भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 656 में से

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पृष्ठ 76

७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अवतार-ग्रहणरूपी संकटमें डाल दिया जाता है ॥ २४ ॥ आप इन दोनों दुष्टात्मा दुराधर्ष दैत्यों मधु और कैटभको मोहित कीजिये और इन्हें मारनेके लिये इन (श्रीहरि)-को ज्ञान प्रदान कीजिये * ॥ २५ ॥ मैं उन दोनोंके द्वारा पूर्वजन्ममें सावधानीपूर्वक आराधित हुआ था तथा मैंने उन्हें अनेक प्रकारके वर दिये थे, इसलिये वे दोनों मेरे द्वारा अवध्य हैं ॥ २६ ॥ इसीलिये मैंने उनके द्वारा कहे गये ऊँचे-नीचे अनेक अपशब्दोंको सहन किया। वे दोनों मुझे मारना चाहते थे; मैंने अनेक स्तोत्रोंसे उनका स्तवन किया, फिर भी वे दोनों अपने दुष्ट स्वभावके कारण मेरा वध करनेके प्रयत्नसे निवृत्त नहीं हुए। हे देवि ! इसीलिये मैंने भगवान् विष्णुका प्रबोधन करनेके लिये आपसे प्रार्थना की ॥ २७-२८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भगवतीकी प्रार्थना' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥ सत्रहवाँ अध्याय भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे मल्लयुद्ध करना, उन्हें जीतनेमें अपनेको असमर्थ समझ गन्धर्वरूपसे गायन-वादनकर भगवान् शिवको प्रसन्न करना और भगवान् शिवका उन्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश देना भृगुजी बोले- जबतक भगवान् विष्णु [निद्रा त्यागकर] उठते, तबतक उन दोनों (मधु और कैटभ)- ने स्वर्गपर आक्रमणकर इन्द्र, यम और कुबेरके भवनोंको अपने अधीन कर लिया ॥ १ ॥ उन दोनों (मधु और कैटभ) - को देखकर देवता सभी ओरको पलायन करने लगे। [उनमेंसे] कुछ चक्कर खाकर गिर गये, कुछ मूर्च्छित हो गये और कुछ अन्य लड़खड़ा गये ॥ २ ॥ तब भगवती योगनिद्राद्वारा निद्रावस्थासे मुक्त किये गये भगवान् श्रीहरिने उन सभी देवताओंको आश्वासन देकर उन दोनों (मधु और कैटभ) - से युद्ध प्रारम्भ किया, जिससे सम्पूर्ण देवताओं, शेषादि सभी नागों, मुनियों, यक्षों और राक्षसोंपर उनके द्वारा किये गये आक्रमणका निवारण किया जा सके ॥ ३-४ ॥ किरीट-कुण्डल धारण किये शंख-चक्र-गदाधारी उन भगवान् श्रीहरिकी वहाँ (उस रणांगणमें) ऐसी शोभा हुई, जैसे घने नीले बादलकी श्यामल छवि हो ॥ ५ ॥ तब उन भगवान् श्रीहरिने महान् ध्वनि करनेवाले शंखको बजाया। उस महान् शब्दसे पृथ्वी और अन्तरिक्ष क्षुभित हो गये ॥ ६ ॥ उस पांचजन्य नामक महान् शंखकी ध्वनि सुनकर उन दोनोंके हृदय विदीर्ण-से हो गये। तब उन दोनोंने भयभीत होकर आपसमें एक-दूसरेसे कहा - ॥ ७ ॥ हम दोनोंने भूमण्डल, पाताल और इक्कीस स्वर्गोंमें सम्यक् रूपसे आक्रमण किया, परंतु ऐसी ध्वनि नहीं सुनी, जिससे हम दोनोंके वज्रसदृश हृदय काँप उठें, अतः ऐसे बलवान् पुरुषके साथ हमें युद्ध करना चाहिये ॥ ८-९ ॥ युद्धकी इच्छाकी शान्तिके लिये हमें युद्ध करना चाहिये, चाहे विजय मिले या पराजय। या तो हम इस

  • स्वाहास्वधारूपधरा सुधा त्वं मात्रार्धमात्रा स्वररूपिणी च। कर्त्री च हर्त्री जननी जनस्य सतोऽसतः शक्तिरसि त्वमेव ॥ श्रुतिः स्वरा कालरात्रिरनादिनिधना क्षपा। जगन्माता जगद्धात्री सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥ सावित्री च तथा सन्ध्या महामाया तृषा क्षुधा। सर्वेषां वस्तुजातानां शक्तिस्त्वमसि पार्वति ॥ त्रैलोक्यकर्ता त्वन्नाथो दैत्यदानवसूदनः। निद्रया व्याप्तनेत्रोऽसौ ज्ञानविज्ञानवान् हरिः ॥ जगदुत्पाद्यते येन पाल्यते ह्रियतेऽपि च। सोऽपि त्वयावताराणां सङ्कटे विनियोज्यते ॥ दुष्टात्मानौ मोहयतौ त्वं दैत्यौ मधुकैटभौ। हन्तुमेतौ दुराधर्षौ ज्ञानमस्य प्रदीयताम् ॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १६।२०-२५)
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क) · पृष्ठ 76, कुल 656 में से · BharatKosha