मधु-कैटभका) वह आपसका युद्ध बहुत समयतक चलता रहा और पाँच सहस्र दिव्य वर्ष बीत गये, परंतु भगवान् श्रीहरि उन दोनोंको जीतनेमें समर्थ नहीं हो सके। तब उन्होंने गानविशारद गन्धर्वका रूप धारण किया और वनके अन्तःभागमें जाकर वीणावादन और सुन्दर गायन प्रारम्भ किया। [उनके इस गायन और वादनको सुनकर] हरिण, हिंसक पशु,

[दायाँ स्तम्भ]

मनुष्य, देवता, गन्धर्व और राक्षस अपने-अपने क्रियाकलाप छोड़कर उसे सुननेमें तत्पर हो गये। उनके इस आलापको कैलासपर्वतपर विराजमान भगवान् शंकरने बार-बार सुना ॥ १८-२१ ॥ तब भगदेवताके नेत्रोंका हरण करनेवाले भगवान् शंकरने निकुम्भ और पुष्पदन्तसे कहा कि 'यह जो वनमें गायन कर रहा है, उसे शीघ्र ले आओ' ॥ २२ ॥ तब उन दोनोंने वहाँ जाकर उन गन्धर्वरूपधारी श्रीहरिका दर्शन किया और उनसे कहा कि हे निष्पाप ! तुम्हारे गीतकी ध्वनि सुनकर देवाधिदेव भगवान् शंकर अत्यन्त हर्षित हुए हैं, उन्होंने तुम्हारे गायनका श्रवण करनेके लिये तुम्हें बुलाया है, तुम हम दोनोंके साथ शीघ्र ही उनके पास चलो ॥ २३-२४ ॥ उन दोनोंकी ऐसी बात सुनकर वे शिवभक्त गन्धर्वरूपी विष्णु उन दोनोंके साथ वहाँ गये, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर थे। वहाँ उन्होंने अर्धचन्द्रको सिरपर धारण किये हुए, गजासुरके चर्मको परिधानके रूपमें पहने हुए, रुण्डमालासे विभूषित, पिंगल वर्णकी जटाओंसे शोभित, सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए पार्वतीवल्लभ [ भगवान् शिव]-को देखा और शरणागतोंके कष्टोंको नष्ट करनेवाले भगवान् विश्वेश्वरको पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया ॥ २५-२७ ॥ तब उन गिरिशायी भगवान् शिवने उन अधोक्षज विष्णुको अपने हाथोंसे उठाकर उन्हें आसन प्रदान किया और उनका पूजन किया ॥ २८ ॥ तब उन [गन्धर्वरूपधारी] श्रीहरिने कहा कि आज मेरा जन्म सफल हो गया; जो कि आज मुझे धर्म-अर्थ- काम और मोक्षके प्रदायक आपका दर्शन हो गया ॥ २९ ॥ तदनन्तर उन गन्धर्वरूपधारी श्रीहरिने गानपरायण होकर वीणाके निनाद, विविध आलाप और पदोंके मधुर गानसे उन देवाधिदेवको तथा स्कन्द, गणेश्वर, देवी पार्वती, देवताओं और ऋषियोंको सन्तुष्ट किया। तब महेश्वर भगवान् शंकरने शंख-चक्र-गदा-पद्म और सुन्दर पीताम्बर धारणकर प्रकट हुए श्रीहरि विष्णुका आलिंगनकर प्रेमपूर्वक कहा-हे हरे ! मुझे तुम्हारे गायनसे

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