भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 656 में से

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पृष्ठ 72

७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हूँ, फिर भी भवसागरसे पार करानेवाले अत्यन्त निर्मल तत्त्वज्ञानकी मुझे प्राप्ति नहीं हुई है। हे अखिलगुरो ! पृथ्वीपर जन्म लेकर आपका भजन करते हुए मैं कब परम भोग, अनुपम सुख और मोक्षको प्राप्त करूँगा ? हे विभो ! आपके [कृपा]-कटाक्षरूपी अमृतसे अभिसिंचित होने कारण मुझ चिरायुकी मृत्यु तो नहीं होगी, परंतु यह आपके लिये ही लज्जाकी बात होगी कि आपका भक्त कष्ट पा रहा है ॥ १५-१६ ॥ भृगुजी बोले- [हे राजन् !] ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करते ही 'तप करो' - इस प्रकारकी आकाशवाणी सुनायी दी। तब उन्होंने पुनः उन (गजानन)- से प्रार्थना की ॥ १७ ॥ [उधर] आकाशवाणी सुनते ही वे अनेकरूपधारी महान् बलशाली विघ्नसमूह उन कमलासन ब्रह्माजीको मुक्त करके अन्तर्धान हो गये ॥ १८ ॥ महान् यशस्वी कमलोद्भव ब्रह्माजी उन विघ्नोंसे मुक्त होकर विचार करने लगे कि 'बिना मन्त्र और बिना स्थानके मैं महान् तपस्या कैसे करूँ?' ॥ १९ ॥ इस प्रकार व्याकुल चित्तवाले ब्रह्माजी जलके मध्य भ्रमण करते रहे, तदनन्तर वे अनन्य भावसे मन-ही-मन अनामय (विघ्नरहित)-स्वरूपवाले गजानन गणेशजीका [इस प्रकारका] ध्यान करने लगे-जो मोतियों और रत्नोंसे जटित सुन्दर मुकुटवाले, लाल चन्दनसे आलिप्त शरीरवाले, सिन्दूरयुक्त अरुणित मस्तकवाले, मोतियोंकी मालासे सुशोभित सुन्दर कण्ठवाले, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित बाजूबन्दसे भूषित, देदीप्यमान पन्ना मणिकी अँगूठियोंसे सुशोभित अँगुलियोंवाले, विशाल नाभिसे शोभित और महासर्पोंसे वेष्टित महान् उदरवाले, विचित्र रत्नजटित करधनीसे सुशोभित कटिप्रदेशवाले, सुवर्णके धागोंसे निर्मित रक्तवस्त्रसे आवृत, मस्तकपर विराजमान चन्द्रमावाले और देदीप्यमान दाँतसे सुशोभित सूँडवाले हैं- ऐसे भगवान् गणेशके स्वरूपका ध्यान करते हुए पुनः यह आकाशवाणी हुई कि 'वटवृक्षको देखो, सुन्दर वटवृक्षको देखो।' तब इस प्रकारका वचन सुनकर ब्रह्माजी पुनः चिन्ताको प्राप्त हो गये ॥ २०-२६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्माजीकी चिन्ताका वर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥ पन्द्रहवाँ अध्याय ब्रह्माजीद्वारा भगवान् गणेशकी आराधना भृगुजी बोले-हे सोमकान्त ! लोकपितामह ब्रह्माजीने व्यासजीसे आगे जो कहा, उसे मैं कहता हूँ; तुम आदरपूर्वक श्रवण करो ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुनिवर ! तत्पश्चात् मैंने एक बड़ा सुन्दर स्वप्न देखा कि मैं आकाशमें भ्रमण कर रहा हूँ और भ्रमण करते हुए मैंने जलमें एक महान् वटवृक्षको देखा ॥ २॥ प्रचण्ड वायु, धूप एवं जलसे [प्रलयकालमें] सम्पूर्ण चराचर जगत्के नष्ट हो जानेपर यह एकमात्र महान् वटवृक्ष कैसे अवशिष्ट रह गया - इस प्रकार आश्चर्यमें पड़े मुझ ब्रह्माको उस महान् वटवृक्षके पत्तेपर एक छोटा-सा बालक दिखायी दिया, जिसके चार भुजाएँ थीं और वह मुकुट-कुण्डलसे सुशोभित था। उसके कण्ठदेशमें मणियों और मोतियोंसे निर्मित माला सुशोभित हो रही थी। उसने मस्तकपर अर्धचन्द्र, शरीरपर रक्तवर्णके वस्त्र और कटिप्रदेशमें करधनी धारण कर रखी थी। तेजसे जाज्वल्यमान उसके श्रीविग्रहमें सम्पूर्ण शरीर मनुष्यके जैसा, परंतु मुख हाथीका था, जिसमें एक दाँत था ॥ ३-५ १/२ ॥ उसे देखकर मैंने विचार किया कि यह बालक कहाँसे यहाँ आ गया? तब उस बालकने सूँडसे मेरे मस्तकपर जलका प्रक्षेप किया तो मैं चिन्ता और